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व्यापार एवं तकनीक । Business and Technology in Hindi Language

आज वैज्ञानिक एवं तकनीकी अनुसंधान के क्षेत्र में रोज आश्चर्यजनक उपलब्धियाँ सामने आ रही हैं और यदि इन अनुसंधानों के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखा जाए, तो ये मानवमात्र की निमित्त उपलब्धियाँ हैं ।

परंतु इन्हें राजनीतिक शक्तियों ने भौगोलिक सीमा में बांधकर परिसंपत्ति बना लिया है । परंतु विकसित देश दुर्भाग्यवश आज विकासशील देशों के निमित्त ‘उपहार’ या ‘दण्ड’ के रूप में कार्य करते हैं ।

अपनी इन उपलब्धियों की चकाचौंध देखकर विकसित देश अविकसित देशों की प्रभुसत्ता स्वतंत्रता एवं सांस्कृतिक पहचान तक के साथ खिलवाड़ करने से नहीं चूकते । बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जो विश्वस्तर पर वाणिज्यिक-तकनीकी उपनिवेशवाद की होड़ लगी थी वह होड़ सोवियत संघ के विघटन के बाद और भी तेज हुई है ।

इससे पहले अमेरिका और सोवियत संघ की आपसी प्रतिस्पर्धा की वजह से किसी ने किसी रूप में संतुलन बना रहता था, जिसका चरित्र उपनिवेशवादी होते हुए भी बहुत शोषक नहीं था । तकनीकी विकास की वजह से वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन में कई गुना वृद्धि हुई है और इस वृद्धि की वजह से व्यापारिक गतिविधियाँ कई गुना बढ़ गई है ।

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उत्पादक देश नव-स्वतंत्र या विकासशील देशों को एक बड़े ‘बाजार’ के रूप में देखते हैं, जिन्हें अब सामरिक शक्ति के बल पर जीतने के बदले वे अपने प्रभाव के बल पर जीतना पसंद करते हैं: चाहे वह ‘खुले व्यापार’ के नाम पर हो या ‘तकनीकी सहयोग’ अथवा ‘पेटेंट’ के नाम पर हो ।

अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण ने किसी न किसी रूप में विकासशील देशों अथवा विकसित देशों को अपनी सप्रभु स्थिति से समझौता करने को बाध्य कर दिया है: चाहे वह उनकी विदेश-नीति का मामला हो आर्थिक नीतियाँ हों इससे उनकी राजनीतिक एवं सामाजिक नीतियाँ भी प्रभावित होने लगी हैं ।

यदि कोई देश इस वैश्वीकरण की परिधि से बाहर रहने की कोशिश करता है, तो वह ‘अविकसित’ या ‘पिछड़ा’ बने रहने के लिए अभिशप्त हो जाता है । अमेरिका इस व्यापारिक उपनिवेशवाद का सबसे बढ़ा प्रायोजक है और उसके साथ कई अन्य विकसित देश भी हैं । इन देशों का समूह विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, जैसी संस्थाओं में बहुत हावी है ।

जिस तरह से विकसित देशों ने ‘संयुक्त राष्ट्रसंघ’ के मंच का प्रयोग अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए किया है या उसे सर्वदा उपेक्षित रखा है, उसी तरह से ‘विश्व व्यापार संगठन’ के प्रयोग को विकसित देशों ने वैकल्पिक उपाय के रूप में रखा है ।

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जब अमेरिका के ‘पेटेंट’ संबंधी अधिकारों का हनन होगा तब तो वह ‘विश्व व्यापार संगठन’ का सहारा लेगा परंतु यदि उसका व्यापार-संतुलन बिगड़ेगा तब वह गैर-तटकर बाधाएँ खड़ी करके अपने बाजारों को सुरक्षित रखेगा । भारत ही नहीं जापान जैसे विकसित देशों के साथ भी पिछले दिनों अमेरिका का जैसा रवैया रहा है उससे भी यही बात जाहिर हुई है कि ‘विश्व व्यापार संगठन’ अपने जन्म के साथ ही अप्रभावी हो गया है और उसका प्रयोग ऐच्छिक बनकर रह गया है ।

परमाणु-शक्ति भी एक मौद्रिक शक्ति के रूप में इस्तेमाल की जा रही है । इतना ही नहीं पांच पुरोधा देश इसे अपनी पैतृक संपत्ति समझने का दावा भी करते हैं और परमाणु-परिसीमन संधि पर विश्व के लगभग सभी सक्रिय देशों से उन्होंने अपने इस अधिकार पत्र पर हस्ताक्षर भी करवा लिए हैं ।

जाहिर है जब अमेरिका से लेकर एक मंदबुद्धि बालक तक यह समझ रहा है कि परमाणु शस्त्रास्त्रों से कोई लड़ाई जीती नहीं जा सकती बस मानवता का अंत किया जा सकता है तब उसे ‘सुरक्षा के साधन’ के रूप में कैसे प्रयोग किया जाएगा ?

जाहिर है उद्‌देश्य सुरक्षा आदि का नहीं है, असली उद्‌देश्य प्रभुत्व-स्थापन में उसका हर संभव प्रयोग करना है । अमेरिका की आणविक शक्ति से सारा विश्व खुद आतंकित है और वह अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग देशों की आणविक क्षमता से पड़ोसी देशों को ‘सतर्क’ करते हुए उन्हें अपना अभिभावकत्व प्रदान करने की पेशकश करता है ।

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इस नव-साम्राज्यवाद के इसी तरह के अन्य तरीके भी हैं । ‘मिसाइल तकनीकी नियंत्रण प्रणाली’ के उल्लंघन के नाम पर अमेरिका हमारे अंतरिक्ष अनुसंधान को बाधित करना चाहता है चाहे वह प्रत्यक्ष प्रतिबंधों की धमकी देकर करे या रूस पर क्रायोजेनिक तकनीक न देने के लिए दबाव जैसे साधनों का प्रयोग करे ।

इस पूरे संदर्भ का एक चिंतनीय पहलू यह भी है कि एक ओर हम अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण के नाम पर ‘विश्व व्यापार सगठन’ जैसी संस्था का निर्माण कर रहे हैं और दूसरी ओर अनेक क्षेत्रीय गुटों: ‘नाफ्टा’, ‘यूरोपीय संघ’, ‘ओपेक’, ‘आसियान’, ‘ए.सी.एस.’, ‘कोमेसी’, ‘साप्टा’ आदि के निर्माण में भी जुटे हैं ।

यदि ये क्षेत्रीय गुट परिसंघीय व्यवस्था की तरह काम करते तो ठीक था । परंतु ऐसा नहीं है । ये ‘विश्व व्यापार संगठन’ और उसके साथ-साथ अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण की सफलता की दिशा में अवरोधक ही बनेंगे ।

अंत में रही बात इस नव-साम्राज्यवाद के शिकंजे से मुक्ति की तो इसके लिए भी वही पुराना रास्ता उपयुक्त है । सारे प्रभावित देश आपसी एकता दिखाए अपने घरेलू विकास को प्राथमिकता दें, तो यह नया साम्राज्यवाद भी घुटने टेकेगा ही, इसमें कोई संदेह नहीं ।

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