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Atomic Structure of an Atom | Hindi | Atoms | Nuclear Science

Read this article in Hindi to learn about the atomic structure of an atom.

प्रत्येक पदार्थ परमाणुओं से निर्मित होता है । पदार्थ के परमाणु प्राय: उदासीन होते हैं अर्थात उनपर कोई आवेश नहीं होता क्योंकि परमाणु के धनात्मक तथा ऋणात्मक आवेशों की संख्या समान होती है ।

ऐसे परस्पर विपरीत आवेश एक ही परमाणु में कैसे रह सकते हैं ? इसके संबंध में विभिन वैज्ञानिकों द्‌वारा परमाणु की संरचना का अध्ययन करके सिद्‌धांतों का प्रतिपादन किया गया है ।

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डाल्टन, टाम्सन तथा रुदरफोर्ड नामक वैज्ञानिकों के सिद्धांत निम्नानुसार हैं:

डाल्टन का परमाणु सिद्धांत:

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अंग्रेज रसायन शास्त्रज्ञ जान डाल्टन ने ई॰स॰ १८०८ में परमाणु सिद्धांत का प्रतिपादन किया । उनके इस सिद्धांत को द्रव्य की संरचना से संबंधित मूलभूत सिद्धांत माना जाता है । उनके सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक द्रव्य सूक्ष्म कणों द्‌वारा निर्मित है । इन कणों को परमाणु कहते है । यह एक कठोर तथा ठोस गोला है । द्रव्य का सूक्ष्मतम कण होने के कारण इसका विभाजन नहीं किया जा सकता ।

डाल्टन के परमाणु सिद्धांत में परमाणु के ऋणात्मक तथा धनात्मक आवेशों के संबंध में कोई उल्लेख नहीं है । इसलिए इनके सिद्धांत के आधार पर द्रव्य के अनेक गुणधर्मों का स्पष्टीकरण नहीं दिया जा सकता ।

टाम्सन का सिद्धांत:

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ब्रिटिश भौतिकीविद् जे. जे. टाम्सन ने वर्ष १८९७ में एक अलग सिद्धांत का प्रतिपादन किया । उन्होंने परमाणु की उपमा तरबूज से दी । प्रत्येक तरबूज में खाने के लायक लाल भाग होता है । उसमें ही तरबूज के काले बीज भी हेते है ।

टाम्सन के परमाणु सिद्धांत में लाल भाग को धनावेशित तथा काले बीजों को ऋणावेशित इलेक्ट्रान माना गया है । इस सिद्धांत में यह बताया गया है कि धनात्मक तथा ऋणात्मक आवेश समान होने के कारण परमाणु पर कोई भी आवेश नहीं होता ।

टाम्सन का मुख्य शोध यह था कि परमाणु पर ऋणावेशित इलेक्ट्रानों का अस्तित्व है और इसे उनहोंने प्रयोग दवाग सिद्ध करने का प्रयास भी किया । इसके लिए उन्हें वर्ष १९०६ का नोबेल पुरस्कार भी प्रदान किया गया । टाम्सन के इस सिद्धांत में परमाणु की उदासीनता का सही स्पष्टीकरण होने पर भी अन्य कई बातों में यह सिद्धांत अपूर्ण ही था ।

रुदरफोर्ड का सिद्धांत:

टाम्सन के परमाणु सिद्धांत की त्रुटि को समझने के लिए अर्नेस्ट रुदरफोर्ड नामक रसायनज्ञ ने एक प्रयोग क्यिा । उन्होंने सोने की अत्यंत पतली एक पन्नी पर धनात्मक आवेशयुक्त अल्फा किरणों द्‌वारा प्रहार कराया ।

इस प्रयोग में उन्हें यह ज्ञात हुआ कि वेग से जानेवाली बहुत सी अल्फा किरणें बिना किसी अवरोध के सोने की पन्नी के आरपार चली जाती हैं । परंतु कुछ अल्फा किरणें आरपार न जाकर पन्नी पर से उसी मार्ग पर पीछे वापस चली जाती हैं । रुदरफोर्ड के लिए यह एक चमत्कार था । उनके शब्दों में ‘बंदूक की गोली एक टिशू पेपर से टकराकर वापस आने जैसा’ यह चमत्कार था ।

करो और देखो:

