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Essay on Air Pollution in India

Essay on Air Pollution in India!

वायु प्रदूषण का इतिहास:

पृथ्वी पर वायु प्रदूषण का आरंभ तभी से माना जाता है जब मनुष्य ने भोजन पकाने और गर्मी पाने के लिए लकड़ी जलाना आरंभ किया । हिप्पोक्रटिज ने 400 ई.पू. में वायु प्रदूषण का उल्लेख किया था । कोयले की खोज और उपयोग में वृद्धि के कारण वायु प्रदूषण काफी बढ़ चुका है, खासकर नगरों में 700 साल पहले लंदन में इसे धुएँ से प्रदूषण के रूप में एक समस्या माना गया था जब बादशाह एडवर्ड प्रथम ने 1273 में पहला प्रदूषण विरोधी कानून बनाकर लोगों को घरों को गर्म रखने के लिए कोयले का प्रयोग करने से रोका था ।

वर्ष 1300 में कोयले के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक और कानून बनाया गया; इस कानून को तोड़ने पर मृत्युदंड का प्रावधान था । इसके बावजूद उद्योगों में कोयले के व्यापक उपयोग के कारण औद्योगिक क्रांति के दौरान वायु प्रदूषण लंदन में एक गंभीर समस्या बन गई । सबसे पहले दर्ज प्रमुख आपदा ‘लंदन धूमकुहरा’ की थी जो 1952 में घटित हुई । इसके दौरान पाँच दिनों तक नगर के वायुमंडल में प्रदूषकों के जमाव के कारण 4000 से अधिक लोग मरे ।

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यूरोप में 19वीं सदी के अंत के आसपास औद्योगिक क्षेत्रों में काले रंग का पेपर्ड माथ (Peppered moth) कीड़ा दिखाई देने लगा । सामान्य रंग का पेपर्ड माथ जब कवक से ढँके पेड़ों पर होता है तो आम तौर पर अच्छी तरह छिपा हुआ होता है । लेकिन औद्योगिक क्षेत्रों में पेड़ों के धुएँ से काले पड़े तनों पर यह भौंरा आसानी से दिखाई देने लगा और पक्षी उसे खाने लगे ।

इसलिए जहाँ साफ, गैर-औद्योगिक क्षेत्रों में सामान्य रंगत का कीड़ा जीन रक्षा में सफल रहा वहीं औद्योगिक क्षेत्रों में केवल काले रंग वाले भौंरे ही छिपे रह सके । इस तरह औद्योगीकरण के विकास के साथ-साथ पेपर्ड मथ ही नहीं, दूसरे भौंरों की काले रंग वाली किस्में अधिक दिखाई देने लगीं । यह प्रदूषण के कारण अनुकूलन (adaptation) की एक क्लासिक मिसाल है ।

बीसवीं सदी के आरंभ में यातायात की व्यवस्थाओं के विकास और बड़े पैमाने पर पेट्रोल और डीजल के उपयोग के कारण वायु प्रदूषण बढ़ने लगा । डीजल और पेट्रोल के दहन के बाद बचे अवशेषों से पेट्रोरसायन धूमकुहरा (smog) के बनने के कारण वायु की गुणवत्ता संबंधी भयानक समस्याएँ सबसे पहले लॉस एंजेलस में महसूस की गईं । अनेक विकसित और भारत समेत विकासशील देशों में वाहनों के धुएँ से होने वाला प्रदूषण प्रर्यावरण की एक गंभीर समस्या बना हुआ है ।

भारत में वायु प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए वायु प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम 1981 और मोटरवाहन अधिनियम अभी हाल में पारित किया गया । इसका मकसद वायु के अति-प्रदूषण को रोकना है । वायु के प्रदूषण का कारण बनने वाली सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना भोपाल में हुई जहाँ बेहद जहरीली मिथाइल आइसोसायनाइट (methyl isocyanide) गैस 2 दिसंबर 1984 की रात को यूनियन कार्बाइड के कीटनाशक उत्पादक संयत्र से अकस्मात हवा में मिल गई । मनुष्य के स्वास्थ्य और मिट्‌टी पर इस आपदा के प्रभाव आज तक महसूस किए जा रहे हैं ।

वायुमंडल की संरचना (Structure of the Atmosphere):

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सामान्यतः वायुमंडल में 79 प्रतिशत नाइट्रोजन और 21 प्रतिशत आक्सीजन होता है तथा शेष एक प्रतिशत कार्बन डाइआक्साइड, जलवाष्प और नियान, हीलियम, मिथेन, क्रिप्टन, हाइड्रोजन और जेनान गैसों का मिश्रण होता है । वायुमंडल की सामान्य संरचना की अनेक महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ होती हैं जो पर्यावरण की समस्याओं के लिए प्रासंगिक हैं । वायुमंडल अनेक सतहों में विभाजित है । सबसे अंदर की सतह क्षोभमंडल (troposphere) है जो विषुवत रेखा पर समुद्रतल से 17 किमी और ध्रुवों पर 8 किमी ऊपर तक फैला हुआ है ।

पृथ्वी के वायुमंडल की कोई 75 प्रतिशत मात्रा इसी में है । इस सतह का पतलापन इसी बात से स्पष्ट है कि पृथ्वी अगर एक सेब होती तो यह विशेष सतह सेब के छिलके से अधिक मोटी नहीं होती । क्षोभमंडल में ऊँचाई बढ़ने पर तापमान गिरता जाता है । क्षोभमंडल के ऊपरी सतह पर तापमान एकाएक बढ़ने लगता है । तापमान में यह उल्टाव जिस सीमारेखा पर आता है उसे ‘क्षोभसीमा’ (tropopause) कहते हैं ।

क्षोभसीमा क्षोभमंडल के अंत और दूसरी सतह समतापमंडल (stratosphere) के आरंभ की सूचक है । समतापमंडल पृथ्वी की सतह के 1718 किमी ऊपर से आरंभ होता है । इसकी संरचना तो क्षोभमंडल जैसी ही होती है, पर इसमें दो बड़े अंतर भी हैं । यहाँ जलवाष्प का आयतन कोई 1000 गुना कम होता है जबकि ओजोन का आयतन लगभग 1000 गुना अधिक होता है ।

