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विज्ञान की सीमाएं पर अनुच्छेद | Limitation of Science in Hindi Language

विस्तार बिंदु:

1. प्रस्तावना ।

2. विश्व बंधुत्व के अंतर्गत ।

3. बिज्ञान व धर्म की मध्यस्थता ।

4. नि:शस्त्रीकरण ।

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5. संयुक्त राष्ट्र की महत्वपूर्ण भूमिका ।

6. उपसंहार ।

अपनी उत्पत्ति के बाद से मानव ने अपने विकास के लिए नित नए प्रयोग किए हैं और उसमें अपेक्षित सफलताएं भी हासिल की हैं । वैज्ञानिकता के विकास के बाद मानव में अनेक प्रकार की विसंगतियां भी आ गई हैं ।

अब मानव ने विज्ञान के सहारे मानव के विनाश के लिए ही अनेक शस्त्रास्त्र विकसित कर लिए हैं । अर्थ को विशिष्टता और सामाजिक श्रेष्ठता प्रदान कर मनुष्यत्व के लिए खतरा उत्पन्न कर दिया गया है, क्योंकि आज प्रत्येक मनुष्य कम से कम समय में अधिक से अधिक अर्थोपार्जन की सोचने लगा है ।

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तीव्र विकास की अंधी भेड़चाल में विज्ञान का भी नकारात्मक प्रयोग किया जाने लगा है । इस कारण यह तथ्य सोचनीय हो गया है कि विज्ञान की क्या सीमाएं हैं ? और क्या होनी चाहिए ? ऐसा इसलिए कि ऐसा नहीं होने पर विज्ञान की उत्पत्ति जिस उद्देश्य से हुई है, कहीं उसी की समाप्ति न हो जाए !

महान वैज्ञानिक आइंस्टीन से किसी ने पूछा था कि तीसरा विश्व युद्ध कब होगा ? तब उन्होंने जवाब दिया था, तीसरे विश्व युद्ध के बारे में तो मैं कुछ नहीं कह सकता, पर चौथे विश्व युद्ध के बारे में बता सकता हूं । कारण, चौथे विश्व युद्ध के लिए कोई इस दुनिया में जिंदा रहेगा ही नहीं ।”

उनके कहने का तात्पर्य यह था कि वर्तमान समय में विश्व अणु व परमाणु बम के जखीरे पर बैठा हुआ है । इस बम की मात्र एक चिंगारी के शिकार जापान के प्रसिद्ध शहर हिरोशिमा व नागासाकी आज भी अपने आपको उस हादसे से उबार नहीं पाये हैं और उसके दुष्परिणामों को झेलने के लिए आज तक विवश हैं ।

मानव आज प्रस्तर युग व बैलगाड़ी युग से चलकर अंतरिक्ष युग में पहुंच गया है व अपनी सफलता तथा चारों तरफ विज्ञान के चकाचौंध से फूला नहीं समा रहा है । ज्वलंत प्रश्न यह है कि क्या आज विज्ञान को सीमा के अंतर्गत बांधा नहीं जा सकता ? ”सबै दिन जात न एक समान” के अनुसार मनुष्य आज उस ऊंचाई पर पहुंच चुका है कि वहां से पीछे मुडकर देखना उसके वश की बात नहीं रह गई है ।

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हां, एक काम वह कर सकता है: ”अति सर्वत्र वर्जयेत” के अनुसार वह अपने कदमों को आत्म-नियंत्रित अवश्य कर सकता है ताकि सीमा के बाहर जाकर वह खुद अपने ही बुने मक्कड़ जाल में मकड़ी की तरह फंस न जाए ।

आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है । जिस दिन विज्ञान के आविष्कार को सीमा के अंतर्गत बांध दिया जायेगा, उसी दिन विज्ञान की प्रगति के द्वार बंद हो जायेंगे । हालांकि संतोष एक अच्छा गुण है पर वैज्ञानिक प्रतियोगिता के क्षेत्र में असंतोष एक परम श्रेष्ठ गुण है, क्योंकि यही असंतोष एक दिन मानव को वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ उसे विश्व के वैज्ञानिकों के बीच ला खड़ा कर देता है ।

भारत विज्ञान के इस प्रगतिशील दौर में सभी सीमाओं को तोड़कर दिन-दूनी रात चौगुनी प्रगति कर रहा है । यहां 14 लाख से अधिक प्रशिक्षित वैज्ञानिक विज्ञान की सेवा में रत है और न केवल चिकित्सा, कृषि, प्रतिरक्षा, उद्योग, इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग, ईंधन, ऊर्जा तथा धातु एवं तेल क्षेत्र में अनुसंधान हो रहे हैं एवं इनके लिए प्रयोगशालाएं दिन-रात नये-नये प्रयोग कर रही हैं, अपितु अंतरिक्ष विज्ञान में भी विश्व प्रगति पथ पर पांव चढ़ा चुका है ।

