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“Contribution of Non-Hindi Speaker to the Development of Hindi” in Hindi Language

हिन्दी के विकास में अहिन्दीभाषियों का योगदान ।  “Contribution of Non-Hindi Speaker to the Development of Hindi” in Hindi Language!

1. प्रस्तावना ।

2. विभिन्न लेखकों का योगदान ।

3. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

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हिन्दी के विकासमें इतिहास के अध्ययन से यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि विगत हजार वर्षों से लेखकों ने हिन्दी भाषा में श्रेष्ठ रचनाएं प्रस्तुत की हैं, जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं है । तात्पर्य यह है कि वैसे सभी रचनाकार अहिन्दीभाषी हैं, जिन्होंने अहिन्दी भाषी होते हुए भी हिन्दी को रचना का माध्यम बनाया ।

2. विभिन्न लेखकों का योगदान:

पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, बंगाल, आन्धप्रदेश और कर्नाटक तक के लोगों का हिन्दी के प्रति विशिष्ट अवदान रहा है । महापण्डित राहुल सांकृत्यायन अप्रभ्रंश के सुप्रसिद्ध लेखक स्वयंभू को हिन्दी का प्रथम ग्रन्थकार तथा उनके ग्रन्थ ‘परमचरित’ (पधचरित) को हिन्दी का प्रथम ग्रन्ध माना है । जबकि स्वयं कर्नाटक के निवासी थे ।

पंजाब के सिद्ध और नाथपंथी योगियों ने हिन्दी का विकास किया । जालन्धर में जन्मे जालन्धर नाथ, जिन्हें आदिनाथ भी कहा जाता है, ने योग से सम्बन्धित सात पुस्तकों की रचना की । ये सभी सात रचनाएं हिन्दी में हैं । हिन्दी में रासो काव्य परम्परा का विशिष्ट स्थान है । इस परम्परा के उदभावक थे अछल रहमान, जो मुसलमान बिरादरी के थे ।

जालन्धर के आस-पास के अन्य अन्धकारों में चौरंगी नाथ, सननाथ, महन्दर नाथ, गोरखनाथ आदि थे, जिनके नामों के लेख के बिना नमापश्व की चर्चा पूर्ण ही नहीं हो सकती । अचूल रहमान द्वारा प्रशस्त मार्ग पर पृथ्वीराज रासो, बीसल देव, रासो, हमीर रासो आदि गन्धों की रचना हुई ।

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पृथ्वीराज रासो के कवि चन्दरदाई लाहौर के निवासी थे पंजाब के गुरा तेग बहादुर तथा गुरा गोविन्दसिंहजी ने स्वयं तो हिन्दी के साथ, ही अपने दरबार में हिन्दी के बाबत कवियों को संरक्षण भी प्रदान किया । हिन्दी का सर्वाधिक प्राचीन गन्ध 1930 ई० में पंजाब के रामप्रसाद निरजनी द्वारा भाषायोग वशिष्ठ के रूप में प्रस्तुत किया गया ।

इस युग के प्रारम्भिक दिनों में पं॰इन्द्र वाचस्पति, स्वासी श्रद्धानन्द, सत्यकेतु विद्यालंकार जैसे प्रसिद्ध पत्रकार पंजाबी भाषी थे । हिन्दी को में प्रतिष्ठित करने वालों में उल्लेखनीय राजर्षि पुराषोत्तम दास पंजाबी भाषी थे ।

जाम नगर में जन्मे गुजरात के स्वामी प्राणनाथ ने हिन्दी में पदावली लिखी और कुरान का हिन्दी में अनुवाद किया । गुजरात के अन्य कवियों में गोपालदास, मुकुन्ददास, कृष्णदास, प्रीतिमदास, बिहारीदास कुबेरदास, निर्मलदास- मनोहरदास, अनुभवानन्द, बापू साहिब  ग्राम कवाड आदि ने हिन्दी में रचना कर, हिन्दी को गौरव प्रदान किया ।

हिन्दी के वर्तमान स्वरूपको खड़ी बोली का नाम गुजरात के लन्नजी लाल ने ही दिया । लल्युजी लाल की नियुक्ति कीर्ति विलियम कॉलेज में हिन्दी गन्ध रचना हेतु अंग्रेज सरकार ने की थी । हिन्दी के प्रचार-प्रसार में गुजरात के स्वामी दयानन्द और महात्मा गांधी का योगदान महत्त्वपूर्ण है । स्वामीजी ने अपना गपथ कत्यार्थ प्रकाश हिन्दी में ही लिखा ।

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उनके द्वारा संस्थापित आर्यसमाज ने हिन्दी को ही समाज की प्रमुख भाषा के रूप में स्वीकार किया । आर्यसमाज के लोग जब किसी मारिशियस, गुयाना आदि देश में गये, तो उनके साथ हिन्दी भी वहां पहुंची । हिन्दी को भारत की जनभाषा बनाने का श्रेय बहुत कुछ गांधीजी को जाता है ।

