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Biography of Radha Charan Goswami in Hindi Language

राधाचरण गोस्वामी । Biography of Radha Charan Goswami in Hindi Language!

1. प्रस्तावना ।

2. जीवन वृत्त एवं रचनाकर्म ।

3. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

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पण्डित राधाचरण गोस्वामी भारतेन्दु युग के श्रेष्ठ कवि, निबन्धकार, पत्रकार, नाटककार, समाजसुधारक, भाषा-प्रेमी थे, जिन्होंने अपने रचनाकर्म के द्वारा राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक नवजागरण का सन्देश दिया । प्रेस की आजादी के लिए संघर्ष किया । वे ब्रजभाषा के प्रबल समर्थक थे ।

2. जीवन परिचय एवं रचनाकर्म:

राधाचरण गोस्वामीजी का जन्म वृन्दावन में 25 फरवरी 1859 को हुआ था । वे उर्दू अंग्रेजी, बंगला, गुजराती, मराठी के अच्छे ज्ञाता थे । उन्होंने ”कविकुल कौमुदी” नामक सभा का गठन कर न केवल संस्कृत कविता को बढ़ावा दिया, वरन् उर्दू फारसी के वर्चस्व के लिए भी 21 हजार लोगों के हस्ताक्षर सहित समर्थन पत्र अंगेजों को दिया और हिन्दी के समर्थन में एक राष्ट्रव्यापी आन्दोलन की शुरुआत की ।

उन्होंने गद्या के क्षेत्र में खड़ी बोली को तो स्वीकार किया ही, साथ ही पद्या के क्षेत्र में ब्रज भाषा की जोरदार वकालत की । खड़ी बोली का विरोध करते हुए उन्होंने उसे डाकिनी, पिशाचिनी भाषा कहा । उन्होंने ब्रज भाषा की सुदीर्घ काव्य-परम्परा को बचाये रखने के लिए भरसक प्रयत्न किया और खड़ी बोली की गद्य चेतना को समसामयिक विषयों के चित्रण के लिए उपयुक्त बताकर उसके प्रयोग को स्वीकार किया ।

राधाचरणजी ने 200 से भी अधिक लेख लिखे, जिसमें उनकी कविता की पुस्तक: “नवभक्तमाल” तथा अन्य पुस्तकों में ”सुदामा नाटक”, ”सती चन्द्रावली”, “अमरसिंह राठौर”, ”तन मन धन श्री गोसाईजी को अर्पण” इत्यादि हैं ।

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उन्होंने अपने निबन्धों में सामाजिक उत्पीड़न, सामाजिक कुरीतियों, धार्मिक अंधविश्वासों पर व्यंग्य किया । उनका निबन्ध ”यमलोक की यात्रा” बहुत चर्चित रहा, जिसमें उन्होंने नपे-तुले शब्दों में शिष्ट हास्य के द्वारा विचारों की उग्रता प्रकट की । राधाचरणजी ने ”भारतेन्दु” नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन भी किया ।

3. उपसंहार:

राधाचरण गोस्वामीजी ने एक पत्रकार के रूप में प्रेस की आजादी की वकालत की और उसके लिए अपना निर्भीक स्वर बुलन्द किया । तत्कालिक विसंगतियों के विरुद्ध अपनी लेखनी के माध्यम से जागति का कार्य किया ।

वे हिन्दी के नवजागरण के रचनाकार कहे जा सकते हैं । समाजसुधार के लिए उन्होंने ”विदेश यात्रा विचार” तथा ”विधवा विवाह” विवरण नामक ग्रन्थ भी लिखे । हिन्दी के प्रारम्भिक स्वरूप के लेखकों में उनका स्थान हमेशा स्मरणीय रहेगा ।

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