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Essay on Marriage in Hindi | India

Read this essay in Hindi language to learn about the tradition of marriage in India.

भारतीय परिवार और विवाह संस्थाएँ दीर्घकाल से यहाँ प्रभावशाली रही हैं । हिन्दू विवाह भारतीय समाज के इतिहास में एक महत्वपूर्ण संस्था है । इसके अन्तर्गत करोड़ों मानवों का जीवन संचालित होता आया है तथा इसके आदर्शों के अनुसार चलकर वे अपने विविध शक्तियों में सन्तुलन करते रहे हैं ।

यह पाँच सहस्र वर्षों से भी अधिक प्राचीन एवं एक सामाजिक संस्था है जिसके ढाँचे में समयानुसार परिवर्तन होता रहा है । परन्तु इसकी आत्मा यथावत् सुरक्षित रही है । हिन्दू विवाह यद्यपि अपना एक विशिष्ट रूप रखता है फिर भी सामान्य विवाह की संस्था से बिल्कुल भिन्न नहीं अपितु उसका एक प्रकार है ।

पृथ्वी पर विचरित सभी प्राणियों में काम भावना पाई जाती है । स्त्री-पुरूष मिलन से ही सृष्टि आगे बढ़ती है, अर्थात् स्त्री-पुरुष केवल अपने आनन्द के लिए ही विवाह नहीं करते, उसके साथ-साथ उनके कुछ अन्य लक्ष्य भी होते हैं; जैसे सन्तानोत्पत्ति व समाज की सुरक्षा ।

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प्रत्येक स्त्री की हार्दिक इच्छा होती है कि वह माँ बने इसके लिए विवाह आवश्यक है । उसे गर्भावस्था से बड़े होने तक बच्चे की देखरेख के लिए पुरूष की सहायता व सुरक्षा की आवश्यकता होती है । अत: उसे विवाह के कथन में बंधना पड़ता है । सन्तान की कामना का एक अन्य कारण है: वृद्धावस्था में आश्रय व देखभाल । हिन्दू परिवार में यह कार्य सन्तान ही करती है ।

विवाह एक सार्वभौमिक संस्था: (Marriage is a Universal Institution)

जैसा ऊपर बताया गया है कि विवाह एक प्राचीन एवं सामाजिक संस्था है । इसका अस्तित्व पूरे विश्व में किसी-न-किसी प्रकार से निरन्तर रहा है । इसका अर्थ है कि विवाह को एक सार्वभौमिक संस्था माना जाता है ।

हिन्दू विवाह के उद्देश्य (विशेषताएं): (Aims of Hindu Marriage)

हिन्दू विवाह केवल एक सामाजिक बन्धन तथा स्त्री-पुरूष में सम्बन्ध ही नहीं है, अपितु भारतीय हिन्दू समाज में विवाह एक धार्मिक संस्कार है ।

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हिन्दू विवाह दो आत्माओं व अनेक जन्मों का अटूट बन्धन है, जोकि निम्न उद्देश्यों की पूर्ति करता है:

(1) धर्म पालन (Dharma or Religious Duties):

विवाह का प्रथम उद्देश्य धर्म पालन है । वैदिक युग में यज्ञ अनिवार्य था, किन्तु यज्ञ पत्नी के बिना पूरा नहीं हो पाता । प्रत्येक हिन्दू के लिए पंच महायज्ञ: ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, पितृयज्ञ तथा नूतज्ञ सम्पन्न करना अनिवार्य था और अविवाहित पुरूष इन्हें पूर्ण नहीं कर सकता था । अत: विवाह का प्रथम उद्देश्य धर्म का पालन करना है ।

(2) सन्तान या पुत्र प्राप्ति (Progeny):

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हिन्दू विवाह का दूसरा उद्देश्य सन्तानोत्पत्ति है । विशेषतया मनुष्य में पुत्र की कामना प्रबल होती है । हिन्दुओं में ऐसा विश्वास है कि पुत्र प्राप्ति से मोक्ष प्राप्ति हो सकती है । पाणिग्रहण के मन्त्रों में वर-वधू से कहता है कि मैं उत्तम सन्तान के लिए तेरा पाणिग्रहण करता हूँ ।

पुरोहित भी वर-वधू को आशीर्वाद देते हुए ‘पुत्रवती भव: कहता है ।

वेदों के अनुसार, मनुष्य तीन प्रकार के ऋणों को लेकर जन्म लेता है:

(1) पितृऋण,

(2) ऋषिऋण,

(3) देवऋण ।

सन्तान उत्पन्न करके मनुष्य अपने दायित्वों को पूर्ण करते हुए ही इन ऋणों से मुक्ति प्राप्त कर सकता है ।

(3) रति या काम सुख (Sexual Pleasure):

शास्त्रों में विवाह का तीसरा उद्देश्य रति बताया गया है । केवल मनुष्य ही नहीं बल्कि पृथ्वी पर विचरित सभी प्राणियों में काम की प्राकृतिक भावना पाई जाती है । स्त्री-पुरूष के सम्बन्ध होने से एक-दूसरे को सन्तुष्टि प्राप्त होती है तथा यही सृष्टि की उत्तम रचना का मुख्य आधार है ।

अत: उपर्युक्त बातों से अर्थ निकलता है कि काम सन्तुष्टि को नियमित करने व सामाजिक मान्यता देना ही विवाह का उद्देश्य है । यदि हम हिन्दू शास्त्रों पर दृष्टि डालें तो उसमें काम वासना को आवश्यक माना गया है तथा विवाह के द्वारा ही उसे उचित मार्ग दिया गया है । शास्त्रों का यह भी मानना है कि काम भावना का दमन करना व्यक्तित्व के विकास में बाधा है, इस प्रकार विवाह के ही द्वारा इसे उचित रीति-रिवाजों द्वारा सन्तुष्ट करना चाहिए ।

(4) मोक्ष की प्राप्ति (Attainment of Salvation):

हिन्दू अन्यों के अनुसार धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरूषार्थों की प्राप्ति के लिए आवश्यक माना गया है । हिन्दू शास्त्र यह भी कहते हैं कि विवाह किए बिना व्यक्ति को मोक्ष नहीं मिल सकता । अत: हिन्दू विवाह एक धार्मिक संस्कार के रूप में माना गया है ।

(5) सामाजिक ढाँचा (Social Structure):

