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Essay on Biodiversity

Read this essay in Hindi learn about biodiversity and its various types.

परिचय (Introduction): 

पृथ्वी पर जीवन की विविधता है । प्राणियों की विविधता वह आधार है जिसका उपयोग अपनी वृद्धि और विकास के लिए हर सभ्यता ने किया है । जिन्होंने प्रकृति की इस देन का उपयोग बुद्धिमता से और निर्वहनीय ढंग से किया, वे सभ्यताएँ जीवित रहीं जबकि उसका अति-उपयोग या दुरुपयोग करनेवाली सभ्यताएँ नष्ट हो गईं ।

विज्ञान एक सदी से भी अधिक समय से प्रकृति की विविधता का वर्गीकरण करने का प्रयास करता रहा । इसके कारण उसे पौधों और प्राणियों के समुदायों में विविध प्रकारों का ज्ञान हुआ । इस जानकारी से पृथ्वी की जीव संपदा का प्रयोग मानवजाति के लाभ के लिए करने में सहायता मिली और यह ‘विकास’ की प्रक्रिया का अभिन्न अंग रहा है । इसमें बेहतर स्वास्थ्य-रक्षा, बेहतर फसलें तथा औद्योगिक विकास के लिए इन जीवनरूपों का उपयोग भी शामिल है जिसके कारण विकसित देशों में जीवन का स्तर ऊँचा उठा है ।

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लेकिन इसी कारण आधुनिक उपभोक्तावादी समाज भी पैदा हुआ है जो उन्हीं जैविक संसाधनों की विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है जिन पर वह आधारित है । पृथ्वी पर जीवन की विविधता इतनी अधिक है कि अगर हम उसका निर्वहनीय उपयोग करें तो अनेक पीढ़ियों तक जैव-विविधता से नए-नए उत्पादों का विकास करते रहेंगे । यह तभी होगा जब हम जैव-विविधता का उपयोग एक कीमती संसाधन के रूप में करें और प्रजातियों के विनाश को रोकें ।

परिभाषा (Definition):

जैविक विविधता (biological diversity) अथवा जैव-विविधता (biodiversity) प्रकृति का वह अंग है जिसमें किसी प्रजाति के अलग-अलग सदस्यों में जीन (genes) की विविधता शामिल है; स्थानीय, क्षेत्रीय तथा वैश्विक स्तर पर पौधों और प्राणियों की तमाम प्रजातियों की विविधता और समृद्धि शामिल है तथा एक सुनिश्चित क्षेत्र में पारितंत्रों के स्थलीय प्रकार शामिल हैं ।

जैव-विविधता क्या है ? (What is Biodiversity):

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जैव-विविधता का संबंध जैवमंडल में प्रकृति की विविधता की मात्रा से है । इस विविधता को तीन स्तरों पर देखा जा सकता है-एक प्रजाति के अंदर ही जीनों का अंतर, एक समुदाय के अंदर प्रजातियों की विविधता, तथा पौधों और प्राणियों के सुस्पष्ट समुदायों में किसी क्षेत्र की प्रजातियों का संगठन ।

जननिक विविधता (Genetic Diversity):

पौधों या प्राणियों की किसी प्रजाति का हर सदस्य अपनी जीनों की संरचना में दूसरे सदस्यों से बहुत भिन्न होता है । इसका कारण हर सदस्य को अपनी खास विशेषताएँ प्रदान करनेवाली जीनों के संभावित संयोगों की भारी संख्या है । उदाहरण के लिए हर मनुष्य दूसरे मनुष्यों से बहुत भिन्न होता है । किसी प्रजाति की जनसंख्या के स्वस्थ प्रजनन के लिए यह जननिक अथवा आनुवंशिक विविधता अनिवार्य है । प्रजनन करने वालों की संख्या कम हो जाए तो जीनों की संरचना की असमानता कम हो जाती है और अपने सीमित जीनों में ही प्रजनन होने लगता है ।

