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Essay on India’s Foreign Policy | Hindi

भारत की विदेश नीति के निर्धारण में भूगोल, इतिहास एवं परंपरा ।  “Role of Geography , History and Traditions in Determining the India’s Foreign Policy” in Hindi Language!

डॉ. वी. पी. दत्त के विचार अनुसार, “ऐतिहासिक परंपराओं, भौगोलिक स्थिति और भूतकालीन अनुभव भारतीय विदेश नीति के निर्माण में प्रभावी तत्त्व रहे हैं ।” भारतीय विदेश नीति के निर्धारण में कई कारकों का प्रभाव रहा है और वे वर्तमान में भी प्रभावित कर रहे हैं । इनमें से कुछ कारकों की प्रकृति स्थाई है, जबकि कुछ समय के साथ बदलते रहे हैं ।

प्रस्तुत हैं कुछ मुख्य भारतीय विदेश नीति-निर्धारकों का विश्लेषण:

भूगोल:

भारत का भौगोलिक आकार और स्थिति उसकी विदेश नीति के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं । के एम. पणिक्कर के अनुसार, “जब नीतियों का लक्ष्य प्रादेशिक सुरक्षा होती है तो उनका निर्धारण मुख्य रूप से भौगोलिक तत्त्व से ही होना संभव होता है ।”

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भारत एक विशाल देश है, संसार का यह सातवीं सबसे बड़ा राष्ट्र है । इसका क्षेत्र लगभग 30 लाख वर्ग किलोमीटर है । इसके उत्तर में इसकी सीमाएँ विश्व-प्रसिद्ध हिमालय पर्वत से लगी हुई हैं । इसकी 15,000 किलोमीटर लंबी थल सीमा पश्चिम में पाकिस्तान के साथ, उत्तर में भूटान, चीन और नेपाल तथा पूर्व में बंगलादेश एवं म्यांमार के साथ लगी हुई है ।

अफगानिस्तान एवं पूर्व सोवियत संघ जम्मू-कश्मीर के काफी निकट हैं । प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी हमेशा कहते हैं कि मित्र तो बदला जा सकता है, पड़ोसी नहीं । अत: भारत अपने सभी पड़ोसी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण एवं तनावमुक्त संबंध रखना चाहता है ।

भारत की 7,500 किलोमीटर की तटरेखा को तीन तरफ से हिन्द महासागर ने घेरा हुआ है । जैसा कि भारतीय बंदरगाहों में यूरोप, पश्चिमी एशिया दक्षिण-पूर्व एशिया एवं पूर्वी एशियाई देशों की ओर जाने वाले या आने वाले वाणिज्य पोतों के यातायात से पता चलता है, भारत का ज्यादातर विदेश व्यापार हिन्द महासागर के मार्ग से होता है ।

इससे हिन्द महासागर के भू-राजनीतिक और भू-सामरिक महत्त्व का पता चलता है । 17वीं-19वीं शताब्दी के दौरान हिन्द महासागर विदेशी शासन, जैसे फ्रांसीसी, ब्रिटिश, डच, पुर्तगाली भारत और पूर्वी एशिया के अधीन रहा । स्पष्टत: भारतीय विदेश नीति इस बात की जरूरत महसूस करती है कि उसकी उत्तरी सीमाएँ सुरक्षित रहें और उसके साथ हिन्द महासागर में उसका क्षेत्रीय जल शांत एवं विदेशी सामरिक निर्माण से मुक्त रहे ।

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भारत की विशाल तटरेखा न केवल उसे एक शक्तिशाली नौसेना रखने के लिए बल्कि हिन्द महासागर में स्थित अन्य नौसैनिक शक्तियों से मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखने के लिए बाध्य करती है । इन नौसैनिक शक्तियों में से इंग्लैंड एवं संयुक्त राज्य अमेरिका का दिएगो गार्सिया में नौसैनिक अड्‌डा भी शामिल है ।

देश की भौगोलिक स्थिति भी उल्लेखनीय है । सबसे बड़े महाद्वीप-एशिया के मध्य स्थित भारत दक्षिण एशिया का सदस्य है । भारत, चीन और पाकिस्तान के सैन्य आक्रमण का शिकार रहा है, यह उसके हित में रहा है कि वह संचार के माध्यमों को बनाए रखे ।

इसी तरह भारत क्षेत्रीय शक्तियों से निकट संबंध बनाए हुए है । भारत पूर्वी देशों के साथ संबंधों में सुधार की नीति का पालन करता है साथ ही वह आसियान देशों के साथ आर्थिक एवं सामरिक संबंध भी विकसित कर रहा है ।

इतिहास एवं परंपरा:

भारत की विदेश नीति उसकी ऐतिहासिक परंपरा को प्रतिबिम्बित करती है । भारत ने अपने क्षेत्रीय विस्तार के लिए देश के बाहर कभी भी कोई आक्रामक अभियान नहीं किया है । असल में वह स्वयं कई आक्रमणों एवं विदेशी शासन का लक्ष्य रहा है ।

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उल्लेखनीय है कि कई आक्रामकों ने इस देश को अपना घर मान लिया और यहाँ की प्रथा एवं परंपरा के अनुसार अपने को ढाल लिया । ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य ने सुनियोजित तरीके से एक देशी रियासत को दूसरे के साथ लड़वा कर अपनी स्थिति सुदृढ़ की जिसमें विजेता और हारने वाले दोनों को ही बराबर का नुकसान हुआ ।

भारत के युद्धों से पीड़ित अनुभव ने उसकी विदेश नीति की प्रकृति को युद्ध-विरोधी बना दिया । इसके अतिरिक्त महात्मा गाँधी और उनके अनुयायियों के नेतृत्व में लड़े गए अहिंसक स्वाधीनता संग्राम की प्रकृति भी भारत की विदेशी नीति में सुस्पष्ट रूप से दिखाई देती है ।

सिर्फ यही नहीं प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति की धरोहर भी विदेश नीति के निर्धारण में सहायक सिद्ध हुई है । ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की पारंपरिक मान्यता, प्राचीन धर्मग्रंथों और स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुषों के आध्यात्मिक कार्यों के माध्यम से भारत की जनता तक पहुँची है ।

भारतीय विदेश नीति की संरचना में विशेष तौर पर सहायक हुए मूल्य हैं: सहिष्णुता, अहिंसा और विश्व-बंधुत्व । ए अप्पादुरै के अनुसार, भारतीय विदेश नीति में अहिंसा की परंपरा, विदेश नीति की समस्या के एक अभिगम की पद्धति की सुविचारित स्वीकृति है जो कि सामंजस्य और शांति की प्रकृति पर बल देती है और प्रतिशोध तथा घृणा की प्रकृति के विपरीत है ।

स्वतंत्रता आंदोलन के ज्यादातर नेता इंग्लैंड में शिक्षित थे या फिर उदार शिक्षा से परिचित थे । वे स्वतंत्रता समानता और लोकतंत्र को महत्त्व देते थे । भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का प्रभाव और राष्ट्रीय आंदोलन तथा स्वतंत्रता संग्राम का प्रभाव भारत की विदेश नीति के निर्माण में स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है ।

ए अप्पादुरै के अनुसार, भारत की विदेश नीति में ब्रिटिश राज्य का दोहरा प्रभाव पड़ा । प्रथम, इसने राष्ट्रीय आंदोलन को स्वतंत्रता के लिए प्रेरित किया जिससे विश्व की पराधीन जनता को स्वतंत्रता के लिए भारत का सहयोग मिला; द्वितीय, ब्रिटिश शासन के दौरान प्रचलित नस्लीय असमानता ने भारत को रंग-भेद का उन्मूलन करने के लिए प्रतिबद्ध किया ।

हालाँकि, इस आदर्शवादी धारणा के अलावा शासन कला के प्राचीनकाल के विद्वान कौटिल्य द्वारा प्रतिपादित यथार्थवाद का भी महत्त्व नकारा नहीं जा सकता अर्थात् आवश्यकतानुसार बल प्रयोग के द्वारा देश के अनिवार्य हितों की रक्षा करना भी जरूरी है ।

भारतीय नेता जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गाँधी संकट की स्थिति में राजनीति के निर्देशन में आदर्शवाद की सीमाबद्धता को स्वीकार करते हैं । गोआ और बंगलादेश में भारतीय कार्यवाही व्यावहारिकता को दर्शाता है ।

आर्थिक दशा:

कच्चे माल और प्राकृतिक संपदा का स्वामित्व तथा आर्थिक विकास की अनिवार्यता देश की विदेश नीति के निर्धारण में दिशा प्रदान करते हैं । भारत विशाल प्राकृतिक संपदा का भंडार है जिसके पास विकास में आर्थिक ऊंचाइयों को छूने की क्षमता है ।

इसकी नदियाँ विद्युत शक्ति के उत्पादन की क्षमता रखती हैं तथा पीने और उद्देश्य और निर्धारक 29 सिंचाई के लिए पर्याप्त जल का प्रबंध करती हैं । बॉक्साइट, कोयला, ताँबा, मैगनीज एवं अन्य खनिजों का विशाल भंडार भारत की संपत्ति है ।

