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Biography of Rahul Sanskrutayan in Hindi Language

राहुल सांस्कृतायान । Biography of Rahul Sanskrutayan in Hindi Language!

1. प्रस्तावना ।

2. जीवन परिचय एवं रचनाकर्म ।

3. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

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राहुल सांकृत्यायन का नाम हिन्दी के घुमक्कड़ शास्त्र के प्रणेता के रूप में अपनी पहचान रखता है । यात्रा-वृत्तान्त पर आधारित उनकी पुस्तकें राहुलजी के बहुआयामी ज्ञान और विद्वता का परिचय देती हैं । मानव के सभी धर्मो के प्रति उनकी आस्था काफी गहरी है । सरल, सहज, आडम्बरमुक्त जीवन, जिसका आधार कर्म हो, वह राहुलजी का जीवन हो सकता था ।

2. जीवन परिचय एवं रचनाकर्म:

राहुल सांकृत्यायन का जन्म 9 अप्रैल, 1893 को आजमगढ़ के पंदहा ग्राम में हुआ था । उनके बचपन का नाम केदारनाथ पाण्डेय था । बौद्ध धर्म से प्रभावित होकर उन्होंने उसे ग्रहण भी कर लिया था । महात्मा बुद्ध के पुत्र राहुल के नाम पर अपना नाम भी “राहुल” रख लिया ।

उनका गोत्र संस्कृति था, अत: वे सांकृत्यायन कहलाये जाने लगे । उन्होंने संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रश, फारसी, अंग्रेजी, तिब्बती, चीनी आदि भाषाओं में प्रवीणता हासिल की थी । बौद्ध धर्म के वे व्याख्याकार थे । बौद्ध धर्म के अनेक ग्रन्थों का उन्होंने हिन्दी में अनुवाद भी किया ।

राहुलजी ने लंका, बर्मा, तिब्बत, चीन, जापान, नेपाल, भूटान, रूस आदि देशों की यात्राएं भी कीं । घूमने की इस प्रवृति के कारण उन्होंने यात्रा-वृतान्त भी लिखे । 1904 में विवाह बन्धन में अनिच्छापूर्वक बंधने के साथ अपनी पहली पत्नी को कभी स्वीकार नहीं किया, जिसकी ग्लानि उनके मन में हमेशा बनी रही ।

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दूसरी पत्नी लीला, जो कि एक रूसी महिला थी । तीसरी पत्नी कमला से उन्हें दो सन्तानें प्राप्त हुईं । 8 वर्ष की अवस्था में संन्यासी बनने के साथ-साथ राष्ट्रप्रेम का जुनून उनके सिर पर सवार था । 1921 में गांधीजी के साथ सत्याग्रह आन्दोलन में भाग लिया । जेल-यात्राएं भी कीं ।

आर्यसमाज के प्रचारक के रूप में कार्य करने के बाद वे बौद्ध भिक्षु बने । इसके बाद कमलाजी से विवाह कर गृहस्थ जीवन में पुन: प्रविष्ट हो गये । 1929 में उन्होंने तिबत की साहसिक दुर्गम यात्रा की । अपनी  अदम्य इच्छाशक्ति के साथ घोर आर्थिक संकटों के बीच उन्होंने यात्राएं कीं । इन यात्राओं के बीच उन्होंने ‘सरहपा’ नामक कवि को भी टूटकर निकाला था ।

चीन की सरकार ने उन्हें तिब्बत का सांस्कृतिक इतिहास लिखने हेतु आमन्त्रित किया था । इस महान् घुमक्कड शास्त्री को नागरी प्रचारणी सभा में प्रधान सम्पादक के पद के साथ-साथ विश्वकोश निर्माण का प्रस्ताव भी आया, किन्तु उनकी प्रतिभा के साथ न्याय नहीं हुआ और भगवतशरण उपाध्याय को इस महत्वपूर्ण कार्य हेतु नियुक्त कर दिया गया ।

1959 में वे चीन गये । वहाँ से तिब्बत नहीं जा सके थे, जिसका उन्हें मलाल रहा । 26 वर्षो बाद वे लंका की यात्रा पर गये । उन्होंने अपने सम्पूर्ण जीवन की यात्रा को पांच खण्डों में 2 हजार 770 पृष्ठों में प्रकाशित करवाया, जिसमें उन्होंने वहां की संस्कृति व परिवेश पर अधिक लिखा ।

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उनकी प्रमुख पुस्तकों में ”चीन में क्या देखा”, “रूस में पचीस मास”, ”सोवियत भूमि”, “मेरी लद्दाख यात्रा”, “श्रीलंका”, “तिब्बत में सवा वर्ष”, ”महामानव बुद्ध”, “घुमक्कड़ स्वामी”, ”मेरी यूरोप यात्रा” तथा ”किन्नर देश और नेपाल”, “आजमगढ़ की पुराकथा”, ”बौद्ध संस्कृति”, “घुमक्कड़ शास्त्र”, ”पाली काव्यधारा”, “शासन शब्दकोश”, “जीव रसायन शब्दकोश”, ”प्रत्यक्ष शरीर शब्द कोश” इत्यादि हैं ।

3. उपसंहार:

राहुल सांकृत्यायन को साहित्य मनीषी, महापण्डित तथा घुमक्कड़ी जीवन के प्रणेता के रूप में प्रतिष्ठित स्थान मिला है । उन्हें काशी पण्डित सभा द्वारा महापण्डित, श्रीलंका द्वारा त्रिपिटिकाचार्य, हिन्दी साहित्य सम्मेलन इलाहाबाद द्वारा साहित्य वाचस्पति, भागलपुर तथा लंका यूनिवर्सिटी द्वारा डी॰लिट॰ की मानद उपाधि प्रदान की गयी ।

भारत सरकार ने उन्हें ”पद्‌मभूषण” से सम्मानित किया । वे लंका में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में प्रसिद्ध थे । ऐसे महामानव का 11 दिसम्बर, 1961 में स्मृति लोप हो गया । 14 अप्रैल, 1963 को उन्होंने इस संसार की अन्तिम यात्रा पूरी की ।

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