इससे जननिक असमानताएँ पैदा होती हैं और अंततः उस विशेष प्रजाति का विनाश हो जाता है । वन्य प्रजातियों की यह विविधता ही वह ‘जीन कोष’ (gene pool) है जिससे हजारों वर्षों से हमारी फसलों और हमारे पालतू पशुओं का विकास हुआ है ।

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इनके वन्य संबंधियों का उपयोग करके आज अधिक उत्पादक, रोग-प्रतिरोधी फसलों की नई किस्में तैयार की जा रही हैं, बेहतर मवेशी विकसित किए जा रहे हैं और इस प्रकार प्रकृति की इस देन का और भी उपयोग किया जा रहा है । आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी भी बेहतर दवाएँ और अनेक प्रकार की औद्योगिक वस्तुएँ विकसित करने के लिए जीनों में फेरबदल कर रही है ।

प्रजातीय विविधता (Species Diversity):

किसी क्षेत्र में मौजूद पौधों और प्राणियों की प्रजातियों की संख्या ही उसकी प्रजातीय विविधता है । यह विविधता प्राकृतिक और खेतिहर, दोनों तरह के पारितंत्रों में देखी जाती है । प्रजातियों की दृष्टि से कुछ क्षेत्र दूसरे क्षेत्रों से अधिक समृद्ध हैं । उदाहरण के लिए, इमारती लकड़ी के उत्पादन के लिए वन विभाग द्वारा विकसित फसली बागानों की अपेक्षा प्राकृतिक और अप्रभावित ऊष्णकटिबंधीय वनों में प्रजातियों की संख्या काफी अधिक है ।

एक प्राकृतिक वन का पारितंत्र बड़ी संख्या में इमारती लकड़ी से भिन्न अन्य वस्तुएँ भी प्रदान करता है जिन पर स्थानीय जनता निर्भर होती है, जैसे फल, जलावन लकड़ी, चारा, रेशे, गोंद, रेजिन और दवाएँ ।

इमारती लकड़ी के बागान उतनी संख्या में भिन्न-भिन्न वस्तुएँ प्रदान नहीं करते जो स्थानीय उपयोग के लिए आवश्यक हैं । हम कह सकते हैं कि इमारती लकड़ी से भिन्न इन वस्तुओं से प्राप्त निर्वहनीय आर्थिक लाभ इमारती लकड़ी के लिए एक जंगल की कटाई से प्राप्त होनेवाले लाभ से अधिक होता है । इस तरह एक बागान के मुकाबले प्रजातियों से समृद्ध एक प्राकृतिक वन का व्यापारिक मूल्य काफी अधिक होता है । परंपरागत कृषि-पशुपालक खेतिहर प्रणालियों में अधिक फसलें बोई जाती थीं; उनकी अपेक्षा आधुनिक सघन खेतिहर पारितंत्रों में फसलों की विविधता कम होती है ।

अभी तक संरक्षण वैज्ञानिकों (conservation scientists) ने पृथ्वी पर कोई 18 लाख प्रजातियों की पहचान की है और उनका वर्गीकरण किया है । पर यह वर्गीकरण वास्तव में पाई जाने वाली प्रजातियों का एक बहुत छोटा भाग है । अनेक नई प्रजातियों की पहचान की जा रही है, खासकर फूल देनेवाले पौधों और कीड़ों की । प्रजातियों से समृद्ध क्षेत्रों को विविधता के ‘मुख्यस्थल’ (‘hotspots’ of diversity) कहा जाता है । भारत दुनिया के उन 15 देशों में है जो प्रजातीय विविधता की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध हैं ।

पारितंत्रीय विविधता (Ecosystem Diversity):

पृथ्वी पर पारितंत्रीय विविधता बहुत अधिक है, और हर पारितंत्र में आवास की भिन्नताओं के आधार पर परस्पर पूरक, समृद्ध, और सुस्पष्ट प्रजातियों का अपना लोक है । पारितंत्रीय विविधता का वर्णन एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र के अनुसार भी किया जा सकता है और देश, राज्य या तालुका जैसी राजनीतिक इकाइयों के अनुसार भी । सुस्पष्ट पारितंत्रों में वन, घासस्थल, रेगिस्तान और पर्वत जैसे भूदृश्य भी आते हैं और नदी, झील या समुद्र जैसे पारितंत्र भी । हर इलाके में खेत या चरागाह जैसे मानव द्वारा संशोधित क्षेत्र भी आते हैं ।

