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होली है । Holi in Hindi Language

होली का पुनीत पर्व सर्वश्रेष्ठ ऋतु बसन्त में मनाया जाता है । इस पर्व का हिन्दी कवियों ने विस्तृत वर्णन किया है । कवियों की होली जन-साधारण जैसी हुल्लड़बाजी की होली नहीं है । उन्होंने आत्माभिव्यक्ति एवं अपने युग के आहान को भी होली-कविता में व्यक्त किया है ।

अतएव हिन्दी कविता में होली का वर्णन विविध रूपों में हुआ है । जन-साधारण तो होली रंग, गुलाल, केसर, कीचड़ आदि से खेलकर अपने-अपने घर आ जाते हैं और बहुत ही हुआ तो वह होलिका की जान लेते हैं । शाम को इधर-उधर घूमने निकल जाते हैं । यह तो रही होली के ऊपरी व्यवहार की बात ।

परन्तु कवियों की होली केवल भावना का रंग लिए, भाषा रूपी पिचकारी से  पाठक-हृदय को रंग डालती है । होली में अनुराग लाल रंग हृदय पर पड़ जाता है । वस्तुत: होली का महत्व कोई साधारण नहीं वरन् असाधारण है ।  इसका अर्थ यह है कि इस दिन मानव अपनी आत्मा पर जमे कल्मष एवं द्रोह, द्वेष आदि गहन तिमिर की कालिमा को धोकर अनुराग का रग आत्मा पर चढाता है ।

यदि सब मनुष्यों का हृदय अनुराग के रंग से रंग जाए तो किसी प्रकार का कोई द्वेष-भाव नहीं रहे और मानव का जीवन नि:स्पन, शान्त ज्ञान रूपी ज्योत्सना के वातावरण में स्वस्थ और प्रफुल्लित रहे । तब मनुष्य सबको भाई-भाई समझे और ”वसुधैव कुटुम्बकम्” का महामन्त्र वास्तव में जग-जीवन में अनुभव करे । वह दृश्य कितना रमणीक, अनुपम और मनोमुग्धकारी हो, यह तो कल्पना से भी दूर की बात आज प्रतीत होती है ।

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हाँ, कविगण तो अवश्य ही इस महामन्त्र से प्रभावित हुए दीखते हैं वह भी कभी-कभी परिस्थितियों के चक्कर में पड़कर डगमगाते दृष्टिगोचर होते हैं । इतनी तो कवियों से आशा की जा सकती है कि वह एक न एक दिन अवश्य ही संसृति के कण-कण को अनुराग के रंग में  रंग देंगे और इस मर्त्य को अमर्त्य बना  देंगे ।

कवियों के भक्त वत्सल हृदय ने इस होली को बड़े पुनीत एवं सुन्दर ढंग से अपने नायक एवं नायिकाओं की आपस में होली खिलाकर व्यक्त किया है । सूर का निष्कट, निष्पाप एवं छल-रहित हृदय तभी तो गा उठता है ।

स्याम-स्यामा खेलत दोड़ होरी । फागु मच्यौं अति ब्रज की खोरी ।। यह नहीं मीरा तो गिरधर की प्रेमिका बनी हुई है । वह तो बिना  मोर-मुकुट-मुरलीधर के किसी के साथ होली नहीं खेल सकतीं विरहिणी होने के कारण यह सब होली का सुख-दु:ख में बदल जाता है ।

तब ही मीरा का विरही हृदय गा उठता है:  होली पिया बिन मोहिन भावै, घर आगण न सहावै । दीपक जोय कहा करूँ होली, पिय परदेश रहायै । सूने सेज जहर ज्याँ लागे, सुसक-सुसक जिय जावै ।।  भक्त कवयित्री प्रताप कुँवरि बाई अपने ज्ञान एव वैराग्य की उच्च भावनाओं को होली-वर्णन में व्यक्त करती है । यह निर्माण सम्प्रदाय की है ।

