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Environment Impact Assessment (EIA) | India

Read this essay in Hindi to learn about the objectives of Environment Impact Assessment (EIA).

सरकारी हों या निजी, तमाम विकास परियोजनाओं के बारे में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को एक सक्षम संगठन द्वारा प्रभाव के आकलन की जरूरत है । इसमें भौतिक, जैविक और सामाजिक अनिवार्यताओं का ध्यान रखा जाना चाहिए । ऐसे आकलन से यह संकेत पाने की आशा की जाती है कि परियोजना अगर स्वीकृत की गई तो उसके क्या प्रभाव संभव हैं ।

मंत्रालय ने बड़ी संख्या में ऐसी परियोजनाओं की पहचान की है जिनको पर्यावरणीय आधार पर स्वीकृति की आवश्यकता है । इस आकलन में यह दिखाना होता है कि जल, मृदा और वायु पर उनका क्या प्रभाव पड़ेगा ।  इसके लिए यह भी आवश्यक है कि क्षेत्र के पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों का प्रलेखन किया जाए और बताया जाए कि क्या ऐसी संकटग्रस्त प्रजातियाँ हैं जिनके आवास या जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा ।

उद्योग, सड़क, रेल और बाँध जैसी अधिकांश विकास परियोजनाएँ स्थानीय जनता के जीवन को भी प्रभावित कर सकती हैं । पर्यावरणीय प्रभाव आकलन में इस पर विचार होना चाहिए । पर्यावरण मंत्रालय ने ऐसे तीस उद्योगों की सूची बनाई है जिनको स्थापित करने से पहले आपत्ति प्रमाणपत्र लेना आवश्यक है ।

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विभिन्न प्रकार के उद्योगों के प्रभाव अलग-अलग होते हैं और प्रभावों के प्रति प्रस्तावित स्थानों की संवेदनशीलता भी अलग-अलग होती है । कुछ क्षेत्र दूसरों से अधिक नाजुक होते हैं, कुछ में अनोखे पारितंत्र होते हैं, जबकि दूसरे क्षेत्र वन्यजीवों के या पौधों और पशुओं की संकटग्रस्त प्रजातियों के आवास होते हैं ।

किसी विकास परियोजना या उद्योगस्थल को मंजूरी देने से पहले इन सब पक्षों का मूल्यांकन आवश्यक हैं । नई परियोजनाओं को जिनमें कोई विकास नहीं हुआ होता, ‘ग्रीनफील्ड परियोजनाएँ’ कहते हैं । जो परियोजनाएँ पहले से जारी हैं पर विस्तार की माँग करती हैं, उनको भी मंजूरी देने के लिए प्रार्थनापत्र देना होता है । इनको ‘ब्राउनफील्ड परियोजनाएँ’ कहते हैं ।

परियोजना से जुड़े लोगों से पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (environment impact assessment, EIA) के लिए एक समर्थ एजेंसी के चयन की आशा की जाती है । परियोजनाओं को हल्के, औसत या गंभीर प्रभाव के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है । निर्माण के चरण में कुछ का बड़ा गंभीर, पर अस्थायी प्रभाव हो सकता है जो आगे चलकर कम हानिकारक हो सकता है या अनेक उपायों के कारण मद्धम पड़ सकता है ।

दूसरी स्थितियों में प्रभाव जारी रह सकता है, बल्कि बढ़ भी सकता है, जैसे वहाँ जहाँ विषाक्त ठोस कचरा लगातार पैदा हो रहा हो । इस तरह कुछ प्रभावों से अस्थायी, पूरणीय हानि हो सकती है जबकि दूसरों से अपूरणीय और स्थायी हानि भी हो सकती है ।

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पर्यावरण संबंधी अनापत्ति के लिए परियोजना के प्रस्तावक को राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से प्रार्थना करनी पड़ती है । बोर्ड जाँच करके बतलाता है कि पर्यावरणीय प्रभाव आकलन का आरंभ किया जा सकता है । आकलन करनेवाली एजेंसी प्रस्तावक को एक रिपोर्ट देती है । इसमें अनेक माह लग सकते हैं । पर्यावरणीय वक्तव्य की एक रिपोर्ट मंत्रालय को भी दी जाती है जो प्रभाव का आकलन करनेवाला प्राधिकरण है ।

1997 के बाद मंत्रालय ने तय किया कि स्थानीय स्तर पर एक जन सुनवाई (public hearing) होनी चाहिए । प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड स्थानीय प्रेस में सुनवाई के बारे में एक विज्ञापन देता है । एक पर्यावरणीय प्रभाव वक्तव्य (Environment Impact Statement-EIS), जो पर्यावरणीय प्रभाव आकलन का सारांश होता है, जनता को पढ़ने के लिए रखा जाता है । जन सुनवाई का स्थान और समय घोषित किया जाता है । सुनवाई हो जाने और परियोजना के पक्ष-विपक्ष में रायों के सामने आने के बाद सभा का विवरण मंत्रालय को भेजा जाता है ।