समतापमंडल में ओजोन की मौजूदगी सूरज की हानिकर पराबैंगनी किरणों के कोई 99 प्रतिशत भाग को पृथ्वी तक पहुँचने से रोकती है तथा इस तरह मनुष्यों को कैंसर से और शारीरिक प्रतिरक्षा व्यवस्था की हानि से बचाता है । इस सतह में बादल नहीं होते और इसलिए इसमें वायुयान उड़ते हैं क्योंकि यह कम बाधा डालती है । समतापमंडल में ऊँचाई के साथ तापमान बढ़ता जाता है जब तक कि एक और उल्टाव (reversal) नहीं आ जाता । इस बिंदु को ‘समतापसीमा’ (stratopause) कहते हैं और यह समतापमंडल का अंत है ।

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अगली सतह मध्यमंडल (mesosphere) है जिसमें तापमान ऊँचाई बढ़ने पर गिरता है और शीर्ष पर तो -110 सेंटीग्रेड रह जाता है । इस सतह के ऊपर की प्रमुख संवृत्ति गैसों के आयनों का बनना है जिससे तापमान बढ़ता है । इस सतह को बाहरी वायुमंडल (thermosphere) कहते हैं । हमारे मौसमों में और इसलिए वायु प्रदूषण में केवल क्षोभमंडल की ही नियमित भूमिका होती है । वायु प्रदूषण के स्तर के निर्धारण में दूसरी सतहों का महत्त्व नहीं होता ।


वायु प्रदूषण के प्रकार और स्रोत (Types and Sources of Air Pollution):

वायु प्रदूषण क्या है?

वायु प्रदूषण का कारण वायु में अवांछित ठोस या गैस कणों की इतनी बड़ी मात्रा की उपस्थिति है कि वह मानव के स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए हानिकारक बन जाए । वायु प्राकृतिक कारणों से भी प्रदूषित हो सकती है, जैसे ज्वालामुखियों से, जो राख, धूल, गंधक और गैसें फेंकते हैं, जंगल की आग से भी जो कभी-कभी आसमानी बिजली के कारण लग जाती है । लेकिन मानव के कार्यकलापों से पैदा प्रदूषकों के विपरीत प्रकृति से उत्पन्न प्रदूषक वायुमंडल में थोड़े ही समय तक रहते है और वायुमंडल में किसी बड़े परिवर्तन को जन्म नहीं देते ।

पहचान योग्य स्रोतों से सीधे निकलने वाले प्रदूषक प्राकृतिक घटनाओं से भी पैदा होते हैं (जैसे धूल भरी आँधी या ज्वालामुखी के विस्फोट से) ओर मानव के कार्यकलापों से भी (जैसे वाहनों, उद्योगों आदि का धुँआ) । इन्हें प्राथमिक प्रदूषक (primary pollutants) कहते हैं । ऐसे पाँच प्राथमिक प्रदूषक हैं जो संयुक्त रूप से विश्व के 90 प्रतिशत वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं । ये हैं कार्बन के आक्साइड (CO और CO2), नाइट्रोजन के आक्साइड, गंधक के आक्साइड, वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (मुख्यतः हाइड्रोकार्बन) तथा निलंबित कण पदार्थ ।

प्राथमिक प्रदूषकों के बीच कुछ रासायनिक प्रतिक्रियाओं से वायुमंडल में उत्पन्न होने वाले प्रदूषकों को द्वितीयक प्रदूषक (secondary pollutants) कहते हैं, जैसे गंधक का तेजाब, नाइट्रिक अम्ल, कार्बनिक अम्ल आदि । कार्बन मोनोआक्साइड (carbon monoxide) एक रंगहीन और गंधहीन विषैली गैस है । यह प्राकृतिक गैस, कोयले और लकड़ी के अधूरे दहन से पैदा होती है । वाहनों का धुँआ कार्बन मोनोआक्साइड का अकेला बड़ा स्रोत है । पूरी दुनिया में साल-दर-साल वाहनों की संख्या बढ़ रही है । अनेक वाहनों का रखरखाव ठीक नहीं होता और अनेक में प्रदूषण नियंत्रण के उपकरण पर्याप्त नहीं होते ।

इससे कार्बन मोनोआक्साइड की मात्रा बढ़ रही है । पर यह कोई स्थायी प्रदूषक नहीं है । प्राकृतिक प्रक्रियाएँ कार्बन मोनोआक्साइड को अन्य यौगिकों में बदल देती हैं जो हानिकारक नहीं होते । इसलिए वायुमंडल में अब और कार्बन मोनोआक्साइड न शामिल हो तो वायु को कार्बन मोनोआक्साइड से मुक्त किया ज सकता है ।

गंधक आक्साइड (Sulphur oxide) तब पैदा होते हैं जब गंधक से युक्त जीवाश्म ईंधन बनाए जाते हैं । नाइट्रोजन के आक्साइड (nitrogen oxide) वाहनों के धुएँ में मौजूद होते हैं । ये इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि ओजोन जैसे द्वितीयक वायु प्रदूषकों के उत्पादन में ये शामिल होते हैं ।

हाइड्रोकार्बन (hydrocarbon) हाइड्रोजन और कार्बन के परमाणुओं वाले यौगिक हैं । ये या तो ईंधन से वाष्प के रूप में निकलते हैं या पूरी तरह न जले ईंधन के अवशेष होते हैं । वर्षा होती है और भूजल बह चलता है तो हाइड्रोकार्बन वायु से बाहर निकल जाते हैं । वे सतह पर चिकनी परत बनाते हैं और जब तक क्रिया करके द्वितीयक प्रदूषकों को जन्म नहीं देते, कोई गंभीर समस्या खड़ी नहीं करते ।

ईंधन और हवा के मिश्रण में आक्सीजन की अधिक मात्रा का उपयोग, गैसों का निकास रोकने के लिए वाल्वों (कपाटों) का प्रयोग और वाहनों में कैटेलिटिक कनवर्टरों (catalytic converters) का उपयोग ऐसे कुछ उपाय हैं जो वायुमंडल में हाइड्रोकार्बनों के निकास को कम कर सकते हैं ।