हिन्दू विवाह एक विस्तृत सामाजिक ढाँचे के रूप में विकसित हुआ है । हिन्दू विवाह सम्पन्न होने के लिये अनेक विधियों एवं उत्सवों की आवश्यकता है । भिन्न-भिन्न क्षेत्र में विभिन्न रीति-रिवाज प्रचलित हैं, परन्तु फिर भी हिन्दू विवाह की रीति या आधार एक ही हैं ।

विवाह के लिए शारीरिक योग्यताएँ (Physical Abilities for Marriage):

विवाह करते समय माता-पिता को इस बात का ध्यान अवश्य ही रखना चाहिए कि विवाह के समय वर व वधू दोनों युवावस्था में प्रवेश पा चुके हों । दोनों शारीरिक रूप से पूर्ण विकसित, स्वस्थ व निरोग हों । इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि दोनों के शरीर में प्रजनन से सम्बन्धित कोई रोग न हो ।

(A) पूर्ण परिपक्वता (Maturity):

विवाह सिर्फ सुन्दर कपड़े, आभूषण तथा घूमना-फिरना ही नहीं है अपितु विवाह पति-पत्नी का एक ऐसा बन्धन है जिसमें जीवन-भर उत्तरदायित्वों को निभाना पड़ता है । इसके लिए आवश्यक है कि विवाह से पहले दोनों शारीरिक व मानसिक रूप से परिपक्व हों, जिससे उनमें सन्तान उत्पन्न करने की क्षमता भी हो जाती है ।

पूर्ण परिपक्वता आयु के अनुसार ही आती है । इस समय बालक व बालिका दोनों का शारीरिक व मानसिक रूप से पूर्ण विकास हो जाता है तथा वे दोनों विवाह सम्बन्धी अपने दायित्वों को भली-भाँति समझते हैं । अत: विवाह के समय लड़की की आयु कम-से-कम 18 वर्ष और लड़के की आयु 21 वर्ष हो जाने पर ही विवाह करना उचित होता है ।

इस आयु तक वे दोनों पूर्ण रूप से विकसित होते हैं तथा स्वास्थ्य भी उत्तम रहता है, इसके साथ-साथ वे स्वस्थ, निरोगी व दीर्घजीवी सन्तान उत्पन्न कर सकते हैं तथा वे आवश्यकतानुसार सन्तान की संख्या पर नियन्त्रण भी कर सकते हैं ।

(B) रोग मुक्तता (Disease Free):

किसी भी व्यक्ति को अच्छी तरह से देखने के पश्चात् उसके बाहरी स्वास्थ्य की जानकारी तो हो जाती है; जैसे-उसके शारीरिक गठन, कद, चेहरे व आँखों की रौनक आदि उत्तम स्वास्थ्य का चिह्न है । परन्तु कभी-कभी देखा गया है कि ऊपरी रूप से स्वस्थ व्यक्ति किसी प्रकार के गुप्त रोग (syphilis) से पीड़ित हो जो पति-पत्नी के सम्बन्धों में विकार उत्पन्न करता है ।

यदि प्रजनन अंग में किसी भी प्रकार का विकार है तो वे सन्तान उत्पत्ति में असमर्थ होंगे साथ-ही-साथ समाज को रोगी सन्तान प्रदान करेंगे जो जीवन-भर उनके लिए बोझ होगी । अत: व्यक्ति व समाज दोनों की भलाई के लिए ऐसा कानून होना चाहिए जिसके अन्तर्गत विवाह से पूर्व स्त्री-पुरूष के शरीर व स्वास्थ्य की पूर्ण जाँच हो । जब चिकित्सक (योग्य डॉक्टर) उन्हें स्वस्थ घोषित कर दे तभी विवाह करना चाहिए ।

चिकित्सक वैज्ञानिकों के मतानुसार आमवात ज्वर (Rheumatic fever) मिर्गी, रक्तदाब (High Blood Pressure), तपेदिक, गुर्दा रोग, मधुमेह या मानसिक रूप से पीड़ित व्यक्तियों को विवाह नहीं करना चाहिए । कभी-कभी परिवार वाले इन रोगों को छिपाकर विवाह करते हैं जिससे पति-पत्नी का जीवन अत्यन्त कष्टमय हो जाता है ।

उपर्युक्त बातों से तात्पर्य है कि रोगी व प्रजनन अंगों के विकार से पीड़ित युवक व युवतियों को एक-दूसरे से इस बात को छिपाकर विवाह नहीं करना चाहिए यह सर्वथा अनुचित है । यदि परिवार के लोग इस बात को नहीं बताते हैं तो युवक-युवतियों को आपस में मिलकर इस बात को स्पष्ट करना चाहिए यह उनका भी दायित्व बनता है ताकि उनका भावी जीवन सुखमय हो सके । यहाँ यह भी बताना अनिवार्य है कि रक्त सम्बन्धियों का आपस में विवाह करना प्राणि-विज्ञान के नियमों के अनुसार निषेध माना गया है । इसका प्रभाव भावी सन्तान पर पड़ता है ।

वैवाहिक समायोजन: (Marital Adjustment)

भारतीय समाज में विवाह एक धार्मिक व अटूट बन्धन माना जाता है । कहा जाता है कि सात फेरे लेने से सात जन्म तक का सम्बन्ध हो जाता है । हमारे समाज में सभी सामाजिक संस्थाओं में विवाह नामक संस्था का अपना अलग रूप व महत्व है ।

विवाह एक सुखमय व आनन्दित जीवन की आधारशिला है, परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि विवाह के पवित्र बन्धन में बँधने के पश्चात् पति-पत्नी सुखी जीवन व्यतीत करें । अनेक बार वैवाहिक जीवन सुख की अपेक्षा दुःख का कारण बन जाता है तथा पति-पत्नी का जीवन दूभर हो जाता है ।

विवाह के पश्चात् शुरू के दिन स्वप्न के समान होते हैं साथ ही पति-पत्नी चाहते हैं कि वे स्वप्न संसार में विचरण करते रहें, परन्तु सभी दम्पत्ति में ऐसा नहीं होता कुछ समय पश्चात् आपस में लड़ाई-झगड़े होने लगते हैं जिससे जीवनयापन अत्यन्त कष्टदायक होता है । इस सबका प्रभाव उनकी सन्तान पर सर्वाधिक होता है ।

बच्चों के मानसिक विकास पर इसका बुरा प्रभाव उड़ता है, जिससे वे अपने संगी-साथियों के साथ ठीक प्रकार से समायोजित नहीं हो पाते । पति-पत्नी वैवाहिक जीवन की गाड़ी के दो पहियों के समान होते हैं । यदि एक पहिया असन्तुलित हो जाए तो गाड़ी गतिहीन हो जाती है ।