एक पारितंत्र को तब ‘प्राकृतिक’ कहा जाता है जब वह मानव के कार्यकलापों से अपेक्षाकृत अप्रभावित हो और तब ‘संशोधित’ कहा जाता है जब उसका दूसरे उपयोगों के लिए परिर्वतन किया जाए, जैसे खेत या नगरीय भूमि के रूप में । पारितंत्र निर्जन क्षेत्रों में सबसे अधिक प्राकृतिक होते हैं । पारितंत्रों का अति-उपयोग या दुरुपयोग करने पर उनकी उत्पादकता अंततः कम हो जाती है और तब उनको निम्नकोटि का कहा जाता    है ।

उद्‌विकास और जैव-विविधता का जन्म (Evolution and the Genesis of Biodiversity):

कोई साढ़े तीन अरब साल पहले पृथ्वी पर जीवन का आरंभ आज भी अस्पष्ट है । जीवन का आरंभ संभवतः पृथ्वी के आदिम समुद्रों में कार्बनिक प्रतिक्रियाओं (organic reactions) के फलस्वरूप हुआ । कीचड़ में या बाहरी अंतरिक्ष से जीवन के आरंभ की वैकल्पिक संभावनाएँ भी सुझाई गई हैं । पृथ्वी पर जीवन के आरंभ के बाद उसमें धीरे-धीरे विविधता भी आने लगी । एककोशिकीय अविशिष्ट रूपों (unicellular unspecialized forms) का विकास धीरे-धीरे जटिल, बहुकोशिकीय पौधों और प्राणियों के रूप में हुआ ।

उद्विकास का संबंध जीवित कायाओं की अपने वातावरण के परिवर्तनों से तालमेल करने की क्षमता से है । इस तरह प्रकृति के अजैव परिवर्तनों ने-जैसे जलवायु और वायुमंडल की उथलपुथल ने, बार-बार आनेवाले बर्फीले तूफानों ने, महाद्वीपों के अपसरण (continental drifting) और भौगोलिक बाधाओं के जन्म ने-पौधों और प्राणियों के विभिन्न समुदायों को अलग-अलग कर दिया और धीरे-धीरे, लाखों वर्षों के दौरान नई प्रजातियों का जन्म हुआ ।

अधिकांश प्रजातियों का जीवनकाल कई लाख वर्षों का होता है । आवास के क्रमिक परिवर्तनों से उनकी अनुकूलन करने की क्षमता तथा नवजात प्रजातियों के साथ उनकी अंतःक्रियाओं ने परस्पर संबद्ध प्रजातियों के समूह पैदा किए जिनका साथ-साथ विकास होता रहा । खाद्य-शृंखलाएँ, शिकार-शिकारी संबंध, परजीवीपन (दूसरी प्रजातियों पर पूर-पूरी निर्भरता) और सहनिवास (दोनों प्रजातियों के लिए लाभदायी भागीदारी) कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण हैं ।

एक प्रजाति-समुदाय में शामिल विभिन्न प्रजातियों के व्यवहार के प्रतिमान (पैटर्न) उनकी प्रजनन क्रिया, बच्चों को खिलाने-पिलाने के ढंग, स्थान परिवर्तन आदि के द्वारा उनको एक-दूसरे से जोड़ते हैं । पृथ्वी पर उथलपुथल के कारण जब प्राचीन प्रजातियों का विनाश हुआ तो उनके आवास में खाली ‘ताक’ (empty niches) रह गए जिसके कारण मौजूद प्रजातियों को उनको भरने के लिए नई प्रजातियों को जन्म देने की प्रेरणा मिली । पृथ्वी के प्राचीन इतिहास में महाविनाश के काल भी रहे हैं और उसके बाद नई प्रजातियों के जन्म के काल भी आए हैं ।

