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“Biography of Maharishi Dadhichi” in Hindi Language

महर्षि दधीचि । “Biography of Maharishi Dadhichi” in Hindi Language!

1. प्रस्तावना ।

2. दधीचि का त्याग ।

3. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

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महर्षि दधीचि ऋषियों में अत्यन्त सम्मान एवं श्रद्धा से पूजे जाते हैं । असुरों का नाश करने के लिए देवताओं तथा ऋषि-मुनियों ने भी बहुत कुछ त्याग किया, किन्तु दधीचि एक ऐसे ऋषि थे, जिन्होंने जीवित रहते हुए भी अपने शरीर का त्याग देवताओं के लिए अपना अमूल्य त्याग दिया ।

2. दधीचि का त्याग:

चेष्टा का पुत्र वृत्रासुर देवताओं का पुरोहित और असुरों -का भांजा था । वह यज्ञ  भाग का हिरसा देवताओं को तो प्रत्यक्ष देता था, किन्तु असुरों को छिपा-छिपाकर देता था । हिरण्यकश्यप ने अपनी बहिन {त्वेष्टा} से कहा: ”बहिन ! तुम्हारा पुत्र वृत्रासुर देवताओं को प्रत्यक्ष भाग देता है और हमें छिपाकर देता है, जिसके कारण हम दुबलाते जा रहे हैं ।”

इस प्रकार वृत्रासुर को ऐसा करने से मना किया कि तू मातुल पक्ष का नाश क्यों करता है ? इधर वृत्रासुर हिस्ण्यकश्यप के पास गया ही था कि ब्रह्मापुत्र वशिष्ठ ने हिरण्यकश्यप को श्राप  दे   दिया । कालान्तर में हिरण्यकश्यप उसी श्राप के वशीभूत होकर मारा गया । इधर अपनी गलती समझ आने पर वृत्रासुर तप करने लगा ।

उसके तप को भंग करने के लिए इन्द्र ने अप्सराएं भेजीं । वृत्रासुर जल्द ही अप्सराओं के मोहजाल में फंस गया । अप्सराओं से उसने कहा: “तूम देवताओं के पास क्यों जाती हो ? मेरे पास जो मन्त्र है, उसका जाप करते ही मेरा प्रभाव देखना ।” ऐसा कहते ही वृत्रासुर के सिर के तीन भाग हो गये ।

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उसने एक मुख से सोमरस का पान, दूसरे से अन्न और तीसरे से देवताओं का भक्षण प्रारम्भ कर दिया । तब उसके बढ़ते हुए शरीर को देखकर देवता ब्रह्मा के पास पहुंचे और उनसे कहा: ”हमारी संख्या कम हो रही है और अब राक्षस अधिक हो जायेंगे ।” इधर वृत्रासुर ने अमरावती पर भी अधिकार कर लिया ।

वृत्रासुर को दिये गये श्राप के अनुसार उसका वध किसी पवित्र आत्मा की हड़ियों के औजार से हो सकता था । ब्रह्मा के कहे अनुसोर सभी देवता भृगुपुत्र दधीचि के पास पहुंचे । उनसे प्रार्थना की कि वे अपनी अस्थियों का दान कर दें ।

दधीचि ने शरीर की नश्वरता को जानते हुए आसन लगा लिया और शरीर का त्याग कर दिया । उनके शरीर का त्याग करते ही विश्वकर्मा ने उनकी हडियों का अमोघ अस्त्र बना दिया । इस प्रकार उससे वृत्रासुर का नाश हुआ ।

3. उपसंहार:

भारतीय संस्कृति में असीम नि:स्वार्थ तथा लोककल्याणकारी त्याग के उदाहरणस्वरूप दधीचि के त्याग को अत्यधिक महत्वपूर्ण समझा जाता है । वे सचमुच में महान् त्यागी ऋषि थे ।

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