उनका स्पष्ट अभिप्राय था: ”हिन्दी ही हिन्दुस्तान की राष्ट्रभाषा हो सकती है और होनी चाहिए ।” दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रचार-प्रसार हेतु गांधीजी ने अपने पुत्र देवदास गांधी को भेजा था । हिन्दी के विकास हेतु महाराष्ट्र के ज्ञानेश्वर, मुक्ताबाई, दामोदर पण्डित, चक्रधर नामदेव इत्यदि के नाम उल्लेख्य हैं ।

ज्ञानेश्वर ने हिन्दी के माध्यम से निगुँण भक्ति धारा का प्रचार-प्रसार किया । सन्त नामदेव, जो 19वीं शताब्दी में हुए, उन्होंने पद, साखी, दोहे, भजनादि लिखकर हिन्दी के साहित्य-भण्डार को समृद्ध किया । आधुनिक युग में मराठी रचनाकारों ने हिन्दी को बहुत कुछ प्रदान किया ।

सर्वश्री माधवराव सिंदे, रघुनाथ कृष्ण खाड़ितकर आदि हिन्दी जगत् के स्मरणीय मराठी भाषी पत्रकार थे । हिन्दी के प्रख्यात साहित्यकार प्रभाकर माचवे जन्मना मराठी थे । हिन्दी के प्रति आन्धप्रदेश का भी अपना योगदान और अवदान रहा है । उत्तर भारत में भक्ति काव्य की सुरसरि प्रवाहित करने वाले दक्षिण के ही आलकर सन्त थे ।

सूरदास को काव्य रचने की प्रेरणा महाप्रभु वल्लभाचार्य से मिली, जो आन्त्रनिवासी थे । आन्धप्रदेश के कवियों में रीतिकाल के ललित कवि पद्‌माकर विशिष्ट स्थान रखते थे । आधुनिक गद्या एवं पद्या में आस्र के अनेक ख्याति प्रान्त गद्या एवं पद्या लेखक हैं ।

13वीं एवं 14वीं शताब्दियों में वर्तमान हिन्दी का स्वरूप प्रकट होने लगा था । खड़ी बोली, अवधी और ब्रजभाषा के अस्तित्व का स्पष्ट परिचय मिलने लगा था । इनके विकास में हजरत निजामुद्दीन और उनके शिष्य बाबा फरीदशंकर का उल्लेखनीय योगदान रहा है ।

मुसलमान कवियों में कुतुबन, जायसी, मंझन, उस्मान, गानकवि, कासिमशाह, शेखनवी, नूरमुहम्मद आदि ने अवधी भाषा में काफी श्रेष्ठ रचनाएं प्रस्तुत की । निजामुद्दीन के शिष्य अमीर खुसरो का नाम हिन्दी के विकास की कड़ी में काफी श्रद्धा से लिया जाता है ।

आधुनिक युग में स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् कई मुसलमान कवियों ने हिन्दी में अच्छी रचनाएं की हैं । हिन्दी के प्रथम दैनिक समाचारपत्र ‘सुधा-वर्षण’ का प्रकाशन कोलकता में हुआ । इसके सम्पादक श्याम सुन्दर सेन बंगलाभाषी थे ।

हिन्दी में सबसे पहला प्रेस ईसाई मिशनरियों ने ही स्थापित किया । ईसाई मिशनरियों की ओर से विलियम केरी, गार्थमैन आदि का योगदान उल्लेख्य है । अंग्रेजों द्वारा संस्थापित ‘फोर्ट विलियम कॉलेज’ ने इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य किया । कॉलेज के प्रिन्सिपल जॉन गिल काइस्ट ने स्वयं हिन्दुस्तानी ग्रामर लिखा और हिन्दी में पुस्तक लिखने के लिए प्रोत्साहित किया ।

3. उपसंहार:

हिन्दी के विकास में अहिन्दीभाषियों की भूमिका श्लाघनीय रही है । इस युग में हिन्दी के जाने-माने लेखकों में ऐसे लेखकों की, जिनकी भाषा हिन्दी नहीं थी, एक लम्बी सूची है । 

अज्ञेय, अमृत, लाल नागर, यशपाल, उपेन्द्रनाथ अश्क, धर्मवीर भारती, किशन चन्दर, अमृता प्रीतम, रांगेय राघव, कुलदीप नैयर, बालकृष्ण भट्ट, बालशोरि रेड्डी , विश्वनाथ अप्यर, पूर्ण सोम सुन्दरम, विद्याभास्कर, नारायणदत्त, गोविन्द रघुनाथ धत्ते, मुक्तिबोध, डॉ॰ प्रेमपति इत्यादि अनेक ऐसे लेखक एवं कवि है, जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं है । हिन्दी को जनभाषा तथा राष्ट्रभाषा में सम्मान दिलाने में इन अहिन्दी भाषी रचनाओं का योगदान अविस्मरणीय है ।

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