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सांस्कृतिक साम्राज्यवाद: मिथक और यथार्थ । Article on Cultural Imperialism in Hindi Language

परमेश्वर ने मनुष्य को प्रतिभा से समन्वित जीव बनाया है, ताकि वह रबयै को अन्य जीवों की अपेक्षा बेहतर स्थिति में रख सके । मानव भी ईश्वर की अपेक्षा पर खरा उतरा है एवं उसने प्राकृतिक कष्टों को तो दूर किया ही है साथ ही अपनी सभ्यता और संस्कृति को भी विकास के लिए आयाम दिए हैं ।

कोई देश कितना विशिष्ट एवं शक्तिशाली है यह उसके अधिकार-क्षेत्र के पैमाने द्वारा नापा जाता है । इसके पश्चात आर्थिक साम्राज्यवाद आया जिसके अंतर्गत शासित देश की जनता एवं उसके संसाधनों का शासक देश अपने हित में इस्तेमाल करने लगे ।

इस अवस्था में इन आक्रांत देशों ने एक नई चाल चली और यह बताया कि उनका धर्म रीति-रिवाज जीवन स्तर इन शासितों की अपेक्षा श्रेष्ठ है और परम नियंता ने उन्हें उन पर राज करने और उनका उद्धार करने के लिए इस पृथ्वी पर भेजा है । वस्तुत: कोई भी संस्कृति उच्च या निम्न नहीं होती ।

संस्कृति एक क्षेत्र विशेष में रह रहे लोगों की विचारधारा रीति-रिवाज पर्व-त्योहार एवं धार्मिकता का संश्लिष्ट रूप होती है । क्षेत्र विशेष की संस्कृति तरुरिस्थितियों में रह रहे लोगों की संवेदनाओं का प्रतिरूप होती है और प्रत्येक संस्कृति के साथ यह सत्य है ।

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कोई भी संस्कृति एकांतता में नहीं जीती बल्कि परस्पर अभिव्यक्ति के माध्यम से पोषित होती है । सत्य भी है कि मानव जीवन में विविधताओं का अपना महत्व है और इसके कारण जीवन सुखमय ही होता है । इस स्तर पर सांस्कृतिक-विभेद बिच्छल अवांछनीय है परंतु जब किसी देश की जनता शासित हो रही हो तो उसके पास सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का कोई सशक्त माध्यम नहीं होता ।

इस स्थिति में एक प्रभावी संस्कृति और दूसरी प्रभावित संस्कृति का स्तर उत्पन्न होता है । शासित लोगों को मानसिक एवं शारीरिक स्तर पर दास बना लिया जाता है । तात्पर्य यह है कि ‘साम्राज्यवाद’ एक न समाप्त होने वाली घटना है, जो राजनीतिक-आर्थिक रूपों में प्रकट होकर अब सांस्कृतिक क्षेत्र में भी परिलक्षित होने लगी है ।

समस्त विश्व संचार क्रांति के नए उपकरणों-रेडियो, टेलीविजन, प्रिंट मीडिया से अब एक ‘विश्व ग्राम’ की अवधारणा में सिमट गया है । विज्ञान के इन आविष्कारों से सूवना संसार व्यापक हुआ है । विश्व के अधिकांश जन-समूह इनका प्रयोग व्यापक स्तर पर कर रहे हैं । विश्व के प्रत्येक सुदूर क्षेत्र में स्थित व्यक्ति भी इनका प्रयोग कर रहा है ।

ऐसी स्थिति में विकसित देशों: अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस आदि द्वारा जब किसी उत्पाद का विज्ञापन किया जाता है, तो पूर्व दासता का शिकार मस्तिष्क इन्हें अपनाने के लिए लालायित हो जाता है । इलैक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के साधनों द्वारा विदेशी संस्कृति का प्रचार-प्रसार इस प्रकार किया जाता है कि उसमें कुछ भी असहज न लगे ।

