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Essay on Family Welfare Programme | Hindi

Read this essay in Hindi to learn about the objectives of family welfare programme.

अपनी भारी जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए भारत ने परिवार नियोजन का एक कारगर कार्यक्रम चलाया जिसे बाद में परिवार कल्याण कार्यक्रम (Family Welfare Programme) कहा गया। ‘हम दो हमारे दो’ जैसे नारे संकेत देते हैं कि हर परिवार में दो से अधिक बच्चे नहीं होने चाहिए । पर इसे सचमुच कारगर होने में अनेक दशक लग गए ।

विश्व के स्तर पर 2000 तक प्रजनन-योग्य आयुवर्ग में 2000 तक 60 करोड़ अर्थात 57 प्रतिशत स्त्रियाँ गर्भनिरोध की किसी न किसी विधि का उपयोग कर रही थीं । लेकिन गर्भनिरोधक विधियों का व्यवहार विकसित देशों में अधिक (68 प्रतिशत) और विकासशील देशों में कम (55 प्रतिशत) है । विकासशील देशों में स्त्री-वंध्याकरण आज गर्भनिरोध की सबसे लोकप्रिय विधि है ।

उसके बाद स्त्रियों के लिए गर्भनिरोधक गोलियों और अंतःगर्भाशय साधनों (intrauterine devices-IUD) का तथा पुरुषों के लिए कंडोम का नंबर आता है । विकासशील दुनिया में भारत और चीन स्थायी वंध्याकरण की विधि का दूसरे अनेक देशों से अधिक कारगर उपयोग कर रहे हैं ।

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एक दंपति के लिए सबसे अच्छी गर्भनिरोधक विधि का फैसला डाक्टरों या प्रशिक्षित सामाजिक कार्यकर्ताओं की सलाह पर आधारित होना चाहिए जो चयन के लिए विधियों का एक पूरा दायरा उनके सामने रख सकें ।

गर्भनिरोध के लिए उपलब्ध उपायों की जानकारी जनता को देना सबसे अधिक महत्त्व रखता है । यह काम स्वास्थ्य और परिवार कल्याण जैसी सरकारी एजेंसियों तथा शिक्षा व विस्तार कार्यकर्ताओं द्वारा किया जाना चाहिए ।

परिवार कल्याण कार्यक्रम की तात्कालिक आवश्यकता को समझना नीति-निर्माताओं और जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों-केंद्र और राज्य के स्तर पर मंत्रियों, सांसदों, विधायकों-के लिए भारी महत्त्व रखता है । संचार-माध्यमों को परिवार का आकार सीमित रखने और दुनिया के संसाधनों पर बढ़ती आबादी के दुष्प्रभावों के बारे में जनता को जानकारी देते रहना चाहिए ।

परिवार का आकार सीमित रखने का फैसला एक दंपत्ति की पृष्ठभूमि और शिक्षा पर निर्भर होता है । इसका संबंध सरकार की नीति, परिवार कल्याण कार्यक्रम की प्रभाविता, शिक्षा का स्तर और जनसंचार में सूचनाओं के स्तरों से होता है । स्वास्थ्य रक्षा व्यवस्था से परिवार कल्याण के बारे में मुफ्त मिलने वाली सूचनाएँ कुछ मामलों में सांस्कृतिक रवैयों कें कारण बेकार चली जाती हैं । अकसर गलत और अपर्याप्त सूचनाओं के कारण कई परिवार अपने आकार को सीमित रखने के कदम नहीं उठाते ।

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विस्फोटमुखी जनसंख्या को आवश्यक संसाधन प्रदान करना आज संसार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है । जनसंख्या और बढ़ी तो पानी की कमी भयानक हो उठेगी, मिट्‌टी गैर-उपजाऊ हो जाएगी और नदियों, झीलों

और तटीय जल का प्रदूषण बढ़ेगा । विकासशील देशों में आज भी जलजनित रोग हर साल 1-2 करोड़ लोगों की जानें ले रहे हैं । 2025 तक 48 देश पानी के लिए तड़प रहे होंगे । वायु का प्रदूषण और भी बढ़ेगा । वायु प्रदूषण आज भी हर साल 30 लाख लोगों की जानें ले रहा है ।