गाड़ी को सन्तुलित रूप से चलाने के लिए दोनों पहियों को समान रूप से कार्य व गति करनी चाहिए इसी प्रकार गृहस्थी रूपी गाड़ी को चलाने के लिए पति-पत्नी को आपस में सहयोग व सामंजस्य स्थापित करना चाहिए ताकि उनके परिवार सुख-शान्ति बनी रहे ।

वे समाज को अपनी सन्तान के रूप में श्रेष्ठ नागरिक दे सकेंगे । अत: जिस प्रकार विवाह एक स्थायी परिवार का आधार है, उसी प्रकार वैवाहिक समायोजन अर्थात् अनुकूलन भी स्थायी विवाह बन्धन के लिए अनिवार्य शर्त होती है ।

पति-पत्नी को पूरा प्रयास करके अपने वैवाहिक बन्धन को टूटने से बचाना चाहिए इसके साथ उन्हें आपसी सच्चे प्रेम, बलिदान और सहानुभूति की भावनाओं को अत्यन्त मजबूत बनाना चाहिए ताकि यदि परिवार में कोई विपत्ति आए तो इस बन्धन पर किसी प्रकार का कुप्रभाव न हों ।

यह कार्य तभी सम्पन्न हो सकेगा जब पति-पत्नी में दृढ़ संकल्प हो कि वे किसी भी प्रकार की छोटी-बड़ी परेशानियों से विचलित नहीं होंगे तथा अपने व अपने बच्चों के जीवन को सुखमय बनाएँगे । यही वैवाहिक समायोजन का सार है ।

वैवाहिक समायोजन का अर्थ: (Meaning of Marital Adjustment)

वैवाहिक समायोजन का अर्थ है कि पति-पत्नी एक-दूसरे की आदतों, विचारों व स्वभाव के अनुसार अपने को ढालें तथा आपस में प्रेमपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखें । इसके साथ-साथ उन्हें त्याग, सहयोग व सहानुभूतिपूर्वक जीवन व्यतीत करना चाहिए । यही वैवाहिक समायोजन या अनुकूलन (Marital Adjustment) है जिससे वैवाहिक जीवन सुखी, सन्तुष्ट व समृद्धिशाली बनता है ।

वैवाहिक समायोजन के आवश्यक तत्व: (Essential Factor of Marital Adjustment)

वैवाहिक जीवन को सुखी बनाने के लिए समायोजन की अधिक आवश्यकता होती है, क्योंकि इसके बिना दाम्पत्य जीवन सुखमय नहीं रह सकता, जिस प्रकार, वायु एवं जल के बिना मानव का अस्तित्व नहीं रह सकता, ठीक उसी प्रकार दाम्पत्य जीवन में समायोजन होना आवश्यक है ।

अत: पति-पत्नी को निम्न तत्वों को ध्यान में रखना चाहिए ताकि उनके वैवाहिक जीवन में समायोजन हो सके:

(i) धार्मिक विचारधारा (Religious Thoughts)

हिन्दू विवाह एक धार्मिक व पवित्र संस्कार है । कुछ लोगों का मानना है कि जोड़ियाँ ऊपर यानि स्वर्ग से बनकर आती हैं, जिसको समाज में विधिवत् धार्मिक संस्कारों द्वारा मान्यता दी जाती है ।

हिन्दू विवाह में अग्नि के सम्मुख सप्तपदी के संस्कार द्वारा जीवनभर साथ निभाने का वचन लेते हैं । तात्पर्य है कि यदि इन्हीं वचनों को वे अपने जीवन में उतार लें वे अपने जीवन में भली प्रकार सामंजस्य स्थापित कर सकते हैं ।

(ii) कर्तव्यों का निर्वाह (Fulfillment of Responsibility):

विवाह एक दम्पत्ति को विभिन्न कर्तव्यों से बाँधता है । अत: पारिवारिक आवश्यकताओं के अनुसार पति-पत्नी अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हैं तो उन्हें अपने कर्तव्यों व दायित्वों का उचित रूप से पालन करना चाहिए ताकि उनके वैवाहिक जीवन में भली प्रकार सामंजस्य स्थापित हो सके ।

(iii) विश्वास (Trust):

वैवाहिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण आधार हें: आपस में विश्वास तभी विवाह रूपी संस्था सफल हो पाती है । यदि दाम्पत्य जीवन में विश्वास की कमी है तो विवाह टूटने में देर नहीं लगती । प्रत्येक परिवार में विभिन्न कार्यों को करने की अलग-अलग रीतियों होती हैं ।

पत्नी एक अलग परिवार से पति के घर आती है जहां अलग वातावरण मिलता है यदि वे आपस में विश्वास न करके छोटी-छोटी बातों पर एक-दूसरे के ऊपर दोषारोपण करेंगे या एक-दूसरे पर छींटाकसी करेंगे तो जीवन कष्टप्रद होगा । अत: इन सब बातों पर अधिक ध्यान न देकर परस्पर प्रेमपूर्ण सम्बन्ध बनाना आवश्यक है ।

(iv) सहयोग (Support):

गहस्थी की गाड़ी पति-पत्नी दोनों के आपसी सहयोग से ही कुशलतापूर्वक चलती है । हमारे भारतीय समाज में पति-पत्नी के कार्य बंटे हुए हैं । पति धन कमाने के लिए बाहर जाता है तथा पत्नी गृह की व्यवस्था करती है, परन्तु वर्तमान महँगाई के युग में महिलाओं को भी बाहर काम करना पड़ रहा है ताकि वे आर्थिक रूप से अपने पति की मदद कर सकें ।

इस परिस्थिति में पत्नी को पति के सहयोग की अत्यन्त आवश्यकता होती है । पति का यह कर्तव्य हो जाता है कि वह पत्नी के गृह कार्यों में अपना सहयोग दे तथा उसका हाथ बंटाए । साथ ही पत्नी से सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार रखे न कि बात-बात पर व्यंग्य-बाणों से उसके हृदय को छलनी करे ।

दूसरी ओर पत्नी को भी चाहिए कि वह पति के विचारों का पूरा-पूरा आदर करे, उसकी विभिन्न रुचियों का ध्यान रखे, आर्थिक स्थिति खराब होने पर उसकी यथासम्भव उचित आर्थिक मदद करे । अत: इस प्रकार पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे के दुख-सुख को समझकर आपस में सहयोग करेंगे तो उनका वैवाहिक जीवन सुखमय बना रहेगा ।

