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Role of Public in Conserving the Environment

Read this article in Hindi to learn about the role of public in conserving the environment.

नागरिकों की कार्रवाई और कार्यकर्त्ता समूह (Citizens Actions and Action Group):

नागरिकों को अपने आसपास की अनिर्वहनीय परियोजनाओं के परिणामों से अपने पर्यावरण की सुरक्षा के लिए हितप्रहरी बनना सीखना चाहिए । इस बारे में प्रबुद्ध नागरिकों के अधिकार ही नहीं होते, कुछ कर्त्तव्य भी होते हैं । देश, अपने राज्य, नगर या गाँव में पर्यावरण आंदोलन को बल देने के लिए उन्हें कार्यकर्त्ता समूहों में शामिल होकर एक लॉबी बनानी चाहिए ।

व्यक्ति अगर किसी को अपने स्वार्थ के लिए क्षेत्र के पर्यावरण को हानि पहुँचाते देखें तो उसे रोकने के लिए वे एक या अनेक कदम उठा सकते हैं । किसी भी व्यक्ति को पर्यावरण संबंधी किसी अपराध या खतरे को संबद्ध अधिकारियों के ध्यान में लाने का अधिकार है । इनमें सरकारी एजेंसियों से लेकर क्षेत्र की पुलिस, वन विभाग, जिलाधीश या आयुक्त तक आ सकते हैं ।

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कभी-कभी हो सकता है कि पर्यावरण के पेचीदा मुद्‌दों को अधिकारी न समझ सकें तो व्यक्ति को यह सीखना होगा कि ये मुद्‌दे किस तरह सामने रखे जाएँ कि संबंधित अधिकारी पर्यावरण के हित में कदम उठाने के लिए बाध्य हो जाए । अगर इससे भी बात न बने तो कोई नागरिक कानूनी कार्रवाई कर सकता है ।

इन उद्‌देश्यों के लिए ई. पी. ए. या डब्ल्यू. पी. ए. सबसे अधिक प्रयुक्त कानूनी उपाय हैं । किसी अदालत में एक जनहित याचिका भी दायर की जा सकती है और इसे माननीय सर्वोच्च न्यायालय में भी ले जाया जा सकता है । माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अभी हाल में संरक्षण के हित में अनेक, अत्यधिक प्रबुद्ध संरक्षण निर्णय सुनाए हैं ।

महत्त्वपूर्ण पर्यावरणीय मुद्‌दों की ओर ध्यान दिलाने के लिए नागरिक समूह दबाव के वैकल्पिक साधनों का सहारा भी ले सकते हैं, जैसे रास्ता रोको, धरना आदि का । वे प्रेस और इलेक्ट्रानिक माध्यमों के द्वारा जनता का समर्थन भी माँग सकते हैं ।

इस देश में पर्यावरण के लिए लड़ी गई अनेक लड़ाइयों में से कुछ में तो जीत मिली है, जबकि अनेक में हार का सामना करना पड़ा है । पर्यावरणीय हानि को नियंत्रित करने के लिए बने कानूनों के बावजूद इन परियोजनाओं ने पर्यावरण की गंभीर हानि की है ।

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जन-जागरूकता (Public Awareness):

हमारे देश में पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता जन-जागरूकता के एक बड़े अभियान से ही आ सकती है । इसके अनेक साधन हैं-इलेक्ट्रानिक माध्यम, प्रेस, विद्यालय, महाविद्यालयी शिक्षा और व्यस्क शिक्षा । ये सब एक-दूसरे के पूरक हैं । छोटे-छोटे स्थानीय पहल से ही बढ़कर हरित आंदोलन सरकार के सामने पर्यावरण सुरक्षा की पैरवी करनेवाला प्रमुख कारक बन सकता है ।

पर्यावरण की सुरक्षा पर जोर देनेवाले मतदाताओं का एक पर्याप्त बड़ा समूह हो, तभी नीति-निर्माता पर्यावरण की सुरक्षा के लिए कार्य करेंगे । पर्यावरणमुखी मुद्‌दों को पेश करने के लिए संचार माध्यमों को प्रवृत्त करना एक महत्त्वपूर्ण काम है । अकसर अनेक विज्ञापनों में ऐसे संदेश होते हैं जो पर्यावरण की रक्षा के हित में नहीं होते ।

पर्यावरणीय कैलेंडर का उपयोग करना (Using an Environmental Calendar of Activities):

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पर्यावरण के लिए विशेष महत्त्व के ऐसे अनेक दिन हैं जो समुदाय द्वारा मनाए जा सकते हैं और पर्यावरण की जागरूकता पैदा करने के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं ।

फरवरी 2:

विश्व दलदल दिवस (World Wetland Day) दलदलयुक्त भूमियों और मानवजाति के लिए उनके महत्त्व की चेतना जगाने के लिए मनाया जाता है । 2 फरवरी 1971 को अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की दलदलों संबंधी रैम्जर संविदा पर रैम्जर (ईरान) में हस्ताक्षर किए गए थे । आप अपने गाँव या नगर के पास की किसी दलदली भूमि के समुचित उपयोग और रखरखाव पर एक अभियान का आरंभ कर सकते हैं ।

मार्च 21:

विश्व वानिकी दिवस (World Forestry Day) का उपयोग हम अपने वनों के अत्यंत तीव्र विनाश के बारे में जन-जागरूकता के अभियान के आरंभ के लिए कर सकते हैं । यह कार्यक्रम कर्ममुखी होना चाहिए और वृक्षारोपण जैसे कार्यों के साथ एक निरंतर प्रक्रिया का रूप ले लेना चाहिए ।

अप्रैल 7:

विश्व स्वास्थ्य दिवस (World Health Day)-1948 में इसी दिन विश्व स्वास्थ्य संगठन का जन्म हुआ था । जन-स्वास्थ्य, व्यावसायिक स्वास्थ्य आदि की समझ के लिए निजी सफाई और स्वास्थ्य-रक्षा का एक अभियान चलाया जा सकता है । पर्यावरण संबंधी रोगों और उनके प्रसार से जुड़े विषयों की विवेचना की जा सकती है और उनकी रोकथाम के उपाय सुझाए जा सकते हैं ।

अप्रैल 18:

विश्व धरोहर दिवस (World Heritage Day) का उपयोग किसी स्थानीय किले या संग्रहालय का भ्रमण आयोजित करने के लिए किया जा सकता है । पर्यावरण में सांस्कृतिक स्मारक भी शामिल होते हैं । छात्र इस अवसर का उपयोग स्थानीय जनता में उनकी बहुत ही मूल्यवान धरोहरों की चेतना जगाने के लिए कर सकते हैं ।

अप्रैल 22:

पृथ्वी दिवस (Earth Day) सबसे पहले अमरीका में एक समूह द्वारा पृथ्वी पर मनुष्यों द्वारा पर्यावरण के लिए बढ़ती समस्याओं की ओर ध्यान खींचने के लिए मनाया गया था । आज यह दिन पूरी दुनिया में रैलियों, त्योहारों, सफाई कार्यक्रमों, विशेष प्रदर्शन और व्याख्यानों के द्वारा मनाया जाता है ।

जून 5:

विश्व पर्यावरण दिवस (World Environment Day) स्टाकहोम मानव पर्यावरण सम्मेलन (स्वीडन 1972) की सालगिरह है । इसमें दुनियाभर के राष्ट्र पर्यावरण की कीमत पर मानव प्रगति के बारे में अपनी चिंता व्यक्त करने के लिए जमा हुए थे । कोई महाविद्यालय वर्ष में पर्यावरण संबंधी जो विभिन्न कार्यक्रम चला चुके हों उन्हें उजागर करने के लिए इस दिवस का उपयोग कर सकता है । महाविद्यालय के स्तर पर पर्यावरण आंदोलन को मजबूत बनाने के नए संकल्प लिए जा सकते हैं ।

जून 11:

विश्व जनसंख्या दिवस (World Population Day) है । इसमें महाविद्यालय और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा आयोजित संगोष्ठियों में जनसंख्या और पर्यावरण के जीवंत संबंध की विवेचना की जा सकती है ।

अगस्त 6:

हिरोशिमा दिवस (Hiroshima Day) का उपयोग भोपाल गैस त्रासदी और चेर्नोबिल दुर्घटना की चर्चा के लिए हो सकता है ।

सितंबर 16:

ओजोन पर्त की रक्षा के अंतराष्ट्रीय दिवस के रूप में संयुक्त राष्ट्र ने विश्व ओजोन दिवस (World Ozone Day) की घोषणा की है । छात्रों के लिए इस पर्त से संबधित मौजूद खतरों के बारे में कुछ और जानने का और इस विश्वव्यापी खतरे के शमन में वे क्या सहायता दे सकते हैं, इसकी चर्चा करने का यह अच्छा अवसर है । ओजोनघाती पदार्थों के उत्पादन और उपभोग के लिए माँट्रियाल प्रोटोकाल पर इसी दिन हस्ताक्षर किए गए थे ।

सितंबर 28:

हरित उपभोक्ता दिवस (Green Consumer Day) का उपयोग उपभोक्ताओं में विभिन्न वस्तुओं के बारे में चेतना जगाने के लिए किया जा सकता है । छात्र दुकानदारों और उपभोक्ताओं से भारी पैकिंग के बारे में बातें कर सकते हैं और जिन वस्तुओं की पैकिंग भारी न हो उनके उपयोग के पक्ष में एक अभियान चला सकते हैं ।

अक्टूबर 1-7:

वन्यजीवन सप्ताह (Wildlife Week) में हमारी संकटग्रस्त प्रजातियों और पारितंत्रों के संरक्षण पर संगोष्ठियाँ आयोजित की जा सकती हैं । राज्यों के विभाग प्रायः विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करते हैं जिनमें हर छात्र को भाग लेना चाहिए । भारत की समृद्ध जैव-विविधता को उजागर करने के लिए पोस्टर प्रदर्शन या नुक्कड़ नाटक की योजना बनाई जा सकती है । वन्यजीवन का अर्थ केवल पशु-पक्षी नहीं है; इसमें पौधे भी आते हैं ।

मैं क्या कर सकता हूँ ? (What can I do ?):

हममें से अधिकांश लोग देश में पर्यावरण की बिगड़ती दशा पर हमेशा शिकायत करते रहते हैं । सरकार को हम दोष देते रहते हैं कि वह इस बारे में कुछ नहीं करती । पर हममें से कितने लोग अपने पर्यावरण के बारे में सचमुच कुछ करते हैं?

आप अपने दैनिक जीवन में, अपने व्यवसाय और समुदाय में पर्यावरण के हित में जो कार्य कर सकते हैं, उनके बारे में सोचें । दूसरों से भी आप पर्यावरण कार्य करा सकते हैं । पर्यावरण में सुधार के लिए एक मशहूर कथन है : ‘सोचो दुनिया भर की, करो अपने बस की (think globally and act locally) ।’  ‘आप’ दुनिया में फर्क ला सकते हैं ।

जैव-विविधता का सरंक्षण:

भारत में बचे-खुचे निर्जन का एक बड़ा भाग आज संकटग्रस्त है । अनेक अनुपम भूदृश्य सिकुड़ रहे हैं क्योंकि विकास के नाम पर सघन कृषि और औद्योगिक संवृद्धि में तेजी आ रही है । मनुष्य अगर प्राकृतिक अवासों को नष्ट करता रहा, विनाश के जुनून में करोड़ों वर्षों के उद्विकास को समाप्त करता रहा और केवल अल्पकालिक लाभों पर ध्यान देता रहा तो आधुनिक विज्ञान को संदेह नहीं कि मानवजाति का अंत निकट है ।

प्रजातियों के विनाश की भरपाई नहीं हो सकती । एक प्रजाति का विलोप होने पर वह हमेशा के लिए खत्म हो जाती है । इस अपूरणीय क्षति के लिए भावी पीढ़ियाँ हमें ही जिम्मेदार ठहराएँगीं ।  अकसर हम भूल जाते हैं कि हम जीवन के पेचीदा ताने-बाने के अंग हैं और हमारा जीवन पृथ्वी, पौधों और पशुओं की उन 18 लाख प्रजातियों की एकता पर निर्भर है जो विभिन्न पारितंत्रों में रहते हैं ।

अपने पारितंत्र की सुरक्षा और जैव-विविधता के संरक्षण हेतु आप इस प्रकार योगदान दे सकते हैं:

करणीय-कार्य:

i. अपने और कार्यस्थल के आसपास स्थानीय या देसी प्रजातियों के और भी वृक्ष लगाएँ और अपने मित्रों को भी इसके लिए प्रेरित करें । पौधे हमारे जीवन के लिए अनेक प्रकार से महत्त्वपूर्ण हैं ।

ii. अगर आपका नगरीय बाग पेड़ों के लिए बहुत छोटा हो तो झाड़ियाँ और लताएँ लगाइए । ये पक्षी-जीवन और कीट-जीवन को सहारा देती हैं जो प्रकृति की खाद्य-शृंखलाओं के अभिन्न अंग हैं । नगरीय जैव-विविधता का संरक्षण संभव है और यह जीवन की सीमित, पर मूल्यवान विविधता को सहारा दे सकती है ।

iii. अगर आप किसी फ्लैट में रहते हैं तो छत पर या बाल्कनी में गमलों में पौधे लगाइए । छोटे फूलदार पौधे उगाने के लिए विंडो-बाक्सों का प्रयोग किया जा सकता है । ये आपके घर की सुंदरता भी बढ़ाएँगे ।

iv. जहाँ भी और जब भी संभव हो, पेड़ों को कटने से रोकें और संभव हो तो संबंधित अधिकारियों को फौरन इसकी सूचना दें । पुराने पेड़ खास तौर पर महत्त्वपूर्ण होते हैं ।

