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Environmental Ethics: Issues and Solution

Read this article in Hindi to learn about the issues and solutions to environmental ethics.

पर्यावरण संबंधी नैतिकता का सरोकार उन मुद्‌दों से है जो मनुष्य के जीवन और कल्याण के लिए बुनियादी हैं । पर्यावरणीय नैतिकता का संबंध न सिर्फ आज की पीढ़ी से है, बल्कि भावी पीढ़ियों से भी है । इसका संबंध मनुष्यों के अलावा पृथ्वी पर रह रहे अन्य प्राणियों के अधिकारों से भी है ।

उत्तर और दक्षिण के देशों के बीच समानता और विषमता (Equity-Disparity in the Northern and Southern Countries):

पर्यावरणीय नैतिकता का संबंध संसाधनों के स्वामित्व और उनके वितरण से है । इसे विभिन्न स्तरों पर अलग-अलग ढंग से देखा जा सकता है । विश्व के स्तर पर इसका संबंध उत्तर-दक्षिण के विभाजन से है; इसमें एक ओर उत्तर अमरीका और यूरोप के धनी औद्योगिक राष्ट्र हैं तो दूसरी ओर दक्षिण के विकासशील देश हैं, जैसे दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और दक्षिण अमरीका ।

आर्थिक रूप से उन्नत देशों में संसाधन और ऊर्जा की प्रतिव्यक्ति खपत और उनकी बरबादी भी अधिक है । यह सब संसाधनों पर निर्भर और विकासशील देशों में रह रही गरीब जनता की कीमत पर हो रहा है । आर्थिक रूप से उन्नत पश्चिम के देशों ने अपने प्राकृतिक संसाधनों का इतना अधिक शोषण किया है कि लगभग हर जगह ये समाप्त हो चुके हैं ।

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अब वे संसाधन-समृद्ध, आर्थिक रूप से पिछड़े देशों से अपेक्षाकृत कम कीमत पर ये संसाधन खरीद रहे हैं । इससे विकासशील देशों के वे प्राकृतिक संसाधन खत्म हो रहे हैं जिन पर गरीब अपनी जीविका के लिए निर्भर होते हैं ।  इस अन्यायपूर्ण आर्थिक व्यवहार को बदलकर व्यापार का एक नया, अधिक न्यायपूर्ण प्रबंध करने की आवश्यकता है । इसके लिए अमीर देशों में रहने वाले लोगों में एक नई सोच का पैदा होना आवश्यक है ।

नगर-ग्राम समानता के मुद्‌दे (Urban-Rural Equity Issues):

नगरों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ग्रामीण समुदायों की साझी संपत्ति का अधिकाधिक उपयोग होता आया है । स्वयं भूमि, जो कभी गाँवों का साझा संसाधन थी, को फैलते हुए नगरीय और औद्योगिक क्षेत्र हथियाते जा रहे हैं । भारत में ग्रामीण क्षेत्र नगरों और कस्बों को न केवल भोजन देता है, बल्कि बहुत मामूली दामों पर उनकी ऊर्जा की आवश्यकताओं का एक भाग भी (मुख्यतः जलावन की लकड़ी के रूप में) पूरा करता है ।

फलस्वरूप गाँवों की साझी जमीनें अपने संसाधनों से वंचित होती जा रही हैं । इसलिए जहाँ नगर धनी बन रहे हैं वहीं ग्रामीण, खासकर भूमिहीन ग्रामीण, निर्धन बनते जा रहे हैं । नगरवासी अमीरों को समझाना होगा कि उनके संसाधन कहाँ से आते हैं, और उन्हें उनके खरे दाम देने के लिए तैयार रहना होगा ।

लैंगिक समानता की आवश्यकता (The Need for Gender Equity):