(v) जीवन साथी का उचित चुनाव (Selection of Perfect Life Partner):

वैवाहिक समायोजन के लिए केवल पति-पत्नी ही जिम्मेदार नहीं होते, अपितु भारतीय परिवारों में विवाह अधिकतर माता-पिता के चुनाव द्वारा होता है । अत: माता-पिता का यह कर्तव्य है कि वे अपने बच्चों के सुखी वैवाहिक जीवन के लिए उचित साथी का चुनाव करें तथा इस बात का भी ध्यान रखें कि उनकी रुचियाँ, स्वभाव, प्रवृत्ति व आकांक्षा आदि एक-दूसरे के अनुरूप हों । यदि विवाह में इन तत्वों पर ध्यान नहीं दिया गया तो विवाह के बाद पति-पत्नी में झगड़े, मनमुटाव आदि होने लगते हैं ।

वर्तमान युग में हर पढ़ा-लिखा लड़का अपने समान पढ़ी-लिखी व स्मार्ट लड़की चाहता है, परन्तु यदि माता-पिता दहेज के लालच में लड़के का विवाह कम पड़ी या गँवार लड़की से कर देते हैं तो उसका बुरा परिणाम ही होगा ।

अत: माता-पिता व पति-पत्नी यदि गम्भीरतापूर्वक अच्छी तरह सोच-समझकर हर बात का निर्णय लें तथा अपने-अपने कर्तव्य का पालन करें तो निश्चित ही उनका वैवाहिक जीवन सुखी होगा साथ-ही-साथ उन्हें वैवाहिक अनुकूलन की भी किसी प्रकार की समस्या नहीं आएगी ।

वैवाहिक जीवन में संघर्ष के कारण: (Reason of Married Life Problems):

यह कहावत सत्य है, ”जो खाए वह पछताए जो न खाए वह भी पछताए ।” विवाह के सम्बन्ध में कहावत पूर्ण रूप से ठीक है । इसका अर्थ है कि पति-पत्नी का आपसी सम्बन्ध अनेक राग-द्वेषों से भरा हुआ है तथा आपसी सहयोग व प्रेम की नींव पर आधारित है ।

यदि पति-पत्नी में अहंकार की भावना के कारण एक-दूसरे से उचित सम्बन्ध नहीं बन पाता या एक-दूसरे के प्रति लापरवाह होते हैं अथवा वे स्वयं ही अपने वैवाहिक जीवन को अनुकूल बनाने का प्रयत्न नहीं करते हैं तो उनके जीवन में कलह ही होता है ।

ऐसे लोग बात-बात पर आपस में लड़ते-झगड़ते हैं । इसी स्थिति को संघर्ष या ‘असामंजस्य की स्थिति’ (Marital Maladjustment) कहते हैं ।

वैवाहिक असामंजस्य के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

(a) संवेगात्मक असन्तुलन (Emotional Disturbance):

वैवाहिक जीवन का मुख्य आधार है: पति-पत्नी का आपसी प्रेम । यदि प्रेम सच्चा है तो त्याग की भावना भी होगी तथा जीवन रूपी नाव आंधी-तूफान का भी सामना बिना डोले अपने उद्देश्यों को पूर्ण करने में सफल होगी । जन्म से ही बच्चे में संवेगात्मक भावना होती है ।

यदि पति-पत्नी विवाह के आरम्भ से आपस में आवेगपूर्ण अनुराग रखें तो सच्चा व स्थायी प्रेम उत्पन्न हो जाता है । यही प्रेम वैवाहिक जीवन के सुख का मुख्य आधार है जो पूरे जीवन चलता रहता है । यहाँ यह कहना आवश्यक है कि पति-पत्नी दोनों को ही संवेगात्मक मनोभाव पर नियन्त्रण रखने की योग्यता होनी चाहिए ।

यदि वे कभी आवेग में भी आ जाते हैं तो उनके बीच में एक-दूसरे के प्रति कटुता की भावना आ जाती है । अत: इस पर नियन्त्रण रखने के लिए उन्हें क्रोध के समय समझदारी, विवेकशीलता तथा सहनशीलता से कार्य करना चाहिए जिससे कई कठिनाई आसानी से दूर हो जायेंगी ।

आज के युवक-युवतियाँ पश्चिमी जीवन शैली से प्रभावित होकर प्रेम विवाह कर रहे हैं । पश्चिमी देशों के प्रेम विवाह अधिकांश अस्थायी ही होते हैं । हमारे देश के युवक-युवतियाँ प्रेम नहीं रोमांस पर अधिक विश्वास कर रहे हैं, परन्तु सच्चाई और कल्पना में तालमेल नहीं बैठ पाता जिस कारण वैवाहिक जीवन अत्यन्त दुखपूर्ण हो जाता है ।

काफी हद तक चलचित्र, टेलीविजन, कहानी, उपन्यास में प्रेम प्रसंगों को देखकर आज के युवा प्रभावित हो रहे हैं जिसे वे अपने जीवन में उतारना चाहते हैं । वे इस बात पर ध्यान नहीं देते कि जीवन में सच्चे प्रेम की आवश्यकता होती है, चलचित्रों की तरह लुभावने प्रेम की नहीं ।

वे विवाह तो सिर्फ काम वासना की पूर्ति के लिए करते हैं, उनके सामने विवाह का उच्च कारण या कोई उद्देश्य नहीं होता है । आज का युवक समझता है कि विवाह का आधार केवल उन्मूक्त प्रेम ही है, आवेश में आकर वे प्रेम के लिए जान भी देने में संकोच नहीं करते ।

उनका मानना है कि यह प्रेम का उनक स्वरूप सदैव ही एकसमान बना रहेगा, परन्तु ऐसा नहीं होता समय के साथ-साथ जब प्रेम का नशा उतरने लगता है तथा वे यथार्थ की धरती पर आ जाते हैं तो उन्हें जीवन भार के समान प्रतीत होने लगता है । जिस ‘रोमाँस’ की वे कल्पना करते हैं वह विवाह के पश्चात् समाप्त हो जाता है । अत: वह विवाह सफल नहीं हो पाता जिसमें सिर्फ वासना युक्त तथा आवेगपूर्ण प्रेम हो ।

