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Growth in a Child in Hindi

Read this article in Hindi language to learn about the three main aspects of growth in a child. The aspects are: 1. Physical Growth Cycle 2. Common Effects of Growth Cycles 3. Rhythms of Growth.

सामान्यत: वृद्धि के अग्र महत्वपूर्ण चरण होते हैं:

Aspect # 1. शारीरिक वृद्धि चक्र (Physical Growth Cycle):

शारीरिक वृद्धि चक्र से तात्पर्य है कि शारीरिक वृद्धि नियमित दर के अनुसार नहीं होती है, बल्कि यह विभिन्न गति के काल चक्र या अवस्थाओं या असमानता के अनुसार होती है । वृद्धि कभी अत्यन्त तीव्र गति से होती है, तो कभी अत्यन्त धीमी गति से परन्तु बालक के भार में निरन्तर वृद्धि होती रहती है ।

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शिशु का जन्म के समय जितना भार होता है छ: माह पश्चात् दोगुना तथा एक वर्ष में तिगुना हो जाता है । मानव विकास वैज्ञानिकों के अनुसार, वृद्धि के चार विभिन्न काल होते हैं । इनमें दो तीव्र गति के काल व दो धीमी गति के काल कहे जाते हैं । गर्भ काल में तथा तम से छ: मास तक वृद्धि की दर तीव्र होती है ।

वृद्धि का प्रथम चक्र काल जिसे तीव्र गति काल कहते हैं ये जन्म से दो वर्ष तक चलता है, इसके उपरान्त वृद्धि की गति धीमी होने लगती है परन्तु वृद्धि रुकती नहीं । उत्तर बाल्यावस्था या लैगिंक परिपक्वता आने तक वृद्धि की गति दर धीमी रहती है या एक समान रहती है ।

वृद्धि का दूसरा चक्र काल आठ से ग्यारह वर्ष की अवस्था में प्रारम्भ होता है । इस अवधि में वृद्धि की गति धीमी होती है । तीसरा वृद्धि चक्र काल ग्यारह वर्ष के पश्चात् शुरू होता है जोकि पन्द्रह या सोलह वर्ष तक चलता है । इसके पश्चात् वृद्धि पुन: तीव्र हो जाती है ।

इसके बाद परिपक्वता की अवस्था आने तक वृद्धि की गति धीमी होती है अत: इसको धीमी गति काल भी कह सकते हैं । चौथा चक्र वृद्धावस्था तक का होता है जिसमें शारीरिक लम्बाई बनी रहती है, परन्तु शारीरिक भार में परिवर्तन दिखाई देते हैं ।

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यहाँ एक बात स्पष्ट होती है कि प्रत्येक बालक की शारीरिक वृद्धि की दर एक-दूसरे से भिन्न होती है हालांकि वृद्धि चक्र को सार्वभौमिक कहा जाता है । अत: इनके लिये कुछ सिद्धान्त तैयार किये गये हैं ताकि वे एक-दूसरे समूह का प्रतिनिधित्व कर सकें ।

Aspect # 2. वृद्धि चक्र के सामान्य प्रभाव (Common Effects of Growth Cycles):

वृद्धि चक्र के सामान्य प्रभाव निम्न प्रकार हैं:

(i) समायोजन में परेशानी (Adjustment Difficulties):

तीव्र वृद्धि के चक्र में लगातार नये समायोजन करने की आवश्यकता होती है, जो बालक को संवेगात्मक रूप से परेशान कर सकते हैं ।

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धीमी वृद्धि चक्र में समायोजन अत्यन्त आसान व सुगमता से होता है ।

(ii) पोषण सम्बन्धी आवश्यकताएँ (Nutritional Requirement):

तीव्र वृद्धि चक्र में बालक की पोषण सम्बन्धी आवश्यकताएँ सबसे अधिक होती हैं । यह समय बालक के जन्म से छ: मास तक का होता है । उपरोक्त चक्र में यदि बच्चे को पूर्ण पोषण प्राप्त नहीं होता है तो उनकी वृद्धि पर प्रभाव पड़ता है तथा वे चिड़चिड़े व क्रोधी हो जाते हैं । इसलिए वे विद्यालय के कार्य तथा खेलों में कम रुचि लेते हैं ।

(iii) ऊर्जा का स्तर (Level of Energy):

तीव्र गति से बढ़ते बालकों को अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है परन्तु यदि यह न मिले तो बालक हमेशा थका-थका-सा रहता है । अत: कम ऊर्जा मिलने पर बालक चिड़चिड़ा व क्रोधी हो जाता है । जबकि धीमी वृद्धि चक्र में बालकों के पास खेलने तथा अन्य क्रियाओं के लिये अधिक ऊर्जा होती है । अत: इस अवधि में बालक अत्यन्त प्रसन्न व मैत्री-पूर्ण व्यवहार करता है ।

(iv) भद्दापन (Awkwardness):

कभी-कभी देखा जाता है कि जो बच्चे पहले अच्छे दिखाई देते हैं, तीव्र वृद्धि के साथ ही बहुत भद्दे दिखाई देने लगते हैं तथा वृद्धि की गति कम होने पर बच्चे में आया यह भद्दापन धीरे-धीरे अच्छे क्रियात्मक समन्वय द्वारा फिर से स्थापित हो जाता है ।

Aspect # 3. वृद्धि की लय (Rhythms of Growth):

मानव का पूरा शरीर एक इकाई की तरह कार्य करता है । शरीर के विभिन्न भागों की अपनी स्वयं की धीमी या तीव्र गति से वृद्धि करने की क्षमता होती है । वे अपने समयानुसार ही पूर्ण परिपक्व आकार में पहुँचते हैं ।

जीवन के प्रथम वर्ष के अलावा बालक की लम्बाई तीव्रता से बढ़ती है तथा कद में वह वृद्धि नहीं होती । चेहरे का निचला का भाग ऊपरी भाग की तुलना में अधिक तीव्रता से बढ़ता है । शरीर की माँसपेशियाँ अस्थियाँ फेफड़े एवं बाह्य जननेन्द्रियाँ सभी एक साथ अपनी वृद्धि काल के वर्षों में लगभग बीस गुना आकार में बढ़ जाती हैं ।

यह देखा गया है कि आँखें, मस्तिष्क एवं अन्य भाग या अंग जो कि जन्म के समय अन्य अंगों की तुलना में अधिक विकसित रहते हैं तथा धीमी गति से वृद्धि करते हैं ।

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