पूरे भारत और खासकर ग्रामीण क्षेत्र में स्त्रियाँ पुरुषों से अधिक घंटे काम करती हैं । स्त्री का जीवन निर्धनता के दुर्भेद्य जाल में फँसा हुआ है । वातावरण से जीविका पाने के प्रयास में वे घरों के लिए और पास के नगरों में बेचने के लिए बराबर जलावन जमा करती हैं । वे मेहनत करके मवेशियों के लिए चारा जमा करती हैं और साफ जल लाने के लिए मीलों चलती हैं । वे मवेशियों, फसलों के अपशिष्ट या ऊर्जा के दूसरे अदक्ष स्रोतों के सहारे धुआँ भरे अस्वास्थ्यकर माहौल में खाना भी पकाती हैं ।

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इन सब में प्रतिदिन 10-12 घंटे की कड़ी मेहनत लगती है । इससे यह सवाल पैदा होता है कि एक ग्राम समुदाय के पर्यावरणीय संसाधनों पर किसका नियंत्रण होना चाहिए । दुर्भाग्य से गाँवों के संसाधनों के प्रबंध में निर्णायक भूमिका पुरुषों की होती है, जबकि स्थानीय स्तर पर निर्णयकर्ता वास्तव में स्थानीय स्त्रियाँ होनी चाहिए जिनका जीवन स्थानीय संसाधनों के उपयोग और संरक्षण के ढर्रों से गहराई से जुड़ा हुआ है ।

स्त्रियों को विकास करने और अपनी हालत सुधारने के समान अवसर नहीं दिए गए हैं । इसका आरंभ लड़कियों की शिक्षा से होता है जिस पर परिवार के लड़कों की शिक्षा के मुकाबले हमेशा कम ध्यान दिया जाता है । हम सबको यह समझना होगा कि पुरुष-प्रधान समाज द्वारा केवल पुरुष कम दृष्टिकोण से विकास की योजना बनाकर स्त्रियों और बच्चों के लिए स्वस्थ वातावरण का निर्माण नहीं किया जा सकता ।

स्त्री-पुरुष की सामाजिक असामानता उन समुदायों में सबसे अधिक स्पष्ट है जो वनों में रहते है और जिनमें परंपरा ने प्राकृतिक संसाधनों के संग्रह में स्त्रियों को पुरुषों से बड़ी भूमिका दे रखी है । स्त्रियाँ हर दिन पानी लाती हैं, लकड़ी, फल, जड़ी-बूटी आदि जमा करती हैं जबकि पुरुष कभी-कभार ही खेतों में काम करता है । स्त्रियों और पुरुषों के जीवन की इस विषमता के कारण शिक्षा और स्वास्थ्य-रक्षा लड़कियों को कम सुलभ है ।

प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग की दर और संरक्षण के लिए ये बातें अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं । ग्रामीण स्त्रियाँ जिनका संसाधनों से अंतरंग संबंध होता है, प्राकृतिक संसाधनों के महत्त्व को पुरुषों से अधिक गहराई से समझती हैं । पर्यावरण संबंधी अनेक आंदोलनों जैसे चिपको आंदोलन को स्थानीय पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों से अधिक जोरदार समर्थन मिला है ।

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भावी पीढ़ी के लिए संसाधनों का संरक्षण (Preserving Resources for the Future Generations):

क्या हम भावी पीढ़ियों के लिए कुछ छोड़े बिना ही दुनिया के सारे संसाधनों का इस्तेमाल कर लें ? संसाधनों का अनिर्वहनीय उपयोग करते हुए हमें इस नैतिक प्रश्न पर विचार करना होगा । अगर हम संसाधनों का और जीवाश्म ईंधनों की ऊर्जा का दुरुपयोग और अति-उपयोग करते हैं तो भावी पीढ़ियों के लिए निर्वाह बहुत मुश्किल हो जाएगा ।