v. पहाड़ों को बसाव या ऐसे ही अतिक्रमण से मुक्त रखने पर जोर दें । पहाड़ी ढालों का ह्रास पर्यावरण की भयानक समस्याओं को जन्म देता है ।

vi. हल्के पैकिंग वाली वस्तुएँ ही खरीदें । इससे गड्‌ढों में जाने वाले कचरे की मात्रा कम ही नहीं होगी बल्कि पैकिंग आदि के लिए कागज बनाने के लिए पेड़ काटने की आवश्यकता भी कम होगी ।

vii. कागज का उपयोग घटाने के तरीके ढूँढें । कागज के हर पन्ने पर दोनों तरफ लिखें और बेकार कागज को पुनर्चालन के लिए भेजें ।

viii. अपने घर के लिए कागज की पुनर्चालित वस्तुएँ खरीदें, जैसे कागज के पन्ने, लिफाफे आदि ।

ix. कार्टनों और उपहार लपेटने के कागज का बार-बार उपयोग करें । अखबार और रद्‌दी कागज को कूड़े में फेंकने के बजाय उसका पुनर्चालन करें ।

x. प्रयुक्त पुस्तकों और पत्रिकाओं को विद्यालयों, अस्पतालों या पुस्तकालयों को दान में दे दें । इस दान से इन संगठनों की सहायता ही नहीं होगी बल्कि कागज बनाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कम होगा ।

xi. अभयारण्यों, राष्ट्रीय पार्कों, प्राकृतिक-मार्गों, खुली जगहों की व्यवस्था करने और वनों को बचाने की आवश्यकता स्पष्ट करनेवाले आयोजनों में भाग लें ।

xii. बाघ परियोजना, हाथी परियोजना आदि में सहायता करें तथा पर्यावरण और प्रकृति के संरक्षण से जुड़े गैर-सरकारी संगठनों में शामिल हों ।

xiii. वन्यजीवन सप्ताह में होने वाली गतिविधियों, वृक्षारोपण अभियान जैसे अन्य सार्वजनिक कार्यों और पर्यावरण के विनाश के प्रतिरोध में भाग लें और इसमें मित्रों को भी शामिल करें ।

अकरणीय कार्य:

i. गुलदस्ते न देकर गमलेदार पौधे उपहार में दें और मित्रों को भी इसके लिए प्रेरित करें ।

ii. गैरजरूरी पर्चे और पुस्तिकाएँ सिर्फ इसलिए न जमा करें कि वे मुफ्त मिल रही हैं ।

iii. कोई पार्टी आयोजित करें तो कागज के प्लेटों, टिशु कागज का प्रयोग या कागज की सजावट न करें ।

आवासों का सरंक्षण:

वनों के तीव्र विनाश और मनुष्यों की बस्तियों और कार्यकलापों के प्रसार ने पशु-पक्षियों के प्राकृतिक आवास कम किए हैं । आवास का विनाश अनेक प्राणियों पर भारी दबाव डालता है और इससे अनेक दुर्लभ और स्थानीय प्रजातियों का विनाश हुआ है । अनेक अन्य प्रजातियाँ गहरे संकट में हैं । इसलिए शेष बचे आवासों और उनके निवासियों की रक्षा का दायित्व हम पर है । नीचे ऐसे कुछ ‘करणीय’ और ‘अकरणीय’ कार्य दिए जा रहे हैं जो संकटग्रस्त पारितंत्रों के संरक्षण में सहायक हो सकते हैं ।

करणीय कार्य:

i. वन-भ्रमण के दौरान अपनी जिम्मेदारी का ख्याल रखें । जो कुछ ले जाएँ उसे वापस लाना और दूसरों द्वारा फैलाए गए कूड़े-कचरे को साफ करना याद रखें । संकेतित राहों पर ही चलें और ध्यान रखें कि वन्यजीवों को भी शांति चाहिए । पारितंत्र का अध्ययन करें; यह उसके संरक्षण के प्रति जिम्मेदारी का एहसास बढ़ाता है ।

ii. पशुओं के साथ दयालुतापूर्ण व्यवहार करें । पक्षियों, मेंढकों, साँपों, छिपकलियों और कीड़ों-मकोड़ों जैसे वन्यजीवों की शांति भंग करने या उनके साथ क्रूरता बरतने से मित्रों को रोकें ।