आज अंतरिक्ष मनुष्य का चौथा पर्यावरण माना जाता है । पहले अन्य तीन पर्यावरण हैं, पृथ्वी, महासागर एवं हवा और इन तीनों का भरपूर उपयोग पहले ही हो रहा है । इस संदर्भ में, अंतरिक्ष को प्राकृतिक संसाधन माना जा सकता है जिसके लाभ या उपलब्धियां अभी मिलनी बाकी हैं ।

अंतरिक्ष-युग का आरंभ 1957 में स्पूतनिक-1 के प्रमोचन से शुरू हुआ था । हाल ही के वर्षों में अंतरिक्ष में स्थापित किये गये उपग्रह जो आज मानव सेवा में रत है, इस बात के प्रमाण है । इससे पहले कभी भी हमारे पास मोसम के बारे में इतना विस्तृत ज्ञान नहीं था कि हम तूफान के केंद्र की स्थिति अथवा चक्रवात की प्रगति का पता लगा सकते ।

जैव-प्रौद्योगिकी एवं आनुवांशिकी के क्षेत्र में आज ‘क्लोनिंग’ बहुत चर्चा में है । क्लोन एक ऑरगेनिज्म है, जो एकमात्र जनक के गैर-लौंगिक विधि से उत्पादित होता है । क्लोन अपने जनक से भौतिक एवं आनुवांशिक रूप से बिल्कुल समान होता है । क्तोनिंग में न्यूक्लियर ट्रांसप्लांटेशन तकनीक द्वारा केंद्ररहित डिम्ब में समाविष्ट करके समरूप क्लोंस प्राप्त किये जाते हैं ।

कृषि और बागवानी के क्षेत्र में तो क्लोनिंग की प्रक्रिया प्राचीन काल से ही अपनायी जा रही है, पर जंतुओं के निर्माण में क्लोनिंग की खोज पिछले कुछ वर्षों से चर्चा में है । इधर मानव क्लोन की बात भी की जा रही है जिसका कई धार्मिक संगठनों ने भारी विरोध किया है ।

क्या यह सब प्रगति व विकास विज्ञान की सीमा रेखा के सीमित क्षेत्र के अंतर्गत किया जा सकता है ? कदापि नहीं । आज के कम्प्यूटर युग में बढ़ चुके मानव के कदम के परिणामस्वरूप दूरसंचार के अंतर्गत प्रदानित सुविधा फैक्स, इंटरनेट, वेब व सेल्लुयर फोन ने पूरे विश्व को एक घर में तथा मुट्ठी के अंतर्गत बांध रखा है ।

ज्वलंत प्रश्न यह है कि विज्ञान को सीमाओं के घेरे में कैसे में बांधा जा सकता है ? इसके लिए अग्रलिखित ये उपाय किये जा सकते हैं-धर्म व विज्ञान को एक-दूसरे का पूरक बनाकर विज्ञान की सीमाएं निर्धारित की जा सकती हैं ।

धर्म व विज्ञान के द्वारा मानव का उत्थान किया जा सकता है । जहां धर्म ने एक तरफ मानव की मानसिक एवं आत्मिक उन्नति को प्रशस्त किया है वहीं दूसरी तरफ विज्ञान ने मानव का बाह्य विकास भौतिक साधन के रूप में किया है ।

विज्ञान का वास्तविक प्रयोग हम मानव के विकास व विध्वंस दोनों रूप में करते जा रहे हैं । विश्व के बड़े-बड़े देश विज्ञान के बढ़ते चरण के परिणामस्वरूप छोटे-छोटे देशों को अपने बाहुपाश में जकड़ने का हर सम्भव प्रयास करते जा रहे हैं ।

एक व्यक्ति को, एक गांव को, एक शहर को नष्ट करने के लिए आज 100 करोड़ रुपए की लागत से लड़ाकू विमान, जैसे-मिग, मिराज, कैनबरा, जैगुआर, आदि बनाये जा रहे हैं और अंतरिक्ष में पहुंचने की होड़ में अरब-खरब रुपये स्वाहा किये जा रहे हैं, वहीं मानव मात्र के विकास हेतु उसके 10% के बराबर भी कदम नहीं उठाए जा रहे हैं ।

धर्म ने मानव हृदय का परिष्कार किया और विज्ञान ने बुद्धि का । आज मनुष्य को भौतिक सुख-शांति की जितनी आवश्यकता है उससे भी अधिक मानसिक सुख शांति की । मनुष्य कितना ही धनवान हो जाए, कितना ही ऐश्वर्य सम्पन्न हो जाए परंतु मानसिक शांति के लिए भटकता देखा गया है ।

