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Biography of Mohan Rakesh in Hindi Language

मोहन राकेश । Biography of Mohan Rakesh in Hindi Language!

1. प्रस्तावना ।

2. जन्म परिचय एवं रचनाकर्म ।

3. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

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हिन्दी साहित्य में मोहन राकेश पहले एक कहानीकार, इसके बाद उपन्यासकार और फिर एक नाटककार के रूप में सामने आये । वे एक सशक्त निबन्धकार और अनुवादक थे । उनके लेखन की विविधता, समग्रता अपने समय, समाज, परिवेश और उसके संघर्ष को बड़ी प्रामाणिकता के साथ रेखांकित करती है ।

2. जन्म परिचय एवं रचनाकर्म:

मोहन राकेश का पूरा और वास्तविक नाम मदनमोहन गुगलानी था । उनकी दीदी ने उनको यह नाम दिया था । उनका जन्म 8 जनवरी सन् 1925 को हुआ था । अमृतसर की जण्डीवाली गली के किराये के एक सामान्य घर में वे रहा करते थे । उनके पिता कर्मचन्द गुगलानी एक वकील थे ।

उनके घर के आसपास का वातावरण बड़ा ही घुटन-भरा था । 8 फरवरी, 1941 को पिता की आकस्मिक मृत्यु और घर की खस्ता हालत के कारण माता के हाथों की सोने की चूडियां भी बेचनी पड़ी, तब कहीं जाकर उनके पिता के दाह-संस्कार का व्यय प्रबन्ध हो पाया था ।

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16 वर्षीय राकेश को समाज के कडुवे जीवन यर्थाथ, क्रूर आपदाओं और संघर्ष के पथ पर चलना पड़ा । 1952 में हिन्दी में प्रथम श्रेणी लेकर एम॰ए॰ की परीक्षा पंजाब विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण की । सन् 1947 में भारत विभाजन ने उनके परिवार को जमीन से उखाड फेंका । वे बम्बई आ पहुंचे ।

फिल्मी दुनिया में पटकथाकार के रूप में नौकरी शुरू की, किन्तु स्वाभिमानवश एक वर्ष पूरा होने के पहले ही इस्तीफा दे दिया । फिर ”टाइम्स ऑफ इण्डिया” नामक समाचार पत्र में नौकरी कर ली । यहां पर भी उनका स्वाभिमान आड़े आया । शिक्षा विभाग में दो वर्ष भी पूरे नहीं हो पाये थे कि 1950 में जालन्धर आ पहुंचे ।

काफी भागदौड़ के बाद डी॰ए॰वी॰ कॉलेज जालन्धर में प्राध्यापक का पद संभाला, किन्तु इससे भी उन्हें मुक्त कर दिया गया । शिमला जाकर नौकरी की । फिर भारत की राजधानी दिल्ली आकर ”अक्षर प्रकाशन” से नाता जोड़ा । दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक बनने के साथ-साथ 1962 में “सारिका” का सम्पादन भार ग्रहण किया ।

1963 में त्यागपत्र देकर स्वतन्त्र लेखन की ओर उन्मुख हुए । 1971 में फिल्म वित्त विभाग के सदस्य बने । अगले वर्ष सन् 1972 में ”शब्द की खोज और महत्त्व” विषय पर शोधकार्य करने पर उन्हें 1 लाख रुपये का ”नेहरू फैलोशिप पुरस्कार” मिला । गोविन्द चातक ने उनके वैवाहिक और पारिवारिक जीवन के बारे में लिखा है कि “वे कभी भी स्थिर नहीं रहे, न नौकरी से बंधे, न व्यक्तियों से, घर उन्हें डराता रहा ।

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1950 में एक अत्यन्त सुशिक्षिता, नौकरीपेशा, अति अहंवादी युवती के साथ विवाह हुआ, जो जल्द ही टूट गया । उन्होंने हिसार के एक मित्र की बहिन सीधी-सादी, विनम्र, साधारण, घरेलू किस्म की, पुरुषावलम्बी लड़की से विवाह किया, जो मानसिक रूप से लगभग विक्षिप्त थी ।

इसके पश्चात् उन्होंने अनिता औलक से प्रेम विवाह किया, जो अन्त तक उनकी सहयोगिनी रही । मोहन राकेश का जीवन अस्थिरता, अतिवादिता और आक्रोश की खुली सच्ची गाथा है । राकेश के अनुसार: “वह व्याकुलता और अस्थिरता उनका स्वभाव बनती जा रही थी । कोई भी क्षण आने वाले क्षण को जल्दी से पा लेने की चाह में सहज नहीं हो पाता । अस्थिरता से अतिवादी प्रवृत्तियां आने लगती हैं ।”

राकेश का व्यक्तित्व विसंगतियों और पारस्परिक अन्तर्विरोधों से इस कदर भरा पड़ा था कि उनका व्यक्तित्व अलग-अलग इमेजों में बंट गया । एक प्रकार से एक असम्भव-सा व्यक्ति बन गया था । वे स्वाभिमानी, अहंवादी साहित्यकार थे । वह एक असामान्य या विशिष्ट कोटि के व्यक्ति थे ।