1960 के दशक की पहली ‘हरित क्रांति’ ने भारी मात्रा में अनाज पैदा किया, पर पर्यावरण की अनेक समस्याओं को भी जन्म दिया । आज एक नई हरित क्रांति की आवश्यकता है जो हमारी बढ़ती आबादी को भोजन दे, पर बड़े बाँध बनाकर भूमि या नदियों की हानि न करे तथा अत्यधिक महत्त्व वाले वनों, चरागाहों और दलदली भूमियों की कीमत पर उसका प्रसार न हो ।

तटीय क्षेत्र संसार के सबसे आबाद क्षेत्र हैं । ये नाजुक पारितंत्र हैं और तेजी से नष्ट हो रहे हैं । विश्व की जलवायु का परिवर्तन आज एक ऐसा संकट है जो घनी आबादी वाले तटीय समुदायों के जीवन को प्रभावित कर सकता है । समुद्र में भारी शिकार के कारण मछलियों की संख्या कम हो रही है ।

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इसे कभी नष्ट न होने वाला संसाधन माना जाता था, पर भारी शिकार के कारण मछलियों का भंडार तेजी सेर घट रहा है । मौजूदा मत्स्य भंडारों के बल पर तटीय आबादियों की हो रही वृद्धि को सहारा दे सकना असंभव हो जाएगा ।

बढ़ती जनसंख्या लाजमी तौर पर खेतों से पास के बाकी जंगलों की ओर बढ़ेगी । भारत में पिछले कुछ दशकों में ऐसे अनेक अतिक्रमण नियमित किए गए हैं । पर वनों के विनाश से जल और वायु की गुणवत्ता पर दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं । दुर्भाग्य से जैव-विविधता की हानि को आज भी आम तौर पर मानव के कल्याण की प्रमुख बाधा नहीं माना जाता है ।

 

 

बढ़ती आबादी और उपभोक्तावादी जीवनशैली के कारण ऊर्जा का उपयोग बढ़ रहा है । उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन, पैकिंग और यातायात में ऊर्जा की भारी खपत होती है । हमारी बढ़ती आबादी अत्यधिक मात्रा में अपशिष्ट भी पैदा कर रही है ।  जनसंख्या वृद्धि और पर्यावरण के बीच ऐसे संबंधों के कारण परिवार कल्याण कार्यक्रम आज मानव जीवन के लिए अनिवार्य बन चुके हैं ।

 

 

वंध्याकरण की विधियाँ (Methods of Sterilization):

भारत का परिवार कल्याण कार्यक्रम काफी सफल रहा है । पर जनसंख्या में स्थिरता लाने के लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है ।  परिवार कल्याण कार्यक्रम जनसंख्या-नियंत्रण के लिए अनेक उपाय सुझाता है । स्थायी वंध्याकरण एक छोटी-सी शल्य-चिकित्सा के द्वारा किया जाता है ।

स्त्री की नसबंदी (tubectomy) में उस नली को बाँध दिया जाता है जिसके द्वारा डिंब गर्भाशय में पहुँचा है । पुरुष की नसबंदी (vasectomy) शुक्राणु ले जाने वाली नस को बाँधकर किया जाता है ।  ये दोनों बहुत आसान क्रियाएँ हैं जो मात्र अंग विशेष को सुन्न करके की जाती हैं । ये कष्टहीन हैं और शल्यक्रिया के बाद भी व्यक्ति को कोई समस्या नहीं आती । नसबंदी से पुरुष की संभोग की क्षमता में कोई कमी नहीं आती, बस शुक्राणुओं का स्थानांतरण रुक जाता है ।

अस्थायी जन्म नियंत्रण के अनेक ढंग हैं । पुरुष संभोग के दौरान डिंब से शुक्राणुओं का मिलन रोकने के लिए कंडोम का प्रयोग करते हैं । अंतःगर्भाशय उपकरण (कापर-टी) छोटे उपकरण होते हैं जिनको डाक्टर गर्भाशय के अंदर एक जगह लगा देता है ताकि डिंब का सेंचन हो जाए तो भी उसका स्थापन न हो ।

वे स्त्री के जीवन या काम में किसी तरह का विघ्न पैदा नहीं करते । गर्भनिरोधक गोलियाँ और सुइयाँ भी उपलब्ध हैं; ये शुक्राणुओं के द्वारा डिंब के सेंचन को रोकती हैं । गर्भनिरोध के परंपरागत मगर कम भरोसेमंद उपाय भी हैं, जैसे स्त्री के उर्वर-चक्र के दौरान संभोग से परहेज या स्खलन से पहले ही हट जाना ।

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