कणपदार्थ (particulates) ठोस वस्तुओं के नन्हें-नन्हें कण होते हैं (जैसे आग से धुएँ के कण, एस्बेस्टस के कण, धूल के कण और उद्योगों से निकली राख) जो वायुमंडल में बिखर जाते हैं । इसके प्रभावों में कालिख से होकर वायुमंडल में बिखरे एस्बेस्टस और धूल के कणों और औद्योगिक संयंत्रों की राख के कैंसरजनक प्रभाव तक शामिल हैं । कणपदार्थों से बार-बार संपर्क होता रहे तो वे फेफड़ों में जमा हो जाते हैं और फेफड़ों की गैसों के विनिमय की क्षमता को बाधित करते हैं ।

सीसा एक प्रमुख वायु प्रदूषक है जो काफी हद तक निगरानी से बाहर है और वाहनों से मुक्त होता है । महानगरों के आसपास की हवा में इसके भारी स्तर पाए गए हैं । सीसायुक्त पेट्रोल भारतीय नगरों में वायु के सहारे सीसे के फैलाव का प्रमुख स्रोत है । सीसारहित पेट्रोल का उपयोग इस प्रदूषक में कमी लाने का एक उपाय है ।

बाहर से दूषित हवा के आने और इमारतों के अंदर प्रयुक्त या उत्पादित विभिन्न रसायनों के कारण अंदर भी प्रदूषक पाए जाते हैं । अंदर और बाहर के प्रदूषक एक समान हानिकारक होते हैं ।

कणपदार्थों के प्रकार:

 

 

वायुमंडल में प्रदूषकों का क्या होता है?

प्रदूषक जब क्षोभमंडल में पहुँचते हैं तो हवा के साथ नीचे आते हैं । तब हवा की भारी मात्रा उनको नष्ट कर देती है, और या तो भौतिक या रासायनिक परिवर्तनों के कारण वे रूपांतरित हो चुके होते हैं या फिर वर्षा उन्हें वायुमंडल से हटा देती है ।

तब वे जलवाष्प के कणों से चिपक जाते हैं जो बाद में वर्षा या बर्फ बनकर पृथ्वी की सतह पर आते हैं । वायुमंडल आम तौर पर प्रदूषकों में हवा की भारी मात्रा मिलाकर उन्हें बिखरा देता है । इसके कारण प्रदूषकों का स्तर कम होकर स्वीकार्य हो जाता है । लेकिन बिखराव की दर निम्नलिखित कारकों के आधार पर बदलती रहती है ।

स्थलाकृति (Topography):

आम तौर पर पृथ्वी की सतह धूप से गर्म हो जाती है और संवहन (convection) के कारण वायु की वह सतह भी गर्म हो जाती है जो पृथ्वी के संपर्क में होती है । यह गर्म हवा ऊपर की ठंडी हवा से कम सघन होती है और इसलिए ऊपर उठती है । इस तरह निचली सतह पर पैदा प्रदूषक कारगर ढंग से फैल जाते हैं ।

लेकिन किसी खामोश शाम को यह प्रक्रिया उलट जाती है । एक चमकते दिन के बाद सूर्यास्त से घंटे, दो घंटे पहले धरती से ऊष्मा निकलने लगती है और जमीन के पास की हवा तेजी से ठंडी होने लगती है । पवन के अभाव के कारण जमीन के ठंडी होने पर ठंडी हवा की एक स्थिर सतह बन जाती है ।

इसके कारण कुहरा जमने लगता है । सुबह का सूरज आरंभ में इस कुहरे को नहीं भेद पाता । सघन होने के कारण ठंडी हवा ऊपर नहीं उठ पाती और ऊपर की गर्म हवा से कैद हो जाती है; आसपास की पहाड़ियों के कारण यह उस क्षेत्र से बाहर भी नहीं निकल सकती ।

स्थलाकृति की ये विशषताएँ एक बंद रासायनिक रिएक्टर से मेल खाती हैं जिसमें प्रदूषक बंद होते हैं । ठंडी रातों में यह दशा अकसर पूरी रात जारी रहती है और सूर्योदय से पहले तीव्रतम होती है । सुबह का सूरज जब धरती को गरमाता है तो जमीन के पास की हवा भी घंटे दो घंटे में गर्म होकर ऊपर उठती है । जोरदार हवाएँ इसे तोड़ भी देती हैं । ठंडे क्षेत्रों में यह दशा कई दिनों तक जारी रह सकती है । ऐसी ही स्थिति को धूमकुहरा (smog = smoke + fog) कहा जाता है ।

इसका सबसे मशहूर उदाहरण 1952 का ‘लंदन का धूमकुहरा’ है । उस समय घरों को गर्म रखने के लिए नगर में भारी मात्रा में गंधकयुक्त कोयले का प्रयोग होता था जो धुँआ छोड़ता था । उधर ताप बिजलीघरों और औद्योगिक प्रतिष्ठानों से भी धुँआ निकलता था । इसके कारण सल्फर के आक्साइडों से युक्त धुँआ भारी मात्रा में पैदा हुआ । मौसम की एक अकस्मात और प्रतिकूल दशा के कारण वायुमंडल में धुएँ और गंधक के आक्साइड जैसे वायु प्रदूषक जमा होने लगे ।

नगर के ऊपर जमा सफेद कुहरे ने काला रंग ग्रहण कर लिया और ‘मटर के सूप’ जैसा धूमकुहरा बन गया जिसमें लगभग नहीं के बराबर दिखाई देता था । इस धूमकुहरे के बनने के दिनों में लोग साँस की तीखी समस्याओं से ग्रस्त होने लगे जिसके कारण श्वासनली में जलन, खाँसी, नाक बहना, गले में खराश, उल्टी और आँखों में जलन पैदा होने लगी । आखिरकार इसके कारण अनेक लोगों की जानें गईं ।

जलवायु की दशाएँ (Meteorological Conditions):