उनके व्यक्तित्व के प्रत्येक पक्ष में अत्यन्त गहराई थी । राकेश का साहित्यिक जीवन 7 मई, 1944 को प्रारम्भ हुआ । उनकी प्रथम कहानी ”नन्ही” थी । “सरस्वती” में प्रकाशित उनकी दूसरी कहानी ”भिक्षु” थी । उनके कहानी संग्रहों में ”इन्सान के खण्डहर”, ”नये बादल”, “जानवर और जानवर”, ”एक और जिन्दगी”, ”फौलाद का आकाश”, “चेहरे”, ”मेरी प्रिय कहानियां”, “मलबे का मालिक” ।

उपन्यास: ”अंधेरे बन्द कमरे में”, ”न आने वाला कल”, ”कांपता हुआ दरिया”, ”नीली रोशनी की बाहें” । निबन्ध संग्रह: ”परिवेश”, “समय सारथी” । संस्मरण: “आखिरी चट्टान”, ”ऊंची झील” । डायरी: ”मेरा पन्ना” । अनुवाद: “एक औरत का चेहरा”, ”हिरोशिमा के फूल” । नाटक: “आषाढ़ का एक दिन”, ”आधे अधूरे”, “लहरों का राजहंस” ”पैरों तले जमीन” इत्यादि हैं ।

“आषाढ़ का एक दिन” संस्कृत के प्रसिद्ध कवि कालिदास के जीवन की घटनाओं पर आधारित ऐतिहासिक कम काल्पनिक अधिक नाटक है, जिसमें कालिदास की प्रेमिका ”मल्लिका” और उनके सम्बन्धों के अन्तर्द्वन्द्व को बताया गया है । यह अपनी कलात्मक और मंचीय गुणवत्ता के साथ-साथ नारी मन के भावों को भी मौलिकता के साथ चित्रित करता है ।

”लहरों के राजहंस” ऐतिहासिक और काल्पनिक उपन्यास है । इस तीन अंक वाले उपन्यास में नन्द और उसकी पत्नी सुन्दरी तथा बौद्ध विचार के संघर्ष को बताया गया है । इस मनोवैज्ञानिक उपन्यास में दाम्पत्य सम्बन्धों को अत्यन्त यथार्थता के साथ चित्रित किया गया है, जिसमें जीवन के सुखों के प्रति आसकिा और अनासक्ति के द्वन्द्व को मुखर किया गया है ।

कथ्य और शिल्प की दृष्टि से यह उपन्यास अनूठा है । ”आधे अधूरे” इस उपन्यास में पति और पत्नी के टूटते और बिगड़ते सम्बन्धों को समकालीन परिवेश में मनोवैज्ञानिक रूप से प्रस्तुत किया गया है । परिवार के आधे-अधूरेपन की व्यथा-कथा को उदघाटित करने में यह उपन्यास अत्यन्त ही सफल रहा है ।

नाट्‌य-कृतित्च अल्प होने के बाद भी अपनी रंगमंचीय श्रेष्ठता के कारण अपना प्रभाव छोड़ता है । मोहन राकेश तनावों और अन्तर्द्वन्द्व के ऐसे कहानीकार हैं, जिनमें मूल्यों की तलाश भी है । मोहन राकेश के सम्पूर्ण कृतित्व का अध्ययन करने पर उनकी भाषा-शैली की विशेषताओं को उद्‌घाटित करना आवश्यक है ।

उनकी भाषा विविधतापूर्ण है । कहीं संस्कृत, तो कहीं उर्दू तो कहीं अंग्रेजी का प्रयोग हुआ है । पात्रों की स्थिति और मनोवृति को व्यक्त करने के लिए उन्होंने छोटे-बड़े संवादों का आश्रय लिया है । राकेश की कहानियों में सामाजिक समस्याओं की अपेक्षा भोगे गये सत्य और घुटन का सच्चा रूप लिखता है ।

उनकी कहानियों में माता- पिता के सम्बन्ध-विच्छेद से उत्पन्न स्थिति एवं बच्चों पर पड़ने वाले कुप्रभावों को बखूबी चित्रित किया गया है । ‘मिस पाल’ एक अकेलेपन से जूझती हुई कार्यालय में काम करने वाली अविवाहित लड़की की कहानी है, जो अपने चारों ओर के छोटेपन और कमीनेपन से ऊबकर दिल्ली चली आती है ।

अकेले में आकांक्षाओं, निराशाओं और घुटन भरी जिन्दगी जीती है । इस तरह मोहन राकेश का लेखन और व्यक्तित्व समानान्तर चलता रहा है । 3 दिसम्बर 1972 को अचानक सीने में दर्द उठा और उस प्राणघातक सख्या में वे सभी से विलग होकर सबसे दूर चले गये ।

3. उपसंहार:

मोहन राकेश नयी कहानी आन्दोलन के प्रमुख कर्णधार थे । उनकी व्यक्ति केन्द्रित कहानियों में पात्रों की स्थिति और मनःस्थितियों का ऐसा सच्चा चित्रण है कि व्यक्ति उसे पढ़ने के साथ-साथ महसूस भी करता है ।

स्त्री-पुरुष के तनाव, घुटन, अलगाव के साथ-साथ उन्होंने वैवाहिक जीवन मूल्यों के सत्य को भी उद्‌घाटित किया है । वह ऐसे नाटककार थे, जिन्होंने हिन्दी नाटककला को रंगमंचीय श्रेष्ठता और पहचान दी । वे आधुनिक शैली के नाटककार थे । अपने कृतित्व के कारण वे आधुनिक रचनाकारों में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ते हैं ।

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