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“Autobiography of a Book” in Hindi Language

पुस्तक की आत्मकथा । “Autobiography of a Book” in Hindi Language!

मैं एक पुस्तक हूं । ज्ञान को अक्षय रश एवं भण्डार हूं । श्रेष्ठ विचारों, आदर्शों, सिद्धान्तों से व्यक्तित्व का निर्माण करने वाली पुस्तक हूं मैं । अवकाश के क्षणों में हमसे बढ्‌कर कोई हितैषी नहीं । सभी की सच्ची मार्गदर्शिका और मित्र मैं ही हूं ।

मन को शीतलता और शान्ति प्रदान करना मेरा उद्देश्य है । हृदय की संवेदना जगाने वाली, लोगों की सद्‌वृत्तियों को सही अर्थो में प्रकट करने वाली मैं पुस्तक हूं । इतिहास साक्षी है कि जितनी भी जनक्रान्तियां हुई हैं, वह मेरा ही परिणाम हैं । मैं संस्कृति एवं सभ्यता के विकास कम की गाथा हूं । मैं साहित्य एवं समाज का दर्पण हूं प्रतिबिम्ब हूं । मैं सभी प्रकार के विद्यार्थियों के लिए एक वरदान हूं ।

लोगों में मानसिक, भावनात्मक, सांस्कृतिक व मानवीय मूल्यों का निर्माण मैं ही करती हूं । विभिन्न भाषाओं में लोगों की ज्ञान-पिपासा को शान्त करना तथा उनको ज्ञानार्जन कराना मेरा धर्म है । राष्ट्र के लोगों में राष्ट्रीयता का भाव जगाना मेरा परम कर्तव्य है । कहानी, उपन्यास, नाटक, आलोचना, निबन्ध काव्य आदि विधाओं में मैं लिखी जाती हूं ।

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मेरी उपयोगिता को पहचानकर ही पुस्तक मेले व पुस्तक प्रदर्शनियों का आयोजन होता है, जहां लोगों का विभिन्न लेखकों तथा ज्ञान की व्यापकता से परिचय होता है । मेरा जन्म पेड़ों की लकड़ियों से होता है, जिसे विभिन्न प्रक्रियाओं के माध्यम से कागज का रूप दिया जाता है ।

पुराने समय में मैं भोजपत्र के रूप में होती थी । कागज बनने के बाद मुझ पर विभिन्न लिपियों में आकर्षक व सुन्दर अक्षरों से छपाई की जाती है, जिसे प्रिंटिंग कहा जाता है । प्रिंटिंग होने के बाद मुझे क्रमानुसार सीकर एक पुस्तक का रूप दिया जाता है ।

आकर्षक पन्नों पर सुन्दर लिखावट व चित्रों की बनावट सभी का मन मोह लेती है । पतली-मोटी, छोटी-बड़ी सभी रूपाकारों में मैं उपलब्ध रहती हूं । ज्ञान-विज्ञान, आनन्द, मनोरंजन का मैं भण्डार हूं । मेरे ही कारण आज मानव समाज सभ्य व सुसंस्कृत कहलाता है । मेरा उपयोग लोगों के लिए ही है ।

मुझे असहनीय कष्ट तब होता है, जब लोग मेरे पन्ने फाड़ते हैं । मुझ पर अनावश्यक रूप से लिखकर मुझे गन्दा कर दते हैं । मैं तो पुस्तकालय की शोभा हूं । मेरा रखरखाव मुझे हानि पहुंचाने वाले दीमकों से हमेशा किया जाना चाहिए; क्योंकि इनके अभाव में मेरा अस्तित्व पूरी तरह से नष्ट हो सकता है । लोगों का कल्याण ही मेरा काम है । मुझे श्रेष्ठ रूपों में ही जानना चाहिए ।

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