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“Biography of Upamanyu” in Hindi Language

भक्त उपमन्यु । “Biography of Upamanyu” in Hindi Language!

1. प्रस्तावना ।

2. उपमन्यु की गुरुभक्ति ।

3. उपमन्यु की शिवभक्ति ।

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4. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

हमारी भारतीय संस्कृति में शिष्यों की ऐसी परम्परा रही है, जिन्होंने अपनी अनुपम गुरुभक्ति तथा ईश्वरभक्ति से अपना नाम इतिहास में अमर किया । उनमें उपमन्यु की गुरुभक्ति और शिवभक्ति अत्यन्त प्रसिद्ध है ।

2. उपमन्यू की गुरुभक्ति:

प्राचीनकाल में आश्रमकालीन शिक्षा पद्धति की प्रचलित परम्परा में शिष्य अपने गुरुओं के यहां रहकर न केवल विद्यार्जन किया करते थे, वरन् उनकी सेवा-सुभूषा भी करते थे । गुरु के लिए भिक्षाटन, गायों को चराना, खेतों की रखवाली आदि का काम भी करते थे । उपमन्यु अपने गुरु आयोद धौम्य का अत्यन्त आज्ञाकारी शिष्य था ।

उसकी हृष्ट-पुष्ट देह को देखकर गुरु ने उसकी परीक्षा लेनी चाही कि देखा जाये उनके इस शिष्य में कितनी गुरुभक्ति है, कितना संयम, कितना धैर्य है । एक दिन गुरु ने इसी उद्देश्य से उपमन्यु से कहा: ”तुम्हारी इस हृष्ट-पुष्ट देह का रहस्य क्या है ?” उपमन्यु ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया: ”गुरुदेव । मैं भिक्षाटन से जो कुछ भी प्राप्त करता हूं उसे ही भोजन के रूप में ग्रहण करता हूं ।”

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गुरु ने कहा: ”कल से तुम भिक्षाटन से प्राप्त अन्न नहीं खाओगे ।” गुरु की बात पर बिना किसी प्रकार का संशय किये ही उपमन्यु ने स्वीकारोक्ति दी । अब उपमन्यु ने गुरु की आज्ञा मानकर भिक्षाटन से प्राप्त अन्न को खाना बन्द कर दिया था । उसकी सुगठित देह को देखकर गुरु ने पुन: प्रश्न किया: ”तुम्हारे अन्न त्याग के बाद तुम्हारी देह जरा भी निर्बल नहीं हुई, तुम क्या ग्रहण करते हो ?”

उपमन्यु ने उत्तर दिया: “गुरुदेव ! मैं दोबारा भिक्षाटन करता हूं ।” गुरु ने इसके लिए मना करते हुए कहा: ”ऐसा करके तो तुम लोगों पर अतिरिक्त बोझ डाल रहे हो । तुम्हें पुन: भिक्षाटन नहीं करना चाहिए ।” उपमन्यु ने कहा: जो आज्ञा गुरुदेव ।” अब उसने दोबारा भिक्षाटन भी त्याग दिया था ।

कुछ दिनों बाद भी गुरु ने उपमन्यु को जस का तस देखा, तो वही प्रश्न किया: ”तुम क्या खाकर इतने बलवान दिखते हो ?” उपमन्यु ने उत्तर दिया: ”गुरुदेव ! मैं तो गायों का दूध पीता हूं ।” गुरु ने उपमन्यु से फिर कहा: “इससे तो बछड़ों को दूध कम मिलता होगा, तुम दूध पीना बन्द कर दो ।” उपमन्यु ने उत्तर में कहा: ”जैसी आज्ञा गुरुदेव !” उपमन्यु ने अब गायों का दूध पीना भी बन्द कर दिया था ।

एक दिन गुरु ने उपमन्यु से वही प्रश्न दोहराया: ”तुम गायों का दूध नहीं पीते हो, तब भी इतने हृष्ट-पुष्ट कैसे हो ?” उपमन्यु ने उत्तर दिया: ”गुरुदेव ! अब तो मैं बछड़ों के फेन पर निर्भर हूं ।” गुरु ने कहा: ”अब तुम फेन पीना भी बन्द कर दो । इससे बछड़ों का पेट अधूरा भरता है ।” उपमन्यु ने गुरु के आदेशानुसार सब छोड़ दिया था ।

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अब वह पूर्णत: उपवास करने लगा था । निरन्तर उपवास से उसकी काया अत्यन्त दुर्बल हो गयी थी । एक दिन भूख की अतिशयता के कारण वह आक के पत्तों को खा गया, जिसके कारण उसकी दृष्टि चली गयी थी । अन्धा होकर वह एक कुएं में जा गिरा । रात को जब उपमन्यु नहीं आया, तब गुरु धौम्य उसे पुकारते हुए निकल पडे । कुएं में गिरे हुए उपमन्यु ने गुरु को आवाज देकर कहा कि वह कुएं में गिर पड़ा है ।

