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My Favourite Moral Story on Humanity | Hindi | Stories

Here is my favourite moral story on ‘Humanity’ written in Hindi language.

पाठशाला के सूचना फलक पर कामिनी ने एक सूचना पढ़ी । सूचना में लिखा था पाठशाला की वार्षिक पत्रिका ‘उत्कर्ष’ के लिए एक संस्मरण तैयार करके दें । सबसे अच्छे सस्मरण को पुरस्कृत किया जाएगा ।

सूचना पढ़कर कामिनी ने मन-ही-मन निश्चय किया कि पिछले दिनों उसके अपने साथ घटी घटना पर वह संस्मरण तैयार करके देगी । इस निश्चय के साथ ही कामिनी की आँखों के सामने वह घटना तैर गई, जो लेखनी के माध्यम से कागज पर उतरने लगी ।

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सुबह-सुबह साढ़े सात बजे के आसपास का समय था । राष्ट्रीय राजमार्ग पर तीव्र गति से एक  ट्रक चला आ रहा था । उसी समय शहर के कुछ बच्चे जो पैदल अपनी पाठशाला जा रहे थे, ट्रक को देखकर मार्ग के किनारे ही रुक गए ।

कुछ लड़कियाँ जो साइकिल पर जा रही थी उन्हें लगा कि वे ट्रक के निकट पहुँचने से पहले ही मार्ग के उस पार निकल जाएंगी । इसलिए साइकिल की गति को तेज करके वे मार्ग के उस पार निकल गई । सड़क पार करते समय एक लड़की की साइकिल की चेन उतर गई और वह मार्ग को पार करने में पिछड़ गई ।

स्थिति को भाँपते हुए ट्रक ड्राइवर ने ब्रेक लगाया पर ट्रक के रुकते-रुकते भी लड़की ट्रक से टकरा ही गई । सड़क पर गिर पड़ी लड़की बेहोश हो चुकी थी । ड्राइवर चाहता तो ट्रक लेकर भाग सकता था पर वह भागने के बजाय अनपेक्षित तौर पर ट्रक से उतरकर लड़की के पास आया ।

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आसपास इकट्ठे हुए विद्‌यार्थियों की मदद से उसने लड़की को अपने ट्रक में लिटा लिया और लोगों से अस्पताल का पता पूछकर वह उसे अस्पताल ले गया । स्वयं ड्राइवर ने ही पुलिस को खबर भी कर दी । पुलिस आ चुकी थी । पुलिस ने लड़की की सहेलियों का बयान लिया, ड्राइवर का बयान लिया ।

तब तक लड़की के माता-पिता भी आ चुके थे । उन्हें स्वयं ड्राइवर ने सब कुछ विस्तार से बता दिया । इसी बीच डाक्टर ने आकर बताया कि चिंता की कोई बात नहीं है । लड़की घबराहट के कारण बेहोश हो गई है, वैसे उसके पैरों में और कमर के पास कुछ चोटें हैं, जो लगभग पंद्रह-बीस दिनों में ठीक हो जाएंगी ।

डाक्टर की बात सुनकर लड़की के माता-पिता और ड्राइवर के चेहरों का तनाव कुछ कम हो गया । विद्‌यार्थियों के बयान और स्वयं ड्राइवर के बयान आदि से यह स्पष्ट था कि ड्राइवर की कोई गलती नहीं थी । ट्रक सामने से आता देख लड़की को मार्ग पार करने की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए थी, जो उसने की । इन सारी परिस्थितियों को देखते हुए पुलिस थोड़ी दुविधा में थी ।

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तभी नर्स ने बाहर आकर बताया कि लड़की को होश आ चुका है । पुलिस उस कमरे में गई उसके बाद शेष सभी लोग पुलिस के पीछे आ गए । लड़की ने स्वयं पुलिस को बताया कि ड्राइवर अंकल की कोई गलती नहीं है, मैं ही गलत थी । यह सुनकर लड़की के माता-पिता ने भी पुलिस से कह दिया कि हमें कोई मामला दर्ज नहीं करना है ।

हमारा तो यह कहना है कि यदि ये ड्राइवर हमारी घायल बेटी को उठाकर अस्पताल न लाता तो शायद वह सड़क पर ही पड़ी रहती । हमें इस ड्राइवर से कोई शिकायत नहीं है । पुलिस ने देखा कि कोई मामला नहीं बन रहा है, सो पुलिस वहाँ से निकल गई ।

संस्मरण के अंत में कामिनी ने लिखा कि वह लड़की और कोई नहीं अपितु मैं स्वयं थी । कामिनी ने अगले दिन पाठशाला की वार्षिक पत्रिका के लिए वह संस्मरण दे दिया । वार्षिक सम्मेलन के अंतिम दिन संस्था के अध्यक्ष महोदय ने वार्षिक पत्रिका का विमोचन किया । पत्रिका सभी को वितरित की गई और कहा गया कि पंद्रह दिनों के भीतर पत्रिका के लेखों के संदर्भ में अपनी प्रतिक्रिया लिखित रूप में दें ।

पंद्रह दिनों तक पत्रिका के विविध लेखों के संदर्भ में विभिन्न प्रकार की चर्चाएँ होती रहीं । कोई किसी लेख की प्रशंसा करता तो कोई उसी लेख पर अपनी आलोचना जड़ देता । कामिनी चोरी छिपे लोगों की चर्चाएँ सुनती रहती पर उसे कहीं भी उसके विषय में चर्चा होती सुनाई नहीं देती ।

आखिर वह दिन भी आ गया जब पत्रिका की सबसे अच्छी रचना का नाम घोषित होना था । बहुत डरते-डरते उसने सभागृह में प्रवेश किया । मंच पर खड़े प्रधानाध्यापक ने घोषित किया कि पत्रिका में संस्मरण मँगवाए गए थे, जिनमें सबसे अच्छी रचना लिखी है कामिनी ने ।

उस लड़की ने स्वयं अपनी गलती को मानते हुए संस्मरण लिखा है तथा उसके साथ घटी घटना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि मानवता आज भी जीवित है । इसके बाद कामिनी को पुरस्कृत किया गया, साथ में कहा गया कि इससे लोगों को प्रेरणा लेनी चाहिए कि हम मार्ग पर सजग होकर वाहन चलाएँ तथा व्यर्थ ही सड़क पार करने की हड़बड़ी न करें ।

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