यह सत्य है कि विवाह रूपी पौधा धीरे-धीरे बढ़ता है जिसके लिए सच्चे प्रेम के विकास की आवश्यकता है । पति-पत्नी एक साथ प्रेमपूर्वक जीवनयापन करते हैं तो यह छोटा पौधा धीरे-धीरे एक बड़े व दृढ़ वृक्ष का रूप धारण कर लेता है ।

इसी वृक्ष की छाया में परिवार सुखी व शान्तिपूर्वक रहता है । अत: विवाह का आधार सच्चा प्रेम होना चाहिए न कि शारीरिक आकर्षण । सुखमय जीवन के लिए जीवन साथी के आन्तरिक गुणों को परखना चाहिए न कि बाहरी सौन्दर्य को ।

पति-पत्नी में परस्पर आत्मसमर्पण, त्याग, बलिदान, सेवा की भावना समझना ही सच्चे प्रेम को दृढ़ करना है । सच्चे प्रेम का मूल भाव है-एक-दूसरे पर अपने आपको सब कुछ न्यौछावर कर डालने की कामना । आज का युवा बाहरी आकर्षण, शारीरिक सौन्दर्य व फैशन आदि को भी गृह में जीवन का सत्य समझता है ।

यदि पत्नी कुरूप या फूहड़ मिल गई तो निरन्तर कलह होता रहता है । कुछ युवा उत्साही होते हैं, परन्तु उनको ऐसे जीवन साथी मिलते हैं जिनमें निराशा, आलस्य व निरुत्साह का भाव होता है जिसे देखकर वे दुःखी होते हैं यही दुःख परिवार के कलह का कारण बनता है ।

यदि पति-पत्नी दोनों ही शीघ्र उत्तेजित होने वाले व तेज हो तथा दोनों में से कोई झुकने के लिए तैयार न हो तो ऐसी स्थिति में आपस में सामंजस्य स्थापित करना अत्यन्त कठिन होगा । कभी-कभी गृह स्वच्छता को लेकर भी पति-पत्नी में खिंचाव की स्थिति आती है ।

यदि दोनों में से एक ज्यादा सफाई पसन्द करता है व दूसरा उसके अनुकूल नहीं बन पाता तो एक-दूसरे के लिए घृणा उत्पन्न हो जाती है । हिन्दू समाज एक पुरूष प्रधान समाज है । यहाँ पति में अधिकार की भावना अधिक होती है । भारतीय समाज की धारणा है कि पति आज्ञा देने वाला होता है तथा पत्नी उसकी अनुगामिनी होती है ।

आज के युग में जब स्त्री-पुरूष को समान दृष्टि से देखा जा रहा है तो नारी इस आज्ञा की भावना को सहन करने में असमर्थ होती जा रही है, क्योंकि आर्थिक रूप से वह स्वयं अपने पैरों पर खड़ी होती है तथा उसे अपने अधिकारों का ज्ञान है जिससे आवश्यकता से अधिक दबाब बनाये जाने को वह सहन नहीं कर पाती फलस्वरूप परिवार में संघर्ष का वातावरण उत्पन्न हो जाता है ।

वैवाहिक जीवन का आधार पति-पत्नी के मानसिक स्तर पर भी निर्भर करता है । आजकल लड़कियों के माता-पिता ने उन्हें घूमने-फिरने की पूर्ण स्वतन्त्रता दे रखी है । वे अपनी सहेलियों के साथ रेस्टोरेन्ट, होटल व सिनेमा जाती हैं ।

इसके साथ-साथ विवाह पूर्व भी उन्हें अपने भावी पति के साथ घूमने-फिरने की स्वतन्त्रता मिलती है जिससे वे दिवा स्वप्न देखने लगते हैं कि विवाह केवल घूमना-फिरना व ऐश करना है, परन्तु विवाह के पश्चात् पति धन कमाने में इतना जुट जाता है कि उसके पास पत्नी की इच्छाओं को पूरा करने का समय ही नहीं रहता ।

दिनभर काम करके वह थकहार कर सो जाता है । बड़े शहरों में तो स्थिति और अधिक भयावह है वहाँ चौबीस घण्टों में से कम-से-कम अठारह घण्टे कार्य करना पड़ता है । ऐसी स्थिति में पति पत्नी को घुमाने-फिराने नहीं ले जा पाता जो कि पारिवारिक कलह का कारण बनती है ।

इसके विपरीत कुछ पति चाहते हैं कि उनकी पत्नी फिल्मी सितारों की भांति सदैव ही सज-सँवर कर रहे, परन्तु पत्नी को गृह कार्य में व्यस्त रहने के कारण इतना समय भी नहीं मिल पाता कि वह सदैव सजी-धजी रहे । अत: वैवाहिक अनुकूलता उनके आपसी मानसिक विचारों पर भी निर्भर करती है यदि उनके विचार एक-दूसरे के अनुकूल होंगे तो वैवाहिक जीवन सुखी रहेगा ।

(b) काम भावना की तृप्ति न होना या लैंगिक असमायोजन (Sexual Dis-satisfaction):

काम भावना प्रत्येक प्राणी में पाई जाती है तथा उसका सन्तुष्ट होना भी अति आवश्यक है । यदि पति-पत्नी शारीरिक रूप से एक-दूसरे से सन्तुष्ट हैं तो उन्हें ही मानसिक तृप्ति प्राप्त होती है जिससे उनमें आपसी प्रेम, व्यवहार व सम्बन्ध प्रगाढ़ होते हैं ।

कभी-कभी देखा गया है कि विवाह के पूर्व बाल्यावस्था में यदि बच्चा दूषित जीवन प्राप्त करता है तो विवाह के पश्चात् वह लैंगिक सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाता । बचपन में यौन शिक्षा के अभाव में, यदि वे गलत कार्यों में लिप्त हो जाते हैं या मित्रों के साथ रहकर गन्दी आदतें सीख जाते हैं तो उसका प्रभाव पूरे जीवन तक बना रहता है तथा वैवाहिक अनुकूलन नहीं आ पाता । अत: यह अत्यन्त आवश्यक है कि बचपन से ही बच्चों की यौन जिज्ञासाओं को सन्तुष्ट करने के लिए उन्हें यौन शिक्षा देनी चाहिए ।

इसलिए प्रत्येक पति-पत्नी को शारीरिक रचना व प्रजनन संस्थान के बारे में पूर्ण ज्ञान होना चाहिए तथा विवाह के उद्देश्यों व परिणामों को अच्छी तरह समझना चाहिए । यह कार्य माता-पिता, शिक्षक या उपयुक्त पुस्तकों द्वारा किया जा सकता है ।