iii. पक्षियों के बारे में जानें और अपने क्षेत्र के आम पक्षियों को पहचानें । उनकी भोजन संबंधी आवश्यकताओं और आदतों को समझें । पक्षियों के लिए बक्सों में कृत्रिम घोंसले बनाएँ । इससे पक्षियों को आपके आसपास रहने का प्रोत्साहन मिलेगा, भले ही उनके आवास दुर्लभ हों । पक्षी-स्नान की व्यवस्था करके आप उनके बारे में कुछ और भी जान सकते हैं ।  पक्षियों को पीने और पंख साफ रखने के लिए पानी चाहिए । चीनी मिट्‌टी या प्लास्टिक के बड़े से पतीले से आप पक्षीस्नान बना सकते हैं । आपके घर, विद्यालय या महाविद्यालय के आसपास पक्षियों के होने से क्षेत्र में प्रजातियों की विविधता बढ़ाने में मदद मिल सकती    है ।

iv. बाग में पानी छिड़ककर या फैलाकर गिलहरी जैसे छोटे पशुओं को उधर आकर्षित करें । एक बाल्टी के पेंदे में छोटा-सा छेद करके उसमें से एक धागा निकालकर बत्ती बनाएँ । अपने पक्षीस्नान के ऊपर किसी पेड़ की टहनी से बाल्टी को टाँग दें तो उसमें से बूँद-बूँद करके दिनभर पानी गिरता रहेगा ।

v. अपने बाग में रसायनों का प्रयोग न करें । इससे कीटभक्षी प्राणियों, खासकर पक्षियों और कीड़ों-मकोड़ों जो आपके आस-पास रहते हैं रक्षा होगी । इसकी बजाय कृमि-कंपोस्ट का उपयोग करें और प्राकृतिक कीटनाशकों का सहारा लें । बाग में कीटों और पौधाजन्य रोगों की रोकथाम के लिए स्थानीय पौधों से बागबानी और सजावट करें ।

vi. अगर आपने पशु-पक्षी पाले हों तो उनको अच्छा भोजन, सही आवास और आपात चिकित्सा प्रदान करें ।

vii. किसी चिड़ियाघर में जाएँ तो वहाँ के पशु-पक्षियों के बारे में जानें, पर उनके पिंजड़ों की डंडियों  के रास्ते न उन्हें छेडें, न उनको हानि पहुँचाएँ । उन्हें शांतिमय जीवन का अधिकार है । चिड़ियाघर उनके लिए वैसे भी कोई आदर्श घर नहीं होता ।

अकरणीय:

i. किसी संरक्षित क्षेत्र में पशुओं को न छेड़ें, न परेशान करें, न चोट पहुँचाएँ और न उन पर पत्थर फेंकें और दूसरों को भी ऐसा करने से रोकें । किसी घायल पशु को देखें तो वन अधिकारियों को सूचित करें ।

ii. पशु-पक्षियों के प्राकृतिक आवासों से छेड़छाड़ न करें या उन्हें नष्ट न करें ।

iii. पशुओं से प्राप्त वस्तुओं, जैसे चमड़े के थैलों और लिपस्टिक जैसी प्रसाधन सामग्री का प्रयोग न करें । वन्यजीवन से प्राप्त किसी भी वस्तु का उपयोग नहीं करना चाहिए ।

iv. तितलियों और दूसरे कीटों को न पकड़े, न मारें । तितलियाँ, भौंरे, मधुमक्खियाँ, गुबरैले और चींटे परागण के लिए महत्त्वपूर्ण होते हैं ।

v. ड्रैगनफ्लाई और मकड़ी जैसे छोटे प्राणियों को न मारे । ये जैविक कीट-नियंत्रक का काम करते हैं ।

vi. वनों से पशुओं और पौधों को घर न लाएँ । इस तरह आप वन्य प्राणियों को और जिन प्राकृतिक पारितंत्रों में वे रहते हैं उनको गंभीर हानि पहुँचाते हैं ।

vii. सरीसृपों की खाल से बने पर्स, बटुआ, बूट आदि वस्तुएँ न खरीदें । अगर आपको इसकी आशंका है कि कोई वस्तु वन्य प्राणियों से बनी है तो उसके उपयोग से बचना बेहतर है ।

viii. हाथीदाँत की वस्तुएँ न खरीदें । हाथियों को हाथीदाँत के लिए ही मारा जाता है जिसका उपयोग अनेक प्रकार की आकर्षक वस्तुएँ बनाने के लिए किया जाता है ।

ix. वन्य प्राणियों या पौधों से प्राप्त वस्तुओं का उपयोग न करें जो निर्जन में मिलते हैं और जिनके चिकित्सकीय गुणों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है । हो सकता है कि इस तरह आप किसी प्रजाति को और अपने स्वास्थ्य को भी संकट में डाल रहे हैं ।

मृदा संरक्षण (Soil Conservation):