इनके कारण बार-बार प्रजातियों की संख्या कम हुई, और फिर पृथ्वी पर मौजूद प्रजातियों की संख्या में क्रमिक वृद्धि के कारण हर बार जीवन की विविधता फिर पनपी । लेकिन इसमें लाखों साल लग गए क्योंकि उद्विकास बहुत ही धीमी प्रक्रिया है । इसलिए जब कोई 20 लाख साल पहले मानव का जन्म हुआ तो पृथ्वी पर पहले की अपेक्षा प्रजातियों की समृद्धि अधिक थी ।

लेकिन आधुनिक मानव के कार्यों के कारण हाल के वर्षों में प्रजातियों का विनाश इतनी तेजी से हो रहा है कि प्रकृति को नई प्रजातियों के विकास का समय नहीं मिल रहा । पहले की अपेक्षा आज पृथ्वी अधिक तेजी से प्रजातियों से वंचित हो रही है ।

तीनों-जननिक, प्रजातीय, पारितंत्रीय-स्तरों पर जीवन की विविधता में आज बदलाव आधुनिक मानव की देन है । इससे भावी पीढ़ियों को भारी हानि का सामना करना पड़ेगा ।

भारत का जैव-भौगोलिक वर्गीकरण (Biogeographic Classification of India):

भूगोल, जलवायु, वनस्पतियों के प्रतिमान तथा स्तनपायी प्राणियों, पक्षियों, सरीसृपों, जलथलचरों, कीड़े-मकोड़ों और दूसरे अकशेरुकी प्राणियों के समुदायों के आधार पर हमारे देश को आसानी से दस प्रमुख क्षेत्रों में बाँटा जा सकता है । इनमें से हर क्षेत्र में वन, घास के मैदान, झीलें, नदियाँ, नमभूमि, पहाड़ और पहाड़ियों जैसे अनेक प्रकार के पारितंत्र हैं और उनमें पौधों और प्राणियों की अलग-अलग प्रजातियाँ हैं ।

भारत के जैव-भौगोलिक क्षेत्र (Indias Biogeographic Zones):

i. ठंडा, बर्फ से ढँका, लद्‌दाख का हिमालयी क्षेत्र ।

ii. हिमालय की पर्वतमालाएँ तथा कश्मीर, हिमाचलप्रदेश, झारखंड, असम और दूसरे पूर्वोत्तर राज्यों की वादियाँ ।

iii. तराई की निम्नभूमि (lowland) जहाँ हिमालय से निकली नदियाँ मैदानों में प्रवेश करती हैं ।

iv. गंगा और ब्रह्मपुत्र के मैदान ।

v. राजस्थान का थार रेगिस्तान ।

vi. दकन के पठार, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु के अर्धशुष्क घास के मैदान ।

vii. भारत के पूर्वोत्तर राज्य

viii. महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल का पश्चिमी घाट ।

ix. अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह ।

x. पश्चिम और पूर्व की लंबी समुद्रतटीय पट्‌टियाँ जिनमें रेतीले तट, वन और मैनग्रोव हैं ।

जैव-विविधता का मूल्य (Value of Biodiversity):

अपनी प्रजातियों और पारितंत्रों के कारण जैव-विविधता से अनेक प्रकार के पर्यावरण संबंधी लाभ होते हैं जो अंतर्राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और स्थानीय स्तरों पर महत्त्वपूर्ण हैं । आक्सीजन का उत्पादन, कार्बन डाइआक्साइड में कमी, जल-चक्र की निरंतरता और मिट्‌टी की सुरक्षा ऐसे कुछ महत्वपूर्ण लाभ हैं । आज दुनिया इस बात को मानती है कि जैव-विविधता की हानि जलवायु में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर परिवर्तन ला रही है । वन कार्बन डाइआक्साइड को कार्बन और आक्सीजन में बदलने के प्रमुख साधन हैं ।