पति-पत्नी में से किसी के प्रजनन अंगों में किसी प्रकार का दोष होना भी वैवाहिक जीवन की असफलता का कारण हो सकता है । कभी-कभी स्त्रियाँ गर्भ धारण करने में डरती हैं, बच्चे के पैदा होने के दर्द से घबराती हैं या अपने सौन्दर्य को नष्ट होने का डर भी रहता है इसके साथ-साथ आर्थिक कठिनाइयां भी एक कारण है जिससे वे बच्चे को जन्म देने का साहस नहीं कर पातीं ।

इन सभी कारणों का परिणाम आपसी मनमुटाव के रूप में उभरकर आता है तथा वैवाहिक जीवन कष्टमय हो जाता है । कभी-कभी देखा गया है कि पति-पत्नी की आयु में अत्यधिक अन्तर होता है जिससे उनकी शारीरिक आवश्यकताओं व मानसिक विचारों में अन्तर पाया जाता है जिसके कारण उनमें आपस में प्रगाढ़ता नहीं आ पाती ।

इसके साथ-साथ पति-पत्नी के रहन-सहन पर भी आयु का प्रभाव पड़ता है दोनों में काफी अन्तर होता है जिससे वे एक-दूसरे से अधिक दूर होते जाते हैं तथा आपसी सामंजस्य में बाधा उत्पन्न होती है । अत: यह आवश्यक है कि काम भावना की तृप्ति के लिए उत्तम स्वास्थ्य भी आवश्यक है ।

स्वस्थ व्यक्ति ही अपने सभी उत्तरदायित्वों को उठाता है तथा प्रसन्न रहता है । यदि पत्नी सदैव अस्वस्थ रहती है तो वह चिड़चिड़ी हो जाती है जिस के प्रभाव में पति का मानसिक स्वास्थ्य भी खराब हो जाता है । अत: उत्तम जीवनयापन हेतु पति-पत्नी दोनों का स्वास्थ्य उत्तम होना चाहिए ।

(c)  आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु धन की कमी (Financial Problem):

प्रत्येक परिवार को उनकी मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु धन की आवश्यकता होती है । यदि परिवार की मुख्य आवश्यकताओं की पूर्ति ठीक प्रकार से नहीं हो पाती तो परिवार के सदस्य सुखी व सन्तुष्ट नहीं रह सकते । परिवार में अधिकांशत: झगड़ा धन की कमी के कारण होता है ।

पति की आय कम होने पर पत्नी सबसे ज्यादा असन्तुष्ट होती है, परन्तु ऐसी स्थिति में वह पति को बुरा-भला कहने के स्थान पर अपनी सामर्थ्य व शिक्षा के अनुसार कुछ-न-कुछ व्यवसाय अपना सकती है । इस प्रकार परिवार का आर्थिक क्लेश कम हो जाएगा ।

परिवार में धन व्यय करने का अधिकार किसके पास होना चाहिए । यह भी एक महत्वपूर्ण बात है । इसी को लेकर पति-पत्नी में आपस में लड़ाई-झगड़ा होता है । पुरूष समझता है कि वह कमाई करता है, अत: खर्च का अधिकार उसे ही है । पत्नी को समय-समय पर कुछ धन दे देना ही पर्याप्त है ।

पति का विचार होता है कि पत्नी को घर खर्च के लिए पर्याप्त रुपया मिल जाता है तो वह और अधिक लेकर क्या करेगी, परन्तु कभी-कभी पत्नी उसे मिलने वाली राशि से ज्यादा खर्च कर देती है तो पति से क्लेश होने लगता है ।

जिस परिवार में पति सम्पूर्ण मासिक आय अथवा घर खर्च से अधिक धन पत्नी को देता है तथा आवश्यकता पड़ने पर उससे लेकर व्यय करता है । यह व्यवहार पत्नी को सबसे अधिक सन्तुष्ट करता है तथा पति में भी विश्वास की भावना उत्पन्न होती है ।

अधिकार प्राप्त होने से बहुधा स्त्रियां मितव्ययी हो जाती हैं । उनके पास समय भी होता है कि वे बजट बना सकें तथा आय-व्यय का पूर्ण विवरण रख सकें । यदि व्यय का अधिकार उन्हें दे दिया जाए तो परिवार को लाभ ही होगा ।

पति की जिम्मेदारियां कम हो जाती हैं एवं जीवन सुख से व्यतोत होता है, परन्तु यदि पत्नी इतनी योग्य न हो तो दोनों को आपस में बैठकर विचार-विमर्श करके आय-व्यय का लेखा-जोखा आर्थिक स्थिति के अनुसार बनाना चाहिए । उसकी व्यवस्था का भार बाँटना चाहिए । धन सुख का साधन होना चाहिए न कि संघर्ष का ।

(d) सामाजिक तथा पारस्परिक असामंजस्य: (Social and Mutual Disharmony):

i. संस्कृति और धर्म में अन्तर (Difference in Culture and Religion):

यदि पति-पत्नी विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि में पले-बड़े हुए हैं तो उनकी सभ्यता, धर्म, संस्कृति के प्रभावों में काफी अन्तर हो सकता है । इस प्रकार सम्भव है कि वैवाहिक जावन में कुछ लोगों को छोड़कर अधिकतर प्रेम विवाह करने वालों में झगड़े का कारण यही होता है ।

यदि पुरूष एक संस्कृति को मानता है तथा स्त्री दूसरे वातावरण में पली-बड़ी हुई है । इस प्रकार दो भिन्न संस्कृतियों में पले हुए स्त्री-पुरूष के विचार प्राय: एक-दूसरे के अनुरूप नहीं होते । खान-पान में अन्तर, भाषा मैं अन्तर, व्यवहार के विभिन्न मापदण्ड, उन्नति के भिन्न साधन तथा शिक्षा के विभिन्न रूप सामने आकर जीवन को अधिक विषम बना देते हैं ।

इस प्रकार पति-पत्नी में तनाव बढ़ता जाता है । अत: संस्कृति तथा पारिवारिक विरोध आपस में संघर्ष का कारण बनते हैं । अधिकांशत: यह पाया गया है कि धर्म, नीति, परम्परा में विश्वास रखने वाले दम्पत्तियों का जीवन अधिक शान्तिपूर्वक और से व्यतीत होता है ।

