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Top 13 Institutions Conserving the Environment in India

Read this article in Hindi to learn about the top thirteen Indian institutions that render a hand in conserving the environment. The institutions are: 1. The Bombay Natural History Society, Mumbai 2. World Wide Fund for Nature-India, New Delhi 3. Centre for Science and Environment, New Delhi 4. CPR Environmental Education Centre, Chennai 5. Centre for Environment Education, Ahmedabad and a few others.

Indian Institutions that Render a Hand in Conserving the Environment:-

  1. The Bombay Natural History Society, Mumbai
  2. World Wide Fund for Nature-India, New Delhi
  3. Centre for Science and Environment, New Delhi
  4. CPR Environmental Education Centre, Chennai
  5. Centre for Environment Education, Ahmedabad
  6. Bharati Vidyapeeth Institute of Environment Education and Research, Pune
  7. Uttarkhand Seva Nidhi, Almoda
  8. Kalpavriksh, Pune
  9. The Salim Ali Centre for Ornithology and Natural History, Coimbatore
  10. The Wildlife Institute of India, Dehradun
  11. The Botanical Survey of India
  12. Zoological Survey of India
  13. The Madras Crocodile Bank Trust, Chennai

हमारे देश में ऐसे अनेक सरकारी और गैर-सरकारी संगठन हैं जो पर्यावरण की रक्षा के लिए काम कर रहे हैं । उन्होंने पर्यावरण की सुरक्षा तथा प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में दिलचस्पी बढ़ाई है । लेकिन संरक्षण की वे परंपरागत विधियाँ धीरे-धीरे गायब हो चुकी हैं जो प्राचीन भारत की संस्कृति का अंग थीं ।

इस तरह पर्यावरण-सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए जन-जागरूकता एक बुनियादी आवश्यकता है । संस्थाओं की जिस बड़ी संख्या का पर्यावरण सुरक्षा और संरक्षण से संबंध है, उनमें कुछ एक मशहूर संस्थाएँ बी एस आई (BSI) और ज़ेड एस आई (ZSI) जैसे सरकारी संगठन तथा बी एन एच एस (BNHS), डब्ल्यू डब्ल्यू एफ-आई (WWF-I) आदि गैर-सरकारी संगठन हैं ।

Institution # 1. बांबे नेचुरल हिस्टरी सोसायटी (The Bombay Natural History Society), मुंबई:

इसका आरंभ 1883 में छह व्यक्तियों की एक छोटी-सी समिति के रूप में हुआ । शिकारियों तथा जीवन के अनेक क्षेत्रों से संबंधित व्यक्तियों के समूह से आगे बढ़कर यह समिति अब एक महत्त्वपूर्ण शोध संगठन बन चुकी है और देश में संरक्षण संबंधी नीति-निर्धारण में मदद देती है । वन्यजीवन संबंधी नीतियों के निर्माण, अनुसंधान, लोकप्रिय प्रकाशनों और जनता की कार्यवाई पर इस बहुमुखी सोसायटी का प्रभाव इसकी अनोखी विशेषता है ।

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वन्यजीवन संबंधी अनुसंधान निस्संदेह इसका प्रमुख योगदान है । भारत का यह सबसे पुराना, संरक्षण-अनुसंधान पर आधारित गैर-सरकारी सगंठन है जो प्रजातियों और पारितंत्रों के संरक्षण के क्षेत्र में सबसे आगे       है । यह सोसायटी हार्नबिल नाम से एक लोकप्रिय पत्रिका प्रकाशित करती है और अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त पत्रिका जर्नल ऑन नेचुरल हिस्टरी भी इसी सोसाइटी की पत्रिका है ।

