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Scope of Electoral Geography | Hindi

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निर्वाचन भूगोल मूलतया निर्वाचन प्रक्रिया के संगठन, संचालन और उसके परिणाम के भौगोलिक पक्षों का अध्ययन है ।

इस आधार पर निर्वाचन भूगोल के अध्ययन के पांच प्रमुख पक्ष हैं:

(1) निर्वाचन प्रक्रिया सम्पन्न करने हेतु चुनाव क्षेत्रों का संगठन, अर्थात् चुनाव क्षेत्रों की संरचना और चुनाव परिणामों पर उसके प्रभाव का  विश्लेषण ।

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(2) मतदान के क्षेत्रीय वितरण प्रारूप का निरूपण और इस प्रारूप तथा जनसंख्या की सामाजिक विशेषताओं के क्षेत्रीय वितरण के बीच के कार्य-कारण सम्बन्ध का विश्लेषण ।

(3) मतदान निर्णय को प्रभावित करने वाले स्थानजन्य कारकों के प्रभाव का विश्लेषण ।

(4) सम्बद्ध संसद अथवा विधान सभा में दल गत प्रतिनिधित्व के क्षेत्रीय प्रारूप का निरूपण तथा विश्लेषण । इसमें दलों को प्राप्त मतों और स्थानों के पारस्परिक सम्बन्ध का विश्लेषण सम्मिलित है ।

(5) सत्ताधिकार और नीतियों के कार्यान्वयन के क्षेत्रीय वितरण प्रारूप का विश्लेषण यह प्रारूप सामान्यतया दलों के जनसमर्थन के क्षेत्रीय वितरण और सदन में उनके प्रतिनिधित्व के क्षेत्रीय प्रारूप को प्रतिबिम्बित करता है ।

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संयुक्त राज्य अमरीका में चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन प्रारम्भ से ही एक विवादास्पद प्रश्न रहा है । सत्तर तथा अस्सी के दशक में भूगोल के अनेक विद्वानों ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान किया था । इनमें रिचर्ड मॉरिल (1970, 1973, 1976) का योगदान विशेष महत्वपूर्ण था ।

ब्रिटेन के सन्दर्भ में एक प्रयास जांस्टन तथा रासिएटर (1983) ने भी किया था । 1960 के दशक में मात्रात्मक विधियों के बढ़ते प्रयोग के परिणामस्वरूप ऊपर वर्णित दूसरे तथा तीसरे विषय को बहुत प्रोत्साहन मिला था । चौथे विषय का सम्बन्ध चुनाव क्षेत्रों के दोषपूर्ण आबण्टन और उनके पूर्वग्रहणग्रसित परिसीमन की समस्या के अध्ययन से है ।

पांचवें और अन्तिम विषय का सम्बन्ध इस बात से हे कि सत्ता एक ही राजनीतिक दल अथवा गठबन्धन के पास होती है, इसलिए यह जानना महत्वपूर्ण हे कि उसके प्रतिनिधि किन क्षेत्रों से चुनकर आए हें तथा उन क्षेत्रों की विशेष समस्याएं क्या हैं ।

ये प्रश्न केन्द्रीय सरकार के नीति निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हें । विकास सम्बन्धी नीतियों के कार्यान्वयन में बहुधा शासक दल के जनाधार वाले प्रमुख क्षेत्रों को वरीयता मिलती है । यह बात परिसंघ व्यवस्था वाले राज्यों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है ।

निर्वाचन भूगोल की प्रगति और उसके अध्ययन के संकल्पनात्मक आधार: एक समीक्षा:

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1960 के बाद के निर्वाचन भूगोल की प्रगति की समीक्षा करते हुए जॉन एग्न्यू (1990) ने इसके अध्ययन में निहित चार प्रमुख परिदृष्टियों की पहचान की हैं ।

ऐतिहासिक विकास के क्रम में ये इस प्रकार हैं:

काल परिदृष्टि

(1) 1965-1972 आधुनिकीकरण और राष्ट्रीयकरण

(2) 1972-1974 लोककल्याण

(3) 1974-1979 विकास का असमान स्तर

(4) 1979 से आज तक स्थानपरक सूक्ष्म सामाजिक परिदृष्टि

भूगोल में निर्वाचन आधुनिकीकरण-राष्ट्रीयकरण परिदृष्टि के सर्वप्रथम प्रवर्तक काक्स (1969) थे जिन्होंने पडोस प्रभाव (अर्थात् समाचार संचार में दूरी का प्रभाव) तथा दलगत सूचनाओं (पार्टीजन बायस) के संचार से मतदान पर पड़ने वाले प्रभाव के अध्ययन में महत्वपूर्ण योगदान किया था ।

