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Case Studies on Environmental Issues

Read this article in Hindi to learn about the twelve main case studies on environmental issues.

केस अध्ययन # 1:

ऊर्जा दक्षता (Energy efficiency):

संयुक्त राज्य अमरीका में नगरीय आवास और व्यापारिक प्रतिष्ठान हरितगृह गैसों के निकास के लगभग 35 प्रतिशत भाग के लिए जिम्मेदार हैं । आवश्यकता यह है कि उनकी इमारतों में ऊर्जा-दक्षता हो और वे कार्बन डाइआक्साइड का निकास कम करें जो इन नगरीय क्षेत्रों में ‘उष्मा-द्वीप’ (heat island) या ऊँचे तापमान वाले इलाके पैदा करती है ।

केस अध्ययन # 2:

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पानी पंचायत, जिला पुणे, महाराष्ट्र:

महाराष्ट्र के पुणे जिले का माहुर गाँव एक सूखाग्रस्त क्षेत्र में स्थित है । लोग साल में एक अच्छी फसल भी नहीं उगा पाते थे; साफ पेय जल भी दुर्लभ था । इस सूखाग्रस्त क्षेत्र में जल संरक्षण के लिए विलासराव सलुंखे नामक व्यक्ति ने ‘पानी पंचायत’ नाम का एक आंदोलन शुरू किया ।

एक मंदिर की बंजर और गैर-खेतिहर भूमि पर जलविभाजक निर्माण (watershed development) आरंभ किया गया । लघु स्तर पर विशद जलविभाजक प्रबंध के जरिए जल संरक्षण और जल संचय के कारण गाँव में धीरे-धीरे जल की अधिकता हो गई ।

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गाँव की 16 हेक्टेयर जमीन में से 9.6 हेक्टेयर जमीन पर सिंचाई होने लगी, 2.4 हेक्टेयर पर वन लगाए गए और 4 हेक्टेयर को रिसाव की टंकी बना दिया गया । कुँए खोदे गए और खेतों में बंध (bunds) बनाए गए । जहाँ सलुंखे की 24 एकड़ जमीन पर 200 क्विंटल अनाज पैदा होने लगा, वहीं उसी क्षेत्र की 10 एकड़ जमीन पर केवल 10 क्विंटल अनाज की उपज होती थी । इसलिए और ग्रामीणों ने भी पानी पंचायत में भाग लेना शुरू किया तथा यह क्षेत्र तेजी से हरा-भरा और उत्पादक बन गया ।

केस- अध्ययन # 3:

मेवाड़, राजस्थान:

राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में कृषि-जल के बँटवारे के लिए जलसंचय की पद्धतियों की एक समृद्ध परंपरा रही है ।

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मेड़बंदी:

इसमें पहाड़ी की ढलान पर पत्थर से बंध बनाया जाता है जिससे कृषि के लिए जमीन समतल बनाने में मदद मिलती है । इससे कटाव रुकता है और नमी सुरक्षित रहती है ।

नाद/बंघा ये नाले-नालियों पर पत्थर के बने रोकबाँध है जो मानसून के दौरान पानी में डूब जानेवाली उपजाऊ जमीन पर पानी का प्रवाह रोकने के लिए बनाए जाते हैं । गाद को रोकने से जमीन न सिर्फ और अधिक उपजाऊ बन जाती है बल्कि मिट्‌टी में जल की अच्छी-खासी मात्रा भी सुरक्षित रहती है । ये बाँध अनेक वर्षों में, एक-एक चरण में, बनाए जाते हैं ।

हेबंर:

ये मौसमी नालों पर पत्थरों, टहनियों और कीचड़ से बने अस्थाई बाँध हैं ताकि पानी का प्रवाह इतना कम हो जाए कि सिंचाई के लिए उमे खेतों तक ले जाया जा सके ।

चक:

चक एक बड़ा भूखंड, आम तौर पर चरनौत या गाँव की चरागाह होता है जिसे कोट नाम की एक पत्थर की दीवार से घेर दिया जाता है । चक में पेड़ों के बाग, चारे के लिए घास, चौहद्‌दी में खंदकों के साथ बंध और पत्थर के ढील-ढाले रोकबाँध बनाए जाते हैं । चक का इस्तेमाल चारा और जलावन पाने के लिए किया जाता है ।

तालाब:

मेवाड़ का क्षेत्र अपने तालाबों के लिए मशहूर है । उदयपुर नगर तालाबों की बड़ी संख्या के कारण ही झीलों का नगर कहलाता है । पाँच बीघे से कम के छोटे जलाशय को तलाई, मझोले आकार की झील को बंध या तालाब तथा बड़ी झील को सागर या समंद कहते हैं ।

साझा कुआँ:

यह खुला कुआँ होता (open dry well) है जिसके अनेक मालिक होते हैं । यह अरावली की पहाड़ियों में सिंचाई की एक महत्वपूर्ण विधि है । उदयपुर जिले के कोई 70,000 कुएँ 80 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र को पानी देते हैं और अपने मालिकों को पानी उपलब्ध कराते हैं । इनको साझी संपदा संसाधन माना जाता है ।

केस अध्ययन # 4:

टेहरी परियोजना:

उत्तरांचल के बाहरी हिमालय क्षेत्र का टेहरी बाँध जब पूरा होगा तो टेहरी नगर और लगभग 100 गाँव डूब चुके होंगे । 1972 में इस बाँध की स्वीकृति मिलने के बाद से ही स्थानीय जनता इसके निर्माण का विरोध करती रही है । वैज्ञानिकों, पर्यावरणवादियों और अन्य समूहों ने भी इस बाँध का विरोध किया है ।

इस बाँध के कारण जो लगभग एक लाख लोग अपने घरों से उजड़ेंगे उनके समुचित पुनर्वास और मुआवजे के लिए शायद ही कुछ किया गया हो क्योंकि वैकल्पिक भूमि उपलब्ध ही नहीं है । जहाँ परिवार सदियों से रहते आए हैं वहाँ से उनको जबरन हटाए जाने से उन्हें भावात्मक और मनोवैज्ञानिक आघात भी पहुँचता है ।

केस अध्ययन # 5:

जनजातीय जनसंख्या:

विनाश का खतरा हमारे पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों तक ही सीमित नहीं है । दुनिया के अनेक जनजातीय लोगों की तरह हिंद महासागर के अंडमान द्वीपवासी जरवा लोगों की संख्या भी गिर रही है । भूमि पर अपने परंपरागत अधिकारों से वंचित कर दिए जाने के बाद उनका जीवन दाँव पर लग गया है । उन्हें अपनी परंपरागत जीवनशैली को छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया गया है जिससे उनकी संख्या तेजी से कम होती जा रही है ।

केस अध्ययन # 6:

प्रकृति की गोद में शिक्षा: शांतिनिकेतन का मॉडल (Education in nature: The Shantiniketan model):

श्री रवींद्रनाथ ठाकुर ने शांतिनिकेतन नाम से एक विश्वविद्यालय बनाया जो पर्यावरण- आधारित दर्शन की शिक्षा देता था । उनकी शिक्षा-दर्शन मनुष्य और उसके पर्यावरण के बीच एक सामंजस्य भरे संबंध की आवश्यकता पर केंद्रित था । इसके लिए उन्होंने युवाओं को प्रकृति की ओर उन्मुख किया । इसका मतलब अपनी जड़ों की ओर वापिस जाना था । प्राचीन भारत में गुरुकुल दूरदराज के जंगलों में होते थे ।

श्री रवींद्रनाथ ठाकुर ने इन धारणाओं को संगीत, नृत्य, नाटक और काव्य के माध्यम से प्रकृति के गुणगान से जोड़ा । शांतिनिकेतन में हर मौसम में उत्सव मनाए जाते और पेड़ लगाए जाते थे । उन्होंने बहुत पहले, 1928 में ही वृक्षारोपण आरंभ किया था । वास्तव में जो कुछ शांतिनिकेतन में शुरू हुआ, वह अब पर्यावरण-शिक्षा और निर्वहनीय जीवन का आधार बन चुका है और यह मूलतः प्रकृति के संरक्षण पर केंद्रित है ।