मृदा का ह्रास हम सबको प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में प्रभाव करता है । ऐसे अनेक उपाय हैं जो मृदा के ह्रास से होनेवाली पर्यावरण संबंधी समस्याओं के हल में सहायक हो सकते हैं ।

नीचे मृदा संरक्षण के संबंध में कुछ करणीय और अकरणीय बातें बताई गई हैं:

करणीय:

i. वर्षा में मिट्‌टी का कटाव (मृदा अपरदन) रोकने और मिट्‌टी की नमी बनाए रखने के लिए अपने खेत या बाग की मिट्‌टी को पलवार (mulch) की एक तह से ढँक दें । यह पलवार घास की कतरन या गिरे हुए पत्तों से बनाया जा सकता है ।

ii. अगर अपने बाग या खेत में तेज ढलान पर पौधे लगाने की योजना बनाएँ तो ढलान पहले सीढ़ीनुमा बना लें । सीढ़ीनुमा भूमि वर्षाजल के नीचे की ओर के प्रवाह को धीमा करती है जिसके कारण वर्षाजल मिट्‌टी को बहाकर ले जाने के बजाय मिट्‌टी में मिल जाता है ।

iii. पेड़ या भूमि पर फैलने वाले पौधे लगाकर मृदा अपरदन की रोकथाम में सहायता दें । पौधे लगाने के लिए उचित स्थानों की पहचान करने, धन जमा करने, पेड़, झाड़ियाँ और घास लगाने के लिए स्थानीय शासन के साथ मिलकर काम करने और उनको लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए आप एक नागरिक समूह भी बना सकते हैं ।

iv. अगर आपके महाविद्यालय के आसपास खुली जगह हो तो मूल्यांकन करें कि मिट्‌टी का कितना उपयुक्त संरक्षण हो रहा है । उन जगहों की तलाश करें जहाँ से मिट्‌टी बहकर जा सकती है, जैसे हरियाली से वंचित एक तेज ढाल या नदी का किनारा, या जहाँ मिट्‌टी पलवार से ढँकी न हो । इन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है और वहाँ सावधानी से पौधे लगाए जाने चाहिए ।

v. बाग की मिट्‌टी को उपजाऊ बनाने के लिए जैविक पदार्थ डालें, जैसे रसोई के कूड़े से बना कंपोस्ट, मुर्गियों की बीट, और गायों के गोबर से बनी खाद पोषक तत्त्वों के अच्छे स्रोत हैं । ध्यान रहे कि खाद बहुत ताजी न हो, और आप बहुत अधिक खाद भी न डालें । अच्छी मिट्टी अच्छे पौधे उगाती है और इसके कारण कीटनाशकों या पातनाशकों की आवश्यकता भी कम होती है ।

vi. अपने घर की क्यारियों में पोषक तत्त्वों का ह्रास रोकने के लिए अदलबदल कर पौधे लगाएँ । मटर और बीन जैसी फलियाँ मिट्टी में नाइट्रोजन को वापस लौटाती हैं ।

vii. अपने महाविद्यालय या बाग में एक कंपोस्ट गड्‌ढा बनाइए ताकि रसोई के कूड़े से आप अपनी मिट्‌टी को उपजाऊ बना सकें और इस कचरे का समुचित उपयोग हो सके । अपने महाविद्यालय या लंचरूम में बाल्टियाँ रखें जिनमें फलों के छिलके, जूठन आदि को फेंका जा सकता है । इन बाल्टियों को प्रतिदिन एक कंपोस्ट गड्‌ढे में खाली करें और कुछ सप्ताह में बनी समृद्ध कंपोस्ट खाद का उपयोग महाविद्यालय के आसपास की मिट्‌टी को उपजाऊ बनाने के लिए करें ।

viii. स्थानीय चिड़ियाघर, खेतिहर किसानों और अन्य संगठनों और लोगों को, जिनके पास मवेशियों की बड़ी संख्या है, प्रोत्साहित करें कि वे जानवरों के मलमूत्र से बनी जैविक खाद आपके समुदाय को दें । इनको कंपोस्ट करके अच्छी खाद बनाई जा सकती है और यह पशुओं के मालिकों के लिए आय का अच्छा स्रोत भी बनेगा ।

ix. मिट्‌टी में रहनेवाले प्राणियों को हानि पहुँचानेवाले विषैले कीटनाशकों के प्रयोग में कमी लाने के लिए जैविक कृषि से उगाई गई वस्तुओं का प्रयोग करें । अपने पंसारी के यहाँ जैविक कृषि के उत्पादों की तलाश करें या अगर आपके पास जगह है तो ऐसी कुछ वस्तुएँ स्वयं उगाएँ ।

x. अपने राज्य और समुदाय में पर्यावरण संबंधी अभियानों को समर्थन दें । गैर- जिम्मेदाराना विकास पर रोक लगने से मिट्‌टी और जैव-विविधता की रक्षा होगी और हमारे जीवन की गुणवत्ता बढ़ेगी ।