काक्स की मान्यता थी कि कालान्तर में इन प्रभावों के फलस्वरूप देश की चुनावी राजनीति में क्षेत्रीय समरूपता का संचार होता है तथा सम्पूर्ण राष्ट्र में एक ही प्रकार की दलगत राजनीति और मतदान व्यवहार व्याप्त हो जाते हे ।

दूसरे शब्दों में तत्कालीन अमरीकी राजनीतिशास्त्रियों की भांति इस अध्ययन धारा के विद्यार्थियों की भी यह मूलभूत मान्यता थी कि आधुनिकीकरण (अर्थात् औद्योगीकरण और नगरीकरण) मतदान व्यवहार का राष्ट्रीकरण कर देते हें जिसके परिणामस्वरूप राष्ट्रीय स्तर पर मतदान व्यवहार में समरूपता आ जाती है ।

1970 के दशक में दो अन्य दृष्टियों का प्रचार हुआ । एक लोक कल्याण (डेमोग्राफिक वेलफेयर) जिसका सबसे चर्चित उदाहरण काक्म की पुस्तक कांफ्लिक्ट, पावर, एण्ड पॉलिटिक्स इन द सिटी (1973) के रूप में प्रस्तुत हुआ था ।

इसके अन्तर्गत लेखक ने नगरीय क्षेत्रों में मतदान व्यवहार की व्याख्या नगर विशेष में विभिन्न सामाजिक वर्गो के मतदाताओं के क्षेत्रीय वितरण तथा उनको प्राप्त होने वाली लोककल्याण सेवाओं की गुणवत्ता के आधार पर करने का प्रयास किया था ।

विकास स्तर में विषमता पर केन्द्रित दृष्टि मुख्यतया मार्क्सवादी चिन्तन धारा से प्रभावित है । यह विशेष रूप से वालरस्टाइन की विश्व व्यवस्था संकल्पना पर आधारित है । वर्तमान राजनीतिक भूगोल में टेलर इसके मुख्य प्रवक्ता रहे हें ।

इसके अन्तर्गत निवचिन व्यवहार की व्याख्या ”केन्द्र-उपांत” संकल्पना के अनुरूप असमान विकास प्रक्रियाजन्य प्रभावों के आधार पर की जाती हे । स्थानपरक सूक्ष्म सामाजिक परिदृष्टि इस वेचारिक विकास क्रम में सर्वाधिक नवीन है ।

इसका श्री गणेश अस्सी के दशक के मध्य में हुआ । परन्तु वास्तव में इसकी जड़ें ब्लाश की मानव भौगोलिक अध्ययन परिदृष्टि से सीधे तौर पर जुड़ी हैं । ध्यातव्य है कि स्थान की सूक्ष्म सामाजिक संरचना सम्बन्धी परिदृष्टि समकालिक समाजशास्त्र से अभिप्रेरित है ।

इसकी मूलभूत मान्यता है कि मतदाताओं के दल सापेक्ष मतदान निर्णय दैनिक जीवन के अनुभवों पर आधारित स्थानजन्य प्रभावों द्वारा प्रेरित होते हैं । अर्थात् मतदाता का मतदान निर्णय स्थानीय सामाजिक सन्दर्भ की उपज है क्योंकि प्रत्येक स्थान एक विशिष्ट प्रकार की ऐतिहासिक सामाजिक इकाई हैं जिसके अपने विशिष्ट स्थानिक संस्कार और क्षेत्रीय सम्बन्ध हैं । अत: यथार्थपरक मतदान विश्लेषण में स्थानीय सूक्ष्म सामाजिक परिदृष्टि अनिवार्य है ।

विश्लेषण के क्षेत्रीय स्तर (अर्थात् मापक की दृष्टि से) प्रथम परिदृष्टि  व्यक्तियों तथा अति लघु इकाइयों के अध्ययन पर केन्द्रित है, द्वितीय परिदृष्टि वृहत् क्षेत्रीय इकाइयों पर, तृतीय कोड (कोर) तथा उपान्तयि अंचलों के विश्लेषण पर, तथा चतुर्थ पृथक-पृथक स्थानीय (सामाजिक)  इकाइयों के अध्ययन पर ।

पहली परिदृष्टि की दो मूलभूत राजनीतिक-भौगोलिक मान्यताएं हैं: (क) राजनीतिक प्रश्नों पर विकसित मतैक्य धीरे-धीरे सम्पूर्ण राष्ट्र के स्तर पर व्याप्त हो जाता है और रख पास-पड़ोस का प्रभाव तथा समाचार संचार का स्तर मतदान निर्णय में निर्णायक भूमिका निभाते हैं ।