वनों के आवरण का विनाश और साथ में औद्योगीकरण के कारण कार्बन डाइआक्साइड और अन्य गैसों का बढ़ता उत्पादन ‘हरितगृह प्रभाव’ में वृद्धि कर रहा है । विश्वव्यापी उष्णता बर्फीले शिखरों को गला रही है जिससे समुद्रों का जलस्तर बढ़ रहा है और इसके कारण दुनिया के नीची सतहों वाले क्षेत्र आखिरकार डूब जाएँगे । इससे वातावरण में भी भारी परिवर्तन आ रहे हैं और तापमान बढ़ रहा है, कुछ क्षेत्रों में भयंकर सूखे पड़ रहे हैं तो कुछ अन्य क्षेत्रों में अप्रत्याशित बाढ़ें आ रही हैं ।

जैव-विविधता पारितंत्रीय प्रक्रियाओं के लिए भी अनिवार्य है:

पोषक तत्त्वों का पुनर्चालन, मृदा का निर्माण, जल और वायु का परिचालन और उनकी सफाई, विश्वस्तर पर जीवन के आधार (पौधे CO2 लेकर O2 छोड़ते हैं) को बनाए रखना, पारितंत्रों के अंदर जल के संतुलन की निरंतरता को बनाए रखना, जलविभाजक (watershed) संरक्षण, वर्षभर नदियों और नालों में प्रवाह की निरंतरता, अपरदन पर नियंत्रण और स्थानीय बाढ़ों में कमी ।

भोजन, वस्त्र, आवास, ऊर्जा, दवाएँ-ये सभी ऐसे संसाधन हैं जिनका जैवमंडल की जैव-विविधता से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध है । यह बात जनजातीय समुदायों के सिलसिले में सबसे स्पष्ट है जो वनों से सीधे संसाधन पाते हैं या मछुआरों के लिए भी जो समुद्री या ताजे जल के पारितंत्रों में मछलियाँ पकड़ते हैं ।

कृषक जैसे दूसरे समुदायों के मामले में जैव-विविधता का उपयोग पर्यावरण के अनुकूल फसलें उगाने के लिए किया जाता है । आम तौर पर नगरीय समुदाय ऐसी वस्तुओं और सेवाओं का सबसे अधिक उपयोग करता है जो प्राकृतिक पारितंत्रों से अप्रत्यक्ष रूप से प्राप्त होती हैं ।

आज यह बात स्पष्ट है कि मानवजाति के कल्याण और जीवनरक्षा के लिए जैविक संसाधनों का संरक्षण अनिवार्य है । निर्जन स्थानों पर तथा हमारी फसलों और पशुधन में मौजूद जीवित कायाओं की यह विविधता मानव के ‘विकास’ में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है । इसलिए जैव-विविधता का संरक्षण ऐसी किसी भी रणनीति का अभिन्न अंग है जिसका उद्‌देश्य मानव जीवन के स्तर को ऊँचा उठाना है ।

जैव-विविधता के मुख्यस्थल (Hotspots of Biodiversity):

पृथ्वी की जैव-विविधता अनेक पारितंत्री क्षेत्रों में विभाजित है । दुनिया में 1000 से अधिक प्रमुख ‘पारिक्षेत्र’ (ecoregions) हैं । इनमें से तो 200 सबसे समृद्ध, सबसे दुर्लभ और सबसे विशिष्ट प्राकृतिक क्षेत्र कहे जाते हैं । इन क्षेत्रों को ‘ग्लोबल 200’ कहा जाता है ।

अनुमान लगाया गया है कि 50,000 स्थानिक पौधों में, जो विश्वभर के पौधों का 20 प्रतिशत है, संभवतः सिर्फ 18 प्रमुख स्थलों में पाए जाते हैं । जिन देशों में जैव-विविधता के ऐसे प्रमुख स्थलों का भाग अपेक्षाकृत अधिक है उनको ‘भारी विविधता वाले देश’ कहा जाता है ।

हमारे पूरे देश में प्रजातियों का विनाश किस दर से हो रहा है, यह अस्पष्ट है । यह दर हो सकती है बहुत अधिक हो क्योंकि हमारे निर्जन क्षेत्र तेजी से सिकुड़ रहे हैं । विश्वस्तर पर मान्यता प्राप्त हमारे प्रमुख स्थल पूर्वोत्तर और पश्चिमी घाट के वनों में हैं जिनको संसार के सबसे जैव-समृद्ध क्षेत्रों में शामिल किया गया है । अंडमान-निकोबार अत्यंत प्रजाति समृद्ध द्वीपसमूह है तथा यहाँ विभिन्न पशु-पक्षियों की अनेक उप-प्रजातियों का विकास हुआ है ।