किसी कंटीली बाढ़ के समीप खड़े होकर म बाड़ की ओर छोटे-छोटे कंकड़ फेंकी । ज्यादा से ज्यादा कंकड़ उस बाड़ में से सीधे दूसरी ओर चले जाएँगे परंतु संभव है कि, कुछ कंकड़ बाड़ के तार से टकराकर वापस आ जाएँ ।

बाड़ के किन्हीं दो तारों के बीच पर्याप्त खाली जगह होती है । इसलिए कंकड़ आरपार चले जाते है परंतु जो कंकड़ वापस आते हैं; वे बीच में लगे तारों का अस्तित्व दर्शाते हैं । इसी आधार पर अर्नेस्ट रुदरफोर्ड ने अपना प्रसिद्ध परमाणु सिद्धांत प्रतिपादन किया ।

उनके मतानुसार:

(i) अधिकांश अल्फा किरणें सोने की पतली पन्नी में से होकर उसके आरपार चली जाती हैं । अत: इससे यह ज्ञात होता है कि (सोने के) परमाणु के मध्य अधिकांश भाग खोखला होता है ।

(ii) जिस भाग से धनात्मक आवेशयुक्त अल्फा किरणें वापस लौटी हैं, वह भाग धनात्मक आवेशयुक्त परंतु खोखले भाग से पर्याप्त छोटा होता है ।

इन निष्कर्षों के आधार पर रुदरफोर्ड ने अपना सिद्धांत प्रतिपादित किया । इसके लिए उन्हें रसायन शास्त्र का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया ।

रुदरफोर्ड के सिद्धांत के अनुसार:

(i) प्रत्येक परमाणु के मध्यभाग में स्थित नाभिक पर धनात्मक आवेश होता  है । परमाणु का अधिकांश द्रव्यमान उसके नाभिक में समाविष्ट होता है ।

(ii) ऋणावेशित इलेक्ट्रान नाभिक के परित: विशिष्ट कक्षाओं में परिभ्रमण करते हैं ।

(iii) परमाणु के आकार की तुलना में नाभिक का आकार पर्याप्त छोटा होता है ।

विभिन्न चरणों में परमाणु के घटकों की खोज:

परमाणु की संरचना में प्रोटान, न्यूट्रान तथा इलेक्ट्रान ये मूलकण होते हैं । परमाणु के नाभिक में प्रोटान तथा न्यूट्रान नामक दो प्रकार के कण होते है । इन्हें सम्मिलित रूप में न्यूक्लिआन कहते हैं ।

प्रोटान (P+):

प्रोटान धनावेशित मूल कण हैं । ये परमाणु के नाभिक पर स्थित होते हैं । प्रोटानों का धनात्मक आवेश (P+) इलेक्ट्रानों के ऋणात्मक आवेश के बराबर होता है ।

न्यूट्रान (n):

न्यूट्रान (n) नामक मूल कण नाभिक में होते है । न्यूट्रनों पर कोई भी आवेश नहीं होता । एक न्यूट्रान का द्रव्यमान एक प्रोटान के द्रव्यमान के बराबर होता है । हाइड्रोजन के अतिरिक्त अन्य सभी तत्वों के परमाणु के नाभिक में न्यूट्रान होते हैं ।

इलेक्ट्रान (e):

यह परमाणु का ऋणावेशित मूल कण है । संकेत में इसे e द्‌वारा  दर्शाते हैं । e वास्तव में ऋणात्मक आवेश की मूलभूत इकाई मानी  जाती है । इलेक्ट्रान परमाणु की नाभिक के परित: विशिष्ट कक्षाओं में परिभ्रमण करते हैं । इलेक्ट्रान जिस कक्षा में होते हैं, उसके अनुसार उनमें विशिष्ट ऊर्जा होती है । प्रोटान तथा न्यूट्रान की तुलना में इलेक्ट्रान का द्रव्यमान नगण्य होता है । इसलिए किसी परमाणु का द्रव्यमान उसकी नाभिक में स्थित न्यूट्रान तथा प्रोटान की संख्या पर निर्भर होता है ।

विद्युतीय दृष्टि से समान्यत: परमाणु उदासीन होता है:

किसी परमाणु की नाभिक के बाहरी भाग में ऋणावेशित इलेक्ट्रान और पर्याप्त रिक्त स्थान होता है । नाभिक के बाहरवाले सभी इलेक्ट्रानों का संपूर्ण ऋणात्मक आवेश, उसके नाभिक के प्रोटानों के संपूर्ण धनात्मक आवेश के बराबर होता है । इसलिए परमाणु विद्युतीय दृष्टि से प्राय: उदासीन होते हैं ।

