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Top 15 Principles of Child Development | Hindi

Read this article in Hindi language to learn about the top fifteen principles of child development.

बाल विकास के सिद्धान्त निम्नलिखित हैं:

Principle # 1. विकास अवस्था के अनुसार बढ़ता है:

बच्चों का विकास अनेक अवस्थाओं से गुजरता है । अत: विकास की वृद्धि को एक अवस्था से दूसरी अवस्था की भिन्नता से पहचानो जा सकता है ।

विकास की मुख्य अवस्थाएं निम्न प्रकार हैं:

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(i) गर्भावस्था,

(ii) शैशवावस्था,

(iii) बचपन,

(iv) बाल्यावस्था,

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(v) वय: सन्धि तथा किशोरावस्था ।

गर्भावस्था में भी निम्नलिखित अवस्थाएँ होती हैं:

(i)  बीजावस्था,

(ii) भ्रूणावस्था,

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(iii)गर्भावस्था तथा

(v) शैशवावस्था ।

प्रत्येक अवस्था में विकास अलग-अलग होता है । सर्वप्रथम निषेचित डिम्य रहता है, फिर अंगों के निर्माण के लिए उसमें अलग-अलग भाग विभाजित होते हैं । उसके बाद सभी अंगों का अलग-अलग विकास होता  है । शैशवावस्था में शिशु नए वातावरण के अनुकूल होता है । 2 वर्ष तक वह दूसरों के सहारे ही अपना जीवन चलाता है, धीरे-धीरे वह आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता है । बाल्यावस्था में बच्चा अपने सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक वातावरण से समायोजित करता है । जिज्ञासा, समूह प्रवृत्ति आदि विशिष्ट प्रवृत्तियाँ आती हैं ।

वह परिवार, मित्रों एवं स्कूल के माध्यम से जीवन की वास्तविकताओं से परिचित होता है । इस समय यौन अंगों का विकास होता है । इसके पश्चात् की अवस्था किशोरावस्था होती है । इस अवस्था में शरीर व मन पर नियंत्रण नहीं रहता है जिसके लिये सभी प्रकार की शिक्षा की आवश्यकता होती है ।

किशोरावस्था के बाद प्रौढ़ावस्था समय कर्तव्यों, उत्तरदायित्वों और उपलब्धियों के साथ आता है तथा जीवन पथ पर आने वाली परिस्थितियों से जूझने एवं समायोजन करने का अनुभव प्राप्त कराता है ।

Principle # 2. परिपक्वता एवं अधिगम के परिणाम से विकास:

बच्चे में वंशानुक्रम से सम्बन्धित शारीरिक क्षमताओं के विकास को परिपक्वता कहते हैं । बच्चों के व्यवहार में परिवर्तन शारीरिक व मानसिक परिपक्वता से ही आता है । जो आयु बढ़ने के साथ स्वत: ही आती     है । हरलॉक के अनुसार, परिपक्वता अधिगम के लिए कच्चा माल प्रदान करती है । परिपक्वता बच्चे के व्यवहार के सामान्य प्रतिमानों को निश्चित करती है ।

Principle # 3. विकास प्रतिमानों की भविष्यवाणी हैं:

विकास के अवधि की कुछ अपनी अलग विशेषताएँ होती हैं जो कि प्रत्येक बच्चे में दृष्टिगोचर होती हैं । शुरू की आयु में ही यह ज्ञात हो जाता है कि बच्चे का आकार व कद कैसा होगा । अत: माता-पिता के लिये यह उचित होगा कि बच्चे के प्रारम्भिक विकास, योग्यताओं और क्षमताओं के अनुरूप ही उसकी शिक्षा का प्रबन्ध करे ।

Principle # 4. विकास का निश्चित क्रम होता है:

बच्चे के शारीरिक विकास को दो निश्चित क्रमों में विभाजित किया गया है:

