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“Biography of Ekalavya” in Hindi Language

गुरुभक्त एकलव्य । “Biography of Ekalavya” in Hindi Language!

1. प्रस्तावना ।

2. अद्वितीय धनुर्धर ।

3. गुरु की परीक्षा ।

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4. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

इस संसार में अनेक गुरु-भक्त शिष्य हुए हैं, जिन्होंने अपनी अन्ध गुराभक्ति से इतिहास रचा, किन्तु न तो ऐसे शिष्य हुए हैं, जिन्होंने गुरुभक्ति की ऐसी कठिन परीक्षा दी होगी और न तो ऐसा कोई गुरु हुआ होगा, जिसने अपने शिष्य की ऐसी परीक्षा ली होगी ।

अपनी परीक्षा में शत-प्रतिशत खरा उतरने वाले इस गुरुभक्त का जन्म एक भील वनवासी परिवार में हुआ था । यह शिष्य व्याधराज हिरण्यधनु का पुत्र एकलव्य था ।

2. अद्वितीय धनुर्धर:

एकलव्य को धनुर्विद्या में बहुत रुचि थी । उसने स्वयं के बल पर धनुष चलाने की विद्या सीखी थी । एक बार जंगल से गुजरते हुए एकलव्य को एक कुत्ता मिला, जो जोर-जोर से भौंक रहा था । एकलव्य को अपने सामने पाकर कुत्ता और जोरों से भौंकने लगा । एकलव्य को कुत्ते का इस तरह से लगातार भौंकना कुछ अच्छा नहीं लगा ।

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उसने भौंकने वाले उस कुत्ते का मुंह तीरों से पूरी तरह से भर दिया । इससे कुत्ते का भौंकना तो बन्द हो गया, किन्तु आश्चर्य यह था कि कुत्ते को जरा भी चोट नहीं आयी । कुत्ता अपने मुंह में उन बाणों को लेकर इधर-उधर घूम रहा था । राह में उसे अर्जुन और द्रोणाचार्य दिख पड़े । कुत्ता उनके सामने आ खड़ा हुआ ।

तभी द्रोणाचार्य और अर्जुन ने देखा कि तीरों से भरा मुख होने के बाद भी कुत्ते के मुख में कहीं कोई घाव का निशान नहीं था । वे धनुर्विद्या के इस अभूतपूर्व कौशल को देखकर दांतों तले उंगली दबा बैठे । वे दोनों उस कुत्ते के पीछे-पीछे चलने लगे । थोड़ी दूर जाने पर उन्होंने एक भील बालक को धनुर्विद्या का अभ्यास करते देखा ।

अर्जुन के प्रश्न करने पर एकलव्य ने बताया कि उसने यह विद्या गुरु द्रोणाचार्य की प्रतिमा के सामने निरन्तर अभ्यास से सीखी है । एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य को स्मरण दिलाया कि एक बार वह उनसे धनुर्विद्या की शिक्षा लेने उनके पास पहुंचा था, तो उन्होंने यह कहकर उसे शिक्षा देने से इनकार कर दिया कि वह एक नीच कुलोत्पन्न, शूद्र बालक है ।

वे धनुर्विद्या उसे नहीं सीखा सकते । उनकी धनुर्विद्या पर तो केवल ब्राहाणों और क्षत्रियों का अधिकार है । तब से उसने गुरु द्रोण की मिट्टी की प्रतिमा स्थापित कर यह विद्या सीखी है । उसके गुरु तो द्रोणाचार्य ही हैं ।

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3. गुरु की परीक्षा:

गुरु द्रोणाचार्य ने जब एकलव्य के मुख से यह सुना, तो उन्होंने एकलव्य से कहा: “तुम तो धनुर्विद्या में पारंगत हो गये हो । अत: तुम्हें गुरुदक्षिणा देनी होगी ।” एकलव्य ने कहा: ”जो आज्ञा गुरुदेव !” द्रोण ने कहा: ”किन्तु तुम यह दे न सकोगे ।” एकलव्य अपनी गुरुभक्ति एवं वचन पालन पर दृढ़ रहा और उसने कहा: ”आप प्राणों से अधिक कुछ न मांगेंगे न गुरुदेव !”

गुरु द्रोण ने कहा: ”मुझे गुरुदक्षिणा में तुम्हारे दाहिने हाथ का अंगूठा चाहिए ।” एकलव्य ने पूजा की थाल में गुरु के चरणों पर अर्पित करने के लिए कुछ पुष्प रखे और अपने दाहिने हाथ का अंगूठा काटकर गुरु को दक्षिणा में समर्पित कर दिया । इस तरह गुरु द्रोण ने अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाते हुए धनुर्विद्या पर उच्च जाति का अधिकार बनाये रखा ।

4. उपसंहार:

गुरु द्रोणाचार्य को दाहिने हाथ का अंगूठा गुरुदक्षिणा में देने वाले एकलव्य का यह त्याग असीम एवं महान् है । वैसे तो गुरु द्रोणाचार्य को यह गुरुदक्षिणा मांगने का अधिकार नहीं था । चूंकि अर्जुन को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने का वचन पालन उन्हें करना था । व्यवस्था की दृष्टि से धनुर्विद्या उच्च कुल के लोगों के लिए ही बनाये रखनी थी ।

यह सत्य है कि युगों-युगों तक गुरु द्रोणाचार्य के इस अन्यायपूर्ण आचरण की निन्दा होगी और एकलव्य की गुरुभक्ति की प्रशंसा होगी । अर्जुन के मन में यह अपराधबोध हमेशा रहा होगा कि उससे भी श्रेष्ठ धनुर्धर हो चुका है, जो कि उस समय की जाति व्यवस्था का शिकार हो चुका है ।

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