परमाणु क्रमांक:

किसी परमाणु के इलेक्ट्रानों अथवा प्रोटानों की संख्या को उस तत्व के परमाणु का परमाणु क्रमांक कहते हैं । इसे Z अक्षर द्‌वारा व्यक्त करते हैं । किसी तत्व का परमाणु क्रमांक ज्ञात होने पर उसके इलेक्ट्रानों तथा प्रोटानों की संख्या ज्ञात होती है ।

आकृतियाँ देखो । हाइड्रोजन की नाभिक में एक प्रोटान तथा उसके परित: परिभ्रमण करनेवाला एक इलेक्ट्रान होता है । अत: उसका परमाणु क्रमांक Z = 1 है । हीलियम तत्व के परमाणु की नाभिक में २ प्रोटान तथा परित: २ न्यूट्रान होते हैं । परिभ्रमण करनेवाले इलेक्ट्रान की संख्या २ होने के कारण हीलियम का परमाणु क्रमांक Z = 2 है । आकृति में आक्सीजन के परमाणु की संरचना ध्यान से देखो ।

परमाणु द्रव्यमानांक:

हम जानते हैं कि किसी परमाणु का द्रव्यमान उसकी नाभिक पर ही एकत्र होता है । उसके आधार पर उसका परमाणु द्रव्यमानांक ज्ञात किया जाता है । किसी परमाणु की नाभिक के प्रोटानों (p) तथा न्यूट्रानों (n) की संख्या के योगफल को उसका परमाणु द्रव्यमानांक (A) कहते हैं ।

लिथियम तत्व में तीन प्रोटान तथा चार न्यूट्रान होते हैं ।

अत: उसका परमाणु द्रव्यमानांक A = 3 + 4 = 7 ।

सोडियम तत्व के प्रोटानों की संख्या 11 तथा न्यूट्रानों की संख्या 12 है ।

अत: उसका परमाणु द्रव्यमानांक A = 11 + 12 = 23 ।

किसी तत्व का संकेत लिखते समय उसके परमाणु क्रमांक तथा परमाणु द्रव्यमानांक दोनों का निर्देश करते हैं । इसकी आधुनिक विधि अग्रानुसार है ।

उदाहरण:

ये क्रमश; हाइड्रोजन, कार्बन तथा आक्सीजन परमाणु के संकेत हैं ।

समस्थानिक:

प्रकृति में कुछ ऐसे तत्व पाए जाते हैं, जिनके परमाणु क्रमांक समान परंतु परमाणु द्रव्यमानांक भिन्न होते हैं । तत्व के ऐसे परमाणुओं को उस तत्व का समस्थानिक कहते हैं । एक ही तत्व के समस्थानिकों के परमाणु की नाभिक में प्रोटानों की संख्या समान होती है परंतु चट्टानों की संख्या भिन्न होती है ।

समस्थानिकों का एक अन्य उदाहरण कार्बन है । तथा इसके समस्थानिक हैं । इसी प्रकार तथा क्लोरीन के समस्थानिक हैं । सामान्यतया एक ही तत्व के सभी समस्थानिकों के रासायनिक गुणधर्म समान होते

हैं । कुछ समस्थानिकों में विशेष गुणधर्म होता है । इसके कारण दैनिक जीवन में इनकी विशेष उपयोगिता होती है ।

उदाहरण:

i. परमाणु भट्ठीयों में ईंधन में रूप में यूनियम का समस्थानिक उपयोगी है ।

ii. कोबाल्ट के समस्थानिक का उपयोग कैंसर के उपचार में करते हैं ।

iii. गलगंड (घेघा) रोग के उपचार के लिए आयोडीन के समस्थानिक का उपयोग करते हैं ।

आयन का निर्माण:

इलेक्ट्रान नामक मूल कण नाभिक के परित: विशिष्ट कक्षाओं में परिभ्रमण करते रहते हैं । उनमें से सबसे बाहरी कक्षा में परिभ्रमण करनेवाले इलेक्ट्रान ही रासायनिक अभिक्रिया में आसानी से भाग लेते हैं । यदि बाह्यतम कक्षा अधूरी हो अर्थात उसमें इलेक्ट्रानों को समाविष्ट करने की क्षमता हो, तो रासायनिक अभिक्रिया होते समय इलेक्ट्रानों का लेन-देन अथवा भागीदारी संभव होती है ।

