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Essay on Multinational Corporations | Hindi

सामयिक अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों में बहुराष्ट्रीय निगमों की भूमिका । “Multinational Corporations and Current International Economic Relations” in Hindi Language!

अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों में बहुराष्ट्रीय निगमों की भूमिका:

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक क्षेत्र में विश्व परिप्रेक्ष्य को परिवर्तित करने में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो गई है । आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में वर्तमान समय आर्थिक संबंधों में शक्तिशाली गैर-सरकारी एजेंसी के रूप में बहुराष्ट्रीय निगमों का विकास अपने आप में उल्लेखनीय घटना है ।

इन निगमों के उदय ने विश्व परिप्रेक्ष्य को बदलने में मुख्य भूमिका निभाई है । ये कंपनियाँ विकसित देशों से पूँजी उद्योग प्रौद्योगिकी और तकनीकी जानकारी को विकासशील देशों तक ले जाने के स्रोत के रूप में उभरकर सामने आई हैं ।

साथ ही इन्होंने विकासशील देशों को विकसित देशों पर और अधिक निर्भर बना दिया है । एक ओर तो वे विकासशील देशों को उनकी मदद से विकास करने और विशेषज्ञता विकसित करने के अवसर देते हैं तो दूसरी ओर वे इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं एवं नीतियों पर नव-उपनिवेशवादी नियंत्रण का माध्यम बनते हैं ।

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अमेरिका, इंग्लैंड या जापान जैसे देशों में जहाँ इन निगमों का जन्म हुआ ये वहाँ की अर्थव्यवस्था को लाभ पहुँचाने में सहायक रहे हैं । ये किसी देश की सरकार के नियंत्रण से मुक्त रहने की कोशिश-करते रहे हैं और साथ ही ये बेरोजगारी बढ़ाने के लिए जिम्मेदार रहे हैं । इन सभी पहलुओं के कारण बहुराष्ट्रीय निगमों को समर्थन भी मिला है और इनका विरोध भी हुआ है ।

आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में बहुराष्ट्रीय निगमों के प्रभाव का आकलन इसी अनुमान से किया जा सकता है कि वर्ष 2002 तक विश्व के आधे या उससे अधिक औद्योगिक उत्पाद मुट्‌ठी भर बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा किया जा रहा था ।

अमेरिका स्थित बहुराष्ट्रीय निगमों की 187 सहायक कंपनियों की सख्या 1950 में 2000 थी जो 1967 में बढ़कर 8000 हो गई । इस प्रकार इनकी सख्या में दो दशकों के भीतर चार गुना वृद्धि हुई । अमेरिका में ऐसी कंपनियाँ, जिनके अधिकारी विदेशी थे, 1972 में 2713 थीं । विश्व बैंक के एटलस के 1979 के संस्करण में विश्व की 100 सबसे बड़ी कंपनियों (एक अरब डॉलर से अधिक पूँजी वाली फर्में और देश) की सूची को शामिल किया गया था ।

इनमें से 41 बहुराष्ट्रीय निगम थे जिनमें जनरल मोटर्स तथा एकसोन का स्थान कंपनियों में सबसे ऊपर लेकिन 22 देशों से नीचे थे । शीर्ष 50 इकाइयों में केवल 9 बहुराष्ट्रीय निगम थे, परंतु बाद की 50 इकाइयों में बहुराष्ट्रीय निगमों की संख्या 32 थी ।

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19 विकसित देशों में कार्यरत 30,400 व्यापारिक कंपनियों की एक या अधिक मेजबान देशों में कम से कम एक विदेशी सहयोगी कंपनी है । इनमें से आधी से अधिक बहुराष्ट्रीय निगमों पर अमेरिका इंग्लैंड या जर्मनी का नियंत्रण है । एक-चौथाई कंपनियों पर अकेले अमेरिका का नियंत्रण है ।

