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Essay on Deforestation in Hindi

Read this essay in Hindi to learn about deforestation and its effect on our environment.

जिन सभ्यताओं ने वन संसाधनों का सावधानी से उपयोग किया है और वनों की देखभाल की है, वे फली-फूली हैं जबकि उनका विनाश करने वाली सभ्यताओं का धीरे-धीरे ह्रास होता गया है । आज हमारे देश में और संसार भर में लकड़ी की कटाई और खनन कार्य वनों की क्षति के मुख्य कारण हैं ।

जलविद्युत (पनबिजली) या सिंचाई के लिए बनाए गए बाँधों के कारण बड़े-बड़े वनक्षेत्र डूबे हैं और वह आदिवासी जनता विस्थापित हुई है जिसका जीवन वनों से गहराई से जुड़ा हुआ था । यह भारत में गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है ।

लकड़ी की कटाई और जलावन लकड़ी पर हमारी निर्भरता के कारण वनों का ह्रास भारत की पर्यावरण संबंधी गंभीर समस्याओं में एक है । ग्रामीण गरीबों की एक बड़ी संख्या भोजन पकाने और घर गर्म रखने के लिए आज भी लकड़ी पर बहुत अधिक निर्भर है । इमारती और जलावन लकड़ी की आवश्यकता पूरी करने के लिए हम उसी अनुपात में या उसी गति से पेड़ लगाने में असमर्थ रहे हैं ।

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इसे महसूस करके पर्यावरण और वन मंत्रालय ने राष्ट्रीय वन नीति 1988 बनाई जिसमें वनों के संयुक्त प्रबंध (Joint First Management-JFM) को पर्याप्त महत्त्व दिया गया था । इसमें वनों के निर्वहनीय प्रबंध के लिए स्थानीय ग्रामीण समुदाय और वन विभाग मिलकर काम करते हैं ।

1990 के एक और प्रस्ताव के द्वारा ग्राम वन समितियों (Village Forest Committees-VFCs) के गठन के रूप में समुदाय की भागीदारी को औपचारिक शक्ल मिली । इस कार्यक्रम के आरंभ के बाद 2002 तक भारत के मन 27 राज्यों में संयुक्त वन प्रबंध की 63,618 समितियाँ 140,953 वर्ग किमी क्षेत्र में वनों की देखभाल कर रही थीं ।

ऐसे प्रबंध के लिए विभिन्न राज्यों ने अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाए हैं । अलग- अलग राज्यों में ग्राम वन समितियों के मुनाफे का प्रतिशत इस प्रकार था: केरल में 25, आंध्र प्रदेश में 100 तथा गुजरात, महाराष्ट्र, उड़ीसा और त्रिपुरा में 50 प्रतिशत । अनेक राज्यों में 25 प्रतिशत राजस्व का उपयोग गाँव के विकास के लिए किया जाता है । अनेक राज्यों मे इमारती लकड़ी छोड़ दूसरे वन्य उत्पाद जनता के लिए मुफ्त उपलब्ध हैं ।

कुछ राज्यों ने पशुओं की चराई पर पूरी तरह रोक लगा दी है, जबकि कुछ दूसरे राज्यों ने चराई की आवर्ती योजनाएँ अपनाई हैं जिनके कारण वनों के पुनर्जन्म में सहायता मिली है ।  लकड़ी की कटाई, खनन-कार्य और बाँध विकासशील देशों के लिए आवश्यक होते हैं ।

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अगर लकड़ी की अत्यधिक कटाई हो तो जंगल के पारितंत्री कार्यों को क्षति पहुँचती है ।  दुर्भाग्य से वन अधिकतर ऐसे क्षेत्रों में होते हैं जहाँ समृद्ध खनिज संसाधन होते हैं । वन नदी-घाटियों के ढालदार किनारों पर भी होते हैं जो जलविद्युत और सिंचाई परियोजनाओं के लिए आदर्श स्थान होते हैं ।