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इस क्रम में पहनने-ओढ़ने से लेकर खान-पान, बोलचाल, रहन-सहन के तौर-तरीकों पर व्यापक असर पड़ता है और अब तो अंतर्वस्त्रों के चयन में भी ये विज्ञापन अपना असर दिखाने लगे हैं । धीरे-धीरे इस प्रवृत्ति ने अपना स्थायी आधार बना लिया है और सामाजिक मूल्यों के विघटन में प्रभावकारी भूमिका का निर्वाह करना प्रारंभ कर दिया है ।

निजी चैनलों और प्रिंट मीडिया ने परिवार में वैयक्तिकता को प्रश्रय देना प्रारंभ किया है, जिससे संयुक्त परिवार की धारणा खंडित हो चली है । भाग-दौड़ की इस दुनिया में मानव केवल अपने लिए जीने लगा है । साथ ही इनके माध्यम से उपभोक्तावादी संस्कृति को चकाचौंध किया जाता है, जिससे अभिभूत हो लोग अंधानुकरण करने को बाध्य हों ।

सिनेमा और धारावाहिकों में भी पाश्चात्य सभ्यता के ही विभिन्न पहलुओं पर जोर दिया जा रहा है । पश्चिमी मूल्यों को जो मान रहा है, वह आधुनिक है और जो ऐसा नहीं कर रहे, वह कूपमंडूक संस्कृति को मानने वाले हैं: ऐसा विश्वास दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है । भारत पर भी अंग्रेजों का शासन रहा है ।

अब जब भारत उनके राजनीतिक-आर्थिक उपनिवेशवाद से निकलकर चैन की साँस ले रहा है, तो इस पर अपनी सांस्कृतिक दासता लादने का उपक्रम जोरों पर है । सच भी है कि इस तकनीकी युग में यह संभव नहीं है कि बाहरी दुनिया में हो रहे परिवर्तनों के प्रति आप अपने देश को अप्रभावित रख सकें ।

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बाहरी हवा तो आएगी ही, हमें अपने सामाजिक-संस्थाओं तथा मूल्यों की इमारत को सुदृढ़ रखना होगा, ताकि ये हवाएँ उसे विखंडित न कर सकें । महात्मा गांधी ने भी कहा था कि: ”मस्तिष्क की खिड़कियों, सदैव खुली रहनी चाहिए ताकि ज्ञान का अबाध आवागमन जारी रह सके ।” इसी प्रकार, सांस्कृतिक स्तर पर भी हो रहे परिवर्तनों को सहज रूप में लेना चाहिए ।

तभी सांस्कृतिक आदान-प्रदान की प्रक्रिया सहज और प्राकृतिक हो सकेगी और विश्व के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चल सकेंगे । अब भारतीय सभ्यता और संस्कृति के प्रति अमेरिका जैसी विकसित सभ्यता दिलचस्पी ले रही है । भारतीय वस्त्र और रीति-रिवाजों को वहा अपनाया जा रहा है । लोग भारतीय दर्शन के प्रति आकर्षित हो रहे हैं ।

भारत में भी जो पाश्चात्य मूल्यों से प्रभावित हो चले थे, उन्होंने भी अब पुन: भारतीय जीवन-मूल्यों में आस्था प्रकट करनी प्रारंभ कर दी है । वैवाहिक अनुष्ठान वैदिक रीति-रिवाजों के अनुसार किए जा रहे हैं । इसके अतिरिक्त भारतीय सभ्यता और संस्कृति में जो अच्छे पहलू हैं, उन्हें उभारने की आवश्यकता है ।

अगर हम ऐसा कर पाए तो ‘सांस्कृतिक साम्राज्यवाद’ हमारी सामाजिक परंपराओं और मूल्यों को बदल पाने में असमर्थ होगा । वैसे भी भारतीय जनमानस इतना परिपक्व अवश्य है कि केवल खान-पान, रहन-सहन और पहनने-ओढ़ने में हुए बदलाव से विचलित नहीं होगा, क्योंकि सहस्त्रों वर्षों से उसके मस्तिष्क में भारतीयता के प्रति अखंडनीय विश्वास बरकरार है ।

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