दूसरी परिदृष्टि की मुख्य मान्यता यह हैं कि मतदान निर्णय की प्रक्रिया जनसंख्या की सामाजिक आर्थिक संरचना तथा सरकार द्वारा प्रदत्त सार्वजनिक सुविधाओं ओर सेवाओ की गुणवता के क्षेत्रीय स्तर द्वारा प्रभावित होती है ।

अतएव सम्पन्नों तथा विपन्नों के आवासीय क्षेत्रों के मतदान प्रारूप भिन्न-भिन्न होते हैं । तीसरी परिदृष्टि की आधारभूत मान्यता यह है कि क्रोड और उपान्तीय आर्थिक व्यवस्था का क्षेत्रीय विस्तार प्रारूप, तथा विषमतापूर्ण विकास और उससे उत्पन्न श्रम विभाजन मतदान को प्रभावित करने वाले तत्त्वों में सर्वाधिक महत्च के हैं । चौथी परिदृष्टि की आधारभूत मान्यता यह है कि राजनीतिक चिन्तन दल संगठन, और मतदान निर्णय आदि स्थानीय सांस्कृतिक चेतना के परिणाम हैं ।

इस पूरे दौर के निर्वाचन भूगोल के विकास यात्रा की समीक्षा के आधार पर एग्न्यू का निष्कर्ष था कि निर्वाचन भूगोल के समकालीन अध्येताओं की एक आधारभूत मान्यता थी कि निर्वाचन प्रक्रिया में भूगोल एक गौण तथा मूलतया समाश्रित (कंटिजेंट) कारक है ।

उदाहरणार्थ ऊपर वर्णित दूसरी तथा तीसरी परिदृष्टियो में भूगोल क्रमश: भूमण्डलीकरण सम्बन्धी प्रभावों तथा राष्ट्रीय स्तर की आर्थिक-सामाजिक हलचलों पर समाश्रित माना गया है । अनेक अध्येताओं की दृष्टि में भूगोल मात्र एक अवशिष्ट कारक है जो सामाजिक विकास के प्रारम्भक चरण में महत्वपूर्ण था परन्तु उत्तरोत्तर इसकी उपयोगिता समाप्त हो गई है ।

इस भ्रमपूर्ण मान्यता का कारण यह था कि साठ के दशक से ही निर्वाचन भूगोल का अध्ययन समस्या केन्द्रित न होकर अध्ययन विधि केन्द्रित हो गया था । परिणामस्वरूप निर्वाचन भूगोल में इतनी व्यापक रुचि के होते हुए भी भूगोल के विद्यार्थी मतदान सम्बन्धी किसी समस्या पर महत्वपूर्ण सैद्धान्तिक योगदान करने में पूरी तरह असफल रहे ।

निर्वाचन भूगोल के विद्याथियों की आधारभूत गलती यह थी कि उन्होंने सामाजिक संरचना में भूगोल की प्रभावी भूमिका को पूरी तरह दृष्टि से ओझल कर दिया था । ध्यातव्य है कि भूमण्डलीय अथवा राष्ट्रीय स्तर के आर्थिक और सामाजिक प्रभाव अपने आप में भिन्न-भिन्न स्थानों में रहने वाले मतदाताओं के मतदान निर्णय के कारक नहीं हो सकते (यद्यपि मतदान पर पड़ने वाले उनके प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता) ।

साथ ही इन प्रभावों का अनुभविक (ऐम्पीरिकल) विश्लेषण सम्भव नहीं है क्योंकि मानव व्यवहार में कार्य-कारण सम्बन्ध मात्र उन सामाजिक तंत्रों के माध्यम से ही सम्भव है जो सामाजिक संरचना को प्रभावित करके सामाजिक व्यवहार को तदनुरूप दिशा देते हैं ।

समाज वैज्ञानिक अध्ययन की इस आधारभूत मान्यता के परिप्रेक्ष्य में निर्वाचन भूगोल के विद्यार्थियों के लिए आवश्यक है कि मतदान के विश्लेषण में वे अपना ध्यान उत्तरोत्तर मतदाता के मनोविज्ञान और उनकी जनगणना सम्बन्धी विशेषताओं के स्थान पर उनके निवास स्थान तथा राजनीतिक दलों के सामाजिक स्वरूप और इतिहास पर केन्द्रित करें ।