सलीम अली कृत हैंडबुक ऑन बर्डस, जे सी डेनियल कृत बुक आफ़ इंडियन रेप्टाइल्स, एस एच प्रेटर कृत बुक आफ़ इंडियन मैमल्स और पी वी बोले कृत बुक आफ़ इंडियन ट्रीज इसके कुछ अन्य प्रकाशन हैं । इसके सबसे महान वैज्ञानिकों में एक थे सलीम अली जिनका भारतीय उपमहाद्वीप के पक्षियों से संबंधित योगदान विश्वविख्यात है । कालक्रम में इस सोसायटी ने सरकार को वन्यजीवन संबंधी कानून बनाने में सहायता पहुँचाई और ‘खामोश वादी को बचाओ’ जैसे अभियान चलाए ।

Institution # 2. वर्ल्डवाइड फ़ंड फ़ार नेचर-इंडिया (World Wide Fund for Nature-India), नई दिल्ली:

इसका आरंभ 1969 में मुंबई में हुआ, पर इसका मुख्यालय बाद में दिल्ली आ गया । पूरे भारत में इसकी अनेक शाखाएँ हैं । आरंभ के वर्षों में इसने वन्यजीवन संबंधी शिक्षा और जागरूकता पर ध्यान केंद्रित  किया । यह विद्यालयों के बच्चों के लिए भारतीय प्रकृति क्लब जैसे कार्यक्रम समेत अनेक कार्यक्रम चलाता है तथा पर्यावरण और विकास के मुद्‌दों पर विचार और कार्रवाई करता है ।

Institution # 3. विज्ञान और पर्यावरण केंद्र (Centre for Science and Environment), नई दिल्ली:

अभियान चलाना, कार्यशालाएँ और सम्मेलन करना, तथा पर्यावरण से संबंधित प्रकाशन करना इस केंद्र के कार्यों में शामिल हैं । इसने स्टेट आफ़ इंडियाज़ इनवायरनमेंट नाम से एक बड़ी रिपोर्ट प्रकाशित की है जो पर्यावरण पर एक नागरिक की रिपोर्ट के रूप में अपने ढंग की पहली रिपोर्ट है ।

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यह केंद्र लोकप्रिय पत्रिका डाउन टू अर्थ भी प्रकाशित करता है जो विज्ञान और पर्यावरण संबंधी एक पाक्षिक पत्रिका है । यह पुस्तकों, पोस्टरों, विडियो फिल्मों के रूप में सामग्री तैयार करता है तथा जैव-विविधता के मुद्‌दों पर कार्यशालाओं और संगोष्ठियों का आयोजन करता है ।

Institution # 4. सी पी आर इनवायरनमेंटल एजुकेशन सेंटर (CPR Environmental Education Centre), मद्रास:

यह केंद्र 1988 में स्थापित किया गया था । यह आम जनता में पर्यावरण संबंधी जागरूकता फैलाने और संरक्षण में रुचि जगाने के लिए अनेक प्रकार के कार्यक्रम चलाता है । प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए यह आम तौर पर गैर-सरकारी सगंठनों, अध्यापकों, महिलाओं, युवकों और बच्चों पर ध्यान केंद्रित करता है । वन्यजीवन और जैव-विविधता संबंधी प्रश्न भी इसके कार्यक्रमों में शामिल होते हैं । यह बड़े पैमाने पर प्रकाशन कार्य भी करता है ।

Institution # 5. पर्यावरण शिक्षा केंद्र (Centre for Environment Education), अहमदाबाद:

इसका आरंभ 1989 में हुआ । पर्यावरण पर इसके कार्यक्रमों का दायरा बहुत बड़ा है और यह अनेक प्रकार की शिक्षा-सामग्री तैयार करता है । इसके पर्यावरण शिक्षा प्रशिक्षण (टी ई ई) कार्यक्रम ने अनेक पर्यावरण-शिक्षकों को प्रशिक्षित किया है ।

Institution # 6. भारती विद्यापीठ इंस्टीट्यूट आफ़ इनवायरनमेंट एजुकेशन एंड रिसर्च (Bharati Vidyapeeth Institute of Environment Education and Research), पुणे:

यह भारती विद्यापीठ अर्द्ध-विश्वविद्यालय का एक अंग है । इस संस्थान में पर्यावरण विज्ञान पर पीएच डी, स्नातकोतर और स्नातक पाठ्‌यक्रम हैं । यह सेवारत अध्यापकों के लिए पर्यावरण शिक्षा का एक प्रवर्तनकारी (innovative) डिप्लोमा (Diploma in Environment Education) भी चलाता है । यह एक व्यापक बहिर्मुखी कार्यक्रम (outreach program) चलाता है जिसके अंतर्गत यह संस्थान कोई 435 विद्यालयों के अध्यापकों को प्रशिक्षित करता है और वार्षिक पर्यावरण शिक्षा कार्यक्रम चलाता है । जैव-विविधता का संरक्षण इसके शोध संबंधी पहलू का एक प्रमुख तत्त्व है ।

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यह प्राकृतिक और वास्तुशिल्पी स्थलों के लिए कम लागत वाले व्याख्या केंद्र स्थापित करता है जो अत्यधिक स्थान-विशिष्ट (locale-specific) हैं तथा विभिन्न लक्ष्य समूहों के लिए भारी मात्रा में प्रवर्तनकारी पर्यावरण शिक्षा सामग्री तैयार करता है । इसकी बेमिसाल विशेषता यह है कि यह प्राथमिक शिक्षा से स्नातकोतर स्तर तक पर्यावरण शिक्षा का प्रबंध करता है ।

इस संस्थान द्वारा पर्यावरण शिक्षा संबंधी पर्याप्त सहायक सामग्री विकसित की गई है । इसने विद्यालयों की पाठ्यचर्या से संबंधित एक अध्यापक पुस्तिका तथा पर्यावरण पर एक अनिवार्य स्नातक पाठ्‌यक्रम के सिलसिले में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के लिए एक पाठ्यपुस्तक तैयार की है । इसके निदेशक ने भारत की जैव-विविधता पर एक सीडी-रॉम (CD-Rom) तैयार किया है ।

Institution # 7. उत्तरखंड सेवा निधि (Uttarkhand Seva Nidhi), अल्मोड़ा:

यह एक शीर्ष संगठन है जो पर्यावरण संबंधी गतिविधियों के लिए धन देकर अनेक गैर-सरकारी संगठनों की मदद करता है । अपने स्थान-विशिष्ट पर्यावरण शिक्षा कार्यपुस्तिका के उपयोग के लिए विद्यालयों के अध्यापकों को संगठित और प्रशिक्षित करना इसका मुख्य कार्यक्रम है । विद्यालयी बच्चों के प्रशिक्षण द्वारा गाँव के स्तर पर संसाधनों का निर्वहनीय उपयोग संभव बनाना इसका प्रमुख लक्ष्य है । यह पर्यावरण शिक्षा कार्यक्रम के अंतर्गत लगभग 500 विद्यालयों को समेटता है ।

Institution # 8. कल्पवृक्ष (Kalpavriksh), पुणे:

यह गैर-सरकारी संगठन पहले दिल्ली में केंद्रित था, पर अब पुणे से काम करता है और भारत के अनेक दूसरे भागों में भी सक्रिय है । कल्पवृक्ष अनेक लक्ष्यों पर काम करता है । शिक्षा और चेतना, अन्वेषण और अनुसंधान, सीधी कार्रवाई और प्रचार, पर्यावरण और विकास के सवालों पर मुकदमेबाजी, विद्यालयों और महाविद्यालयों में वार्ताएँ और दृश्य-श्रव्य कार्यक्रम, प्रकृति-भ्रमण और शिविरों का आयोजन, सड़कों पर प्रदर्शन समेत जारी अभियानों में छात्रों की भागीदारी की व्यवस्था, खाद्य पदार्थों के बारे में उपभोक्ताओं में चेतना जगाना, प्रेस वक्तव्य, हरित चेतावनी और नगरों के प्रशासकों से मुलाकातें इसके कार्यों में शामिल हैं ।