(i) मस्तकाधोमुखी क्रम,

(ii) निकटस्थ क्रम ।

प्रथम- शारीरिक विकास सिर से पैर की दिशा में होता है । बच्चा पहले सिर उठाता है, फिर धड़ तथा अंत में पैर को घसीटता हुआ खड़ा होना सीखता है ।

द्वितीय- विकास सुषुम्ना नाड़ी के पास के क्षेत्रों से प्रारम्भ होकर तथा उससे दूरस्थ स्थित क्षेत्रों की तरफ जाता है । परन्तु हाथों एवं अँगुलियों से कार्य करने की क्षमता का विकास देर से होता हैं ।

Principle # 5. विकास सामान्य से विशिष्ट की ओर होता है:

बच्चे में प्रथम सामान्य क्रियाओं का तथा उसके पश्चात् विशिष्ट क्रियाओं का विकास होता है । प्रथम बार गेंद पकड़ने में अपना पूरा शरीर हिलाता है । कुछ बढ़ने पर हाथ पकड़ने लगता है । शिशु की सभी तरह की शारीरिक और मानसिक प्रक्रियाओं का सामान्य रूप होने के पश्चात् वे विशिष्ट रूप धारण कर लेते हैं ।

Principle # 6. विकास के प्रतिमानों में स्थिरता रहती है:

विकास के प्रतिमानों की स्थिरता का नियंत्रण वंशानुक्रम और वातावरण के संयुक्त स्वरूप से होता है । अधिकांश तया जो बच्चे विशेष आयु की लम्बाई में बढ़ते हैं उनमें आगे भी लम्बाई में बढ़ने की प्रवृत्ति रहती है ।

इसी प्रकार देखा गया है कि बच्चों की मानसिक प्रतिमानों में भी स्थिरता पाई जाती है । जो बच्चे एक आयु स्तर पर मंद बुद्धि के रहते हैं, वे अन्य स्तरों पर भी (उस आयु को देखते हुए) मंद बुद्धि के ही रह जाते हैं ।

Principle # 7. सन्तुलन एवं असन्तुलन की अवस्थाएँ:

सन्तुलन व असन्तुलन का स्थान विकास के प्रतिमानों में एक समान रहता है । ये दोनों बच्चे को समायोजन करने में सहायता करते हैं । जिन अवस्थाओं में विकास प्रतिमान संतुलित रहता है, उसमें बच्चा अच्छी तरह से अपना समायोजन कर लेता है ।

परन्तु असंतुलन की स्थिति उत्पन्न होने पर बच्चा उन अवस्थाओं में तनाव, असुरक्षा, अनिर्णय आदि समस्याओं का शिकार बन जाता है किन्तु असन्तुलन का अनुभव मुख्यतया वयःसन्धि की अवस्था में ही होता है ।

Principle # 8. विकास की गति एक निरन्तर प्रक्रिया है:

विकास की प्रक्रिया गर्भावस्था से प्रारम्भ होकर जीवन-पर्यन्त चलती है । धीरे-धीरे परिपक्वता के बाद विकास की गति कम हो जाती है परन्तु बचपन में विकास तेज होने के साथ-साथ निर्णायक होता है ।

Principle # 9. विकास में वैयक्तिक भिन्नताएँ होती हैं:

प्रत्येक बालक के विकास की गति एक समान नहीं होती है । किसी का विकास धीरे-धीरे होता है तो किसी का विकास तेजी से होता है । कोई बच्चा जल्दी बोलता है तो कोई देर से । व्यवहार एवं बुद्धि के सन्दर्भ में भी यही बात लागू होती है । औसतन तेज एवं मंद बच्चों के विकास की गति भिन्न हो सकती है परन्तु विकास का क्रम भिन्न नहीं होता है; जैसे-चलने से पहले खड़ा होना, बोलने से पहले बुद-बुदाना आदि होते हैं ।