साथ ही कुशल और शिक्षित श्रमिक वर्ग इसका आधार है । हालाँकि कृषि साक्षरता विज्ञान और प्रौद्योगिकीय प्रगति के बावजूद इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि भारत विकास में काफी पिछड़ा हुआ है ।

बढ़ती हुई जनसंख्या का अधिकांश भाग रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताओं का प्रबंध करने में भी सक्षम नहीं है । ध्रुवित विश्व में भारत को दोनों मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था वाले पश्चिम और पूर्व सोवियत संघ के नेतृत्व वाले समाजवादी देशों के साथ मैत्री एवं सद्‌भाव की आवश्यकता थी ।

ऐसे मे गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाकर भारत ने दोनों गुटों से मदद की अपेक्षा की । भारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था का मार्ग अपनाया जिसमें सार्वजनिक और निजी क्षेत्र का मिश्रण है । सार्वजनिक क्षेत्र में भारतीय राजकीय निवेश किया गया और साथ ही आधारभूत सेवाओं आदि जैसे कर्ड क्षेत्रों में निजी क्षेत्र का योगदान रहा ।

भारत के पूर्व औपनिवेशिक शासक इंग्लैंड के साथ आर्थिक संबंध से नेहरू को उस देश के साथ: द्वि-पक्षीय एवं राष्ट्रमंडल के अंतर्गत मैत्रीपूर्ण संबंध बनाने में सहायता मिली । भारत के व्यापार के बृहत् भाग के अंतर्गत कच्चे माल जैसे कपास, चाय का निर्यात तथा भारी मशीनें एवं प्रौद्योगिकी का आयात मुख्यत: अमेरिका तथा पश्चिमी यूरोपीय देशों के साथ होता है । ये देश कई परियोजनाओं के लिए उदार अनुदान एवं ऋण की व्यवस्था करते आए हैँ ।

इसके साथ ही विश्व बैंक एवं अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से बहु-पक्षीय ऋण की भी सुविधा प्रदान करते रहे हैं । पूर्व सोवियत संघ भी आसान शर्तों पर रक्षा और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के अन्य क्षेत्रों में भारत का महत्वपूर्ण साझेदार बना है ।

यह भी उल्लेखनीय है कि औद्योगिक और आर्थिक आवश्यकताओं के लिए तेल पर निर्भरता ने मध्य-पूर्व में तेल समृद्ध अरब देशों से संबंध के विशेष महत्त्व के अलावा विश्व-बाजार में स्थिर मूल्य एव आपूर्ति के लिए भारत कार्यरत है ।

एक अलग स्तर पर, देश की आर्थिक दशा भारतीय विदेश नीति को एक दिशा प्रदान करते हुए विकसित एवं विकासशील देशों के बीच असमानता को कम करने का तर्क देती है और विकासशील देशों के बीच अधिक आर्थिक सहयोग चाहती है ।

नेतृत्व का स्वरूप:

किसी भी नेता की व्यक्तिगत योग्यता या क्षमता एक राष्ट्र के भविष्य को एक निश्चित समय में अपने नेतृत्व द्वारा विदेश नीति के स्वरूप को एक निश्चित दिशा प्रदान करती है । जैसे, 20 वीं शताब्दी के पूर्व दशकों में अमेरिका की विदेश नीति को स्वरूप देने में वुडरो विल्सन के योगदान को कौन इन्कार कर सकता है या फिर इसी सदी के अत में सोवियत नीति के निर्माण में मिखाइल गोर्बाचोफ के योगदान को ? इसी तरह, भारत की स्थिति में भी पदासीन प्रधानमंत्रियों कै व्यक्तित्व की देश की विदेश नीति में एक विशेष पहचान दिखाई पड़ती है ।

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, जिन्होंने भारत की नीति को डेढ़ दशकों से भी ज्यादा समय तक दिशा प्रदान की, एक दृष्टिकोण से अंतर्राष्ट्रीयतावादी माने जाते थे और किसी भी समस्या का संकुचित और स्व-केंद्रित मार्ग अपनाने के बजाए एक प्रबुद्ध मार्ग को वरीयता देते थे ।

वे अपने काल के सभी दूरदर्शियों में सबसे महान् माने जाते थे । स्वाभाविक है कि इस काल में भारत की विदेश नीति में विश्व-शांति और निरस्त्रीकरण के संबंधमें राष्ट्रों के सौहार्द के सामूहिक हित के लिए प्रतिबद्ध थी । पंचशील को सिद्धांत विभिन्न देशों की समस्याओं के समाधान का एक विशिष्ट नहरूवादी दृष्टिकोण का प्रतिरूप था ।

