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Essay on Ground Water Pollution in India

Read this essay in Hindi to learn about the cause and effect of ground water pollution in India. 

तेल के रिसाव की घटनाएँ जल्द ही चर्चा का विषय बन जाती हैं और संचार माध्यम अकसर उन पर काफी ध्यान देते हैं । लेकिन मानवजीवन के लिए दूसरे कहीं बहुत अधिक खतरे पीने और सिंचाई के काम में आनेवाले भूमिगत जल से संबंधित हैं । जहाँ भूमिगत जल आसानी से कम हो सकता है या प्रदूषित हो सकता है, वहीं इसकी भरपाई बहुत धीमे होती है ।

इसलिए हमें विवेक के साथ इसका उपयोग करना चाहिए । भूमिगत जल का प्रवाह धीमा और हलचलरहित होता है, इसलिए प्रदूषकों का जल में उस तरह तनुकरण और फैलाव नहीं होता है जैसा भूजल (surface water) के साथ होता है । इसके अलावा भूमिगत जल को पंप से निकालने और उसका शोधन न करने की क्रिया बहुत धीमी और खर्चीली होती है । इसलिए भूमिगत जल का प्रदूषण रोकना अत्यंत आवश्यक है ।

भूमिगत जल प्रदूषण के कुछ कारण इस प्रकार हैं:

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i. नगरों में अशोधित या अपर्याप्त शोधित गंदे पानी और कचरे का बहाव ।

ii. जलभरों (aquifers) के ऊपर या पास में औद्योगिक अपशिष्टों का जमाव ।

iii. ग्रामीण क्षेत्रों में भारी मात्रा में रासायनिक खादों और कीटनाशकों के प्रयोग, जैसे खेतिहर तौर-तरीके, मवेशियों को चारा खिलाने के ढंग आदि ।

iv. भूमिगत भंडारण की उन टंकियों से रिसाव जिनमें गैसोलीन और अन्य घातक पदार्थ भरे हों ।

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v. भूभरावों (landfills) से निक्षार ।

vi. खराब ढंग से बनाए गए और अपर्याप्त रखरखाव वाले सेप्टिक टैंक ।

vii. खदानों के अपशिष्ट पदार्थ ।

पश्चिम बंगाल में प्रदूषित भूमिगत जल से आर्सेनिक विष के प्रभाव के अनेक उदाहरण सामने आए हैं; इसे आज भूमिगत जल प्रदूषण का बदतरीन उदाहरण माना जाता है । पर्यावरण विज्ञान संस्थान, जादवपुर विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल पिछले 14 वर्षों से पश्चिम बंगाल में आर्सेनिक की समस्या के परिमाण का सर्वेक्षण कर रहा है ।

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डाउन टू अर्थ (वर्ष 11, अंक 22) में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार आर्सेनिक विष के प्रभाव को सबसे पहले उष्णकटिबंधीय चिकित्सा संस्थान, कोलकाता में त्वचा विज्ञान के भूतपूर्व प्रोफेसर, के सी साहा ने तब देखा जब उनके पास त्वचा पर दाग लिए ऐसे रोगी आने लगे जिनके दाग कोढ़ से मेल खाते थे, पर कोढ़ थे नहीं ।

चूँकि वे तमाम रोगी 24 परगना जिले के थे, साहा और दूसरे डॉक्टरों ने कारण की खोज शुरू की और पाया कि यह आर्सेनिक का प्रभाव था । इस तरह पश्चिम बंगाल में भूमिगत जल में आर्सेनिक प्रदूषण की रिपोर्ट दिसंबर 1983 में सबसे पहले एक स्थानीय दैनिक में छपी । इसमें अलग-अलग जिलों में स्थित तीन गाँवों के 630 व्यक्तियों की पहचान स्वास्थ्य अधिकारियों ने आर्सेनिक से पीड़ित के रूप में की थी ।

भूमिगत जल में आर्सेनिक की इस असामान्य भारी मात्रा की व्याख्या के लिए दो परिकल्पनाएँ पेश की गई हैं । शोधकर्त्ताओं के एक समूह के अनुसार इसका कारण प्राकृतिक है जबकि दूसरे समूह का कहना है कि इसका कारण मानव-निर्मित है ।