दुनिया-भर में फैली बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर नजर डालते हैं तो पता चलता है कि इन पर अमेरिका हावी है । 1976 में सभी 411 औद्योगिक कंपनियों (एक अरब डॉलर की बिक्री) में 54 प्रतिशत कंपनियाँ अमेरिकी

थीं ।

12 प्रतिशत कंपनियों के साथ इंग्लैंड का दूसरा तथा 10 प्रतिशत कंपनियों के साथ जापान का तीसरा स्थान था । अग्रणी कंपनियों में अमेरिका की विशाल कंपनियों: एकसोन, जनरल मोटर्स, फोर्ड मोटर्स, टेक्साको, मोबिल, स्टैंडर्ड आयल ऑफ कैलीफोर्निया, गल्क आयल, आई.बी.एम., जनरल इलेक्ट्रिक तथा इंटरनेशनल टेलीफोन एंड टेलीग्राफ के नाम शामिल थे ।

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1977 में बैंक ऑफ अमेरिका तथा सिटीकॉर्प दुनिया के दो सबसे बड़े बैंक थे । विश्व के 50 सबसे बड़े बैकों में 12 जापान के थे । यह प्रवृत्ति अभी तक जारी है । बहुराष्ट्रीय व्यापार तथा लाभ का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका जापान जर्मनी और इंग्लैंड की झोली में जाता है ।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों का इतना नियंत्रण और अभी तक इनका दबदबा होने के मुख्य कारण हैं उनकी गतिविधियों का विस्तार और उनकी आर्थिक क्षमता की मजबूती । इनका ध्यान मुख्य रूप से विकासशील देशों पर रहता है क्योंकि इन देशों के सकल घरेलू उत्पाद तथा उनके उन्नत आर्थिक क्षेत्रों में इनका महत्त्व अधिक दिखाई देता है । इसके अलावा विकासशील देश इन कंपनियों को अपने ऊपर विकसित देशों के नव-उपनिवेशवादी नियंत्रण की एजेंसी मानकर चलते हैं ।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मेजबान देशों पर प्रभाव:

बहुराष्ट्रीय निगम माल प्रौद्योगिकी और प्रबंधकीय जानकारी को देशों की सीमा से पार ले जाने के साधन के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं ।

ये कंपनियाँ और उनके समर्थक मानते हैं कि उन्होंने विकसित देशों की पूँजी तथा उत्पादन विकासशील देशों तक पहुँचाने का काम किया है । पहली बात तो यह है कि ये कंपनियाँ विकासशील देशों की निवेश संबंधी आवश्यकताएँ पूरी करती हैं ।

दूसरी बात यह है कि अधिक वेतन देती हैं, हिसाब-किताब में अधिक ईमानदारी बरतती हैं, ज्यादा करों की अदायगी करती हैं तथा स्थानीय औद्योगिक इकाइयों के मुकाबले अधिक प्रबंधकीय जानकारी एवं प्रशिक्षण प्रदान करती हैं ।

तीसरी बात यह है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अपने कर्मचारियों को बेहतर सामाजिक सेवाएँ तथा रोजगार के अधिक आकर्षक अवसर उपलब्ध कराती हैं । चौथी विशेषता यह है कि ये विकसित देशों से उन्नत प्रौद्योगिकी विकासशील देशों तक ले जाने की वाहिका के रूप में काम करती हैं ।

परंतु विकासशील देशों का मानना है कि ये कंपनियाँ जो लागत वसूल करती हैं वे काफी अधिक होती है । यह सही है कि ये विकासशील देशों में पूँजी रोजगार तथा अन्य लाभ उपलब्ध कराती हैं परंतु जिन शर्तों पर ये लाभ आते हैं उनके बारे में माना जाता है कि वे अन्यायपूर्ण तथा शोषणकारी हैं एव ये नए देशों के संसाधनों को हड़पने वाली हैं ।