केस अध्ययन # 7 और 8:

प्रवाल भित्तियों की हानि, प्रशांत महासागर (Damage to coral reefs, Pacific Ocean):

प्रशांत महासागर में 1997 में अल नीनों के कारण समय-समय पर बढ़ने वाली उष्णता की तीव्रता प्रवालों की अभी तक की सबसे गंभीर मृत्यु का कारण बनी । अनुमान है कि पृथ्वी की लगभग 10 प्रतिशत प्रवाल भित्तियाँ (coral reefs) मर गईं, 30 प्रतिशत गंभीर रूप से प्रभावित हुई और 30 प्रतिशत का ह्रास हुआ ।  ग्लोबल कोरल रीफ मानीटरिंग नेटवर्क (आस्ट्रेलिया) का अनुमान है कि 2050 तक सभी भित्तियाँ शायद मर      जाएँ ।

ग्रेट ब्रिटेन में तितलियों की संख्या (Butterfly population in the United Kingdom):

विश्वव्यापी उष्णता के कारण तितलियाँ ग्रेट ब्रिटेन में समय से पहले ही पहुँच रही हैं । वैज्ञानिकों का कथन है कि पिछले दो दशकों में हर साल अब तितलियाँ काफी पहले ही देखी जा सकती हैं । रेड एडमिरन जैसी कुछ तितलियाँ 1970 के दशक के मध्य के मुकाबले एक माह पहले ही देखी जा सकती हैं । पीकाक और अरेंज टिप जैसी दूसरी तितलियाँ अतीत की अपेक्षा अब 15 से 25 दिन पहले ही आने लगी हैं । तापमान का भारी चढ़ाव इन तितलियों पर प्राणघातक प्रभाव डाल सकता है । ऐसी कुछ तितलियों की हानि हो सकती है जिनको अधिक ठंडा माहौल चाहिए ।

केस अध्ययन # 9:

नाभिकीय आपदाएँ और रिसाव (Nuclear disaster and leakages) :

1986 में भूतपूर्व सोवियत संघ में चेर्नोबिल परमाणु बिजलीघर में एक खराबी पैदा हो गई जिसके कारण उसके रिएक्टर में आग लग गई और अनेक विस्फोट हुए । रेडियोधर्मी धूल अनेक किलोमीटर तक फैल गई तथा यूरोप ही नहीं, उत्तरी अमरीका के ऊपर भी छा गई । विस्फोट में 3 लोगों की मौत हुई और विकिरण के प्रभाव से कुछ ही समय बाद 28 लोग मरे । कोई 259 बीमार लोग अस्पतालों में भरती किए गए । इस क्षेत्र को खाली कराना आवश्यक था, इसलिए 1,35,000 लोग फौरन और 1991 तक 1.5 लाख लोग वहाँ से हटाए गए ।

रेडियोधर्मिता का प्रभाव जारी रहने के कारण और भी लोगों को हटाना पड़ा । इस नाभिकीय दुर्घटना से 6.5 लाख लोगों के गंभीर रूप से प्रभावित होने का अनुमान है । वे कैंसर, थायराइड, ट्‌यूमर और मोतियाबिंद के शिकार हो सकते हैं और उनकी प्रतिरक्षा व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है । चूँकि रेडियोधर्मिता घास से शाकभक्षियों में स्थानांतरित होती है, इसलिए स्काटलैंड की भेड़ों और लैपलैंड के रेंडियरों पर भी प्रभाव पड़ा और वे खाने योग्य नहीं रहे । यूरोप में सब्जियाँ, फल और दूध प्रदूषित हुए ।

