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“Biography of Ramana Maharishi” in Hindi Language

महर्षि रमण । “Biography of Ramana Maharishi” in Hindi Language!

1. प्रस्तावना ।

2. उनका जीवन व उनके महान् कार्य ।

3. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

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महर्षि रमण एक ऐसे सिद्ध पुरुष थे, जो अपनी मौन वाणी से भी सभी को प्रभावित करने की क्षमता रखते थे । भारतीय आध्यात्मिक जीवन में उन्होंने अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था । कहा जाता है कि वे दूसरों की बातों को मन-ही-मन जान लेने की विलक्षण क्षमता रखते थे ।

2. उनका जीवन व उनके महान् कार्य:

रमण महर्षि का जन्म 30 दिसम्बर 1869 को तमिलनाडु के तिरूचुशी गांव के एक सामान्य परिवार में हुआ था । उनके पिता सुन्दर  अय्यर   वेंकटरमण मदुरै में वकालत करते थे । इस धर्मनिष्ठ ब्राह्मण की पत्नी अवगम्माल अत्यन्त ही धर्मनिष्ठ महिला थी ।

बचपन में जब रमण को पाठशाला पढ़ने भेजा, तो उनका मन पढ़ाई में लगने की बजाय किसी चिन्तन और दर्शन में खो जाता । एक दिन अपने काका के यहां बैठे हुए उनके मन में अचानक ईश्वर बोध तथा मृत्यु बोध जाग उठा ।

अपने शरीर को लम्बा कर उन्होंने श्वास को रोक लिया और कहा: “अब मेरा शरीर मर रहा है, क्या मैं भी मर रहा हूं ? शरीर तो निष्क्रिय और जड़ है, आत्मा ही मुख्य तत्त्व है ।” इसके बाद वे सत्रह वर्ष की अवस्था में अरूणाचल चले गये ।

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चरमसत्य की खोज करते-करते उनका शरीर काला पड़ गया । केश और नाखून भी बढ़ गये । मां ने जब उनकी ऐसी दशा देखी, तो वे उन्हें घर चलने का आग्रह करने लगीं । शरीर भाव से महर्षि बिलकुल शून्य    थे । केवल उनका आत्मरूप ही जीवित था ।

जब वे साधना करते बैठते, तो उनका शरीर पत्थर की तरह जड़ हो जाया करता था । छिपकली, सांप जैसे जीव-जन्तु उनके शरीर पर रेंगते । उन पर इसका कोई असर नहीं होता । ये सभी हिंसक प्राणी महर्षि के चरणों  में  आकर बैठ जाते । मोर, सांप, बन्दर, तोते, कौए सब उनकी शरण में रहने के बाद अपने-अपने घरों को लौट जाते । उनको जड़ अवस्था में देखकर लड़के पागल समझाकर उन्हें कंकड़, पत्थर से मारते ।

एक बार तो कुछ चोरों ने उनके आश्रम में धन की खोज में रमणजी की खूब पिटाई की । चोरों की दुष्टता की खबर पाकर पुलिस के आने पर उन्होंने किसी भी प्रकार की शिकायत दर्ज नहीं की । पशु-पक्षियों द्वारा काट खाये जाने पर भी उनका व्यवहार उनके प्रति सहय ही रहा ।

3. उपसंहार:

महर्षि रमण अन्तर्मुखी साधना   में लीन ऐसे पुरुष थे, जिन्होंने शरीर की जगह आत्मा को ही प्रमुख माना । उनका कहना था: ”आप शरीर से जितना काम ले सकते हो, उतना लो और बाद में इसे छोड़ दो ।”

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