पवन की गति प्रदूषकों के बिखराव को प्रभावित करती है । तेज हवाएँ आसपास की हवाओं की अपेक्षा प्रदूषित वायु को अधिक तेजी से मथती हैं जिससे प्रदूषकों का संकेद्रण तेजी से कम हो जाता है । पवन की गति कम हो तो दोनों का मिश्रण होता है और प्रदूषकों का स्तर ऊँचा बना रहता है ।

पवन जब गंधक और नाइट्रोजन के आक्साइडों को बिखराती है तो द्वितीयक प्रदूषक बनते हैं जैसे नाइट्रिक अम्ल का वाष्प, गंधक के अम्ल की बूँदें तथा सल्फेट और नाइट्रेट लवणों के कण । ये रसायन दो रूपों में पृथ्वी की सतह तक आते हैं; नम (अम्लीय वर्षा, बर्फ, कुहरा, और बादल) और शुष्क (अम्लों के कण) रूपों में । बनने वाला मिश्रण अम्लीय अवसाद (acid deposition) या आम बोलचाल में अम्लीय वर्षा कहलाता है ।

अम्लीय अवसाद के अनेक हानिकारक प्रभाव होते हैं, खासकर जब भू-स्थलीय प्रणालियों के लिए यह pH 5.1 से और जलीय प्रणालियों के लिए 5.5 से नीचे पहुँच जाए । इससे मनुष्यों को ब्रांकाइटिस और एस्थमा जैसे साँस के रोग होते हैं जिससे अकाल मृत्यु भी हो सकती है । यह मूर्तियों, इमारतों, धातुओं को और कारों की चमक को भी नुकसान पहुँचाती है । अम्लीय अवसाद पेड़ों के पत्तों को सीधे-सीधे हानि पहुँचा सकता है, पर सबसे गंभीर प्रभाव पेड़ों का कमजोर पड़ना है जिससे उनमें अन्य प्रकार की हानियों की संभावना भी बढ़ जाती है ।

अम्लीय अवसाद में मौजूद नाइट्रिक अम्ल और नाइट्रेट लवण मिट्टी में नाइट्रोजन के स्तर को अत्यधिक बढ़ा सकते हैं । इससे दूसरे पौधों की वृद्धि में तेजी आती है और मिट्टी के दूसरे महत्त्वपूर्ण पोषक तत्त्वों की, जैसे कैल्शियम और मैग्नीशियम की कमी हो जाती है । इसके कारण पेड़ों की वृद्धि और शक्ति मारी जाती है ।

जीवित कायाओं पर वायु प्रदूषण के प्रभाव (Effects of Air Pollution on Living Organisms):

हमारी खास प्रणाली में ऐसी अनेक व्यवस्थाएँ हैं जो हमें वायु प्रदूषण से बचाने में सहायक हैं । हमारी नाक के अंदर के बाल बड़े कणों को बाहर ही रोक लेते हैं । ऊपरी श्वासनली का चिपचिपा म्यूकस (श्लेष्मा) छोटे कणों को चिपका लेता है और कुछ गैसीय प्रदूषकों को घोल लेता है ।

ऊपरी श्वासनली में जब प्रदूषकों के कारण जख्म होता है तो छींक और खाँसी के कारण प्रदूषित हवा और श्लेष्मा बाहर आ जाते हैं । धूम्रपान की पुरानी आदत या वायु प्रदूषकों से लंबे संपर्क के कारण इन प्राकृतिक प्रतिरक्षा व्यवस्थाओं पर जोर पड़ता है या वे टूट जाती हैं । बुजुर्ग, बच्चे, गर्भवती स्त्रियाँ और दिल के रोग, दमा या श्वास संबंधी दूसरे रोगों से ग्रस्त व्यक्ति खासकर वायु प्रदूषण से प्रभावित होते हैं ।

सिगरेट पीना कार्बन मोनोआक्साइड से संपर्क का सबसे बड़ा कारण है । जिस हवा में मात्र 0.001 प्रतिशत कार्बन मोनोआक्साइड हो उसमें अनेक घंटों तक हम रहें तो यह बेहोशी, कोमा, यहाँ तक कि मौत का भी कारण हो सकता है । कार्बन मोनोआक्साइड खून के होमोग्लोबिन से लंबे समय तक चिपका रहे तो वह जमा हो जाता है और खून की आक्सीजन ले जाने की क्षमता को कम कर देता है ।

इससे देखने और चिंतन की शक्ति कम होती है, प्रतिवर्ती क्रियाओं (reflexes) में धीमापन आता है, तथा सरदर्द, चक्कर, सुस्ती और उलटी की शिकायतें पैदा होती है, भारी यातायात के दौरान पैदा कार्बन मोनोआक्साइड सरदर्द, सुस्ती और आँखों में धुँधलाहट का कारण है; भारी मात्रा में कार्बन मोनोआक्साइड के जहरीले असर से मृत्यु तक हो सकती है ।

सल्फर डाइआक्साइड श्वासनली के ऊतकों में जलन पैदा करता है; इससे अधिक संपर्क हो तो ब्रांकाइटिस जैसी दशा पैदा हो सकती है । यह जल से या वायु की आक्सीजन और अन्य पदार्थों से क्रिया करके गंधकयुक्त अम्ल भी बनाता है । ये अम्ल कणों से चिपक जाते हैं और साँस में जाएँ तो फेफड़ों का क्षरण करते हैं ।

नाइट्रोजन के आक्साइड, खासकर NO2, फेफड़ों में जलन पैदा करते हैं और ये दमा या असाध्य ब्रांकाइटिस का कारण होते हैं । इससे श्वास संबंधी संक्रामक रोगों, जैसे इन्फ्लूएंजा या आम खाँसी की संभावना भी बढ़ जाती है ।

वायु में निंलबित कण हमारी श्वासनली में खराश पैदा करते हैं जिससे ब्रांकाइटिस या दमा होता है । इन कणों से लंबा संपर्क फेफड़ों के ऊतकों को हानि पहुँचाता है तथा साँस की असाध्य बीमारियों और कैंसर को जन्म देता है ।