अकरणीय:

i. कटी घास को न हटाएँ, उसे लॉन में ही रहने दें । घास के टुकड़े नमीरक्षक पलवार और प्राकृतिक खाद का काम करते हैं ।

ii. अपने बाग में विषैले कीटनाशकों का प्रयोग न करें । ये अकसर उन लाभदायक जीवों को भी मार डालते हैं जिनकी आपकी मिट्‌टी के उपजाऊ बने रहने के लिए जरूरत होती है ।

जल संरक्षण (Conserving Water):

भारत के अधिकांश भाग में औसत वार्षिक वर्षा अच्छी होती है । फिर भी हर जगह हमें जल की कमी का सामना करना पड़ता है । यह हमारे देश की प्रमुख पर्यावरण संबंधी समस्याओं में से एक है । इस बहुत ही कीमती प्राकृतिक संसाधन का संरक्षण बहुत महत्त्वपूर्ण है और यह समय की माँग है । इसका आरंभ हर व्यक्ति से होना चाहिए । इसका आरंभ आपसे होना चाहिए !

इस कीमती प्राकृतिक संसाधन के संरक्षण के लिए कुछ करणीय और अकरणीय बातों का उल्लेख किया गया है:

करणीय:

i. दैनिक कार्यों में पानी की खपत कम कीजिए । मसलन दाँत साफ करते समय पानी बचाने के लिए नल को बंद रखें ।

ii. खँगाल के पानी का उपयोग घर के पौधों के लिए करें । सब्जियाँ जिस पानी में धोई गई हों उससे अपनी क्यारियों या गमलों में लगे पौधों की सिंचाई करें ।

iii. वाष्पीकरण कम हो, इसके लिए पौधों को हमेशा सुबह पानी दें ।

iv. पानी और डिटरजेंट का प्रयोग कम करने के लिए बर्तनों को धोने से पहले भिगोकर रखें ।

v. प्रसाधन कक्ष (toilet) और स्नानघर में पानी का रिसाव रोकें । इससे प्रतिदिन कई लीटर पानी बचेगा ।

vi. पौधों को पानी देते समय उसी गति से पानी दें जिस गति से मिट्‌टी उसे सोख सके ।

vii. अधिक कारगर सिंचाई के लिए टपकन सिंचाई प्रणाली (drip irrigation system) का प्रयोग करें ।

viii. पानी पीना हो तो उतना ही पानी लें जितना जरूरत हो । हमारे देश में लाखों लोगों को पीने का साफ पानी नहीं मिलता ।

ix. कीमती वर्षाजल को बचाना बहुत महत्त्वपूर्ण है । छतों पर गिरनेवाली बारिश का पानी संचित करें तथा इसका निर्वहनीय उपयोग करें ताकि कुओं, नदियों और झीलों पर बोझ कम हो ।

x. जल प्रदूषण रोकने के लिए नालियों में जानेवाले गंदे पदार्थों पर निगरानी रखें और उनको नियंत्रित करें ।

xi. अपने घरों में फिनाइल, कठोर डिटरजेंट, शैंपू, रासायनिक कीटमारक और खाद आदि की जगह नीम और जैविक खाद जैसे पर्यावरणस्नेही विकल्पों को अपनाएँ । घरों में प्रयुक्त रसायनों द्वारा भूमिगत जल का प्रदूषण बढ़ती हुई चिंता का विषय है ।

xii. गणेशचतुर्थी के लिए प्लास्टर आफ पेरिस की जगह मिट्‌टी की मूर्ति खरीदें और नदी का प्रदूषण रोकने के लिए उसे जल में विसर्जित न करके किसी को दान कर दें ।

अकरणीय:

i. नल को पूरा न खोलें और जल के प्रवाह को धीमा रखें ।

ii. नहाने के लिए फव्वारे (shower) का प्रयोग न करें बल्कि बाल्टी का प्रयोग करें । बाल्टी से पानी के प्रयोग की तुलना में दस मिनट तक शावर चलाने पर अनेक लीटर पानी बेकार चला जाता है ।

iii. बाग के पौधों की बहुत अधिक सिंचाई न करें । उन्हें आवश्यकता होने पर ही सींचें ।

iv. जल के स्रोतों या जलाशयों में बेकार पदार्थ फेंककर उन्हें प्रदूषित न करें । यह वह जल है जिसे आप पीएँगे या कोई और पीएगा ।

v. प्रसाधन कक्ष (toilet) में बेकार की वस्तुएँ न फेंकें क्योंकि वे अंत में जलाशयों में ही पहुँचती हैं ।

