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Essay on Noise Pollution in India | Hindi

Read this essay in Hindi to learn about the cause and effect of noise pollution in India.

शोर हो सकता है जल और वायु के प्रदूषण जितना हानिकारक न लगे, पर यह भी प्रदूषण की एक समस्या तो है जो मानव के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है और पर्यावरण की गुणवत्ता में ह्रास लाती है । शोर अवांछित ध्वनि होता है ।

हर ध्वनि शोर नहीं होती है । जो ध्वनि एक व्यक्ति को संगीत लगती है, वह किसी दूसरे व्यक्ति को शोर लग सकती है ! अधिकांश दूसरे प्रदूषकों की तरह यह कोई पदार्थ नहीं होती कि पर्यावरण में जमा हो        जाए । ध्वनि को ‘डेसिबिल’ (decibel-dB) की इकाई में मापते हैं ।

शोर के कई स्रोत होते हैं जो घर के अंदर और बाहर ध्वनि प्रदूषण पैदा करते हैं । कारखानों और वाहनों से तथा त्योहारों के दिनों में लाउडस्पीकरों के बजने से उठनेवाला शोर घर से बाहर ध्वनि प्रदूषण का कारण है जबकि रेडियो का म्यूजिक सिस्टम ऊँची आवाज में बजाने पर या दूसरे इलेक्ट्रानिक उपकरणों से घर के अंदर ध्वनि प्रदूषण होता है ।

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नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार (इन दिनों बाजार में उपलब्ध) पटाखों से पैदा होनेवाला शोर वांछित स्तर से बहुत अधिक होता है । पर्यावरण संरक्षण (दूसरा संशोधन) नियम 1999 के अनुसार शोर का निर्धारित स्तर 125 डेसिबिल है ।

ध्वनि और शोर के बीच अंतर प्रायः मनोगत और निजी राय पर आधारित होते हैं । लेकिन ध्वनि के ऊँचे स्तरों के कुछ बहुत हानिकारक प्रभाव अवश्य होते हैं । इनके प्रभावों की तीव्रता बेहद उलझन पैदा करनेवाले से लेकर बेहद कष्टदायक और घातक तक हो सकती है ।

आम ध्वनियों के डेसिबिल स्तर (Decibel levels of common sounds):

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शारीरिक स्वास्थ्य पर ध्वनि प्रदूषण के प्रभाव (Effects of Noise Pollution on Physical Health):

अत्याधिक शोर का सबसे प्रत्यक्ष हानिकारक प्रभाव कानों पर पड़ता है और श्रवणशक्ति स्थायी या अस्थायी रूप से प्रभावित होती है जिसे अकसर ‘अस्थायी दहलीजी परिवर्तन’ (temporary threshold shift-TTS) कहते हैं । इससे ग्रस्त व्यक्ति मामूली ध्वनियों को नहीं सुन सकते । लेकिन कुछ माह बाद श्रवणशक्ति आम तौर पर वापस आ जाती है ।

महाराष्ट्र में जहाँ गणपति पूजा के दौरान दस दिनों तक कानफाड़ संगीत चलता रहता है, गणेश मंडपों के पास रहनेवाले व्यक्ति अकसर इस प्रवृत्ति से प्रभावित हो जाते हैं । स्थायी बहरापन जिसे ‘शोरजन्य स्थायी दहलीजी परिर्वतन’ (noise-induced permanent threshold shift-NIPTS) कहते हैं, श्रवणशक्ति की ऐसी हानि है कि वह ठीक नहीं हो सकती ।

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80 डेसिबिल से कम की ध्वनियों से बहरापन कतई नहीं आता । लेकिन 80 से 130 डेसिबिल की ध्वनियों के अस्थायी प्रभाव देखे गए हैं । काम के दौरान 95 डेसिबिल की ध्वनि के संपर्क में आनेवाले लगभग 50 प्रतिशत व्यक्ति अस्थायी बहरेपन के शिकार होते हैं और 105 डेसिबिल से अधिक ध्वनियाँ सुननेवाले कुछ सीमा तक स्थायी बहरेपन से ग्रस्त होते हैं 150 डेसिबिल या इससे अधिक की ध्वनि मनुष्य के कानों के पर्दे फाड़ सकती है ।

बहरेपन की सीमा शोर की अवधि और तीव्रता पर निर्भर होती है । उदाहरण के लिए, 100 डेसिबिल की ध्वनि एक घंटे सुननी पड़े तो अस्थायी हानि हो सकती है जो एक दिन जारी रहेगी । लेकिन शोर करनेवाली मशीनों वाले कारखानों में मजदूरों को प्रतिदिन भारी शोर सुनना पड़ता है ।

95 डेसिबिल की ध्वनि यदि 8 घंटे प्रतिदिन 10 वर्षों तक सुननी पड़े तो कोई 15 डेसिबिल वाली स्थायी हानि हो सकती है । बहरापन पैदा करने के अलावा ध्वनि के ऊँचे स्तर रक्तचाप बढ़ाकर और नाड़ी की गति बदलकर रक्त के परिचालन पर हानिकारक प्रभाव भी डाल सेकते हैं ।