इन कंपनियों के माध्यम से प्रौद्योगिकी के आ जाने से विकासशील देश पराश्रित बन जाते हैं । विकसित देशों को स्थानीय विकास में बाधा डालने का मौका मिल जाता है । इससे स्थानीय उद्यम समाप्त भले ही न होते हों, परकमजोर अवश्य होते हैं और औद्योगीकरण आर्थिक विकास तथा आत्म-निर्भरता की प्रक्रिया में रुकावट आती है ।

बहुराष्ट्रीय निगम मुख्य रूप से लाभ कमाने वाले संगठन हैं और उनका सतत् प्रयास रहता है कि वे अपने शेयरहोल्डरों को अधिक से अधिक लाभ दें जिनमें से अधिकतर लोग इन कंपनियों के गृह देशों के रहते

हैं ।

साथ ही विकासशील देशों से विकसित देशों तक पूँजी का प्रवाह बहुत अधिक होता है, जिसका पुनर्निवेश विकासशील देशों में जहाँ उत्पादन होता है, नहीं किया जाता । बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ प्रौद्योगिकी-हस्तातरण तकनीको जानकारी देने और लाइसेंस देने के लिए भारी शुल्क वसूल करती हैं जिससे मेजबान देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव पड़ता है ।

‘हस्तांतरण’ का मूल्य निर्धारण एक और तरीका है जिसका इस्तेमाल बहुराष्ट्रीय निगम अपने करों को कम करने तथा लाभ बढ़ाने के लिए करते हैं । किसी कपनी की विभिन्न देशों में स्थित सहायक कंपनियों का कच्चा, अर्ध-प्रसंस्कृत या तैयार माल का कारोबार वास्सव में सहायक कंपनियों के बीच ही किया जाता है क्योंकि खरीदने तथा बेचने का काम वास्तव में एक ही कंपनी कर रही होती है, इसलिए आयात-निर्यात के इन सौदों में सुरक्षित या स्थानांतरण मूल्यों को इस प्रकार समायोजित किया जा सकता है जिससे मूल कंपनी को फायदा हो ।

इस सारे गोरखधंधे का परिणाम यह होता है कि पूँजी का प्रवाह विकासशील देशों से विकसित देशों की ओर होता है । बहुराष्ट्रीय निगम मेजबान देशों को लाभ तो पहुँचाती हैं लेकिन भारी कीमत पर । ये कंपनियाँ विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं तथा

विकास प्रयासों पर नकारात्मक प्रभाव डालकर उन्हें नुकसान पहुँचाती हैं । विकासशील देशों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दुष्प्रभावों का विश्लेषण करते हुए जोन एडलमैन मेरो ने कहा है,  बहुराष्ट्रीय निगम आमतौर पर बड़े-बड़े विकास ढाँचे खड़े करते हैं जिनका अर्थव्यवस्था के विस्तार में कोई योगदान नहीं होता ।

इनमें ऐसी प्रौद्योगिकी इस्तेमाल की जाती है जिनमें भारी पूँजी की आवश्यकता होती है, बहुत कम स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है सामान उसी देश से नहीं बल्कि बाहर से प्राप्त किया जाता है, करों से बचने के लिए हस्तांतरण मूल्यों तथा प्रौद्योगिकी समझौतों का सहारा लिया जाता है और आमदनी अपने देशों को भेजी जाती है । फायदे की बात की जाए तो इन ढाँचों के लाभ गृह देश और मेजबान देश के उन 

थोड़े से लोगों को ही मिलते हैं जो इन निगमों से जुड़े होते हैं ।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों का गृह देशों पर प्रभाव:

बहुराष्ट्रीय कंपनियों की भूमिका उनके अपने गृह देशों में भी चिंता का विषय है । निस्संदेह ये कंपनियाँ अपने गृह देशोंको आर्थिक लाभ पहुँचाती हैं पर इन लाभों के बदले इन देशों को अपनी अर्थव्यवस्थाओं तथा उत्पादन एवं रोजगार बाजारों में समस्याओं के रूप में भारी कीमत चुकानी पड़ती है ।

