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Essay on Grassland Ecosystems of India | Hindi

Read this essay in Hindi to learn about grassland ecosystems of India.

अनेक प्रकार के भूदृश्य (landscapes), जिनमें वनस्पति मुख्यतः घासों और छोटे सालाना पौधों के रूप में होती है, भारत की विभिन्न जलवायवीय दशाओं (climatic conditions) के लिए खासतौर पर उपयुक्त हैं । इन्हीं से अनेक प्रकार के चरागाही अथवा घासस्थली पारितंत्र बनते हैं जिनके अपने-अपने विशिष्ट पौधे और प्राणी होते हैं ।

चरागाही/पारितंत्र क्या है?

चरागाह अथवा घासस्थल ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ वर्षा प्रायः कम होती है और/या मिट्‌टी की गहराई और गुणवत्ता कम होती है । कम वर्षा होने से बड़ी संख्या में यहाँ पेड़ और झाड़ नहीं उग सकते, पर इतनी वर्षा मानसून में घास के आवरण को पैदा करने के लिए पर्याप्त होती है ।

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गर्मी के महीनों में घास और छोटी झाड़ियाँ सूख जाती हैं और उनकी सतह से ऊपर का भाग मर जाता है । अगले मानसून में बची हुई जड़ों और पिछले साल के बीजों से घास का आवरण फिर से उग आता है । यह परिर्वतन चरागाहों को अत्यधिक मौसमी रूप दे देता है जिसमें उनकी वृद्धि के कालों के बाद एक सुषुप्तावस्था आती है ।

अनेक प्रकार की घास, छोटी झाड़ियाँ तथा कीड़ों, पक्षियों और स्तनपाइयों की अनेक प्रजातियों का विकास इस तरह से हुआ है कि वे इन खुले और विस्तृत घास के मैदानों में रह सकती हैं । ये पशु ऐसी दशाओं में रह सकते हैं जहाँ वर्षा के बाद भोजन की बहुतायत हो; इसे वे वसा (चर्बी) के रूप में जमा कर लेते हैं जिसका उपयोग वे शुष्क काल में करते हैं जब खाने को कुछ नहीं होता । प्राचीन काल में मनुष्य ने जब पशुओं को पालतू बनाया तो उनको खिलाने के लिए इन चरागाहों का उपयोग आरंभ किया और इस प्रकार पशुपालक (pastoralist) बन गया ।

भारत में चरागाहों के प्रकार (Types of grasslands in India):

विभिन्न जलवायवीय दशाओं में चरागाहों के अनेक प्रकार के पारितंत्र होते हैं; इनमें लगभग रेगिस्तानी दशाओं से लेकर वे शोल (shola) चरागाहें भी शामिल हैं जो दक्षिण भारत के अत्यंत नम सदाबहार वनों के पास पहाड़ियों की ढलानों पर पाई जाती हैं । हिमालय क्षेत्र में ऊँचाई पर ठंडी चरागाहें पाई जाती हैं । हिमालय की तलहटी के दक्षिण में स्थित तराई क्षेत्र में हाथी बराबर ऊँची घास के मैदान पाए जाते हैं । पश्चिमी भारत, मध्य भारत के कुछ भागों और दक्कन के पठारों में अर्धशुष्क चरागाहें भी पाई जाती हैं ।

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हिमालयी चरागाह की पट्‌टी (Himalayan pasture belt) हिमरेखा (snowline) तक फैली हुई है और नीचे की चरागाहें शंकुधारी और विस्तीर्णपर्णी जंगलों के साथ लगी पट्‌टियाँ हैं । हिमालयी प्राणियों को अपने आवास के रूप में वन्य और चरागाही, दोनों पारितंत्रों की आवश्यकता होती है ।

ये पशु गर्मियों में ऊँचाई वाली चरागाहों में चले जाते हैं और जाड़े में ये चरागाहें जब बर्फ से ढँक जाती हैं तो ये नीचे के वनों में वापस आ जाते हैं । इन हिमालयी चरागाहों में घास और झाड़ियों की भारी विविधता मौजूद है । हिमालयी ढलानें हजारों रंगबिरंगे फूलदार पौधों और बड़ी संख्या में जड़ी-बूटियाँ देने वाले पौधों से ढँकी हुई हैं ।