अनेक वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (जैसे बैंजीन और फार्मेल्डिहाइड) और विषैले कण (जैसे सीसा और कैडमियम) विकारों, प्रजनन संबधी समस्याओं या कैंसर को जन्म दे सकते हैं । ओजोन, जो प्रकाश-रासायनिक धूमकुहरे (photochemical smog) का एक घटक है, अगर बार-बार साँस में जाए तो खाँसी, छाती में दर्द, साँस में तकलीफ तथा आँखों, नाक और गले में जलन जैसी शिकायतें पैदा हो सकती हैं ।

पौधों पर प्रभाव (Effects on Plants):

कुछ गैसीय प्रदूषक जब पत्तों के छिद्रों में पहुँचते हैं तो फसली पौधों के पत्तों को हानि पहुँचाते हैं । वायु प्रदूषकों से पत्तों का लंबा संपर्क उनकी उस चिकनी सतह को नष्ट कर सकता है, जो पानी की अत्यधिक हानि को रोकने में सहायक है और इसके कारण रोगों, कीड़ों, सूखे और पाले से पत्तों को नुकसान हो सकता है । वायु प्रदूषकों से लगातार संपर्क प्रकाश-संश्लेषण और पौधों की वृद्धि में बाधा डालता है, पोषक तत्त्वों की ग्रहण क्षमता कम करता है और पत्तों को पीला या भूरा बना देता है या फिर वे एकदम गिर पड़ते हैं ।

सल्फर डाइआक्साइड का संकेद्रण अधिक हो तो अधिकांश कलियाँ सख्त हो जाती हैं और ऐंठ जाती हैं । वे आखिर पौधों से गिर पड़ती हैं क्योकि वे फूल बनने में असमर्थ हो जाती हैं । लोहा पिघलाने या कोयला जलाकर बिजली बनाने वाले संयंत्रों से और औद्योगिक इकाइयों से तथा वाहनों से भी निकलने वाले वायु प्रदूषकों के ऊँचे स्तर से लंबा संपर्क पेड़ों और अन्य पौधों को हानि पहुँचा सकता है ।

पदार्थों पर वायु प्रदूषण के प्रभाव (Effects of Air Pollution on Materials):

हर साल वायु प्रदूषक अरबों रुपयों का नुकसान करते हैं । वायु प्रदूषक कारों और घरों की बाहरी रंगाई को नष्ट करते हैं । पूरी दुनिया में वायु प्रदूषकों ने अद्वितीय स्मारकों, ऐतिहासिक इमारतों, संगमरमर की मूर्तियों, अन्य धरोहरों और प्राकृतिक सौंदर्य के स्थलों के रंग उड़ा दिए हैं ।

समतापमंडल पर वायु प्रदूषण के प्रभाव (Effects of Air Pollution of Stratosphere):

ऊपरी समतापमंडल में ओजोन की पर्याप्त मात्रा पाई जाती है जो पराबैंगनी किरणों (UV lights) से कारगर बचाव करती है । ‘ओजोन पर्त’ (ozone layer) नाम का यह क्षेत्र पृथ्वी की सतह से 60 किमी ऊपर तक है । ओजोन है तो 60 किमी ऊपर तक, लेकिन पृथ्वी की सतह से 20-25 किमी तक के क्षेत्र में यह सबसे घनी है । ओजोन पर्त में गैसों के एक लाख अणुओं में ओजोन का केवल एक अणु होता है । इसलिए ओजोन के संकेंद्रण में थोड़ा-सा परिवर्तन भी पृथ्वी पर जीवन में नाटकीय प्रभाव पैदा कर सकता है ।

पृथ्वीतल से 50 किमी ऊँचाई तक के ‘वायु स्तंभ’ में ओजोन की कुछ मात्रा को सकल स्तंभ ओजोन (total column ozone) कहते हैं । इसे डाबसन इकाई (Dobson Units or DU) में मापा जाता है जो ओजोन पर्त की मोटाई को समुद्रतल पर सामान्य दाब और ताप वाले शुद्ध ओजोन गैस की समतुल्य पर्त के रूप में नापती है । इसका मतलब यह है कि समुद्र तल पर सामान्य ताप और दाब पर 100 DU एक मिलीमीटर शुद्ध ओजोन गैस के बराबर है ।

ओजोन आक्सीजन का वह रूप है जिसमें दो की जगह तीन परमाणु होते हैं । यह वायुमंडल में प्राकृतिक रूप से, प्रकाश के द्वारा आक्सीजन के अणुओं के विखंडन से पैदा होती है । इस तरह ओजोन प्राकृतिक प्रक्रियाओं के कारण लगातार टूटती रहती है जिससे ओजोन पर्त में उसका संतुलन बना रहता है । प्रदूषकों के अभाव में ओजोन का निर्माण और विखंडन पूरी तरह प्राकृतिक शक्तियों से संचालित होता है ।

पर कुछ प्रदूषकों की मौजूदगी ओजोन के विघटन में तेजी ला सकती है । यह पहले भी पता था कि ओजोन के संकेंद्रण में घटत-बढ़त होती है और कभी-कभी ओजोन की मात्रा जरा-सी कम हो जाती है । लेकिन ओजोन का बड़े पैमाने पर नाश जिसे ‘ओजोन छिद्र’ (Ozone Hole) भी कहते हैं, 1985 में ही सामने आया जब कुछ ब्रिटिश शोधकर्ताओं ने ओजोन पर्त के माप प्रकाशित कराए ।

इन परिणामों के कुछ ही समय बाद ओजोन पर्त संबंधी अनुसंधान में और तेजी आई और पक्के तौर पर साबित हो गया कि सी एफ सी (CFCs) गैसें उसमें कमी ला रही हैं । CFCs (chlorofluorocarbons) अत्यंत स्थायी, अज्वलनशील, अविषाक्त और प्रयोग में सुरक्षित होते हैं । इस कारण वे एरोसोल, वातानुकूलकों, रेफ्रिजरेटरों और अग्निशामकों जैसे अनेक औद्योगिक उपयोगों के लिए आदर्श हैं ।

