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Development of a Child | Home Science

Read this article in Hindi language to learn about the growth and development of a child.

वृद्धि एवं विकास: (Growth and Development):

प्रत्येक बालक में जन्म के बाद विभिन्न प्रकार के परिवर्तन एवं बढ़ने की प्रक्रिया चलती रहती है तथा यह क्रमश: शैशवावस्था से बाल्यावस्था एवं बाल्यावस्था से किशोरावस्था तथा किशोरावस्था के आगे बढ़ती जाती है । ये परिवर्तन प्रत्येक बालक में भिन्न-भिन्न हो सकते हैं ।

इस प्रकार आकार, लम्बाई एवं वजन में होने वाला प्रत्येक परिवर्तन वृद्धि कहलाता है, जिसकी नाप की जा सकती है । परन्तु विकास के बाद स्वभाव में परिवर्तन आता है । उदाहरणस्व रूप-त्वचा का कठोर होना, शरीर के सभी आंतरिक अंगों का विकास होना तथा परिपक्वता तक पहुँचना ।

विकास एक के बाद एक चरण की अवस्था में होता है तथा इन चरणों में आपस में एक घनिष्ठ संबंध होता है । शारीरिक विकास के अतिरिक्त मानसिक एवं भावात्मक, नैतिक एवं सामाजिक आदि पक्षों में भी विकास होता विकास केवल वृद्धि तक ही सीमित नहीं रहता है ।

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वृद्धि शब्द का प्रयोग सामान्यत: शरीर तथा इनके भागों के भार अथवा आकार में वृद्धि के लिए किया जाता है । विकास का तात्पर्य वृद्धि से होता है, परन्तु यह मुख्यत: शरीर में होने वाले परिवर्तनों को प्रदर्शित करता है । यहाँ यह स्पष्ट होता है किए विकास की विभिन्न अवस्थाएँ एक-दूसरे से सम्बद्ध होती हैं । मनुष्य के व्यक्तित्व के विभिन्न पक्ष होते हैं । इन्हीं पक्षों के आधार पर विकास के विभिन्न रूपों का वर्णन किया गया है ।

विकास का अर्थ: (Meaning of Development):

गर्भावस्था से मृत्यु तक मानव शरीर में अनेक शारीरिक व मानसिक परिवर्तन होते हैं । परिवर्तन कभी रुकते नहीं, अपितु किसी अवस्था में ये तीव्र गति से तो किसी अवस्था में धीमी गति से होते हैं ।

गर्भावस्था में भ्रूण के शारीरिक अंगों का निर्माण तथा जन्म के बाद उसके शारीरिक व्यवहार में अनेक परिवर्तन होते हैं । इन परिवर्तनों की प्रक्रिया प्रगतिशील दिशा में होती है । जिन्हें धनात्मक परिवर्तन कहते

हैं । प्रौढ़ावस्था में इन परिवर्तनों की प्रक्रिया में स्थायित्व आ जाता है ।

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ऐसा भी देखा जाता है कि प्रौढ़ावस्था के बाद परिवर्तन की प्रक्रिया में गिरावट आ जाती है, जिसे ऋणात्मक परिवर्तन कहते हैं । विकास का अर्थ वातावरण के कारण होने वाले परिवर्तन से होता है । अत: उपरोक्त आधार पर कहा जा सकता है कि, ”विकास का अभिप्राय गर्भावस्था से लेकर मृत्यु तक किसी निश्चित समय की ओर होने वाले उन परिवर्तनों से है जो व्यवस्थित तथा समानुपात से होते हैं ।”

विकास की परिभाषा: (Definition of Development):

विभिन्न विद्धानों ने बाल विकास को निम्न प्रकार परिभाषित किया है:

हरलॉक:

”विकास का अर्थ बढ़ने से नहीं है बल्कि इसका तात्पर्य व्यवस्थित एवं समानुगत परिवर्तन से होता है जो कि परिपक्वता के लक्ष्य को प्राप्त करने की ओर होते हैं ।

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मुनरो:

”विकास परिवर्तन शृंखला की वह अवस्था है जिसमें बालक धूणावस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक गुजरता है, विकास कहलाता है ।”

ड्रेवर:

”विकास प्राणी में प्रगतिशील परिवर्तन है जो किसी निश्चित लक्ष्य की ओर लगातार निर्देशित होता है ।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि विकास एक व्यापक शब्द है । विकास की प्रक्रिया भ्रूण के गर्भ में आते ही शुरू हो जाती है । सर्वप्रथम माता के अण्डाणु तथा पिता के शुक्राणु के संयोग से नये जीव का विकास प्रारम्भ होता है । यह अवस्था गर्भावस्था कहलाती है जो सामान्यत: 9 या 10 माह या लगभग 280 दिन तक होती है । इस अवधि में शरीर के अंगों का विकास होता है ।

शिशु के जन्म के पश्चात् विकास के विभिन्न क्षेत्रों में पुन: प्रक्रिया होने लगती है । इस समय शिशु का केवल शारीरिक विकास ही नहीं, अपितु उसका मानसिक, सामाजिक एवं संवेगात्मक विकास भी होता है । अत: यह स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि विकास परिवर्तनों की शृंखला है ।

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