तराई क्षेत्र में लंबी घास के मैदान और बीच-बीच में साल वनों के पारितंत्र हैं । हाथी समान ऊँची ये घास, जो पाँच मीटर तक बढ़ जाती हैं, नीचे के जलभराव वाले क्षेत्रों में स्थित हैं । ऊँचे क्षेत्रों और हिमालयी ढलानों को साल वनों के टुकड़े ढँके हुए हैं । तराई क्षेत्र के गड्‌ढेदार हिस्सों में दलदलें भी पाई जाती हैं । यह पारितंत्र हिमालय की तलहटी के दक्षिण में एक पट्टी के रूप में फैला हुआ है ।

पश्चिमी भारत, मध्य भारत और दकन के अर्धशुष्क मैदानों में घास की चरागाहें फैली हुई हैं और बीच-बीच में काँटेदार जंगल आते हैं । भेड़िये, काले हिरन, चिकारे जैसे अनेक स्तनपायी पशु तथा फ्लोरिकन जैसे अनेक पक्षी इन शुष्क दशाओं में रहने में समर्थ हैं । दकन के पठार के झाड़ वाले इलाके ऐसी मौसमी घास और कंदमूल से भरे हुए हैं जिन पर वहाँ के प्राणी आश्रित हैं । ये ऐसे कीड़े-मकोड़ों से भी भरे हुए हैं जिन पर कीटभक्षी परिंदे जीवित रहते हैं ।

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शोल चरागाहें पश्चिमी घाट, नीलगिरी और अन्नामलाई पर्वतमालाओं की शोल वनों के बीच-बीच में, उनकी ढालों पर स्थित हैं । ढालों पर घास की चरागाहें तथा नदी-नालों के किनारे और निचाई पर स्थित क्षेत्रों में वन्य आवास हैं । घास के मैदान कम वर्षा वाले क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं हैं ।

घास के कुछ मैदान तो उन जगहों पर बन जाते हैं जहाँ विभिन्न प्रकार के वन काट दिए जाते हैं । कुछ तो और भी ऊँची और तेज ढलानों पर हैं, नदी-नालों के किनारे या गहराई वाले स्थानों में स्थित वन-खंडों के साथ-साथ हैं । इन चरागाहों में बार-बार आग लगती है जिससे वनों की वृद्धि नहीं होती ।

घास इन क्षेत्रों में जैवभार (biomass) की प्रमुख उत्पादक है । हर चरागाही पारितंत्र में घास और कंदमूल की बहुत विविधता पाई जाती है । घास और कंदमूल की कुछ प्रजातियाँ अत्यधिक चराई से आसानी से प्रभावित होती हैं और अगर किसी क्षेत्र में उनकी अधिक चराई हो तो मर जाती हैं ।

दूसरी प्रजातियाँ बार-बार आग लगने से नष्ट होती हैं और उनका पुनर्जन्म संभव नहीं होता । इस तरह अतिशय उपयोग वाली या बार-बार आग का सामना करने वाली चरागाहों का ह्रास होता रहता है और पौधों की प्रजातियों की विविधता वहाँ बहुत कम होती है ।

चरागाहों का उपयोग कैसे किया जाता है?

घास के मैदान ग्रामीण समुदायों के लिए चराई के क्षेत्र होते हैं । मवेशियाँ या बकरियाँ पालने वाले किसान और भेड़ पालने वाले गड़ेरिये इन मैदानों पर बहुत निर्भर होते हैं । गाँव की ‘शामिलात’ (common land) में पालतू पशु चराए जाते हैं । गर्मियों में जब चरने के लिए घास नहीं होती, मवेशियों को खिलाने के लिए चारा जमा करके रखा जाता है । घास का इस्तेमाल छप्परों और मवेशी बाड़ों की छवाई के लिए भी होता है । घास के मैदानों में जो थोड़े-से पेड़ दिखाई देते हैं उनकी काँटेदार झाड़ों और शाखाओं का उपयोग जलावन के रूप में होता है ।

पालतू पशुओं के भारी रेवड़ चराई से अनेक चरागाहों का ह्रास हुआ है । चरागाहों में ऐसे कीटों की अनेक प्रजातियाँ रहती हैं जो फसलों का परागण करती हैं । यहाँ इन कीटों के भक्षक भी होते हैं, जैसे छछूँदर जैसे छोटे स्तनपायी, छिपकली जैसे सरीसृप, शिकारी पक्षी और मेंढक या टोड जैसे जलथलचारी । ये सब मांसभक्षी पास के खेतों पर कीटों के हमले कम करने में सहायक होते हैं ।

चरागाही पारितंत्रों के सामने क्या खतरे हैं?