नार्मेंडी (फ्रांस) के एक नाभिकीय अपशिष्ट शोधन केंद्र ने आसपास खेलनेवाले बच्चों के जीवन को प्रभावित किया है । आगे चलकर वे ल्यूकेमिया (रक्त कैंसर) के शिकार हो सकते हैं ।

केस अध्ययन # 10:

टेहरी, उत्तरांचल:

उत्तरांचल के टेहरी जिले का नगचौंद गाँव मिट्‌टी के कटाव से त्रस्त और वनों से रहित था । 1989 में सेना से सेवानिवृत्ति के बाद सोभनसिंह भंडारी जब अपने गाँव वापस लौटे तो यह ह्रास देखकर स्तब्ध रह     गए । छह माह के बाद वे ग्रामप्रधान बने और उन्होंने ग्राम विकास की विभिन्न योजनाओं को लागू करने का फैसला किया । जवाहर रोजगार योजना के द्वारा उनको समुदाय का बेपनाह समर्थन मिला । 1990 में वन विभाग ने जलविभाजक विकास के एक लघु कार्यक्रम के लिए 30 हेक्टेयर भूमि का एक बंजर टुकड़ा चुना ।

ग्रामीणों ने क्षेत्र में चराई पर रोक लगाईं तथा ईंधन और चारे के लिए पौधे लगाए । इस क्षेत्र का चारा एक पड़ोसी गाँव को बेचकर पैसा जमा करने में भंडारी ने गाँव की मदद की तथा इस पैसे का उपयोग विकास और रखरखाव के कामों पर किया । इस सामुदायिक प्रयास ने क्षेत्र के पारितंत्र पर भारी प्रभाव डाला । क्षेत्र में नमी की मात्रा बढ़ी तथा गाँव के जलस्रोत फिर से भर गए । स्थानीय जनता को अपने दैनिक जीवन के लिए जिन-जिन प्राकृतिक संसाधनों की आवश्यकता होती है, वे आज उसे सुलभ हैं ।

केस अध्ययन # 11:

नर्मदा का मुद्‌दा (The Narmada Issue) :

भारत में नर्मदा और उसकी सहायक नदियों पर अनेक बाँधों के निर्माण की योजना संबंधी विवाद एक न्यायपूर्ण और समतामूलक समाज के संघर्ष का प्रतीक है । इन बाँधों से अनेक गरीब और साधनहीन समुदाय विस्थापित हो रहे हैं, उनकी अपेक्षाकृत आत्मनिर्भर और पर्यावरण की दृष्टि से दोषमुक्त अर्थव्यवस्था और संस्कृति का विनाश हो रहा है तथा स्वाभिमानी लोग शरणार्थियों या गंदी बस्तियों के निवासियों में बदलते जा रहे हैं ।

‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ राष्ट्रीय हित के नाम पर अपने घरों, जीविका और जीवनशैली से वंचित किए जा रहे साधनहीन लोगों के अधिकारों के बारे में सबसे गतिशील जन-आंदोलनों में एक है । ऐसे बाँधों में एक है सरदार सरोवर बाँध जो पूरा होने पर 37,000 हेक्टेयर उपजाऊ जमीन को डुबोएगा, दो लाख आदिवासियों को विस्थापित करेगा और पारितंत्र को अकथनीय हानि पहुँचाएगा ।

केस अध्ययन # 12:

खामोश घाटी (Silent Valley):

खामोश घाटी में, जो दक्षिण भारत में उष्णकटिबंधीय जैव-विविधता का एक अनोखा क्षेत्र है, एक प्रस्तावित जलविद्युत परियोजना 1970 के दशक में रोक दी गई और इस क्षेत्र को 1984 में राष्ट्रीय पार्क घोषित कर दिया गया । यह उपलब्धि थी अनेक समर्पित व्यक्तियों, समूहों और संगठनों की जो इस क्षेत्र को डूबने से बचाने और उसकी समृद्ध जैव-विविधता को सुरक्षित रखने के लिए प्रयासरत थे ।

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