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इन्होंने अपने इस बैरागी हृदय को निम्न चरण में बड़े सुन्दर ढंग से प्रकट किया है । होरि या रग खेलत आओ । इड़ला प्रिग्ड.ला सुखमणि नारी ता संग खेल खिलाओ  सुरत पिचकारी चलाओ । कायो रंग जगत को छोडो, सांची रंग लगाओ । बाहर भूल कबौं मृत जावों, काया नगर बसायो ।

तब गिरभै पद पाआ । पाँयौ उलट धरै धर भीतर अनहदनाव बजाओ सब बकवाद दूर तब दीर्ज, जान गीत नित गाओ पिया के मन तब ही भायो । आपका भक्त हृदय अपने दृष्ट से ही होली खेलता है । आपका कच्चे रंग की आवश्यकता नहीं वरन् ज्ञान के गुलाल से होली खेलती है । अनायास ही कवियित्री का हृदय गा उठता है ।

होरी खेलन की रुत भारी नर-तन पाय अरे भज हरि को मास एक दिन चारी अरे अब तो चेन अनारी । ज्ञान गुलाल अबीर प्रेम करि, प्रीत मयी पिचकारी लाल उसास राम रंग भर-भर, सूरत सरीरी नारी खेल इन संग रचारी रीतिकालीन कवियों में गारिक भावना प्रेम का बहुत प्रचार हुआ ।

इनके नायक-नायिका अनेक प्रकार के हो गए तथा सामान्य जन भी नायक-नायिका हो गए । इनके श्रुंगार में मौरूल प्रेम की झलक अधिकांश में देखने को मिलती है । अधिक-तर इस काल के कवियां के लिए किसी वस्तु का वर्णन करना हो तो  किस-किस वस्तु की आवश्यकता होगी, उस सब सामग्री को इकट्‌ठा कर कविता होने लगी थी ।

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इस काल में कवि बस इतना ही जानते थे कि राजा को प्रसन्न कर अच्छा इनाम पाएं । अनेक कवियों ने इस उक्ति को कि कवि पैदा होता , बनाया नही जाता को गलत करने का बीड़ा उठा लिया था । इसका कारण यह था कि उन्होंने संस्कृत के एक ग्रन्थ ”कवि कपट्रिका” को कण्ठस्य कर लिया था ।

इस ग्रन्थकार की प्रतिज्ञा है कि:  यत्नादिमां कण्ठगतां विधाय, श्रुतोपदेशात् विदितोपदेश: । अज्ञात शब्दार्थ विनिश्चयोजयि; श्लोक करोत्येव समासु शीघ्रम ।। इतना होने पर भी कुछ एक कवि ऐसे थे जिन्होंने स्वतन्त्र रूप से प्रत्येक वस्तु का अवलोकन किया । ये तो वह रसिक ही परन्तु उनका प्रेम सात्विक एवं सच्चा  था ।

महाकवि देश ने प्रकृति का स्वतन्त्र अवलोकन किया और वह प्रकृति में इतने रमे रहने कि फाग का रूपक में बाँध दिया था:  सीतल, मन्द, सुगन्ध खलावनि पौन हुलावति कौन लयी है ।  नील गुलार्वान कोल फुलावनि जोन कुलावनि प्रेम पची है ।  मालती, मल्लि, मलेज, लबगनि, सेवती संग समूह सची  देव सुहागिन आजु के भागिन देखरी, वर्गान फागुमयी है आनन्द किशोरी की किशोर के संग होती खिलवाते हैं ।

देखिए इस होली वर्णन मार्मिकता को कि:  होरी खेलन रंगनि रँगीलो छल छबीलों नगर गोरी संग, उरजन तकि-तकि छड़ित छवि सो कंचन की पिचकारी, भरि-भरि नवल केसर संग । प्यारी द्यात बनावत आवत मूठि गुलाल चलावत सुन्दर साँबरे सगं । आनन्दधन रस दोड़ बरसीले झूमि-झूमि झपाटे लपटि जात भी ने अनंग उमंग । रसखान किस से कम है ।

