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Dr. APJ Abdul Kalam in Hindi Language

मौलाना अबुल कलाम आजाद | Dr. APJ Abdul Kalam in Hindi Language

प्रस्तावना:

देश को स्वतंत्र कराने के लिए अनेक महापुरुषों ने अपना अमूल्य योगदान किया । उनमें से कई महापुरुष ऐसे हैं जिनका त्याग व बलिदान अपेक्षाकृत बहुत अधिक रहा ।

ऐसे ही महापुरुषों में मौलाना अबुल कलाम आजाद का नाम आता है, जिनका त्याग व बलिदान हमें सदैव उनका स्मरण कराता है । मौलाना आजाद ने हमारे समाज के लिए जो अद्वितीय व प्रशंसनीय कार्य किए वह भारतीय स्वतन्त्रता के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखने योग्य हैं ।

परिवार व जन्म:

मौलाना आजाद के पूर्वज मुगल शासक बाबर के शासन काल में ईरान से भारत आये थे । उनके पिता का नाम मौलाना खैरूद्दीन था जो अपने समय मे अरबी के बड़े विद्वान थे ।

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अग्रेजो के दमन चक्र से पीड़ित होकर मौलाना खैरूद्दीन सन् 1857 में भारत छोड़ कर मक्का के धार्मिक वातावरण में जा बसे । वही एक अरबी विद्वान की पुत्री से उनका विवाह भी हो गया । मक्का में सन् 1888 में अबुल कलाम आजाद का जन्म हुआ । उनके जन्म के दो साल बाद ही उनके माता-पिता भारत चले आये । अबुल कलाम अपने पाँच भाई-बहिनो में सबसे छोटे थे ।

प्रारम्भिक जीवन और शिक्षा:

मौलाना आजाद के बचपन का नाम गुलाम मोहिउद्दीन हैदर था । किसी भी तौर पर अपने नाम के साथ गुलाम शब्द को वह बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे इसलिए अपने नाम को बदलकर वह गुलाम मोहिउद्दीन हैदर 

से  अबुल कलाम आजाद हो गये । खुद का दिया हुआ यह नाम आगे चलकर ऐसा चला कि असली नाम पूरी तरह गुम हो गया ।

मौलाना आजाद बचपन से ही प्रखर प्रतिभा के व्यक्ति थे । उनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही उनके पिता जी के द्वारा शुरू हुई । बाद मे घर पर ही पड़ाने के लिए हर विषय के अलग-अलग अध्यापक आते थे ।

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इस प्रकार उन्हें स्कूल देखने का मौका नही मिला । उनका दिमाग इतना तेज था कि जिसको वे एक बार देख लेते थे, वह पूरी तरह उनके दिमाग मे बैठ जाता था । परिणामत: मात्र चौदह वर्ष की अल्पायु मे वे साहित्य, दर्शन, गणित, आदि विषयों में पारगत हो गये थे ।

लेखन एवं पत्रकारिता:

अबुल कलाम आजाद ने चौदह वर्ष की आयु में सन् 1902 में एक साहित्यिक पत्रिका ‘लिसानुस्सिदक’ का सम्पादन कार्य प्रारम्भ किया । उस समय में इस पत्रिका ने अत्यन्त आश्चर्य-जनक धूम मचा दी थी ।

इसके अतिरिक्त आजाद ने ‘अन नदव’, ‘वकील’, ‘दारुल सल्तनत’ आदि पत्रिकाओं का कुशल सम्पादन किया । अंग्रेज ‘फूट डालो राज करो’ की नीति अपना रहे थे । मौलाना आजाद इस नीति के रहस्य को भरनी भाति जानते थे ।

उन्होने देश की एकता के लिए मुसलमानो में राष्ट्रीय भावना भरने व उनके मन में देश को लेकर नई उमंगे पैदा करने के उद्देश्य से ‘अल हिलाल’ नामक पत्रिका का प्रकाशन करना प्रारम्भ किया । यह पत्रिका इतनी लोकप्रिय हो गयी कि इसकी एक प्रति भी नही बचती थी । इसमें राष्ट्रीय विचारधारा के लेख होते थे, फलत: ‘अल हिलाल’ व स्वयं मौलाना आजाद अंग्रेजों के कोपभाजन बन गये ।