अत: विवाह के पूर्व ही एक-दूसरे की धार्मिक भावना को अच्छी तरह समझना चाहिए नहीं तो आगे चलकर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है । धार्मिक सामंजस्य अथवा विरोध वैवाहिक जीवन पर अधिकाधिक प्रभाव डालते है ।

ii. सम्बन्धियों से अनुकूलन की आवश्यकता (Adjustment with Relatives):

वैवाहिक जीवन में सबसे ज्यादा सामंजस्य में बाधाएँ पति-पत्नी दोनों के परिवार वालों के कारण होती हैं । यहाँ तात्पर्य है कि वैवाहिक सामंजस्य सिर्फ दो लोगों के बीच में नहीं होता, अपितु सामंजस्य इस बात पर भी निर्भर करता है कि ससुराल के अन्य सदस्यों के साथ कैसा सामंजस्य है ।

हालांकि आजकल संयुक्त परिवार व्यवस्था कम होती जा रही है, परन्तु परिवार में अन्य सदस्य; जैसे: सास, ससुर, ननद, देवर आदि तो होते ही हैं । इसके अतिरिक्त संयुक्त परिवार में चाचा-चाची तथा अन्य सम्बन्धियों के बीच रहने के कारण आपस में सामंजस्य नहीं रह पाता ।

यह बात तो आम है कि ”औरत ही औरत की सबसे बड़ी दुश्मन होती है ।” अत: सास, ननद शुरू से ही बहू या भाभी के लिए विरोध भाव रखती हैं । देखा गया है कि सास बहू का संघर्ष सबसे अधिक होता है । आधुनिक विचार के दम्पत्ति को माता-पिता की टोका-टाकी जैसे ‘सिनेमा देखना बुरा है ‘घूमना बुरा है’ ‘इधर मत बैठो’ आदि बातें पसन्द नहीं आतीं ।

बहुधा देखा गया है कि सास-ससुर व माता-पिता के लिए अधिकांश पति-पत्नी कहते हैं कि ”वे शादी के बाद भी हमें बच्चा समझते हैं और हमारे जीवन में दखलंदाजी करते हैं” आदि । इस स्थिति में पति-पत्नी आपस में एक-दूसरे से माता-पिता के लिए कुछ कह भी नहीं पाते जिससे आपसी मनमुटाव एवं मानसिक तनाव बढ़ता जाता है ।

उपर्युक्त सभी परिस्थितियाँ यदि घर का एक सदस्य समझदार, दूरदर्शी व धैर्यवान हो तो परिवार की सारी विषमताएँ दूर हो जाती हैं और पति-पत्नी हँसी-खुशी जीवनयापन करते हैं । परिवार में कुछ ऐसे भी सदस्य होते हैं जो हर समय व्यंग्य-बाण चलाते रहते हैं जिससे परिवार में दिन-रात छोटी-छोटी बातों को लेकर लड़ाई-झगड़ा होता रहता है ।

वृद्ध माता-पिता को लेकर भी अधिकांश पति-पत्नी में क्लेश होता रहता है । वृद्धावस्था के कारण इन्हें अपने बच्चों पर निर्भर रहना पड़ता है तथा वे उन्हीं के साथ जीवन व्यतीत करते हैं । अत: कभी-कभी बच्चों को वृद्ध माता-पिता भार के समान लगते हैं ।

पति-पत्नी में संघर्ष का एक और मुख्य कारण है कि पति की माँ को शादी के बाद लगने लगता है कि उसका पुत्र पर अधिकार नहीं रहा अब वह पत्नी के वश में है, उधर पत्नी सोचती है कि पति माँ की बात अधिक मानता है तथा माँ भी यथासम्भव पुत्र पर अपना प्यार न्योछावर करने से नहीं चूकती, जिससे आपस में संघर्ष की स्थिति बनी रहती है ।

इन परिस्थितियों में बहू को सास का उचित आदर करना चाहिए तथा उन्हें अपनी माँ के समान समझना चाहिए वहाँ सास को भी बहू से प्रेमपूर्वक व्यवहार करना चाहिए तथा उसे अपनी बेटी के समान समझना चाहिए । इस प्रकार पति-पत्नी में संघर्ष की स्थिति ही नहीं आयेगी ।

माता-पिता को भी चाहिए कि वे हर समय बेटे या बहू के कार्य में दखलंदाजी न करें तथा उन्हें गृहस्थी सम्भालने योग्य समझे । कभी यदि किसी भी प्रकार की सलाह या सहायता की आवश्यकता हो तभी देना उत्तम होगा ।

इसके साथ-साथ बेटे-बहू को भी माता-पिता की वृद्धावस्था का ध्यान रखना चाहिए उनकी आवश्यक सेवा श्रद्धा व प्रेमपूर्वक करनी चाहिए तथा उनके सम्मान में किसी भी प्रकार की ठेस न आने दें । वृद्ध माता-पिता अधिकाँशत: प्रेम चाहते हैं ।

इसके साथ-साथ पति-पत्नी दोनों अपनी ससुराल के अन्य सम्बन्धियों से उचित व्यवहार करें, जिससे पति-पत्नी का पारस्परिक जीवन आनन्दमय व सुखमय हो सके माँ अधिकतर बेटी के ससुराल चले जाने पर अपने आपको अकेलापन महसूस करने लगती है ।

बेटी जब ससुराल से मायके आती है तो माँ अत्यन्त लाड़-प्यार से उसका स्वागत करती है । पत्नी की माँ का यही लाड-प्यार संघर्ष का कारण बनता है । पति के दिमाग में यह ख्याल आता है कि पत्नी उसके घर वालों की बुराई करने मायके जाती है । इस प्रकार एक-दूसरे के माता-पिता की निन्दा व आलोचना करना युवक व युवतियों के जीवन को संघर्षमय बना देता है ।

मनोरंजन व मित्रों का वैवाहिक अनुकूलन में स्थान: (Role of Enjoyments Friends in Marriage Adaptation)

हर व्यक्ति की इच्छा होती है कि थक हारकर कुछ मन बहलाया जाए । विवाह के पश्चात् पति-पत्नी खूब मनोरंजन के इच्छुक होते हैं तथा इसके अवसर भी निकाल लेते हैं, परन्तु यदि पत्नी गृह कार्यों में दिनभर व्यस्त रहे व कार्य पूर्ण करके समय निकाल ले तथा पति अपनी नौकरी या व्यवसाय के कारण व्यस्त रहने पर पत्नी की मनोरंजन की इच्छा पूर्ण न कर सके तो दाम्पत्य प्रेम में कमी आयेगी ।