हालाँकि ऐसा किया तो जाता है, पर स्पष्ट है कि परियोजना से प्रभावित व्यक्तियों की आवाजें अभी भी अनसुनी रह जाती हैं । कुछ मामलों में गैर-सरकारी संगठन स्थानीय जनता की आवाज उठाते हैं । पर्यावरणीय शिक्षा और जागरूकता जब तक जनता की सोच का अंग नहीं बनतीं और वस्तुगत रूप से तथ्यों पर आधारित नहीं होतीं, तब तक ऐसी सुनवाइयाँ विकास की नई परियोजनाओं के संभावित प्रभावों के नियंत्रण के लिए अपर्याप्त ही रहेंगी ।

अनुभवों से पता चलता है कि कई बार पर्यावरणीय प्रभाव आकलन अपर्याप्त अनुसंधानों पर आधारित और अकसर पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होते हैं क्योंकि उनके लिए परियोजना के प्रस्तावक धन देते हैं । जहाँ अधिकांश आकलन वायु, जल और मृदा प्रदूषण की संभावनाओं के अध्ययन के लिए पर्याप्त होते हैं, वहीं वे जैव-विविधता के संरक्षण जैसे प्रश्नों और पर्यावरण पर भावी प्रभावों से जुड़े सामाजिक प्रश्नों की अपर्याप्त विवेचना ही करते हैं ।

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अकसर जैव-विविधता के मुद्‌दे पर अपर्याप्त विचार किया जाता है । अधिकतर इसमें प्रजातियों की एक सूची दे दी जाती है पर उनकी संख्याएँ नहीं दी जातीं, वन्यजीवन की गणना के आँकड़े नहीं दिए जाते या समग्र पर्यावरण पर प्रभाव का कोई अध्ययन नहीं होता । भूमि के उपयोग के प्रतिमान बदलने से जीवित प्राणियों के पूरे-पूरे समुदाय प्रभावित होते हैं । इस पर शायद ही कभी ध्यान दिया जाता है क्योंकि ऐसे मुद्‌दों का परिमाणात्मक मूल्यांकन कठिन होता है ।

पूरा-पूरा ध्यान संसाधन संबंधी समता से जुड़े मुद्‌दों पर भी नहीं दिया जाता जो विकास परियोजनाओं से लाजमी तौर पर परिवर्तित होते हैं । पर्यावरणीय आकलन में इन अस्पष्ट प्रश्नों की अधिक गंभीर विवेचना होनी चाहिए और जनता को इन अपर्याप्तताओं का ज्ञान और बोध होना चाहिए । पर्यावरणीय प्रभाव आकलन किया गया है, केवल ऐसा कह देना पर्याप्त नहीं है ।

महत्त्व आकलन की गुणवत्ता और गंभीरता का  है ।  हर तरह का विकास रोकना आकलन का उद्‌देश्य नहीं होता । किसी उद्योग के लिए सावधानी से स्थान चुना जा सकता है । अगर उस उद्योग से किसी नाजुक क्षेत्र की हानि की संभावना हो तो एक वैकल्पिक और कम संवेदनशील स्थान का चयन किया जा सकता है ।

कुछ मामलों में, अगर संभावित प्रभाव बहुत गंभीर हों तो परियोजना को एकदम त्याग देना आवश्यक है । अन्य मामलों में, परियोजना के लिए आवश्यक है कि वह पर्यावरण संबंधी दुष्प्रभावों का शमन करके अपने प्रभावों को कम से कम करे । इसका मतलब वनरोपण के द्वारा पर्यावरण की हानि की भरपाई करना या परियोजना के खर्च पर पास में एक संरक्षित क्षेत्र बनाना है ।

प्रभावित व्यक्तियों का पुनर्वास एक बुनियादी प्रश्न है जिसके लिए आवश्यक धन आवंटित होना चाहिए और क्षेत्र के निवासियों की स्पष्ट शब्दों में सहमति लेने के बाद ही काम शुरू होना चाहिए । अधिकांश मामले में पुनर्वास से बचना ही बेहतर होता है । अगर किसी क्षेत्र की हरियाली प्रभावित हो रही हो तो परियोजना की लागत में हर्जानास्वरूप वनरोपण और अन्य सुरक्षा उपायों की लागत भी शामिल होनी चाहिए ।

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