Principle # 10. विकास में सह-सम्बन्ध होता है:

विकास के विभिन्न क्षेत्रों में सह-सम्बन्ध होता है । प्राय: शारीरिक एवं मानसिक विकास सह-सम्बन्धित ढंग से चलता है । सामाजिक विकास के साथ-साथ नैतिक में भी आपसी सम्बन्ध बना रहता है । इस तरह से विविध पक्षीय विकास अन्योन्याश्रित रूप में चलता है ।

Principle # 11. विकास की भिन्न-भिन्न गतियाँ होती हैं:

विकास प्रक्रिया की गति अलग-अलग पक्षों पर भिन्न-भिन्न होती है; जैसे: शरीर के कुछ अंग अन्य अंगों की अपेक्षा जल्दी विकसित हो जाते हैं । अध्ययनों द्वारा ज्ञात हुआ है कि सृजनशीलता, कल्पना आदि का विकास बाल्यावस्था में ही प्रारम्भ हो जाता है । किशोरावस्था में यह चरम सीमा पर पहुँच जाता है ।

Principle # 12. विकास अवस्था के विशिष्ट स्वाभाविक गुण एवं लक्षण होते हैं:

विभिन्न आयु स्तर पर होने वाले विकास-प्रतिमानों के अपने विशिष्ट एवं स्वाभाविक गुण होते हैं । इन विशिष्ट लक्षणों की जानकारी बच्चे को समझने में सहायक होती है । वयःसन्धि की अवस्था में बच्चे में कुछ असामान्य व्यवहार उस आयु में होने वाली स्वाभाविक बात के कारण होते हैं ।

कुछ शारीरिक परिवर्तनों में बच्चे का घबरा जाना स्वाभाविक है । अत: प्रत्येक आयु में होने वाले ऐसे स्वाभाविक लक्षणों के लिए बालक को समायोजित करने में उनकी सहायता करना अति आवश्यक है । कभी-कभी एक अवस्था पर जिस व्यवहार को सामान्य माना जाता है वहीं दूसरी अवस्था में वही व्यवहार असामान्य भी माना जा सकता है ।

Principle # 13. प्रारम्भिक विकास, बाद में होने वाले विकास से ज्यादा महत्व का होता है:

बचपन में शिशु सबसे अधिक कोमल होता है उसे कोई भी रूप दिया जा सकता है । इसलिए प्रारम्भिक अवधि का विकास बच्चे को एक अच्छे व्यक्ति के रूप में तैयार करने की दृष्टि से सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है ।

Principle # 14. लड़के-लड़कियों के विकास एवं आयु में अन्तर होता है:

लड़के-लड़कियों के विकास में कुछ अन्तर होता है । जन्म से ही लड़के लड़कियों से लम्बे होते हैं । 10 वर्ष में लड़कों की अपेक्षा लड़कियों का वजन कम रहता है । 11-14 वर्ष की लड़कियाँ वजन में लड़कों से अधिक रहती हैं ।

विकास की प्रत्येक अवस्था में लड़के के सिर का आकार लड़कियों से अधिक होता है । क्रियात्मक पक्ष में लड़के साइकिल चलाना लड़कियों की अपेक्षा जल्दी सीखते हैं । मानसिक क्षमताओं के विकास में तथा व्यवहार आदि में भी लडकों का विकास लडकियों से भिन्न होता है ।


Principle # 15. पिछड़ा विकास भविष्य में सामान्य विकास की बराबरी नहीं करता है:

किन्हीं कारणों से पिछड़ा विकास, कभी निर्धारित समय पर होने वाले सामान्य विकास की बराबरी नहीं कर पाता है । जन्म के पूर्व के विकास में कमी रहने पर वह सामान्य रूप से जन्मे बच्चे की बराबरी नहीं कर पाता है । ऐसे बच्चे का विकास निर्धारित समय पर न होकर कुछ देर से ही होता है ।

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