इन परिस्थितियों में पत्नी पति को परेशान करने लगती है तथा दोनों में तनाव उत्पन्न हो जाता है । ‘बडेसि’ और ‘कोइल’ के अनुसार, “जो दम्पत्ति युवावस्था में खूब सैर-सपाटे करते हैं, क्लबों, सोसाइटी में मित्रों के साथ मनोरंजन करते हैं उनका वैवाहिक जीवन अपेक्षाकृत अधिक सुखी व सन्तुष्ट रहता है ।”

मनोरंजन के अभाव में पति-पत्नी एक-दूसरे से दूर हो जाते हैं । पुरूष बाहरी दुनिया में व्यस्त रहता है तथा उसे मनोरंजन के अनेक अवसर प्राप्त होते हैं और उसे कई स्थानों पर आमन्त्रित किया जाता है । इस प्रकार यदि पति-पत्नी की रुचि समान है तथा परिस्थितियाँ दोनों को साथ-साथ रहने का अवसर प्रदान करती हैं तब तो ठीक है, अन्यथा पति-पत्नी एक-दूसरे के प्रति उदासीन हो जायेंगे ।

पति-पत्नी के बीच में कभी-कभी मित्र भी विरोध उत्पन्न करते हैं जिन्हें दूर करना असम्भव हो जाता है । अत: मित्रों के चुनाव में अत्यन्त सावधानी व बुद्धिमता रखनी चाहिए ।

वैवाहिक जीवन को अनुकूल बनाने के उपाय: (Methods of Making Adjustment in Marital life):

भारतीय समाज में विवाह एक धार्मिक संस्कार माना जाता है । हर व्यक्ति की इच्छा होती है कि वह अपनी बेटी या बेटे की शादी धूमधाम से करे । अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही लोग गा-बजाकर शादी करते है तथा ससुराल में बहू का स्वागत किया जाता है उसे गृहलक्ष्मी तथा अन्नपूर्णा कहा जाता है, परन्तु कितने ऐसे दम्पत्ति हैं जो शादी के बाद आजीवन सुखी रहे । ऐसे दम्पत्तियों की संख्या कम ही है ।

अब कुछ ऐसे उपायों का वर्णन किया जायेगा जिससे वैवाहिक जीवन सुखी बनाया जा सकता है:

(I) संवेगों में सामंजस्य (Emotional Adjustment):

वैवाहिक जीवन में आने वाली कटुता स्थायी न हो जाए इसके लिए पति-पत्नी को अपने-अपने संवेगों व भावनाओं पर नियन्त्रण रखना चाहिए । अत: पति-पत्नी को परस्पर विश्वास और सहानुभूतिपूर्वक एक-दूसरे के दुख-सुख में साथ तथा एक-दूसरे को महत्व देना चाहिए ।

(II) आपसी सच्चा प्रेम (True Love):

पति-पत्नी को अपने सम्बन्धों को मधुर बनाने का प्रयास करना चाहिए । एक-दूसरे के प्रेम के बन्धन से वैवाहिक जीवन सुखमय तथा दृढ़ हो जाएगा ।

(III) विश्वास (Trust):

विश्वास वैवाहिक जीवन का मुख्य आधार है । पति-पत्नी के रिश्ते में विश्वास का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है । अपने जीवन साथी से विश्वासघात नहीं करना चाहिए । इसके साथ-साथ एक-दूसरे के लिए समर्पण की भावना रखने से आपस में प्रेम बढ़ता है । अत: आपसी विश्वास से दोनों का जीवन सदैव ही सुखी रहता है ।

(IV) आर्थिक स्थिति (Financial Status):

ऐसा अनेक बार देखा गया है कि विवाह के पश्चात्र कुछ दिनों तक नवयुगल खूब ऐशो-आराम से रहते हैं, घूमते-फिरते हैं तथा शान-शौकत पर इतना धन खर्च कर देते हैं कि बाद में उन्हें आर्थिक तंगी झेलनी पड़ती है । यदि आय सीमित है तो उसी के अनुसार व्यय करें । पति-पत्नी को अपनी सीमित आय के अनुसार बजट बनाकर ही धन व्यय करना चाहिए । इस प्रकार आय-व्यय मैं सन्तुलन रहेगा तथा वे एक-दूसरे पर अधिक खर्च का दोषारोपण भी नहीं कर सकेंगे ।

(V) शिक्षा (Education):

शिक्षित पति-पत्नी से यह आशा की जा सकती है कि अधिक अच्छी तरह समायोजन करें । यहाँ पर इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि शिक्षित व्यक्ति को शिक्षित महिला से ही शादी करनी चाहिए परन्तु यदि पति-पत्नी में से कोई अशिक्षित या दूसरे से कम शिक्षित है तो उसकी शिक्षा को रिश्ते के बीच में नहीं लाना चाहिए ।

(VI) धर्म व संस्कृति (Religion and Culture):

यह अति उत्तम होगा यदि विवाह एकसमान संस्कृति व धर्म में किया जाए । इस प्रकार दोनों के आचार-विचार व व्यवहार में समानता होगी तथा वैवाहिक अनुकूलन में किसी प्रकार की समस्या नहीं आएगी ।

(VII) परिपक्व आयु (Mature Age):

वैवाहिक जीवन में मधुर सम्बन्ध बना रहे इसके लिए विवाह परिपक्व आयु में करना चाहिए । ऐसे व्यक्ति सभी प्रकार की जिम्मेदारियाँ आसानी से उठा लेंगे तथा उनका जीवन हँसते-हँसते कट जायेगा । पति-पत्नी की आयु में भी ज्यादा अन्तर नहीं होना चाहिए अच्छा हो यह अन्तर तीन या चार साल का हो ।

(VIII) परिवार में सामंजस्य (Adjustment in Family):

पत्नी को अपने सास, ससुर, ननद व देवर को उचित मान-सम्मान देना चाहिए । उन्हें अपनी माँ बहन व भाई समान समझना चाहिए । अत: इस प्रकार परिवार में शान्ति का वातावरण बना रहेगा ।

(IX) उत्तरदायित्व (Responsibility):

पति-पत्नी को अपने-अपने उत्तरदायित्व को भली-भाँति निभाना चाहिए । अत: जिस परिवार में पति-पत्नी दोनों को अपने- अपने उत्तरदायित्वों का पूर्ण रूप से ज्ञान होता है वहाँ समायोजन आसानी से हो जाता ।

(X) व्यक्तित्व (Personality):

प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व के अनुसार ही जीवन साथी का चुनाव करना चाहिए ।

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