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सरकार ने इस पत्रिका पर प्रतिबध लगा दिया । फिर भी वे चुप नहीं रहे उन्होने दूसरी पत्रिका ‘अल बलाग’, का प्रकाशन प्रारम्भ कर दिया । जब इस पर भी प्रतिबंध लगा तो उन्होंने ‘पैगाम’ नामक साप्ताहिक पत्रिका निकालना शुरू किया । इनके अलावा इनकी कई महत्त्वपूर्ण रचनाएँ भी हैं ।

हिन्दू-मुस्लिम एकता व राष्ट्रीय आन्दोलन:

मौलाना आजाद के दो प्रमुख उद्देश्य थे-राष्ट्रीय स्वाधीनता व हिन्दु-मुस्लिम एकता । ‘अल हिलाल’ और ‘अल बलाग’ के प्रकाशन के पीछे उनकी यही दोनो मूल भावनाएँ निहित थीं जो तात्कालिक शासको को रुचिकर नहीं थी । इसलिए, उन्हें तीन साल तक राची जेल मे रहना पड़ा ।

जब वे जेल से छूटे, उस समय देश में असहयोग आन्दोलन चल रहा था । वे उसमे कूद  पड़े तथा महात्मा गाँधी के सम्पर्क में आये । दोनों ने एक दूसरे को बहुत अधिक पसन्द किया । गाँधी को मौलाना जैसे देश भक्त नवयुवक की आवश्यकता थी । अल्प काल में ही वे राष्ट्रीय काग्रेस के अत्यन्त सक्रिय सदस्य बन गये ।

सितम्बर, सन् 1923 को मौलाना भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये । अपने अध्यक्षीय भाषण मे उन्होने कहा “यदि हिन्दू-मुसलमानो के भेदभाव में हमें 24 घंटे के अन्दर भी आजादी मिल जाती है तो हम उसे ठुकरा देगे क्योकि देश की एकता आजादी से भी अधिक महत्त्व रखती है ।”

26 सितम्बर, सन् 1924 को उन्होंने एक एकता सम्मेलन का आयोजन किया जिसमें उन्हें काफी सफलता मिली । सन् 1927 मे उन्होने अन्य काग्रेसी नेताओ सहित साइमन कमीशन का बहिष्कार कर सारे देश का भ्रमण किया । सन् 1935 में प्रान्तीय सरकार मे शामिल होने पर वे ससदीय कमेटी के सदस्य चुने गये ।

सन् 1940 में वे पुन: काँग्रेस के अध्यक्ष चुने गये । उस समय उन्हें कई नेताओ सहित जेल भेज दिया गया । सन् 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन में बढ़-चढ़कर भाग लेने पर उन्हे भी जेल भेज दिया गया । इसी अवधि में उनकी पत्नी व बहन का निधन हो गया । मौलाना आजाद जैसे देश भक्त महापुरुषों के पुण्य प्रताप से सन् 1947 में देश को आजादी मिली ।

भारत स्वतंत्र होने पर प० जवाहरलाल नेहरू देश के प्रधानमत्री चुने गए । मौलाना आजाद की प्रखर विद्वता से प्रभावित होकर नेहरू ने उन्हे देश का शिक्षा मत्री नियुक्त किया क्योकि किसी भी देश की प्रगति वहाँ की शिक्षा पर निर्भर करती है । सन् 1947 के भीषण नर सहार से मौलाना के हृदय को अत्यन्त वेदना पहुँची ।

लोक सभा के दोनो आम चुनावों में मौलाना जीत कर आए और देश के शिक्षा मत्री बने रहे । अपने कार्य काल में मौलाना ने देश की प्रगति के लिए जिस शिक्षा नीति की नीव डाली वह सदैव स्मरणीय रहेगी ।

उपसंहार:

मौलाना आजाद जैसे नेता को पाकर भारत माँ गर्व का अनुभव करती है । यद्यपि देश व समाज के लिए अपना सारा जीवन अर्पित कर वे  संसार से विदा हो गए, किन्तु उनके सिद्धात व नीतियों हमे हर समय प्रेरणा देते रहते हैं कि “देश की एकता, देश की आजादी से अधिक महत्त्व रखती है ।” उनके इस विमल प्रयास का भारत सदा-ऋणी रहेगा ।

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