उपर्युक्त विश्लेषण का तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि अन्य परिदृष्टियां निरर्थक हैं अथवा कि सूक्ष्म सामाजिक स्थानपरक परिदृष्टि का उनसे कोई विरोध है । उदाहरणार्थ, भूमण्डलीय स्तर पर विषमतापूर्ण विकास से उत्पन्न प्रभावो के सन्दर्भ में शेली तथा आर्चर (1997) ने 1992 के अमरीकी राष्ट्रपति पद के चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी रॉस पेरीट के पक्ष में पड़े मतों के विश्लेषण के आधार पर स्थानजन्य सामाजिक संरचनात्मक तत्वों तथा भूमण्डलीय स्तर की आर्थिक व्यवस्थाजन्य चेतना के परस्पर परिपूरक प्रभाव की ओर ध्यान आकर्षित किया है ।

पेरॉट ने कुल 19 प्रतिशत मत प्राप्त किए थे जो कि संयुक्त राज्य अमरीका के निर्वाचन के इतिहास में किसी भी निर्दलीय प्रत्याशी के लिए नया प्रतिमान है । 1912 के बाद से किसी अन्य स्वतंत्र उम्मीदवार ने इतना अधिक समर्थन प्राप्त नहीं किया था । इसके पूर्व अन्य निर्दलीय उम्मीदवारों के समर्थन का प्ररूप सामान्यतया क्षेत्रीय दृष्टि से कुछ प्रांतों तक ही सीमित रहा था । इसके विपरीत पेरॉट को प्राय सम्पूर्ग देश में पर्याप्त समेर्थन प्राप्त हुआ ।

यद्यपि मैदानी भागों तथा महानगरों से दूर स्थित प्रदेशों में उसे अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक समर्थन मिला था । देश के विशाल मैदानी क्षेत्र में 3000  से 20,000 जनसंख्या वाले नगरों में पेरॉट के समर्थन का स्तर विशेष तौर से अच्छा था जबकि महानगरों तथा 3000 से कम जनसंख्या वाली बस्तियों में उसको मिले मतों का प्रतिशत न्यूनतम था ।

शेली और आर्चर के अनुसार इसका मुख्य कारण यह था कि 1990 की जनसंख्या और आवास गणना (सेंसस) (जिसके परिणाम चुनाव के ठीक पहले ही प्रकाशित हुए थे) के अनुसार बीसवीं सदी के अंतिम दशक में अमरीका के इतिहास में पहली बार देश की कुल जनसंख्या के आधे से अधिक लोग दस लाख से ऊपर की जनसंख्या वाले महानगरों में रह रहे थे ।

साथ ही अभी भी अमरीकी जनसंख्या के आधे से अधिक लोग उपनगरीय अर्थात् महानगरों के उपान्तीय क्षेत्रों तथा अमहानगरीय क्षेत्रों से बाहर निवास कर रहे थे । देश के अन्य भागों के सर्वथा विपरीत ”ग्रेट प्लेन्स” क्षेत्र में महानगरीकरण की प्रक्रिया अवरुद्धप्राय थी ।

परिणामस्वरूप इस क्षेत्र के नगर अपेक्षाकृत छोटे आकार के थे तथा उनमें उपनगरीय विकास का पूर्ण अभाव था । अत जहां एक ओर इन मैदानी क्षेत्र के बाहर स्थित प्रदेशों में तीसरे (टर्सरी) तथा चौथे स्तर के (क्वार्टर्नरी) उद्योगों का अत्यधिक विकास हुआ था वहीं मैदानी भागों में अर्थव्यवस्था अभी भी प्राय पूरी तरह कृषि तथा अन्य प्राथमिक उद्योगो पर निर्भर थी ।

परिणामस्वरूप मैदानी क्षेत्रों की मूलतया प्राथमिक संसाधनों पर खडी अर्थव्यवस्था के स्थायित्व और भूमण्डलीय अर्थव्यवस्थाजन्य प्रभावों से इसकी सुरक्षा हेतु विकास प्रक्रिया पर सरकारी नियंत्रण और विकास के लिए राजकीय प्रोत्साहन आवश्यक था ।

दूसरी ओर महानगरीय क्षेत्र मुक्त अर्थव्यवस्था के पक्षधर हें अत: वहां मतदाता मैदानी क्षेत्र में व्यापक आर्थिक परिवर्तनों के प्रति शंकालु थे और देश में आर्थिक और राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया में यथास्थितिवाद के पक्षधर थे । अत: यहां के मतदाताओं ने पेरीट को समर्थन नहीं दिया ।

इस उदाहरण के आधार पर शेली ओर आर्चर ने संस्कृति की है कि चुनाव परिणामों के विश्लेषण करने समय आवश्यक है कि शोधकर्ता अपने अध्ययन में सूक्ष्म और बृहद् दोनो प्रकार के सामाजिक और आर्थिक प्रभावों को समुचित महत्व दें ।

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