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Autobiography of a River in Hindi Language

नदी की आत्मकथा । Autobiography of a River in Hindi Language!

मैं एक नदी हूं । सतत प्रवाहिनी नदी । अन्त: सलिला, पयस्विनी, निर्झरनी, सरिता, निम्नगा, तटिणी, प्रवाहिनी, जलस्त्रोत स्विनी नदी । प्रकृति के अक्षय रूपों एवं निधियों में से एक मेरा रूप है । धरती के समस्त प्राणी समुदाय को अपनी अमृत जलधारा से जीवन प्रदान करने वाली नदी हूं ।

पशु-पक्षियों, मनुष्यों, खेत-खलिहानों के साथ धरती की प्यास बुझाने वाली नदी हूं मैं ! भारतीय संस्कृति में तो मुझे पतितपावनी, मोक्षदायिनी मानकर पूजा जाता है । मुझे सामान्य नहीं माना जाता है । मुझे तो देवी कहकर मोक्ष का एक साधन मानकर बड़ी श्रद्धा के साथ विभिन्न अवसरों पर पूजा जाता है । हिन्दू अपने पितरों के श्राद्ध का तर्पण मुझमें करके मोक्ष की कामना करते हैं ।

मेरे पवित्र जल में स्नान कर पुण्य-लाभ करते हैं । मेरा जन्म देवताओं की नगरी स्वर्गलोक से हुआ है । हिन्दुओं की ऐसी आस्था है । प्राकृतिक रूप से मैं किसी पहाड़ी या बर्फीली गुफा से निकलती हूं । पहाड़ियों के शिलाखण्ड से प्रसूत होकर मैं बड़ी-छोटी चट्टानों से टकराती, उछलती-कूदती हुई मैदानी भागों में बहती हूं । मेरे आसपास खेत पनपते हैं ।

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पेड़-पौधे, हरी-भरी धरती मेरे ही दम पर सुशोभित होती है । मानव की सभ्यता वहीं पर बसी, जहां मैं थी । मेरे आसपास लोगों ने अपना जीवन बसाया । एक प्रकार से इस समस्त सृष्टि में बसी मानव सभ्यता का केन्द्र मैं ही रही हूं । चाहे वह सिन्धु घाटी की सभ्यता हो या मिश्र की सभ्यता ।

सभी की संस्कृति एवं सभ्यता, ज्ञान-विज्ञान का आधार मैं ही हूं और थी । मैं साक्षी हूं इस सृष्टि के निर्माण एवं विध्वंस की प्रक्रिया की । पहाड़ों को काट-काटकर मैं चमकते रेत के कणों को जन्म देती हूं । अपने मुहानों पर डेल्टा तथा द्वीपों का निर्माण भी करती हूं । मैं कभी रुकती नहीं हूं । सतत बहती रहती हूं ।

प्राचीन सभ्यता से लेकर वर्तमान आर्थिक, वैज्ञानिक, औद्योगिक सभ्यता के विकास क्रम में मेरा ही हाथ है । मुझ पर बड़े-बड़े बांध बांधकर एक ओर जहां ऊर्जा का उत्पादन किया जाता है, वहीं मेरे ऊपर से बड़े-छोटे पुलों का निर्माण कर मानव परिधि लांधकर अपने ही लाभ के साधन जुटाता चला जा रहा है । देव नदी गंगा से लेकर आज कई नदियां प्रदूषित हो चली हैं ।

मेरी उपयोगिता जानकर भी आज मानव कूड़ा-करकट, मल-मूत्र, जहरीले रासायनिक पदार्थो को मेरे जल में बड़ी ही निर्दयता के साथ बहाता चला जा रहा है । मुझे इसका बड़ा दुःख है । मैं तो सतत प्रवाहित होने वाली नदी हूं । बहना मेरा काम है, सकना मेरी नियति है । मैं मनुष्यों को भी यही प्रेरणा देती हूं । मेरी तरह बहते रहो ! सबका कल्याण करो ।

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