इस तरह पर्यावरण वैज्ञानिकों की संरक्षण संबंधी रुचियों तथा खनन और सिंचाई विभागों के हितों में बराबर टकराव होता रहता है । समझने की बात यह है कि पर्यावरण के दीर्घकालिक लाभों को ऐसे अल्पकालिक लाभों के लिए बलिदान नहीं किया जा सकता जो दुर्भाग्य से वनों का विनाश करते हैं । जहाँ वन हैं वहाँ विकास परियोजनाओं को लागू किए जाने से हजारों आदिवासी अपने घरों से वंचित हो सकते हैं । यह ऐसी समस्या है जिसका शायद ही कोई संतोषजनक समाधान हो ।

वनों के कार्य (Forest Functions):

जलविभाजकों की सुरक्षा (Watershed protection):

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i. सतह पर जल के प्रवाह की गति को कम करना

ii. आकस्मिक बाढ़ों और मृदा अपरदन (भूमि कटाव) को रोकना

iii. लंबे समय तक क्रमिक प्रवाह सुनिश्चित करना और इस तरह सूखे से बचाव करना

वायुमंडल का नियंत्रण (Atmospheric regulation):

i. जलवाष्प के उत्सर्जन के दौरान सौर ऊष्मा का अवशोषण करना

ii. पौधों की वृद्धि के लिए कार्बन डाइआक्साइड का स्तर बनाए रखना

iii. स्थानीय जलवायु की दशाएँ बनाए रखना

अपरदन पर नियंत्रण (Erosion control):

i. मिट्‌टी की जकड़न को बनाए रखना ताकि वर्षा सीधे मिट्‌टी को बहाकर न ले जाए

भूमि बैंक (Land bank):

i. मृदा (मिट्‌टी) के पोषक तत्त्वों और ढाँचे को बनाए रखना

स्थानीय उपयोग (Local use):

i. वन्य उत्पादों का स्थानीय व्यक्तियों द्वारा उपभोग जो उन्हें जीवन निर्वाह के लिए जमा करते हैं (उपभोगमूलक उपयोग)

ii. भोजन:

वनों से कंदमूल जमा करना, मछली मारना, शिकार करना (पहले जब वन्यजीवन में प्रचुरता थी, तब लोग भोजन के लिए जानवरों का शिकार कर सकते थे । अब जबकि अधिकांश वन्य प्रजातियों की संख्या घट गई है, यदि शिकार जारी रहा तो वे समाप्त हो जाएँगी ।)

iii. मवेशियों के लिए चारा

iv. भोजन पकाने और गर्मी पाने के लिए जलावन लकड़ी और चारकोल

v. घर बनाने के लिए बाँस या बल्लियाँ, विशेषकर ग्रामीण और निर्जन क्षेत्रों में

vi. घरेलू साज-सामान और निर्माण के लिए इमारती लकड़ी

vii. टोकरों, रस्सों, जालों, तारों आदि की बुनाई के लिए रेशे

viii. रेशम के लिए रेशम के कीड़ों का पालन

ix. मधुमक्खीपालन (apiculture); जंगली मधुमक्खियाँ पौधों में परागण भी करती हैं

x. परंपरागत दवाओं के लिए जड़ी-बूटियाँ, नई और आधुनिक दवाओं के संभावित स्रोतों के रूप में उनकी जाँच

बाजारी उपयोग (उत्पादक उपयोग) Market use (Productive use):

i. उपभोग की ऊपर दर्ज वस्तुओं में से अधिकांश वस्तुएँ आय के लिए बेची भी जाती हैं; इस तरह वे वनवासी जनता को जीविका प्रदान करती हैं ।

ii. वनों के गौण उत्पादन:

जलावन लकड़ी, फल-फूल, गोंद, रेशे आदि जिनको वनवासियों द्वारा आय के स्रोतों के रूप में जमा करके स्थानीय बाजारों में बेचा जाता है ।

iii. निर्माण-कार्य, औद्योगिक उपयोगों, कागज की लुगदी आदि के लिए बड़े पैमाने पर लकड़ी की कटाई । भारत में लकड़ी की यह कटाई वन विभाग द्वारा की जाती है, पर भारत और दुनिया के अनेक वनों में गैरकानूनी कटाई जारी है ।

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