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“Biography of Nimbarkacharya” in Hindi Language

निम्बकाचार्य । “Biography of Nimbarkacharya” in Hindi Language!

1. प्रस्तावना ।

2. जीवन परिचय ।

3. उनकी रचनाएं व कार्य ।

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4. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

कृष्ण भक्ति शाखा के वेष्णव सम्प्रदाय के प्रवर्तक निम्बकाचार्यजी हैं । वे निम्बार्क सम्प्रदाय के प्रवर्तक कहे जाते हैं । उन्होंने द्वैताद्वैत के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया, अर्थात् जीव और ब्रह्म दोनों की सत्ता अलग-अलग है । ऐसा कहा जाता है कि व्यासजी निम्बाकाचार्य के समकालीन थे । उन्होंने सिद्धान्तों की स्थापना के साथ-साथ पांच ग्रन्थों का प्रणयन भी किया ।

2. जीवन परिचय:

निम्बकाचार्यजी का जन्म 1162 के आसपास माना जा सकता है । वे मैसूर के वेल्लारी जिले के निम्बापुर नामक नगर में जन्मे थे । उनके बचपन का नाम नियमानन्द तथा आरुणि था । पिता का नाम अरूणमुनि तथा माता का नाम जयन्तीदेवी था । अपने ब्रह्मसूत्र भाष्य में उन्होंने अपने गुरु का नाम नारद बताया है ।

कहा जाता है कि एक बार मथुरा के कोई जैन साधु उनसे चर्चा करने आये हुए थे । इस आध्यात्मिक चर्चा में दोनों इतने अधिक लीन हो गये कि उन्हें समय का ध्यान ही नहीं रहा । जैन साधु के भोजन की बेला टल गयी, जिससे उन्हें बहुत पश्चाताप हुआ । मन में इतनी वेदना हुई कि शान्त भाव से ईश्वर का ध्यान करते  बैठ गये ।

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चमत्कार ऐसा हुआ कि आश्रम के नीम के वृक्ष के ऊपर सूर्य देवता अपना प्रकाश फेंक रहे थे । उन्होंने जैन साधु को जैसे ही भोजन करवाया, सूर्य देवता अन्तर्धान हो गये । नीम के वृक्ष के ऊपर अर्क, अर्थात् सूर्य का दर्शन कराने के कारण उनका नाम निम्बकाचार्य पड़ गया । उनकी कर्मभूमि ब्रजमण्डल रही है ।

वृन्दावन, गोवर्धन, नमिगांव आदि स्थानों में घूमकर उन्होंने अपने सिद्धान्तों का प्रचार किया । उनके प्रमुख चार शिष्य थे । उन्हें भगवान् कृष्ण के सुदर्शन चक्र का अवतार भी माना जाता है ।


3. उनकी रचनाएं व कार्य:

उन्होंने अपने सिद्धान्तों की स्थापना के लिए पांच ग्रन्थों का प्रणयन किया: वेदत्तसौरश, दशश्लोकीभक्तिसिद्धान्त, श्रीकृष्णस्तवराज, मन्त्ररहस्यषोडसी, प्रपन्नकल्पवल्ली । निम्बार्क का सम्प्रदाय द्वैताद्वैतवादी है ।  उनके अनुसार जीवन परब्रह्म का अंश है । ईश्वर सबका नियन्ता है । वह जीवन आणु का दृष्टा है । ईश्वर को जीव पाक्ति द्वारा प्राप्त कर सकता है ।

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कृष्ण भक्ति में राधा और कृष्ण दोनों की ही अराधना की जानी चाहिए । वामभाग में राधा के साथ कृष्णा ही उपास्य है । अत: श्री और लक्ष्मी दोनों ही रूपों में राधा, कृष्ण के साथ प्रकट होती हैं । दाम्पत्य भक्ति ही श्रेष्ठ भक्ति है । उन्होंने भी मानवतावादी धर्म का प्रचार किया ।


4. उपसंहार:

श्री निम्बकाचार्य के अनेक मन्दिर उत्तर भारत में विद्यमान हैं । राजस्थान के सलेमाबाद में इस सम्प्रदाय की सबसे बड़ी गद्दी है । वृन्दावन में बड़ी पुंज आराधना स्थल है । आज भी उनके अनुयायी उत्तर भारत में मिलते हैं । भक्ति में द्वेताद्वेत के सिद्धान्त के कारण उनका महत्त्व है ।

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