झाग और फुवार छोड़नेवाले अनेक डिब्बों (जैसे परफ्यूमों, रूम फ्रेशनर आदि के डिब्बों) में क्लोरोफ्लोरोकार्बन होते हैं । इनका उपयोग चटाइयों और सोफों, फेंकने-योग्य स्टाइरोफोम कपों, काँच, कुचालन के लिए पैकेजिंग सामग्री के बनाने में, शीतघर आदि में भी होता है । पर अपने स्थायित्व के कारण वायुमंडल में CFCs का जीवन लंबा होता है ।

हैलोनों (Halons) का ढाँचा भी क्लोरोफ्लोरोकार्बनों जैसा होता है पर इनमें क्लोरीन की बजाय ब्रोमीन के परमाणु होते हैं । वे ओजोन पर्त के लिए क्लोरोक्लोरोकार्बनों से भी खतरनाक हैं । हैलोन अग्निशामक पदार्थों के रूप में प्रयुक्त होते हैं क्योंकि आग बुझाने के दौरान वे लोगों और उपकरणों को हानि नहीं पहुँचाते ।

क्लोरोफ्लोरोकार्बन और हैलोन मुक्त होने के बाद ऊपरी वायुमंडल में पहुँच जाते हैं । चूँकि वे हवा से भारी होते हैं, इसलिए पवन वेग (air currents) उन्हें उड़ाकर निचले वायुमंडल के ठीक ऊपर तक पहुँचाती हैं जहाँ से वे विसरण के द्वारा धीरे-धीरे ऊपरी वायुमंडल में पहुँच जाते हैं । यह एक धीमी प्रक्रिया है और इसमें 10 से 15 वर्ष लग सकते हैं । समतापमंडल में पराबैंगनी किरणें रासायनिक बंधन को तोड़कर क्लोरोफ्लोरोकार्बन से क्लोरीन को मुक्त करा देती हैं ।

यह फिर ओजोन के अणुओं पर क्रिया करके उनको, ऑक्सीजन के अणुओं और परमाणुओं में बदल देती है । बावजूद इसके कि पूरे संसार में क्लोरोफ्लोरोकार्बनों का वितरण एकसमान है, ओजोन का विनाश खास तौर पर दक्षिणी ध्रुव पर हुआ है । अंटार्कटिक के वायुमंडल में मौसम की अतिवादी दशाएँ इसका कारण हैं । बर्फ के डलों की मौजूदगी से CI-O संयोग (CI-O bonding) आसान हो जाता है । आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के और दक्षिणी अमरीका के कुछ भागों के ऊपर भी ओजोन पर्त कमजोर हुई है ।

भारत ने 1992 में माट्रियल प्रोटोकोल पर हस्ताक्षर किए जिसका मकसद ओजोन को हानि पहुँचाने वाले पदार्थों के उत्पादन और उपभोग पर नियंत्रण लगाना है ।

ओजोन की हानि: यह क्या करती है ? (Ozone Depletion: What does it do ?):

मानवजति के लिए ओजोन पर्त के परिवर्तन के गंभीर निहितार्थ हैं ।

i. मानव के स्वास्थ्य पर प्रभाव (Effects on human health):

पराबैंगनी किरणों के बढ़ने पर त्वचा का जलना, मोतियाबिंद, त्वचा में झुर्रियाँ और त्वचा का कैंसर जैसे रोग होते हैं । यह शरीर की प्रतिरोधी क्षमता को दबाकर उसकी प्रतिरक्षा व्यवस्था को कमजोर करती है जिससे चेचक, खसरा जैसे संक्रामक रोग और अन्य विषाणुजन्य रोग जैसे शरीर पर दाने पड़ना और त्वचा के रास्ते मलेरिया जैसे परजीवी कीटाणुओं से होनेवाले रोग होते हैं ।

ii. खाद्य-उत्पादन (Food production):

पराबैंगनी विकिरण प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के दौरान पौधों की प्रकाश ग्रहण करने की क्षमता को प्रभावित करता है । इससे पोषक तत्त्वों का अंश कम हो जाता है और पौधों की वृद्धि मारी जाती है । फलियों वाले पौधों और बंदगोभी के बारे में यह बात खासकर देखी जा सकती है ।

पराबैंगनी विकिरण पौधों और प्राणियों के प्लैंकटनों (planktons) को हानि पहुँचाता है । जूप्लैंकटनों (Zooplanktons, सूक्ष्म प्राणियों) में विकिरण से परिवर्तन के कारण प्रजनन काल कम हो जाता है । चूँकि प्लैंकटन सागरीय खाद्य-शृंखला के आधार हैं, उनकी संख्या और प्रजाति संरचना में कोई परिवर्तन मछलियों और घोंघो के उत्पादन को प्रभावित करता है ।

iii. पदार्थों पर प्रभाव (Effects on materials):

विकिरण में वृद्धि रंगों वस्त्रों को हानि पहुँचाती है और वे जल्दी ही बेरंग हो जाते हैं ।

iv. जलवायु पर प्रभाव (Effects on climate):

प्रदूषण से होनेवाले वायुमंडलीय परिवर्तन विश्वव्यापी उष्णता के लिए जिम्मेदार हैं । यह ऐसी संवृत्ति (phenomenon) है जो कार्बन डाइआक्साइड, नाइट्रोजन के आक्साइडों, मिथेन और क्लोरोफ्लोरोकार्बन जैसी कुछ गैसों का संकेंद्रण बढ़ने से पैदा होती है । पृथ्वी पर किए गए प्रेक्षणों से असंदिग्ध रूप से पता चलता है कि वायुमंडल के जलवाष्प, कार्बन डाइआक्साइड, मिथेन, नाइट्रोजन आक्साइड और क्लोरोफ्लोरोकार्बन जैसे घटक पृथ्वीतल के निकट अवरक्त (infra-red) विकिरण के रूप में गर्मी सोखते हैं ।