बहुराष्ट्रीय निगमों के आलोचकों का कहना है कि ये शक्तिशाली निगम मजदूर संगठनों की वेतन बढ़ाने की माँगों से बचने के लिए उत्पादन सुविधाएँ अन्य देशों में ले जाते हैं । औद्योगिक रूप से विकसित देशों से कारोबार को उन विकासशील देशों में जहाँ मजदूरी सस्ती है और मजदूर संगठन असंगठित है, ले जाने की प्रवृति के फलस्वरूप गृह देशों में बेरोजगारी पनपती है क्योंकि पूँजी का स्थानांतर मजदूरों के मुकाबले ज्यादा तेजी से हो जाता है ।

अपनी आर्थिक सत्ता के सहारे बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ मेजबान देशों की नीतियों को अपने पक्ष में प्रभावित करने में सक्षम होती है । दूसरी ओर, उनके गृह देश इन कंपनियों को विकासशील देशों में अपनी विदेश नीति संबंधी लक्ष्य प्राप्त करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं ।

बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ चूँकि पूँजी माल तथा प्रौद्योगिकी को विश्व के विभिन्न भागों में हस्तांतरित करने में सक्षम होती हैं, इसलिए गृह देशों की सरकारों द्वारा अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए उठाए गए कठोर कदमों के प्रभाव से बच जाती हैं ।

उदाहरण के लिए ये अपने उद्यम अन्य अमीर देशों को स्थानांतरित करके अपने देश की कठोर ऋण नीति से बच सकती है । विदेशों से लाभ वापस भेजने में देरी करके वे गृह देशों के बकाया भुगतान में बाधा पैदा कर सकती हैं ।

इसी तरह, उत्पादन सुविधाएँ विदेशों में ले जाकर स्थानीय मजदूरी की लागत में मृद्धि से बच सकती हैं । जैसे-जैसे किसी बहुराष्ट्रीय निगम का लाभ बढ़ता है, वैसे-वैसे गृह देश के लिए उस पर नियंत्रण रखना कठिन होता जाता है ।

वे मामूली-सी आर्थिक और प्रबंध संबंधी गतिविधियों के जरिए गृह देश द्वारा निर्धारित लक्ष्यों पर नकारात्मक असर डाल सकती हैं । एक सशक्त गैर-सरकारी लाभ कमाने वाली संस्था के रूप में काम करने की क्षमता के कारण बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ गृह देशों के लिए समस्याएँ पैदा कर सकती हैं । गृह देश की राजनीतिक तथा आर्थिक क्षेत्र में विदेश नीति संबंधी उद्देश्यों को ये कंपनियाँ नुकसान पहुँचा सकती हैं ।

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के वर्तमान युग में बहुराष्ट्रीय निगम अपने गृह देशों तथा मेजबान देशों दोनों की सरकारों को प्रभावित कर रहे हैं । ये मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय मामलों की विशाल गैर-सरकारी आर्थिक इकाई के रूप में उभरकर सामने आए हैं ।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों की राजनीति व्यापक अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का अंग है । एक ओर इनकी भूमिका की विकासशील देशों के कुछ आलोचकों द्वारा घोर निंदा की जाती है तो दूसरी ओर कई अन्य विद्वान एवं अर्थशास्त्री इन्हें अंतर्राष्ट्रीय परस्पर-निर्भरता मानव कल्याण और आधुनिकीकरण का ऐसा माध्यम मानते हुए इनका समर्थन करते हैं जो अब इतनी शक्तिशाली बन चुकी हैं कि अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के जानकार इनकी अनदेखी नहीं कर सकते । बहुराष्ट्रीय निगमों की भूमिका की बात किए बिना समकालीन अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर कोई भी चर्चा अधूरी रहेगी ।

निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि बहुराष्ट्रीय निगमों के समर्थक इन्हें आर्थिक औद्योगिक तथा प्रौद्योगिकी के विकास के ऐसे साधन मानते हैं जो विकसित तथा विकासशील दोनों तरह के देशों को लाभ पहुँचा रहे हैं ।

उनकी राय में जरूरत इस बात की है कि इन अंतर्राष्ट्रीय महासंस्थाओं के संसाधनों का इस्तेमाल इस तरह किया जाए कि विश्व को युद्ध गरीबी तथा पिछड़ेपन से मुक्त किया जा सके । इन कंपनियों के आलोचक विशेषकर विकासशील देशों के लोग बहुराष्ट्रीय निगमों के उदय एवं प्रगति को वर्तमान युग का बहुत बड़ा अभिशाप मानते हैं ।

उनकी माँग है कि इन्हें नव-उपनिवेशवाद के साधन के रूप में सक्रिय होने से रोकने के लिए कड़े उपाय किए जाएँ । ऐसा राष्ट्रीय तथा स्थानीय कानूनों के जरिए ही की जा सकता है क्योंकि अपनी असीम शक्ति के कारण ये संयुक्त राष्ट्र संघ तथा अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के नियंत्रण से बाहर हो गए हैं ।

बहुराष्ट्रीय कपनियाँ समकालीन अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की वास्तविकता हैं । कोई भी इनकी समाप्ति की आशा नहीं कर सकता और घड़ी की क्रयों को पीछे ले जाने की कोशिश करना बेकार है । आवश्यकता इस बात की है कि इन्हें इस तरह नियंत्रित किया जाए कि वे मानवता को नुकसान न पहुँचा पाएँ ।

ये अपने मेजबान तथा गृह, दोनों देशों की अर्थव्यवस्था तथा सत्ता के लिए खतरा पैदा कर सकती हैं, बल्कि कुछ हद तक पहले से भी खतरे पैदा कर रही हैं । गैर-सरकारी महासस्था के रूप में वे अपने देशों की नीतियों एवं कानूनों को अपने हक में प्रभावित करके अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में उनकी भूमिका को सीमित कर सकती हैं ।

वे पूँजी प्रौद्योगिकी तथा तकनीकी जानकारी को विकसित देशों से विकासशील देशों को हस्तांतरित करने की राह में पहले से ही रोड़े अटका रही हैं । इसलिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों की गतिविधियों को नियंत्रित करने के उपाय करने की जरूरत है ताकि वे आधुनिकीकरण तथा विकास की वाहिका के रूप में काम करें और उन्हें विश्व में आर्थिक विषमता तथा नव-उपनिवेशवाद के प्रसार के साधन के रूप में काम करने हरीका जा सके ।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सर्मथकों तथा आलोचकों दोनों को यह महसूस करना चाहिए कि ये पहले से ही अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की सशक्त गैर-सरकारी इकाइयों के रूप में विकसित हो चुकी हैं । इसलिए इस बात का हरसंभव प्रयास किया जाए कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों का इस्तेमाल अंतर्राष्ट्रीय शांति सुरक्षा एवं विकास के साधन के रूप में किया जा सके । इन्हें विकसित तथा विकासशील दोनों तरह के देशों को हानि पहुँचाने से रोका जाना चाहिए ।

इसके लिए आवश्यक है कि राष्ट्रीय अतर्राष्ट्रीय कानूनी और राजनीतिक दायरों से बाहर रहने के इनके मौजूदा दर्जे को समाप्त किया जाए । सभी देशों को ऐसी राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ खड़ी करनी चाहिए जो इन विशाल आर्थिक संस्थाओं को नियंत्रित करने में सक्षम हों । इस दिशा में बढ़ने में विफलता से निश्चय ही 21वीं सदी में उनका दुष्प्रभाव और बड़ा तथा खतरनाक बन जाएगा ।

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