पशुपालक समुदाय अनेक क्षेत्रों में सदियों से चरागाहों अथवा घासस्थलों का उपयोग करते आ रहे हैं । ग्रामीण समुदायों की ‘शमिलाती चरागाहों’ के अति-उपयोग और भूमि के उपयोग में परिवर्तन से इनका ह्रास हुआ है । स्थायी चरागाहों की दृष्टि से देश की मात्र 3.7 प्रतिशत भूमि ही आज घास का मैदान है । चरागाहों का सिंचित खेतों में परिवर्तन कर दिया जाना प्राकृतिक चरागाहों के लिए प्रमुख खतरा है ।

दक्कन में चरागाहों को सिंचित खेत बना दिया गया है और आज उनका उपयोग मुख्यतः गन्ना उगाने के लिए किया जाता है जो एक जलभक्षी फसल है । निंरतर सिंचाई के कारण ये खेत खारे और कुछ वर्षों में बेकार हो जाते हैं । हाल के वर्षों में बाकी बचे घास के मैदानों में से अनेक को औद्योगिक क्षेत्रों में बदल दिया गया है । इससे तात्कालिक आर्थिक लाभ तो मिलते हैं पर आगे चलकर आर्थिक और पर्यावरणीय हानियाँ होती हैं ।

पालतू और वन्य प्राणियों को सहारा देने की घास के मैदानों की क्षमता सीमित होती है । पालतू पशुओं की संख्या बढ़ने पर दबाव के बढ़ने से चरागाही पारितंत्र का ‘प्राकृतिकपन’ कम होता है और उसका ह्रास होता है ।

अधिकांश चरागाही पारितंत्र मानव के कार्यकलाप के कारण बहुत अधिक बदल चुके हैं । मवेशियों, भेड़ों और बकरियों की चराई और बार-बार की आग, ये सब चरागाहों पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं । चरागाहों का अधिकाधिक उपयोग अगर कृषि, बागान और उद्योगों के लिए किया जाए, तो इससे इस अत्यधिक उत्पादक पारितंत्र के लिए गंभीर खतरे पैदा होते हैं । इसलिए घास के उन मैदानों का तत्काल संरक्षण आवश्यक है जिनमें कम फेरबदल हुए हैं और जो अपने विशेष पेड़-पौधों और पशु-पक्षियों को सँजोए हुए हैं ।

घास के मैदानों में पशुधन की संख्या एक निश्चित सीमा से अधिक हो तो अत्यधिक चराई के कारण उनका ह्रास होता है । पशु जब अत्यधिक चराई करते हैं तो घासों की सिर्फ जड़ें बची रहती हैं जिनमें हरा पदार्थ बहुत कम होता है । ह्रासमान चरागाहों में घास की कम प्रजातियाँ होती हैं क्योंकि पोषक प्रजातियाँ तो मवेशियों की भारी तादाद द्वारा चट कर ली जाती हैं और उनका पुनर्जीवन असंभव हो जाता है ।

गर्मियों में जब चरागाहों में आग लगती है तो जली घास में छोटे-छोटे ताजे, हरे तिनके आते हैं जिनको मवेशी खा जाते हैं । ऐसा जब कई बार होता है तो चरागाह का ह्रास होने लगता है । मैदान आखिरकार परती बन जाता है, पैरों से दब-दबकर मिट्टी कड़ी हो जाती है, मानसून में बारिश से बह जाती है या गर्म, खुश्क मौसम में आँधियों में धूल बनकर उड़ जाती है । इन सबसे भूमि का ह्रास होता है क्योंकि मिट्‌टी को जकड़े रहने वाली घास नहीं होती और भूमि बंजर बन जाती है ।

चरागाही प्रजातियों का लोप क्यों हो रहा है?

बहुत-से लोग समझते हैं कि वनों और वन्य प्रजातियों का ही लोप हो रहा है, जबकि चरागाहों जैसे दूसरे प्राकृतिक पारितंत्रों का लोप और भी तेजी से हो रहा है । भारत के अनेक भागों में अनेक घासस्थली प्रजातियाँ, जो 50 या 60 साल पहले पाई जाती थीं, अब विलुप्त हो रही हैं । चीता भारत में लुप्त हो चुका है, भेड़िये के लिए भारी खतरा सामने है, मांस के लिए काले हिरन और चिंकारा का शिकार किया जा रहा है, सुंदर भारतीय सोहनचिड़िया (Great Indian Bustard) जैसे पक्षी गायब हो रहे हैं ।

अगर घासस्थली प्रजातियों का संरक्षण नहीं किया जाता तो वे आवास की कमी के कारण नष्ट हो जाएँगे क्योंकि प्राकृतिक और अप्रभावित घासस्थल बहुत कम बचे हैं । अगर ये पशु-पक्षी मर गए या उनके आवास और कम हो गए तो उनके विलुप्त होने की प्रक्रिया और तेजी से बढ़ेगी ।

अगर चरागाहें गायब हुईं तो?