यह विद्यालयों के अध्यापकों के लिए स्थल-विशिष्ट (site-specific) पर्यावरण हस्तपुस्तिकाओं की तैयारी में रत है । कल्पवृक्ष उन संगठनों में से एक है जो 2003 में भारत की राष्ट्रीय जैव-विविधता रणनीति और कार्रवाई योजना के विकास में शामिल थे ।

Institution # 9. सलीम अली सेंटर फ़ार आर्निथोलॉजी एंड नेचुरल हिस्टरी (The Salim Ali Centre for Ornithology and Natural History), कोयम्बटूर:

यह सलीम अली का सपना था जो उनके निधन के बाद साकार हुआ । वे संरक्षण-प्रेमी वैज्ञानिकों के एक प्रतिबद्ध समूह को स्थायी आधार पर सहायता देना चाहते थे । आरंभ में इसकी परिकल्पना बांबे नेचुरल हिस्टरी सोसायटी की एक शाखा के रूप में की गई थी । आगे चलकर 1990 में यह कोयम्बटूर में केंद्रित एक स्वतंत्र संस्था बन गई । इसने अनेक क्षेत्र-आधारित कार्यक्रम चलाए हैं जिन्होंने हमारी संकटग्रस्त जैव-विविधता के बारे में देश में ज्ञान का प्रसार किया है ।

Institution # 10. वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट आफ़ इंडिया (The Wildlife Institute of India), देहरादून:

इस संस्थान की स्थापना 1982 में हुई थी । यह वन अधिकारियों को प्रशिक्षण देता है और वन्यजीवन प्रबंध संबधी अनुसंधान कार्य करता है । प्लानिंग ए वाइल्डलाइफ प्रोटेक्टेड एरिया नेटवर्क फ़ार इंडिया (रोजर्स एंड पँवार, 1988) इसका सबसे महत्त्वपूर्ण प्रकाशन है ।

पिछले कई वर्षों से यह संगठन भारत की जैविक संपदा संबंधी जानकारियाँ जुटाता रहा है और बड़ी संख्या में वन विभाग के अधिकारियों और कार्मिकों को वन्यजीवन प्रबंधकों के रूप में प्रशिक्षण दे रहा है । इसके स्नात्तकोतर पाठ्यक्रम ने वन्यजीवन के उत्तम वैज्ञानिक तैयार किए हैं । इसके पास एक पर्यावरण प्रभाव आकलन प्रकोष्ठ (Environment Impact Assessment Cell) भी है । यह वन विभाग के कर्मियों को संबंधित प्रशिक्षण देता है ।

Institution # 11. बॉटनिकल सर्वे आफ़ इंडिया (The Botanical Survey of India):

इसकी स्थापना रॉयल बॉटनिकल गार्डेन, कोलकाता में 1890 में हुई थी । लेकिन 1939 के बाद यह अनेक वर्षों तक बंद रहा और 1954 में फिर से इसकी शुरुआत हुई । इसका पुनर्गठन करने और इसके उद्‌देश्यों को निरूपित करने के लिए 1952 में योजनाएँ बनाई गई थीं ।

1955 तक कोलकाला इसका मुख्यालय बन चुका था और इसके मंडल कार्यालय कोयम्बटूर, शिलांग, पुणे और देहरादून में थे । 1962 और 1979 के बीच इलाहाबाद, जोधपुर, पोर्ट ब्लेयर, इटानगर और गैंगटाक में इसके कार्यालय खुल चुके थे । आज इसके नौ क्षेत्रीय केंद्र हैं । यह विभिन्न क्षेत्रों में वनस्पति संसाधनों का सर्वेक्षण करता है ।

