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“Autobiography of Money” in Hindi Language

रूपये की आत्मकथा । “Autobiography of Money” in Hindi Language!

जिसके बल पर सारा संसार चलता है, वह मैं ही हूं । मेरे ही प्रकाश से यह संसार जगमगा रहा है । लोगों के पास आज जो कुछ वैभव है, जो कुछ उपलब्धियां हैं, वह सब मेरी ही बदौलत हैं । इस संसार में लोग मुझे रुपया, धन-दौलत, पैसा, सम्पत्ति, डॉलर, पौण्ड, मुहर, सिक्का, येन, टका न जाने क्या-क्या कहते हैं ।

मैं विभिन्न रूपों में पाया जाता हूं । कभी नोटों के रूप में, तो कई सिक्कों के रूप में चलता हूं । मेरा रूप भले ही बदला है और बदलता रहेगा, किन्तु मेरा महत्त्व कभी कम नहीं हो सकता । जब तक मानव सृष्टि रहेगी, तब तक मैं रहूंगा ।

मेरी महत्ता एवं प्रभाव के कारण आज मानव समाज इतनी प्रतिष्ठित एवं प्रभावपूर्ण स्थिति को प्राप्त करता है । लोगों के समस्त व्यवहार का केन्द्र बिन्दु मैं ही हूं । मुझे प्राप्त करने की होड़ में यह संसार हमेशा लगा रहता है । मैं तो लोगों का जीवन हूं ।

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एक प्रकार से उनके प्राणों का आधार हूं । मुझे पाने के लिए संसार के व्यक्ति अपना स्वभाव, अपनी प्रकृति, अपना चरित्र तक बदल देते हैं । मैंने कभी नहीं चाहा कि मुझे प्राप्त करने के लिए व्यक्ति किसी प्रकार का अनुचित कार्य करें, अमानवीय कृत्य करें, किन्तु ऐसा हो रहा है ।

यह सब जानकर मैं बड़ा दुखी हो जाया करता हूं । जनकल्याण, विश्व के कल्याण का भाव मुझमें हमेशा से ही निहित रहा है । जब मैं सिक्कों के रूप में होता हूं तो टकसालों में ढाला जाता हूं । मुइा पर विभिन्न अंकों को मुद्रित किया जाता है ।

मेरा महत्त्व और मेरी गुणवत्ता मेरी संख्या के आधार पर होती है । नोटों के रूप में मेरी गुणवत्ता का मूल्यांकन ठीक इसी आधार पर होता है । मैं सालो-साल चलता हूं । मुझे बनाया ही कुछ इस प्रकार जाता है कि सिक्कों के रूप में मुझ पर जंग नहीं चढ़ती है । नोटों के रूप में मुझमें खराबी तभी आती है, जब मेरा प्रयोग बड़ी निर्दयता से होता है ।

संसार के सभी देशों में मेरा चलन है । मेरी प्रवृत्ति चलायमान है । इसी वजह से मैं किसी एक के पास नहीं रहता । कभी किसी के हाथ में, तो कभी किसी के हाथ में जाता हूं । मेरा प्रयोग न जाने किन-किन रूपों में, कहां-कहां, कब-कब, कैसे-कैसे होता है । जब तक मैं लोगों के पास रहता हूं उनकी जेब गर्म रहती है ।

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मेरे न रहने पर उनका जीवन पूरी तरह से ठण्डा हो जाता है । मेरे अभाव में कुछ बेचारे तो  मौत को गले लगा लेते हैं । जिनके पास मैं होता हूं वे बड़े आराम व सुकून का जीवन जीते हैं, किन्तु कई लोग तो बस मुझे पाने की लालच में ”निन्यानबे के फेर” में पड़े-पड़े अपने जीवन का अमूल्य समय गंवा देते हैं ।

फिर भी उन्हें शान्ति नहीं मिलती । ऐसे लोगों की मनोदशा पर मुझे बड़ा तरस आता है । वैसे देखा जाये, जिसने भी सन्तोष करना सीख लिया, उस व्यक्ति का जीवन सुखी हो जाता है । मेरे साथ रहते हुए व्यक्ति यदि इस बात को मान ले कि सन्तोष ही सबसे बड़ा धन है, तो उसका जीवन सार्थक हो जायेगा ।

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