अगर हमारी चरागाहें नष्ट हुईं तो एक अत्यंत विशेष प्रकार का पारितंत्र हमसे छिन जाएगा जिसमें लाखों वर्षों से पशु-पक्षी और पौधे आवास की इन विशेष दशाओं में रहने के अभ्यस्त रहे हैं । साथ ही, स्थानीय जनता अपने पशुधन को चारा आदि नहीं दे सकेगी ।

प्रजातियों का विनाश मानवजाति के लिए हानिकारक है । जंगली घास के जीनें (genes) फसलों की नई किस्मों के विकास के लिए अत्यधिक उपयोगी होते हैं । जंगली पौधों से नई दवाओं का विकास भी किया जा सकता है । जंगली भेड़ों, बकरियों और हिरनों जैसे शाकभक्षी प्राणियों के जीनों का उपयोग मवेशियों की नई किस्मों के विकास के लिए किया जा सकता है । चरागाहों के लुप्त होने पर ये सभी संभावनाएँ भी समाप्त हो जाएँगी ।

चरागाही पारितंत्रों का सरंक्षण कैसे संभव है?

चरागाहों में अत्यधिक चराई नहीं होनी चाहिए और उनके कुछ भागों में तो चराई पर प्रतिबंध होना चाहिए । मवेशियों को थान पर खिलाने के लिए घास काटकर लाना बेहतर है । किसी क्षेत्र में चरागाह का एक भाग हर साल बंद कर देना चाहिए ताकि चराई में एक आवर्ती ढर्रा बन सके । आगों की रोकथाम होनी चाहिए और आग लगने पर उस पर तेजी से नियंत्रण होना चाहिए । पहाड़ी क्षेत्रों में छोटे-छोटे जलग्रहण क्षेत्रों में मिट्‌टी और जल का प्रबंध करके चरागाहों को फिर से प्राकृतिक, अत्यधिक उत्पादक पारितंत्र बनाया जा सकता है ।

अधिकांश प्राकृतिक और अप्रभावित चरागाही पारितंत्रों की रक्षा के लिए अभयारण्य और राष्ट्रीय पार्क बनाए जाने चाहिए जहाँ चरागाही पारितंत्र के सभी विशिष्ट प्राणियों और पौधों की रक्षा हो सके । अतः चरागाहों को बागानों में नहीं बदला जाना चाहिए । खुली चरागाह वहाँ के विशेष प्राणिजगत का आवास होता है । इन क्षेत्रों में पेड़ लगाने से इस पारितंत्र की प्रकृतिके विशेषताएँ कम हो जाती हैं जिससे वन्यजीवन के इस अनूठे आवास का नाश होता है ।

हम क्या करें?

i. सभी विभिन्न प्रकार के बचे-खुचे प्राकृतिक घास के मैदानों को राष्ट्रीय पार्क और अभयारण्य बनाकर इनका संरक्षण किया जाना चाहिए ।

ii. भेड़िये, काले हिरन, चिंकारे जैसे पशु तथा ग्रेट इंडियन बस्टर्ड और फ्लोरिकन जैसे पक्षी आज पूरे देश में दुर्लभ हो चुके हैं । जिन थोड़े-से राष्ट्रीय पार्कों और अभयारण्यों में प्राकृतिक चरागाही आवास हैं उनमें तथा इन संरक्षित क्षेत्रों से बाहर भी उनका सावधानी से संरक्षण किया जाना चाहिए ।

iii. हमें जनता में यह जागरूकता पैदा करनी होगी कि घास के मैदानों का बहुत महत्त्व होता है । अगर गायब होती चरागाहों और उनके अद्‌भुत प्राणियों के बारे में हम सब सचेत रहें, तो सरकार भी उनके संरक्षण के लिए प्रेरित होगी ।

iv. घास के मैदानों को बनाए रखना राष्ट्रीय प्राथमिकता का विषय होना चाहिए ।

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