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Biography of Bhisham Sahni in Hindi Language

भीष्म साहनी । Biography of Bhisham Sahni in Hindi Language!

1. प्रस्तावना ।

2. जीवन परिचय एवं रचनाकर्म ।

3. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

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हिन्दी के कथाकारों में भीष्म साहनी एक सशक्त कलमकार हैं, जो नयी कहानी के उन कथाकारों में हैं, जिन्होंने गुलाम भारत के दर्द को न केवल देखा है, वरन् महसूसा भी किया है । भीष्म को हिन्दुओं, सिक्सों और मुसलमानों के जीवन की मिली-जुली संस्कृति के बीच रहना खूब भाया ।

इसी संस्कृति ने उन्हें सर्वधर्म-समभाव की सकारात्मक दृष्टि से सम्पन्न लेखक बनाया । उन्होंने राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विदूपताओं से भरा वह दौर भी देखा है, किन्तु इनके बीच रहते हुए भी अपनी मानवीय संवेदनाओं को आदमी तथा आदमीयत के साथ जोड़े रखा । पात्रों के मनोवैज्ञानिक चित्रण में तथा घटनाओं की यथार्थ अभिव्यक्ति में वे माहिर रहे हैं ।

2. जीवन परिचय एवं रचनाकर्म:

भीष्म साहनी का जन्म 8 अगस्त सन 1915 को रावलपिण्डी (पाकिस्तान) में एक कट्‌टर आर्यसमाजी परिवार में हुआ था । बाल्यावस्था से उनके जीवन पर भारतीय सुधार आन्दोलन पुनर्जागरण काल के घटनाचक्रों का प्रभाव रहा । प्रारम्भिक स्कूली शिक्षा रावलपिण्डी में ग्रहण करने के पश्चात् उन्होंने उच्च शिक्षा लाहौर में ग्रहण की ।

देश विभाजन से पूर्व पैतृक व्यवसाय से जुड़े रहे । इसके बाद अध्यापन, पत्रकारिता और ‘इप्टा’ नाट्‌य मण्डली में अभिनय के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया । भाई बलराज साहनी के साथ स्वप्न नगरी मुम्बई में रहने का स्वप्न अधूरा रह गया । दिल्ली विश्वविद्यालय में स्थायी रूप से प्रवक्ता के रूप में रत हो गये ।

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साहित्य सेवा के साथ-साथ मास्को विदेशी भाषा प्रकाशन विभाग में अपनी सेवाएं दीं । ”नयी कहानियां” पत्रिका का सम्पादन किया । उनकी रचनाओं में ‘”झरोखे”, “कड़ियां”, ”तमस”, “बसन्ती”, “कुंतों”, “भैयादास की माढ़ी”, ”नील-नीलिमा-नीलोफर” उपन्यास विधा से हैं तथा कहानी संग्रह: ”भाग्य रेखा”, ”पहला पाठ”, ”शोभायात्रा”, “निशाचर” तथा डायन इत्यादि हैं ।

नाटकों में ”माधवी”, ”हानुक”, ”कबीर खड़ा बाजार में”, प्रमुख हैं । भीष्मजी की इन समस्त रचनाओं में ”चीफ की दावत”, “कहानी प्रेमचन्द की बूढ़ी काकी” की तरह एक मनोवैज्ञानिक एवं मर्मस्पर्शी कहानी है । ”तमस” उपन्यास में तो उन्होंने देश विभाजन की त्रासदी के बीच साम्प्रदायिक तनाव के बीच टूटते-बिखरते मानवीय रिश्तों तथा युगीन परिस्थिति का यथार्थ चित्रण किया है ।

इस पर टेलीफिल्म भी बनी जो काफी लोकप्रिय रही । भीष्म साहनी की कहानियों का फलक अन्य समकालीन कहानीकारों कमलेश्वर, मोहन राकेश, अमरकान्त, राही मासूम रजा जैसा व्यापक तो नहीं है, तथापि उनकी कहानियां गहरी संवेदना के साथ अपनी सादगी तथा वैचारिक चेतना के तेवर के साथ पात्रों को सामने लाती हैं ।

मानव मन की दुर्बलताओं को उन्होंने जिस तरह से उदघाटित किया है, वह शायद कम लेखकों की शैली में होगा । उन्होंने उर्दू संस्कृत, अंग्रेजी भाषा का प्रयोग आवश्यकतानुसार किया है, जिसमें पंजाबी तथा आंचलिक भाषा के देशज शब्द भी मिलकर प्रभाव उत्पन्न करते हैं ।

3. उपसंहार:

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वे नि:सन्देह हिन्दी के ऐसे कथाकार रहे हैं, जो मानवीय भावों के सबल एवं निर्बल दोनों ही पक्षों को दर्पण की तरह दिखाते चलते हैं । पाठक उन्हें देखते-पढ़ते ही अपनी भावनाओं को व्यक्त किये बिना नहीं रह पाते हैं । वे रचनाधर्मिता के प्रति सजग प्रतिबद्धता के कवि रहे हैं । उनका निधन 11 जुलाई, 2003 को दिल्ली में हुआ ।

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