वह भी पूर्व रसिक है । वह आनन्द धन के होली वर्णन की छटा को भी फीका करने का दावा रखते हुए कहते हैं कि:  खेलत फाग सुहागभरी अनुरागहिं लालिन कौंधरि के ।  भारत कुंकुंभ केसरि के पिचकारिन में रंग को भरि कै ।।  गेरत लाल गुलाल लली मनमोहिनि मौज लुटा कर कै ।  जात चली रसखान अली मदस्त मनी मन की हरि कै ।।

रीतिकाल में तो एक के बाद एक कवि श्रुंगार वर्णन करने की कलाओं से पूर्ण निपुण प्रतीत होता है । होली के पुनीत पर्व पर गोपी द्वारा कृष्ण का पीताम्बर उतरवा तथा नंगा कर कृष्ण को भगवा देते हैं । उस भाव को पद्‌माकर ने किस कुशलता से व्यक्त किया है कि:  फागु की भीर अभीरन में कहि गोविंद ले गई भीतर गोरी ।  भाई करी मन की पद्‌माकर ऊपर नाई अबीर की झोरी ।।  छीन पितम्बर कम्मर ते सुमीडि; कपोलन रोरी । नैन नचाई कही मुसकाई लला फिर आइयो खेलन होरी ।।

हिन्दी साहित्य में महिला कवियों ने भी बहुत कुछ दिया है । रसिक बिहारी भी एक अच्छी कवयित्री हुई है । आपको बनी ठनी जी भी कहा जाता है । आपने ब्रज की होली का वर्णन कितनी निपुणता से किया है । उसका एक उदाहरण नीचे प्रस्तुत है:  होरी-होरी कहि बोले सब ब्रज की नारि । नन्द गाँव बरसानो हिल मिलि गावत इतउत रसकी गरि उड़त गुलाल अरूण भयो अम्बर खेलत रंग पिचकारि धारि । रसिक बिहारी भानु दुलारी नायक संग खेलैं खिलवारि ।।

होली के दिन है, ब्रज की गोरी अब पानी भरने पनघट पर कैसे जाए क्योंकि कोई रंग डाल देगा । फिर कृष्ण तो बडे उद्दण्ड है । इस बात को रसिक बिहारी ‘बनी ठनी जी कहती हैं:  कैसे जल लाऊँ मैं पनघट जाऊँ । होरी खेलत नन्द लाडिलो क्योंकर निबहन पाऊँ । वे तो निलज फाग मदमाते ही कुल बध कहाऊँ । जो छुवें रसिक बिहारी धरती फार समाऊँ ।

कवयित्री रघुराज कुँवरि कृष्ण-राधा के होली खेलने का वर्णन कहती है:  जनक किशोरी युग करते गुलाल रोरी । कीन्हन वर गोरी प्यार, मुखपै लगावैरी ।। अब आधुनिक काल आया । इसमें कवियों के दृष्टिकोण में परिवर्तन हुआ ।

अब राष्ट्रीय चेतना की लहर जागी अतएव कवियों ने होली वर्णन का भी राष्ट्रीयकरण कर दिया और होली खून के रंगों से खेली गयी । रंग की अरूणाई तथा प्रेम की लालिमा ने खून की लालिमा का स्थान ग्रहण कर लिया ।

जब भारत स्वतन्त्र हुआ तो फिर कवियों को कुछ सोचने के लिए विश्राम प्राप्त हुआ । पर वह विश्राम आर्थिक समस्या को सुलझाने में लगा । पर कुछ ऐसे कवि थे जो अपना महाकाव्य लिखने में मस्त हो गए और कुछ रोमांटिक भावना का अनुकरण करने लगे तथा कुछ नयी धाराओं की ओर झुक गए । फिर भी कवियों ने निरन्तर होली के माध्यम से सांस्कृतिक चेतना का परिचय दिया ।

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