इसे ‘ हरितगृह प्रभाव’ (Greenhouse Effects) कहते हैं । यह जो कुछ एक पौधाघर में होता है यह प्रवृत्ति उससे मेल खाती है । पौधाघर का शीशा सूरज की गर्मी को अंदर आने देता है जिसे अंदर मौजूद वस्तुएँ सोख लेती हैं । ये वस्तुएँ पार्थिव विकिरण (terrestrial radiation) के रूप में गर्मी छोड़ती हैं जो शीशे से बाहर नहीं जाने पाती । इस तरह गर्मी पौधाघर के अंदर ही बंद रहती है जिससे अंदर का तापमान बढ़ता है और पौधों की अच्छी तरह वृद्धि होती है ।

विश्वव्यापी उष्णता के अनेक प्रतिकूल प्रभाव हो सकते हैं:

i. पृथ्वी का ताप बढ़ने पर ध्रुवों की बर्फ पिघलेगी जिससे समुद्रों और तटीय क्षेत्र जलमग्न होंगे ।

ii. बांग्लादेश और मालदीव जैसे देशों में यह बात घातक हो सकती है । समुद्र का तल अगर तीन मीटर बढ़ जाए तो मालदीव पूरी तरह जल के नीचे होगा ।

iii. तापमान में वृद्धि से खेतिहर पैदावार कम होगी ।

iv. सौर ऊर्जा के वितरण में परिवर्तन से आवासों में परिवर्तन आ सकते हैं । कोई उत्पादक खेतिहर क्षेत्र गंभीर सूखे का शिकार हो सकता है जबकि रेगिस्तानी क्षेत्रों में वर्षा हो सकती है । इसके कारण प्राकृतिक पौधों, खेतिहर फसलों, कीटों, पालतू पशुओं और सूक्ष्म जीवों की प्रजातियाँ बदल सकती हैं ।

v. विश्वव्यापी उष्णता के कारण तापमान बढ़ने पर ध्रुव क्षेत्रों में घातक प्रभाव होंगे । अलास्का की हिमाच्छित मिट्‌टी में भारी मात्रा में मिथेन कैद है । तुषार के पिघलने पर मुक्त होनेवाली मिथेन विश्वव्यापी उष्णता की प्रक्रिया में तेजी ला सकती है ।

वायु प्रदूषण पर नियंत्रण के उपाय (Control Measures for Air Pollution):

वायु प्रदूषण को दो बुनियादी ढंगों से नियंत्रित किया जा सकता है: रोकथाम की तकनीकों और बहिस्त्राव (affluent) पर नियंत्रण से । वायु प्रदूषण के नियंत्रण के कारगर तरीकों में एक है सही उपकरणों की     व्यवस्था । इनमें निकलनेवाली गैसों से स्क्रबर के द्वारा प्रदूषकों को निकालना, संग्रह और निकास की बंद प्रणालियों का उपयोग (ताकि प्रदूषकों के बाहर निकलने से पहले ही उनको जमा किया जा सके), शुष्क-नम संग्राहकों, फिल्टरों, स्थिर-विद्युतीय प्रक्षेपकों आदि का उपयोग शामिल है ।

धुएँ की अधिक ऊँची चिमनियाँ लगाने से प्रदूषक जमीन से यथासंभव दूरी पर मुक्त होते हैं । उद्योगों का स्थान सावधानी से तय किया जाना चाहिए ताकि स्थलाकृति और पवनों की दिशाओं पर विचार करके प्रदूषण के प्रभाव को कम से कम किया जा सके । अधिक प्रदूषण पैदा करने वाली वस्तुओं की जगह कम प्रदूषण पैदा करनेवाली वस्तुओं के उपयोग से भी वायु प्रदूषण की रोकथाम हो सकती है ।


भारत में वायु प्रदूषण (Air Pollution in India):

संसार के केवल विशाल नगरों का मूल्यांकन करनेवाले विश्व स्वास्थ्य संगठन ने नई दिल्ली को संसार का चौथा सबसे प्रदूषित नगर बतलाया है । पर भारत के अन्य नगरों की तुलना में दिल्ली प्रदूषित नगरों की सूची में ऊपर नहीं है । हमारे देश में प्रदूषण के अनेक प्रमुख स्थल हैं ।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Central Pollution Control Board-CPCB) के हाल के प्रकाशन परिवेश (जनवरी 2003) में कहा गया है कि अहमदाबाद की हवा सबसे विषैली है, फिर कानपुर, शोलापुर और लखनऊ का स्थान आता है और इनमें छोटे कणों (PM10) का स्तर मानक स्तर 60 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर (mg/m3) से 3-4 गुना अधिक है ।

इस रिपोर्ट ने श्वसनीय कण पदार्थ (Respirable Particulate Matter-RSPM) के स्तरों के अनुसार वर्ष 2000 में 29 नगरों का श्रेणीकरण किया था । यह रिपोर्ट भारतीय नगरों में भारी प्रदूषण की पुष्टि करती है; इनमें 14 नगर तो चिंताजनक स्तर को छू रहे हैं ।

अधिकांश बड़े नगरों में नाइट्रोजन डाइआक्साइड का स्तर आम तौर पर 60 mg/m3 के वार्षिक स्वीकार्य स्तर के पास है । लेकिन वाहनों की भारी संख्या और यातायात वाले कुछ नगरों में इसमें भारी वृद्धि देखी गई है, जैसे कोलकाता और दिल्ली के कुछ क्षेत्रों में, जिससे यातायात के भारी प्रभाव का संकेत मिलता है । केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने वाहनों को वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में एक ठहराया है ।

लेकिन दिल्ली में पिछले कुछ वर्षों से लागू किए गए सख्त उपायों से जैसे यूरो-II (Euro-II) मानदंड के व्यवहार से जिससे ईंधन में गंधक का घटक कम होकर 500 ppm रह गया है, और सी एन जी (Compressed Natural Gas-CNG) कार्यक्रम के आरंभ से वायु की गुणवत्ता बढ़ी है ।

छोटे नगरों और खासकर बड़े व्यापार केंद्रों के पास स्थित छोटे नगरों के तीव्र नगरीकरण से यातायात में तेजी से बढ़त्तरी हुई है, खासकर दुपहिया और तिपहिया और डीजल के वाहनों जैसे सबसे अधिक प्रदूषक वाहनों के यातायात में । इस बात ने और साथ में घटिया ईंधन के प्रयोग ने बड़े पैमाने पर वायु की गुणवत्ता को गिराया है ।