Institution # 12. जूलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया (Zoological Survey of India):

इसकी स्थापना 1916 में हुई थी । इसका कार्य भारत के प्राणिजगत का सुव्यवस्थित सर्वेक्षण करना है । कालक्रम में इसने ‘प्रजातियों के नमूने’ जमा किए जिनके आधार पर वर्षों से हमारे यहाँ प्राणिजीवन का अध्ययन किया जाता रहा है । इसका काम 1875 में स्थापित भारतीय संग्रहालय, कोलकाता में जमा इन नमूनों से आरंभ हुआ ।

1814 और 1875 के बीच एशियाटिक सोसायटी आफ बंगाल में संग्रहीत नमूने तथा 1875 और 1816 के बीच भारतीय संग्रहालय में संग्रहीत नमूने फिर इस संगठन को सौंप दिए गए । आज यहाँ दस लाख से अधिक संग्रहीत नमूने हैं । इसी वजह से यह एशिया में उपलब्ध प्रजातियों के नमूनों का सबसे बड़ा खजाना है । इसने वर्गिकी (taxonomy) और पारिस्थितिकी पर बहुत काम किया है । आज इस संगठन के 16 क्षेत्रीय केंद्र हैं ।

Institution # 13. मद्रास क्रोकोडाइल बैंक ट्रस्ट (The Madras Crocodile Bank Trust):

यह एशिया का पहला संरक्षित मगरमच्छ प्रजनन केंद्र है जिसे भारतीय मगरमच्छों के संरक्षण के लिए तथा संकटग्रस्त सरीसृपों की दूसरी प्रजातियों के संरक्षण और वंशवृद्धि के कार्यक्रम शुरू करने के लिए 1976 में स्थापित किया गया । पिछले कई वर्षों में विभिन्न राज्यों के वन विभागों को 1500 से अधिक मगरमच्छ तथा इस जंतु के कई सौ अंडे दिए जा चुके हैं । इसका उद्‌देश्य भारत के दूसरे राज्यों और पड़ोसी देशों में इस जीव की वंशवृद्धि के कार्यक्रम चलाना और प्रजनन केंद्र स्थापित करना है ।

इस ट्रस्ट ने भारत में समुद्री कछुओं के सर्वेक्षण और संरक्षण का पहला कार्यक्रम शुरू किया है जिसमें एक प्रजनन केंद्र स्थापित करना भी शामिल है । ग्रामों और विद्यालयों के लिए यह एक पर्यावरण शिक्षा कार्यक्रम चला रहा है । इसके अंतर्गत प्रकृति-शिविर लगाना तथा अध्यापकों, युवा मछुआरों और संसाधन व्यक्तियों के लिए प्रशिक्षण कार्यशालाएँ आयोजित करना शामिल है ।

1992 में अंडमान एंड निकोबार इनवायरनमेंट टीम (एएनईटी) का गठन किया गया जो उपरोक्त ट्रस्ट का एक प्रभाग है । इन द्वीपों में सरीसृपविज्ञानी और अन्य पारिस्थितिकी अध्ययनों के लिए हैरी एंड्रयूज़ (दक्षिणी अंडमान) में एक आधार कार्य केंद्र बनाया गया । क्रोकोडाइल बैंक में इरूला स्नेक कैचर्स कोआपरेटिव सोसायटी भी है ।

यह एक आदिवासी आत्मसहायक परियोजना है तथा विषमारक दवाओं के उत्पादन और चिकित्सकीय उपयोग के लिए भारत के साँपों और बिच्छुओं का जितना जहर जरूरी होता है, उसकी यह आपूर्ति करती है । ट्रस्ट के कार्मिकों ने इरूला आदिवासी महिला कल्याण समाज का भी गठन किया है जिसका मुख्य उद्‌देश्य: बंजर जमीनों पर जंगल लगाना और इरूला महिलाओं के लिए आय का सृजन करना है ।


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