किसी रासायनिक अभिक्रिया में धातुओं में इलेक्ट्रान देने की तथा अधातुओं में इलेक्ट्रान लेने की प्रवृत्ति होती है । उदाहरण सोडियम के परमाणु में कुल ११ इलेक्ट्रान होते हैं । उनमें से पहली कक्षा में २ इलेक्ट्रान, दूसरी कक्षा में ८ इलेक्ट्रान तथा तीसरी कक्षा में १ इलेक्ट्रान होता है ।

तीसरी कक्षा ही सोडियम परमाणु की बाह्यतम कक्षा है । सोडियम की बाह्यतम कक्षा अपूर्ण है । किसी रासायनिक अभिक्रिया में सोडियम के परमाणु द्‌वारा बाह्यतम इलेक्ट्रान देने पर, सोडियम की नाभिक के प्रोटानों की संख्या (११) बचे हुए इलेक्ट्रानों की संख्या (१०) से अधिक हो जाती है । फलत: सोडियम धनावेशित हो जाता है ।

सोडियम के परमाणु द्‌वारा एक इलेक्ट्रान दिया गया ।

सोडियम की भाँति मैगनीशियम धातु भी धनावेशित होती है ।

इसके विपरीत क्लोरीन के एक परमाणु में कुल १७ इलेक्ट्रान होते हैं । उनमें से पहली कक्षा में २, दूसरी कक्षा में ८ तथा तीसरी कक्षा में ७ इलेक्ट्रान होते हैं । फलत: क्लोरीन की बाह्यतम कक्षा अपूर्ण होती है । उसे पूर्ण करने के लिए क्लोरीन को एक इलेक्ट्रान लेना पड़ता है । फलत: क्लोरीन परमाणु के नाभिक के प्रोटानों की संख्या (१७) इलेक्ट्रानों की संख्या (१८) से कम हो जाती है । इसलिए क्लोरीन ऋणावेशित हो जाती है ।

इस समीकरण में क्लोरीन के परमाणु ने एक इलेक्ट्रान लिया है । क्लोरीन की भाँति आक्सीजन भी ऋणावेशित होती है । इसी प्रकार इलेक्ट्रान के लेन-देन से आयनों का निर्माण होता है । एल्युमीनियम के परमाणु की बाह्यतम कक्षा में ३ इलेक्ट्रान होते है ।

संयोजकता:

प्रत्येक तत्व में अन्य तत्वों से संयोग करने की एक निश्चित क्षमता होती है । किसी तत्व की इसी संयोगक्षमता को उस तत्व की संयोजकता कहते हैं । किसी तत्व की संयोगक्षमता (संयोजकता) की तुलना हाइड्रोजन की संयोगक्षमता (संयोजकता) के साथ की जाती है । इसके लिए हाइड्रोजन की संयोजकता १ मानी जाती है । तत्वों की संयोजकता दर्शानेवाली संख्या सदैव पूर्णांक में होती है ।

सोडियम तथा पोटैशियम की संयोजकता हाइड्रोजन की संयोजकता के बराबर होती है । अत: इन तत्वों की संयोजकता एक ही है । आक्सीजन तथा कैल्शियम की संयोजकता हाइड्रोजेन की संयोजकता की दुगुनी है । अत: इनकी संयोजकता २ है । इसी प्रकार नाइट्रोजन की संयोजकता ३ तथा सिलिकान की संयोजकता ४ है ।

जब भिन्न तत्वों के परमाणु परस्पर संयोग करते हैं, तो यौगिक के अणु निर्मित होते है । ऐसी स्थिति में उन तत्वों की संयोजकता ज्ञात होना आवश्यक होता है ।

इसके लिए निम्नलिखित उदाहरणों का अध्ययन करो:

संयोजकता १ १

यहाँ सोडियम तथा क्लोरीन दोनों की संयोजकता एक ही है ।

संयोजकता २ १

यहाँ मैगनीशियम की संयोजकता २ तथा क्लोरीन की १ है ।

संयोजकता ३ १

यहाँ एल्युमीनियम की संयोजकता ३ तथा क्लोरीन की १ है ।

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