ऊर्जा का संरक्षण (Conserving Energy):

कोयला, पेट्रोलियम और तेल जैसे जिन खनिज संसाधनों का हम प्रयोग करते हैं उनमें से अधिकांश ऊर्जा के अनवीकरणीय स्रोत है । जीवाश्म ईंधन के उपयोग की वर्तमान दर से पृथ्वी के मौजूदा तेल भंडार अगले 30 से 50 साल तक ही चलेंगे । कोयला, पेट्रोलियम और बिजली के उत्पादन, शोधन और वितरण में करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं । पवन और फोटोवोल्टेइक सेलों से ऊर्जा उत्पन्न करने के प्रयोग जारी हैं । ये अत्यंत सफल रहे हैं । व्यक्तिगत स्तर पर हम सबको ऊर्जा बचाने का प्रयास करना चाहिए ।

ऊर्जा संरक्षण के लिए आप क्या कर सकते हैं, इस बारे में कुछ बातें नीचे दी जा रही हैं:

करणीय:

i. आवश्यकता न हो तो बत्तियों, पंखों और एयर-कंडीशनर को बंद कर दें ।

ii. कम वोल्टेज वाली बत्तियों का प्रयोग करें ।

iii. ट्‌यूबलाइटों और बिजली बचानेवाले बल्बों का प्रयोग करें क्योंकि ये बिजली कम खाते हैं ।

iv. आवश्यकता न हो तो रेडियो और टेलीविजन बंद कर दें ।

v. पानी गर्म करने और भोजन पकाने के लिए ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों का प्रयोग करें, जैसे सौर ऊर्जा का ।

vi. बिजली के उपकरणों के प्रयोग में कमी करें ।

vii. गर्मियों में घर को ठंडा रखने के लिए सुबह ही खिड़कियाँ और दरवाजे बंद कर दें और पर्दे खींच दें ।

viii. ऊर्जा बचाने के लिए प्रेशर कुकर का अधिक से अधिक प्रयोग करें ।

ix. उपयोग के बाद स्टोव को फौरन बंद कर दें ।

x. भोजन पकाना शुरू करने से पहले योजना के अनुसार चीजों को तैयार रखें ।

xi. ऊर्जा बचाने के लिए भोजन पकाते समय बर्तनों को बंद रखें और हमेशा छोटे और तंग मुँह वाले बर्तनों का उपयोग करें ।

xii. भोजन पकने के करीब हो तो गैस स्टोव बंद कर दें और बर्तन का मुँह बंद रखें । जो भाप अंदर मौजूद है उसी से भोजन पूरी तरह पक जाएगा ।

xiii. पकाने का समय कम करने और ईंधन बचाने के लिए चावल, दाल आदि को भिगोकर रखें ।

xiv. परिवार से साथ भोजन करने को कहें । इससे बार-बार खाना गर्म करने पर लगनेवाला ईंधन बचेगा ।

xv. दीवारों और छतों के लिए हल्का रंग चुनें । यह प्रकाश का परिवर्तन (reflection of light) अधिक करेगा और आपकी बिजली की खपत कम होगी ।

xvi. अपने अध्ययन की मेज को खिड़की के पास रखें और प्राकृतिक प्रकाश में अध्ययन करके बिजली का खर्च कम करें ।

xvii. साइकिल का उपयोग करें । यह कम जगह लेती है, कोई प्रदूषक नहीं छोड़ती और इससे शारीरिक व्यायाम भी होता है ।

xviii. जहाँ तक संभव हो, रेल और बस जैसी सार्वजनिक यातायात व्यवस्थाओं का उपयोग करें ।

xix. बाहर जाने से पहले अपनी यात्राओं और मार्गों की योजना बनाएँ ।

xx. जब भी संभव हो, गाड़ी पर जाने के बजाय पैदल चलें । पैदल चलना आपके स्वास्थ्य के लिए सबसे अच्छे व्यायामों में से एक है ।

xxi. ईंधन की खपत और प्रदूषण का स्तर कम करने के लिए अपने वाहनों की नियमित सर्विसिंग कराते रहें ।

अकरणीय:

i. बाहर सजावट के लिए अनावश्यक रोशनियों का प्रयोग न करें ।

ii. गर्मी में गीजर का प्रयोग न करें । इसके बदले धूप की सहायता से पानी गर्म करें ।

iii. हैलोजन लैंपों (halogen lamps) का प्रयोग न करें क्योंकि ये अधिक बिजली खाती हैं ।

iv. भोजन जब तक गर्म हो, उसे रेफ्रिजरेटर में न रखें ।

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