स्थानीय अर्थात केवल भारत में मिलने वाली प्रजातियों की एक बड़ी संख्या इन्हीं तीन क्षेत्रों में केंद्रित है । अकेले भारत में थलचर स्तनपाइयों की 135 किस्मों में 85 (63 प्रतिशत) पूर्वोत्तर क्षेत्र में हैं । पूर्वोत्तर राज्यों में पौधों की 1500 स्थानिक प्रजातियाँ भी हैं । जलथलचारी और सरीसृप प्रजातियों, खास तौर पर साँपों की एक बड़ी संख्या पश्चिमी घाट में पाई जाती है । यहाँ पौधों की भी 1500 स्थानिक प्रजातियाँ मिलती हैं ।

भारत के समुद्रों को लें तो प्रवाल भित्तियाँ (coral reefs) अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह, लक्षद्वीप द्वीपसमूह तथा गुजरात और तमिलनाडु के खाड़ी क्षेत्रों को घेरे हुए हैं । इनमें उष्णकटिबंधीय वनों जितनी ही प्रजातियों की विविधता मिलती है ।

विश्वस्तर पर प्रजातियों की विविधता (Global Species Diversity) :

 


 

जैव-विविधता का संकट: आवास क्षति, वन्य प्राणियों का शिकार, मानव-वन्यजीवन टकराव (Threats to Biodiversity: Habitat Loss, Poaching of Wildlife, Man-wildlife Conflicts):

मानव अब इनमें से अधिकांश प्राकृतिक पारितंत्रों का अति-उपयोग करने लगा है । संसाधनों के इस अनिर्वहनीय उपयोग के कारण जो भूखंड कभी उत्पादक वन और घास के मैदान थे, अब रेगिस्तान बन चुके हैं और बंजर सारी दुनिया में फैल चुका है । जलावन लकड़ी और झींगापालन के लिए मैनग्रोव काटे गए हैं जिसके कारण समुद्री मछलियों के प्रजनन के लिए आवासों में कमी आई है । खेती की जमीन बढ़ाने के लिए नमभूमियों को सुखाया गया है । आगे चलकर इन परिवर्तनों के गंभीर आर्थिक परिणाम होंगे ।

निर्जन आवासों के बाकी बचे बड़े क्षेत्रों का इन दिनों विनाश जारी है, खासकर अद्‌भुत विविधता वाले उष्णकटिबंधीय वनों और प्रवाल भित्तियों के क्षेत्रों में । यह संसार भर में जैव-विविधता के लिए सबसे बड़ा जोखिम है । वैज्ञानिकों का अनुमान है कि मानव के कार्यकलाप 2050 तक लगभग एक करोड़ प्रजातियों को नष्ट कर सकते हैं ।

जैसा कि कहा गया, आज दुनिया में विज्ञान को पौधों और प्राणियों की लगभग 18 लाख प्रजातियों का ज्ञान है । लेकिन प्रजातियों की संख्या इससे कम से कम दस गुनी हो सकती है । अज्ञात पौधों और कीड़ों-मकोड़ों की तथा दूसरे जीवनरूपों की पहचान दुनिया में विविधता के प्रमुख स्थलों में की जा रही है । दुर्भाग्य से विनाश की दर यही रही तो दुनिया की लगभग 25 प्रतिशत प्रजातियाँ खासी तेजी से समाप्त हो जाएँगी । यह सब प्रतिवर्ष 10-20 हजार प्रजातियों की दर से हो सकता है जो संभावित प्राकृतिक दर से 1000-10,000 गुना अधिक है ।