चिंताजनक बात यह है कि वायु प्रदूषण में आवासीय क्षेत्र तेजी से औद्योगिक क्षेत्रों से आगे निकले जा रहे हैं । इसका मतलब यह है कि वाहनों का धुआँ इस प्रवृत्ति के लिए जिम्मेदार है । सर्वोच्च न्यायालय के 5 अप्रैल 2002 के आदेश ने केंद्र सरकार को दूसरे प्रदूषित नगरों के बारे में एक कार्रवाई योजना तैयार करने का निर्देश दिया था । कार्रवाई की किसी स्थानीय पहल के अभाव में और वायु प्रदूषण पर नियंत्रण के उपायों में देरी के कारण स्थिति और बदतर ही होगी ।

ताजमहल के संरक्षण में भी सर्वोच्च न्यायालय की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है । सल्फर डाइआक्साइड और निलंबित कण पदार्थों के संपर्क के कारण ताज को ‘संगमरमर का कैंसर’ (marble cancer) हो रहा था जिसमें कवक लगने के कारण सतह घिस रही थी और उसका रंग पीला पड़ रहा था । कण पदार्थों के जमाव से ताजमहल काला पड़ रहा था । पर्यावरण विशेषज्ञ वकील श्री एम सी मेहता ने 1984 में जनहित याचिका दायर की जिसमें आगरा की प्रदूषक इकाइयों से ताज को होते वाली क्षति पर चिंता प्रकट की गई थी ।

12 साल बाद सर्वोच्च न्यायालय ने आसपास के 292 उद्योगों को या तो प्रदूषण के उपाय करने या उन्हें ताला लगाए जाने के आदेश दिए । उसने इन इकाइयों के लिए अनिवार्य बना दिया कि या तो वे पर्यावरण-स्नेही ईंधन, जैसे प्राकृतिक गैस, का उपयोग करें या ये इकाइयाँ कहीं और लगाई जाएँ ।

वायु की गुणवत्ता की निगरानी (Air Quality Monitoring):

इस समय भारत में वायु प्रदूषण की निगरानी की कोई सुस्थापित व्यवस्था नहीं है । 1960 के दशक के अंतिम वर्षों में जब वायु की गुणवत्ता की निगरानी आरंभ की गई तो योजनाकारों ने केवल सल्फर डाइआक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइडों और कणपदार्थ जैसे कुछ ही प्रदूषकों पर ध्यान दिया । कार्बन मोनोआक्साइड और सीसा जैसे अन्य प्रदूषकों की बस सीमित निगरानी की जाती थी । बेंजीन, ओजोन और छोटे कणों से होने वाली हानि का ज्ञान नहीं था क्योंकि इनकी निगरानी की ही नहीं जाती थी ।

भारतीय नगरों की वायु की गुणवत्ता पर एक आँकड़ा-भंडार (database) राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी संस्थान (NEERI), नागपुर के निगरानी केंद्रों ने तैयार किया है । CPCB ने 1985 में वायु की गुणवत्ता की निगरानी का अपना कार्यक्रम आरंभ किया । इसके लिए आँकड़े राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों ने दिए जो फिर केंद्रीय बोर्ड को भेज दिए गए ।

विशेषज्ञों का मानना है कि निगरानी के समुचित स्टेशनों के अभाव में वायु की गुणवत्ता की निगरानी का मौजूदा नेटवर्क नगरों में वायु प्रदूषण की सच्ची तस्वीर पेश नहीं कर सकता । इसके अलावा निगरानी के अंतर्गत आने वाले प्रदूषकों की सूची में कुछ अन्य विषैले पदार्थों को अभी तक शामिल नहीं किया गया है ।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा विकसित भारत में वायु की गुणवत्ता के मानदंड:

 

 

भारत में वायु प्रदूषण नियंत्रण के वैधानिक पहलू (Legal Aspects of Air Pollution in India):

1981 में वायु (प्रदूषण रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम पारित किया गया । इसमें वायु प्रदूषण की रोकथाम, उस पर नियंत्रण रखने और उसमें कमी लाने की व्यवस्था थी । इस अधिनियम में अधिसूचित क्षेत्रों में प्रदूषण फैलाने वाली कोई भी औद्योगिक गतिविधि राज्य के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुमति के बिना आरंभ नहीं की जा सकती । लेकिन यह कानून इतना सख्त न था कि कोई चेतावनी देता या सुधार ला सकता । भोपाल दुर्घटना के बाद 1986 में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम को और व्यापक बनाया गया ।

इसमें पहली बार क्रियान्वयन के संगठनों को पर्यावरण को हानि पहुँचानेवाले किसी कार्यकलाप पर दंड दे सकने की शक्तियाँ दी गई थीं । वाहन यातायात को संचालित करने के लिए 1939 के केंद्रीय मोटरवाहन अधिनियम को 1989 में संशोधित किया गया । इस संशोधन के बाद वाहन मालिकों के लिए धुएँ के निकास संबंधी नियम अधिसूचित किए गए और 1991 में पहली बार वाहन निर्माताओं के लिए निकास संबंधी मानदंड लागू किए गए । इन मानदंडों को 2000 में फिर संशोधित किया गया ।

एक सुस्पष्ट कार्यक्रम के रूप में वायु की गुणवत्ता की निगरानी भारत में अभी भी आरंभ नहीं हुई है । हमें वायु-गुणवत्ता के प्रबंध की इसके कहीं अधिक सख्त प्रणाली की आवश्यकता है ताकि हमें स्वच्छतर हवा मिल सके । इसके लिए एक सख्त वायु प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम के साथ एक समन्वित दृष्टिकोण भी आवश्यक है ।

इस विषय में कुछ सुझाव इस प्रकार हैं:

i. प्रदूषण के नियंत्रण के बदले रोकथाम पर अधिक जोर देना ।

ii. जीवाश्म ईंधनों का प्रयोग कम करना ।

iii. वाहनों में प्रयुक्त ईंधन की गुणवत्ता सुधारना ।

iv. नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग को बढ़ाना ।

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