पहली परिकल्पना के अनुसार आर्सेनिक संभवतः हिमालय में गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों के ऊपरी हिस्सों में निकला होगा और इन नदियों के किनारे की बारीक जलोढ़ कीचड़ में हजारों वर्षों से डेल्टा क्षेत्र की सतह के नीचे दबा पड़ा होगा । पश्चिम बंगाल के अधिकांश आर्सेनिक-पीड़ित क्षेत्र चतुर्थ काल (पिछले 16 लाख वर्ष) में बने जलोढ़ मैदानों में आते हैं । पश्चिम बंगाल का पुरलिया जिला कैंब्रियनपूर्व काल (पिछले 57 करोड़ वर्ष) में बनी कायांतरित चट्‌टानों और ग्रेनाइटों का इलाका है जिनमें सल्फाइड खनिज व्यापक रूप से पाए जाते हैं ।

ब्रिटिश जियोलॉजिकल सर्वे के शोधकर्ताओं का सुझाव था कि गंगा जहाँ (भूगर्भीय दृष्टि से) बांग्लादेश में प्रवेश करती है उस स्थान के पास इसकी भौगोलिक स्थिति बंगाल के जलोढ़ मैदानों में आर्सेनिक का प्रमुख कारण होगा । इस संगठन के परियोजना प्रमुख डेविड किनीबर्ग के अनुसार प्रमुख तत्त्व समय है ।

इन क्षेत्रों में कीचड़ पृथ्वी के किसी और स्थान की अपेक्षा अधिक मोटी, चौड़ी और सपाट है । इस तरह कीचड़ से होकर भूमिगत जल के रिसने और समुद्र तक पहुँचने में लाखों साल लगे होंगे और इस तरह उसमें एक लंबे समय तक आर्सेनिक का प्रवेश होता रहा होगा ।

दूसरे शोधकर्ताओं का मानना है कि भूमिगत जल में आर्सेनिक की अत्यधिक मात्रा का कारण जल की निकासी की भारी दर है। ‘पाइराइट आक्सीकरण प्रस्थापना’ (pyrite oxidation theories) नाम से उनकी परिकल्पना बतलाती है कि भूमिगत जल में आर्सेनिक कैसे जमा हो जाता है । इस परिकल्पना में माना गया है कि आर्सेनिक कुछ खनिजों (पाइराइटों) में मौजूद होता है जो जलभरों (aquifers) के अवसादों में जमा हो जाते हैं ।

अवसादों के नीचे जल का स्तर कम हो जाने के कारण जलभर के एक क्षेत्र में, जिसे ‘वैडोज क्षेत्र’ (Vadoze zone) कहते हैं, आर्सेनोपाइराइट का ऑक्सीकरण होता है तथा मुक्त आर्सेनिक लोहे के हाइड्रोक्साइड के ऊपर जमा हो जाता है । इस सिद्धांत की पुष्टि दो तर्कों से होती है । पहला है पश्चिम बंगाल में गहरे और छिछले नलकूपों के आधार पर गहन सिंचाई का विकास ।

जल निकालने की इस विधि ने, जो जमीन के स्तर के 20 से 100 मीटर नीचे की पट्‌टी से जल बाहर निकालती है, सिंचाई में भूमिगत जल के योगदान में वृद्धि सुनिश्चित की । पाइराइट ऑक्सीकरण के सिद्धांत के समर्थन में दूसरा तर्क यह है कि भूमिगत जल पर आधारित सिंचाई और पेयजल आपूर्ति की योजनाओं से पहले आर्सेनिक के प्रभाव का कोई दृष्टांत सामने नहीं आया था ।

‘आर्सेनिक’ अर्थात आर्सेनिक विष का प्रभाव आर्सेनिक से प्रदूषित पेयजल का 2 से 5 साल तक प्रयोग करने के बाद सामने आता है । यह पानी के उपभोग की मात्रा और उसमें आर्सेनिक के स्तर पर निर्भर है । आरंभ में त्वचा काली पड़ती है (इसे ‘डिफ्यूज मेलानोसिस’ कहते हैं) जिससे फिर स्पाटेड मेलानोसिस पैदा होती है जब छाती, पीठ और जोड़ों पर काले धब्बे पैदा होने लगते हैं और आगे चलकर ‘ल्यूकोमेलानोसिस’ सामने आती है तथा शरीर पर काले-सफेद धब्बे दिखाई देते हैं ।

आर्सेनिकोसिस के मध्यवर्ती चरण में त्वचा के कुछ भाग सख्त और रेशेदार हो जाते हैं । हाथों या पैरों के तलवों में गाँठदार खुरदरी सूखी त्वचा विष के बहुत अधिक प्रभाव का संकेत देती है जो गैंगरीन और कैंसर को जन्म दे सकती है । आर्सेनिक का प्रभाव अपने साथ दूसरी पेचीदगियाँ भी लाता है, जैसे जिगर या तिल्ली का बढ़ना, जिगर की सिरोसिस, मधुमेह, घेंटा (goitre) और त्वचा का कैंसर ।

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