स्थायी रूप से मानव को सुख-शांति तभी प्राप्त हो सकती है यदि वर्तमान समय में विज्ञान को मानवीय धरातल पर धर्म की चचेरी नहीं बल्कि सगी बहन के रूप में महत्व दिया जाए तभी विज्ञान अपनी सीमा को पहचान पायेगा । राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर की निम्नलिखित पंक्तियों के अनुरूप विज्ञान को अपनी सीमा के अंतर्गत आगे बढ़ना होगा, चिर भविष्य में कठोर कदम उठाने होंगे:

व्योम से पाताल तक सब कुछ उसे है ज्ञेय,

पर, न यह परिचय मनुज का, यह न एक श्रेय ।

श्रेय उसका, बुद्धि पर चैतन्य उर की जीत,

श्रेय, मानव की असीमित मानवों से प्रीत ।

एक नर से दूसरे के बीच का व्यवधान,

तोड़ दे जो बस, वही ज्ञानी, वही विद्वान ।

हृदय और मस्तिष्क का समन्वय ही विज्ञान को उसकी सीमा में रहने के लिए बाध्य कर सकता है । हृदय अर्थात् कविता अर्थात् मानवीय संवेदना को बढ़ावा देना होगा तथा मस्तिष्क अर्थात् विज्ञान को नियंत्रित दिशा प्रदान करनी होगी । जिस प्रकार स्त्री व पुरुष गृहस्थ जीवन के दो पहिये कहे जाते हैं, उसी प्रकार मानव जीवन की उन्नति के लिए कविता व विज्ञान दो पहिए हैं ।

कविता का तात्पर्य है आत्मानुभूति की अभिव्यक्ति । कविता का मर्म समझने वाला व्यक्ति कभी भी विज्ञान का नकारात्मक प्रयोग नहीं कर सकता और मानव की भलाई के लिए कुछ भी करने में भी वह किसी प्रकार का संकोच नहीं कर सकता । विश्व कल्याण के लिए यह नितांत आवश्यक है कि विज्ञान और कविता में सामंजस्य स्थापित हो तथा दोनों एक-दूसरे के सहचर रूप में रहकर आगे बढ़ते जायें ।

निःशस्त्रीकरण के द्वारा विज्ञान की सीमा के अंतर्गत पूरे विश्व को एक मंच पर लाया जा सकता है, जैसे-रासायनिक हथियार, जैविक हथियार, न्यूट्रान बम, हाइड्रोजन बम आदि को पूर्णतया नष्ट करना होगा तभी जाकर हम सुख-शांति के आधार पर स्थायी रूप से टिक सकते हैं, अन्यथा बम के ढेर पर बैठा यह सम्पूर्ण विश्व कब स्वाहा हो जायेगा, बताया नहीं जा सकता ।

इसके लिए विश्व की महान शक्तियों के रूप में स्थापित हो चुके चीन, अमेरिका, रूस, जापान, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी व भारत को आगे आना होगा । संयुक्त राष्ट्र संघ को इस संबंध में किसी प्रकार के भेदभाव से रहित नीति को अपनाते हुए मानव कल्याण के लिए ही सदैव तत्पर रहते हुए विश्व के वैज्ञानिकों को विज्ञान की सीमा के अंतर्गत कार्य करने के लिए आवश्यकतानुरूप बाध्य भी करना होगा और इस कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने हेतु कोई कसर नहीं छोड़नी होगी तभी जाकर एक नये विश्व का पुनर्जन्म हो सकता है एवं विज्ञान व वैज्ञानिकता का असली रूप सामने लाया जा सकता है ।

उदाहरणस्वरूप, आज वैज्ञानिक उन्नति के चलते भ्रूण परीक्षण की तकनीक विकसित हो जाने से नारी जाति के ऊपर असीम अत्याचार बढ़ता जा रहा है । दुनिया में आने से पहले ही उसकी हत्या की जा रही है । इसके साथ ही साथ परमाणु आयुधों के विध्वंसकारी परीक्षणों ने आज समस्त विश्व को भयभीत कर रखा है । इस सम्बंध में तन, मन व धन से संयुक्त राष्ट्र संघ को एक पल भी नष्ट किए बिना आगे आना ही होगा ताकि विज्ञान की सीमाएं निर्धारित की जा सकें ।

अंतत: हम कह सकते हैं कि विज्ञान को उसकी सीमा के अंतर्गत रखकर कार्य करने के लिए जिस दिन हम बाध्य कर देंगे ताकि पूरी मानव जाति का विकास हो सके उसी दिन से विज्ञान व वैज्ञानिकों, मनुष्य व मनुष्यता का वास्तविक विकास हो सकेगा और संपूर्ण वैश्विक पर्यावरण में हम स्वच्छंद रूप से विचरण कर सकेंगे ।

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