मानव के कार्यकलाप अगले 25-30 वर्षों में दुनिया की 25 प्रतिशत प्रजातियों को खत्म कर सकते हैं । इस महाविनाश का काफी कुछ संबंध जनसंख्या की वृद्धि, औद्योगीकरण और भूमि के उपयोग में परिवर्तन से है । इस विनाश का एक बड़ा भाग निश्चित ही उष्णकटिबंधीय वनों, नमभूमियों और प्रवाल-भित्तियों जैसे जैव-समृद्ध क्षेत्रों में होगा । तेजी से बढ़ती जनसंख्या और अल्पकालिक आर्थिक विकास के कारण निर्जन आवासों का विनाश दुनियाभर में जैव-विविधता के तीव्र विनाश को बढ़ा रहा है ।

द्वीपों के प्राणी और पौधे, जो सभी ओर से समुद्र से घिरे छोटे-छोटे अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय होते हैं, अभी तक मानव के कार्यकलाप से सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं । इसके कारण अनेक द्वीपवासी पौधों और पशुओं का पहले ही विनाश हो चुका है (मेडागास्कर का डोडो इसका प्रसिद्ध उदाहरण है) ।

मनुष्य एक क्षेत्र की प्रजातियों को दूसरे क्षेत्र में लाता है, तब भी आवासों की हानि होती है और मौजूद समुदायों का संतुलन बिगड़ता है । इस प्रक्रिया में जानबूझकर या अनजाने में लाई गई प्रजातियों ने अनेक स्थानीय प्रजातियों का विनाश किया है और मानव के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाला है । (यूपेटोरियम, लैंटना, वाटर हायसिंथ, ‘कांग्रेस ग्रास’ या पार्थेनियम इसकी कुछ बदनाम मिसालें हैं ।)

कृषि या उद्योग के मकसद से बदले जाने के कारण या जल, वायु और मिट्‌टी के प्रदूषण के कारण प्राकृतिक पारितंत्रों का विनाश हो रहा है । इस कारण प्रजातियों का विनाश भी होता है ।

भारत में वनों और घास के मैदानों को लगातार खेती के कामों की ओर मोड़ा जा रहा है । कब्जों को अनेक बार कानूनी बनाया गया है । इसी तरह हमारी प्राकृतिक दलदल प्रणालियों को सुखाकर कृषिभूमि में बदल दिया गया है जिससे जलीय प्रजातियों की हानि हुई है । घास के जिन मैदानों को कभी मनुष्यों और उनके पशुओं की अपेक्षाकृत छोटी संख्या निर्वहनीय ढंग से इस्तेमाल करती थी, आज उनका दुरुपयोग, अति-उपयोग या भिन्न प्रकार से उपयोग हो रहा है ।

हमारे प्राकृतिक वन इमारती लकड़ी के लिए नष्ट किए जा रहे हैं और वहाँ इमारती लकड़ी के पेड़, जैसे टीक और साल लगाए जा रहे हैं । एक प्रकार के पौधे वाले वन अथवा बागान बहुपक्षीय प्राकृतिक वन की तरह जैव-विविधता को सहारा नहीं दे सकते जिसमें एक बंद प्राकृतिक छतरी होती है और नीचे जमीन पर अनेक पौधे उगते रहते हैं । एक पौधे वाले वन मिट्टी को पुनर्जीवन भी नहीं दे सकते ।

पेड़ों की शाखें काटकर वन से जब भारी मात्रा में जलावन जमा की जाती है तो वन की छतरी खुल जाती है और इससे स्थानीय जैव-विविधता में बदलाव आता है । चरनेवाले मवेशी वन के पुनर्जन्म की गति धीमी करते हैं क्योंकि छोटे-छोटे पौधे लगातार उनके खुरों से कुचलते रहते हैं ।

हमारे संरक्षित क्षेत्रों की सीमा पर मनुष्य की लगातार बढ़ती जनसंख्या वनों के पारितंत्रों का विनाश करती है और रोजाना खुलेआम होनेवाले अतिक्रमण धीरे-धीरे तटीय और वन क्षेत्रों को कम करते चले जाते हैं । इसका एक प्रमुख उदाहरण गिर राष्ट्रीय पार्क है जो एशियाई सिंह का आखिरी ठिकाना है । इससे होकर एक मीटर गेज रेल लाइन और एक राष्ट्रीय सड़क गुजरती है तथा अंदर तीन मंदिर भी हैं ।