उन प्रजातियों और प्राकृतिक अप्रभावित परितंत्रों की रक्षा करना हमारा कर्त्तव्य है जिनका उन जैव-संसाधनों से संबंध है जिनको भावी पीढ़ियों के उपयोग के लिए बचाकर रखा जाना चाहिए । जैसे हमारे पूर्वजों ने हमारे लिए संसाधन छोड़े हैं उसी तरह हमें भी भावी पीढ़ियों के लिए संसाधन छोड़कर जाना होगा । इन संसाधानों पर आगे जन्म लेने वाले प्राणियों का भी अधिकार है । हम भावी पीढ़ियों के लिए दुनिया के न्यासी (trustee) मात्र हैं ।


पशुओं के अधिकार (The Rights of Animals):

मनुष्य, अर्थात केवल एक प्रजाति, क्या पृथ्वी के उन संसाधनों का अकेले उपयोग और शोषण कर सकता है जिनपर हमारे साथ पौधों और प्राणियों की अरबों प्रजातियाँ का भी हक हो ? हमारी दुनिया में अनेक प्रकार के प्राणी हैं । हमारे साथ पृथ्वी पर मौजूद पौधों और पशुओं को भी पृथ्वी के संसाधनों में हिस्सा बँटाने और यहाँ रहने का अधिकार है ।

लाखों वर्षों में विकसित एक प्रजाति को विनाश की ओर धकेलने का हमें कोई अधिकार नहीं । जंगली और पालतू पशुओं को जीने का ही नहीं, सम्मान से जीने का भी अधिकार है । एक पशु के साथ क्रूरता नैतिक दृष्टि से मनुष्य का मनुष्य के साथ क्रूरता से कतई भिन्न नहीं ।

 

 

मनुष्य पृथ्वी पर जीवन-चक्र का एक पुर्जा मात्र है । हम अकसर भूल जाते हैं कि हम प्रकृति और अन्य प्रजातियों का आवश्यकता से काफी अधिक दोहन कर रहे हैं । पृथ्वी पर जीवित वस्तुओं के समुदाय के अंग के रूप में हर पौधे और प्राणी को जीने का अधिकार है । जहाँ प्रकृति में शिकार-शिकारी संबंध पाया जाता है वहीं अगर प्रकृति को उसके हाल पर छोड़ दिया जाए तो वह हर पारितंत्र में संतुलन बनाए रखती है । उद्‌विकास के अंतर्गत प्रजातियाँ मिटती हैं और दुनिया के पारितंत्रों को भरने के लिए पौधों और प्राणियों की नई प्रजातियाँ जन्म लेती हैं ।

लेकिन पृथ्वी पर प्रजातियों की संख्या में हाल में तेजी से जो कमी आई है उसके लिए अकेले मनुष्य ही जिम्मेदार है । इससे भी चिंताजनक बात यह है कि मनुष्य प्रजातियों की प्रचुरता को इतनी तेजी से कम कर रहा है कि निकट भविष्य में संभवतः हम विनाश की एक भारी लीला आरंभ कर देंगे और इससे मानवजाति का अस्तित्व ही गंभीर खतरे में पड़ जाएगा ।

इसलिए वन्य पौधों और प्राणियों को खतरे में डालना और उनको विनाश के कगार पर लाना न सिर्फ इन प्रजातियों के साथ अन्याय करना है बल्कि उन भावी पीढ़ियों के साथ भी अन्याय करना है जो इन प्रजातियों की उपस्थिति का लाभ नहीं उठा पाएँगे ।

पृथ्वी पर पशुओं और पौधों के अस्तित्व के अधिकार का एक ठोस नैतिक आधार भी है । मानव हो या पशु, हर प्राणी के साथ न्यायोचित व्यवहार होना चाहिए । पशुओं के प्रति क्रूरता ऐसा अपराध है जिसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए ।

पशुओं को भी गरिमा के साथ जीने का अधिकार है तथा उनके जीवन कल्याण और स्वतंत्रता का ध्यान रखा जाना चाहिए । हमारे देश में पशुओं के अधिकारों के प्रति चेतना बढ़ रही है और पशुओं के साथ क्रूरता को अपराध माना जा रहा है ।

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