पंडित जवाहरलाल नेहरू की बेटी इंदिरा गाँधी का प्रभाव बिल्कुल विपरीत था । स्वभाववश वह बहुत प्रभावशाली एवं दृढ़ महिला थी । राष्ट्रीय हित की अनिवार्य आवश्यकताओं के प्रति उनकी प्रकृति त्यावहारिक एवं संवेदनशील थी, जिसने विदेश नीति को आदर्शवाद की जगह दोबारा यथार्थवाद के मार्ग की ओर अग्रसर किया ।

इस तरह भारत की नीति को बंगलादेश की स्वाधीनता परमाणु अ-प्रसार संधि की अस्वीकृति तथा पूर्व सोवियत संघ से प्रगाढ़ संबंध के परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए । दूसरी ओर, उदारवादी गुणों के लिए विख्यात अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान और अमेरिका के साथ व्यस्त रखने की नीति को प्रभावित किया ।

घरेलू वातावरण:

किसी भी देश की विदेश नीति अपनी आंतरिक गतिशीलता के प्रभाव से मुक्त नहीं रह सकती है । घरेलू अथवा आंतरिक वातावरण से तात्पर्य है: शासकीय प्रणाली की प्रकृति, राजनीतिक संस्कृति, जिसके अंतर्गत राजनीतिक दल, लोकमत, परंपरा, सरकार की संरचना और प्रबुद्ध नेतृत्व शामिल हैं ।

स्वतंत्र भारत ‘अनेकता में एकता’ का सजीव उदाहरण है । भारत ने अहिंसक आंदोलन के बाद ब्रिटिश-राज से स्वतंत्रता प्राप्त की और लोकतांत्रिक प्रणाली को अपनाया जो कि क्षेत्रीय धार्मिक और सांस्कृतिक विविधताओं को समुचित प्रतिनिधित्व देती है ।

कार्यपालक जन-प्रतिनिधियों के प्रति उत्तरदायी होते हैँ । जन-प्रतिनिधि निश्चित समयांतराल पर मतदान द्वारा चुने जाते है । भारत की राजनीतिक व्यवस्था इंग्लैंड की संसदीय प्रणाली पर आधारित है । हालाँकि कार्यपालिका प्राय: ऐसा विश्वास करती है कि विदेश नीति पर उसका विशेषाधिकार है ।

लेकिन कार्यपालिका पर संसद के नियंत्रण ने देश की विदेश नीति को प्रभावित करने का माध्यम खोज लिया है । भाग्यवश भारत की विदेश नीति राष्ट्रीय सम्मति को प्रतिबिम्बित करती है जो कि शासक दल और विपक्ष दोनों के राजनीतिक मतभेदों के ऊपर है । गुट-निरपेक्षता की नीति इसका स्पष्ट उदाहरण है ।

चुनावों के समय में राजनीतिक दल भी विदेशी-नीति के मागले में अपने चुनाव घोषणा-पत्र में अपना दृष्टिकोण रखते हैं । भूमंडलीकरण, विश्व व्यापार संगठन और कई अन्य मामलों में भारतीय जनता पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी के मत भिन्न हैं ।

इसी तरह, कुछ क्षेत्रीय दल जैसे तमिलनाडु में द्रमुक, अन्नाद्रमुक, एम.डी.एम.के. आदि और जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस क्रमश: श्रीलंका एवं पाकिस्तान के प्रति देश की नीति को प्रभावित करते है । संचार के साधनों तथा हित/दबाव समूहों के कार्यकलापों के द्वारा बने जनमत ने भारत की विदेश नीति के निर्धारक के रूप में महत्त्व अर्जित किया है ।

जैसे सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ संबंधों के संदर्भ में आई.एस. सी.यू.एस.या सी.आई.आई. की भूमिका को अस्वीकार नहीं किया जा सकता । मुद्रण और दृष्टि संचार मीडिया भी नीति-निर्माण का महत्वपूर्ण निर्धारक रहा है ।

1999 में कांधार में भारतीय वायुसेना के अपहरण के मामले में तथा इराक में युद्ध के बाद सेना भेजने के संयुक्त राज्य अमेरिका के अनुरोध को नहीं मानने संबंधी सरकारी घोषणा ऐसे दो उदाहरण हैं जहाँ भारतीय नीति को प्रभावित करने में मुद्रण संचार एवं दूरदर्शन की भूमिका उल्लेखनीय है ।

अंतर्राष्ट्रीय प्रवृत्ति:

किसी निश्चित समय में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के स्पष्ट प्रचलन का विदेश नीति में प्रत्यक्ष असर पड़ता है । विदेश नीति के संचालन में कठिनाई उत्पन्न होती है क्योंकि राज्यों के पास दूसरे राज्यों के व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए निश्चित माध्यम का अभाव रहता है । दो विश्व-युद्धों के बीच के समय में फ्रांस की सुरक्षा का प्रश्न उसके बाद इटली में फासीवाद तथा जर्मनी में नाजीवाद का उदय एवं जापान में सैन्यवाद आदि ने सभी देशों की विदेश नीतियों को प्रभावित किया ।

अमेरिका ने सोवियत संघ के प्रति अपनी नीतियों में परिवर्तन किया और उसे मान्यता प्रदान की क्योंकि 1933 में जर्मनी में हिटलर के उदय ने युद्ध के पश्चात् स्थापित विश्व व्यवस्था के लिए संकट पैदा कर दिया था । 1931 में मंचूरिया (चीन) पर जापानी हमले ने अमेरिका और सोवियत संघ दोनों के लिए सुदूर पूर्व में एक सामान्य संकट उत्पन्न कर दिया था । दोनों शक्तियों ने इसलिए तब अपनी शत्रुता छोड़ दी ।

शीत युद्ध काल ने अधिकतर देशों की विदश नीति -को अत्यधिक प्रभावित किया । अमेरिका के परमाणुकरण के भय के कारण पूर्वी यूरोप के देश सोवियत संघ के नियत्रण में आ गए और इसका परिणाम यह हुआ कि ये देश समाजवाद अपनाते हुए सोवियत संघ के पक्ष में खडे हो गए ।

अमेरिका द्वारा स्थापित नाटो, सिएटो तथा अन्य सैन्य संधि/व्यवस्था से उसकी साम्यवाद को नियंत्रित करने की नीति स्पष्ट होती है । भारतीय प्रयासों से प्रतिपादित गुटनिरपेक्ष की नीति अंतर्राष्ट्रीय वातावरण में उत्पन्न इसी ध्रुवीकरण की एक प्रतिक्रिया थी ।

विश्व राजनीति अगले करीब 45 वर्षो तक शीत युद्ध से प्रभावित रही । परमाणु क्षेत्र में हथियारों की दौड़ बढ़ते हुए संदेह की तीव्रता और आने वाले विनाश के भय का द्योतक है । परमाणु निरस्त्रीकरण की भारत की नीति इसी आशंका पर व्याप्त है कि दुर्घटनावश या विवेकपूर्ण तरीके से भी इन हथियारों का प्रयोग मानव सभ्यता के लिए विनाश का कारण बन सकता है ।

परमाणु क्षेत्र से संबंधित 1998 में भारत द्वारा परमाणु अस्त्र का सफल परीक्षण का यह तर्क दिया जा रहा है कि अंतर्राष्ट्रीय वातावरण में तेजी से हो रहे बदलाव के कारण यह एक आवश्यक प्रतिक्रिया है, जो कि परमाणु निरस्त्रीकरण की माँग को अस्वीकार करता है तथा परमाणु-संपन्न शक्ति एवं परमाणु-विपन्न शक्ति के बीच असमान श्रेणीबद्धता का समर्थन करता है ।

शीत युद्ध के आकस्मिक अंत एवं उसके साथ सोवियत संघ के विघटन के बाद भारत की विदेश नीति में गुटनिरपेक्ष आंदोलन की तरफ कम उत्साह होना, अमेरिका की चिंता को समायोजित करने की उत्सुकता, इजराइल के साथ पूर्ण कूटनीतिक संबंध स्थापित करना, यूरोप, दक्षिण-पूर्व एशिया एवं दक्षिण एशिया के साथ संबंधों में आर्थिक पक्ष पर बल देना आदि जैसे कई प्रकार से पर्याप्त परिवर्तन हुए हैं ।

पुन: शीत युद्ध के पश्चात्, आतंकवाद एवं मानव-अधिकार के मामलों में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की बढ़ती हुई संवेदनशीलताने भारतीय विदेश नीति में महत्त्वपूर्ण समायोजन करने के लिए प्रेरित किया । 1990 के दशक में भारतीय विदेश नीति के आलोचनात्मक प्रेक्षकों का मानना था कि बड़ी शक्तियों और अंतर्राष्ट्रीय मंचों में भारत सरकार जम्मू-कश्मीर के मामले पर पूर्वाधिकृत रही । 11 सितम्बर, 2001 को अमेरिका के न्यूयॉर्क और वाशिंगटन में आतंकवादी हमले ने भारत को अपनी आतंकवादी-विरोधी नीति को अधिक दृढ़ता के साथ पेश करने का मौका दिया ।

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