अब वह अन्धा हो चुका है । गुरु ने सहनशक्ति और धैर्य की परीक्षा में उसे सफल होते देखकर गर्व एवं प्रसन्नता का अनुभव किया । उन्होंने उपमन्यु से कहा: ”तुम मेरी परीक्षा में सफल हो गये हो । देवताओं के वेद्य अश्विनीकुमार से प्रार्थना करो कि वे तुम्हारी आंखों की ज्योति लौटा दें ।”

उपमन्यु ने अश्विनीकुमारों की स्तुति की । उनके आशीर्वाद से उपमन्यु ने नेत्रज्योति पुन: प्राप्त की । इस तरह लगन, धैर्य, संयम और सच्ची गुरु भक्ति के कारण उपमन्यु संसार में प्रसिद्ध हुआ ।


3. उपमन्यू की शिवभक्ति:

भगवान शिव को प्रेसन्न करने के लिए इस संसार में कई भक्तगणों ने उनकी पूजा-आराधना की है । भगवान् शिव इस सृष्टि के एकमात्र ऐसे देवता हैं, जिन्हें आशुतोष कहा जाता है । आशुतोष, अर्थात् थोड़ी-सी पूजा-आराधना में तुरन्त हीं प्रसन्न होने वाले भगवान् ।

यदि प्रार्थना अल्पसाधनों में तथा बिना किसी विधि-विधान के शुद्ध मन से की गयी हो, तो भी भगवान् शिव प्रसन्न हो जाते हैं और मनोवांछित फल भी देते हैं । उपमन्यु जितना महान् गुरुभक्त था, उतना ही महान शिवभक्त भक्त था । एक दिन उपमन्यु ने अपनी माता से दूध मांगा ।

दूध तो उपमन्यु के यहां था नहीं । ऐसे में उसकी माता ने चावल का घोल बनाकर उसे यह कहकर दे दिया कि: ”यदि तुम्हें दूध पीना है, तो भगवान शिव की प्रार्थना करो । वे प्रसन्न होकर दूध-भात देंगे ।” ऐसा सुनकर उपमन्यु ने उनकी भक्ति हेतु माता के कहने पर वन जाकर ॐ नम: शिवाय महामन्त्र का जाप करना शुरू कर दिया ।

तब उसे वन में रहने वाले पिशाचों ने तरह-तरह से सताया । इस पर उपमन्यु जरा भी विचलित नहीं हुआ । उसके इस मन्त्र जाप का प्रभाव यह हुआ कि पिशाचों का चित्त निर्मल हो गया । उपमन्यु के कठोर तप को देखकर भगवान शिव उसकी परीक्षा लेने हेतु इन्द्र का रूप धारण कर उसके पास गये ।

उपमन्यु ने अपनी आन्तरिक शक्ति से इन्द्र बने शिव को पहचान लिया था, और उनसे कहा: ”देवराज ! आपने मेरे सामने आकर बड़ी ही कृपा क है, मैं आप कि क्या सेवा कर सकता हूं ?” इन्द्र रूपी शंकरजी ने उपमन्यु पर प्रसन्न होकर कहा: ”वत्स ! “मैं तुम पर अति प्रसन्न हूं ।

मांगो तुम क्या चाहते हो ? मैं तुम्हें इच्छित फल दूंगा ।” उपमन्यू ने कहा: ”मैं भगवान शंकर का दास बनकर उनकी सेवा करना चाहता हूं । जब तक वे मुझे दर्शन नहीं दे देते, तब तक मैं तप करना नहीं छोडुंगा ।” इतना सुनना था कि इन्द्र बने जी ने स्वय की निन्दा प्रारम्भ कर दी ।

भगवान संकर की निन्दा सुनकर उपमन्यु दुखी और क्रोधित हुआ । उसने इन्द्र का वध करने हेतु अभिमन्त्रित भस्म उन पर फेंकी और शिव निन्दा के प्रायश्चित स्वरूप अपने शरीर पर भस्म लगाने लगा । तब उसने देखा के उसके समक्ष साक्षात भगवान शिव और पार्वती अपने वाहन (नन्दी बैल) सहित खड़े हैं ।

ऐसा अदभुत दृश्य देखकर उपमन्यु भावविभोर हो गया था । भगवान् शिव ने उसकी अविचल भक्ति को देखकर उसके सारे दु:ख दूर कर दिये । उपमन्यु को दूध-भात, खीर देकर शिव मन्त्र की दीक्षा दी । ऐसी थी उपमन्यु की शिवभक्ति ।

4. उपसंहार:

इस तरह उपमन्यु अपने गुरु द्वारा ली गयी परीक्षा तथा भगवान शिव द्वारा ली गयी परीक्षा में सफल रहा । साक्षात् शिव-पार्वती का दर्शन कर उसका जीवन धन्य हो गया ।

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