पारितंत्र की गुणवत्ता के मूल्यांकन में एक और बात का भी ध्यान रखा जाता है । घास की पैदावार में तेजी लाने के लिए स्थानीय चरवाहे बराबर आग जलाते हैं । यह आग अंततः पौधों के पुनर्जन्म और उनकी विविधता में कमी लाती है । चारे के वैकल्पिक स्त्रोतों के बिना यह दबाव कम नहीं हो सकता ।

वनों की जैव-विविधता को कम करनेवाला एक और कारण भारत में ऐसी विदेशी घासों का आना है जो प्राकृतिक वनस्पति का अंग नहीं होतीं । लैंटना और यूपेटोरियम की झाड़ियाँ और ‘कांग्रेस’ ग्रास भारत में ऐसी कुछ आम मिसालें हैं । ये इस देश में बाहर से लाई गई हैं और इन्होंने हमारे प्राकृतिक वनों के बड़े-बड़े भूखंडों पर अतिक्रमण कर लिया है । ये घासें अनेक प्रकार की देसी प्रजातियों की कीमत पर फलती-फूलती      हैं । कीड़े-मकोड़ों, पक्षियों और अन्य वन्य प्रजातियों पर भी इन घासों के बुरे प्रभाव पड़ते हैं, हालाँकि इन प्रभावों का पर्याप्त अध्ययन नहीं किया गया है ।

हमारे देश में सदियों में खेती की अनेक प्रकार की तकनीकों का विकास हुआ है । ऐसी दो विधियाँ हैं हिमालय क्षेत्र में झूम खेती, और पश्चिमी घाट में ‘राब’ जिसमें पेड़ों की डालियों को जलाकर राख बनाई जाती है और उसका खाद रूप में प्रयोग होता है । इन क्षेत्रों में जब मानव की जनसंख्या कम थी तब ये ही कृषि की निर्वहनीय विधियाँ थीं । दुर्भाग्य से आज इन क्षेत्रों में भारी जनसंख्या है जो अधिकतर कृषि पर निर्भर है । ये विधियाँ अब अनिर्वहनीय हो चुकी हैं और वनों की जैव-विविधता को नष्ट कर रही हैं ।

खासकर बड़ी ट्राउलर नावों के द्वारा मछलियों का अत्यधिक शिकार उनकी जनसंख्या को बहुत कम कर रहा है । उड़ीसा के समुद्रतट पर समुद्री कछुओं को, जो अनजाने में मछली पकड़ने वाले जालों में फँस जाते हैं, काट डाला जाता है । गुजरात के तट पर दुर्लभ ह्वेल शार्क (whale shark) को मारा जा रहा है जो एक अत्यधिक संकटग्रस्त प्रजाति है ।

शिकार:

कुछ पशुओं का शिकार भारी आर्थिक लाभों के कारण किया जाता है । बाघों की खालें और हड्‌डियाँ, हाथियों के दाँत, गेंडों की सींगें, और कस्तूरी मृग की कस्तूरी का विदेशों में व्यापक उपयोग होता है । भालुओं का शिकार उनके पित्ताशय के लिए किया जाता है । चेन्नई, कन्याकुमारी और अंडमान-निकोबार के समुद्रतटों पर प्रवालों और सीपियों को भी निर्यात के लिए जमा किया या बेचा जाता है ।

कछुए, सुंदर पक्षी और छोटे प्राणी छोटे-छोटे डिब्बों में भरकर व्यापार के लिए तस्करी द्वारा बाहर भेजे जाते हैं । वास्तविक और कभी-कभी संदिग्ध चिकित्सकीय महत्त्व वाले, अनेक प्रकार के वन्य पौधे अत्यधिक काटे जा रहे हैं । आम तौर पर जमा किए जाने वाले पौधों में रॉल्फिया, नक्स वोमिका, धतूरा आदि शामिल हैं । गैरकानूनी व्यापार के लिए बागों से जमा किए जानेवाले पौधों में आर्किड, फर्न और मॉस शामिल हैं ।

 

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