मानसिक स्वास्थ्य पर शोर के प्रभाव (Effects of Noise Pollution on Mental Health):

शोर के कारण चिढ़, चिंता और तनाव जैसे भावात्मक या मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा होते हैं । ध्यान केंद्रित करने की असमर्थता और मानसिक थकान शोर के महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्य संबंधी प्रभाव हैं । ऐसा देखा गया है कि जो विद्यालय नगर के व्यस्त क्षेत्रों में स्थित हैं और ध्वनि प्रदूषण से त्रस्त हैं उनके बच्चों की बोध की क्षमता कम होती है ।

शोर चूँकि सामान्य श्रवण में बाधा डालता है, इसलिए वह चेतावनी के संकेत सुनने नहीं देता और दुर्घटनाओं की दर बढ़ाता है, खासकर कारखानों में । इससे मजदूरों की कार्यक्षमता और उत्पादकता भी कम होती हैं, तथा कार्यस्थलों पर दुर्घटनाओं की दरें बढती हैं । इस तरह शोर एक परेशानी या उलझन मात्र नहीं है । यह स्पष्ट रूप से जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करता है । इसलिए ध्वनि प्रदूषण का शमन या नियंत्रण आवश्यक है ।

शोर के निर्धारित स्तर (Permitted noise levels):

आसपास में शोर के स्तर (डेसिबिल में dB) :

 

 

शोर के विभिन्न स्तरों से संपर्क के बारे में सुरक्षित समय-सीमा का एक मानक तय किया गया है । इस ‘सुरक्षित’ समय से अधिक अगर एक वर्ष तक निरंतर संपर्क हो तो बहरापन आ सकता है ।

 


 

शोर पर नियंत्रण की तकनीकें (Noise Control Techniques):

शोर को चार बुनियादी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है: स्रोत पर शोर में कमी करके, शोर के रास्ते को बंद करके, रास्ते की लंबाई बढ़ाकर, और ग्रहण करनेवाले को सुरक्षित बनाकर । समान्यतः स्रोत पर ही शोर में कमी करना नियंत्रण की सबसे अच्छी विधि है ।

स्रोत पर कमी का सबसे कारगर तरीका वाहनों और मशीनों को ढँकना है । उद्योगों में मशीनों के चारों ओर मजबूत बंद कमरे बनाकर और उनमें ध्वनिशोषक सामग्री की पर्तें लगाकर शोर को कम किया जा सकता है । मशीनों और उनके कमरों का फर्श से संपर्क समाप्त करके, उन्हें विशेष प्रकार की स्प्रिंगों या अवशोषक पैडों पर रखकर और अंदर की पाइपों के लिए लोचदार संयोजकों (couplings) का प्रयोग करके भी स्रोत पर शोर में कमी लाई जा सकती है ।

लेकिन मशीनों का नियंत्रित और भरपूर रखरखाव स्रोत पर शोर में कमी के बेहतरीन उपायों में एक है । निर्माण की समुचित योजनाओं और समय-निर्धारण की तकनीकों के उपयोग से निर्माणस्थलों पर शोर को नियंत्रित किया जा सकता है । शोर करनेवाले एयर कंप्रेसरों और दूसरे उपकरणों को उन स्थलों से दूर लगाकर और साथ में अस्थायी दीवारें बनाकर शोर पर भौतिक रोक लगाकर भी शोर को कम किया जा सकता है ।

यातायात संबंधी शोर अधितर वाहनों के पहियों के सड़कों पर घिसाव और हवा के प्रतिरोध से पैदा होता है । लेकिन खराब रखरखाव वाले वाहन भी शोर बढ़ाते हैं । यातायात का घनत्व और गति भी ध्वनि के स्तर पर सार्थक प्रभाव डालते हैं । मिसाल के लिए, वाहन की गति को दुगुना कर देने पर ध्वनि का स्तर कोई 9 डेसिबिल बढ़ जाता है और यातायात का घनत्व (प्रतिघंटा वाहनों की संख्या) के दुगुना होने पर ध्वनि का स्तर कोई 3 डेसिबिल बढ़ता है । यातायात के ‘रुको और जाओ’ वाले ढर्रे की अपेक्षा उसका सुचारु प्रवाह कम शोर पैदा करता है ।

यातायात का शोर कम करने के लिए सड़कों की योजना और रूपरेखा सही ढंग की होनी चाहिए । आवासीय क्षेत्रों से जानेवाली सड़कों पर गति की सीमा कम करना, यातायात का घनत्व सीमित रखना तथा ट्रकों के लिए वैकल्पिक रास्तों की व्यवस्था करना भी शोर-नियंत्रण के कारगर उपाय हैं । राजमार्गों पर उर्ध्वाकार अवरोधक (vertical barriers) लगाकर भी यातायात के शोर का रास्ता बंद किया जा सकता है ।

घरों के आसपास लगे पेड़ भी शोर के कारगर अवरोधक होते हैं । उद्योगों में अंदरूनी शोर कम करने के लिए विभिन्न प्रकार की अवशोषक सामग्रियों का उपयोग किया जा सकता है । दीवारों, छतों और फर्श के लिए उच्च अवशोषक सामग्रियों का प्रयोग घरों में शोर का स्तर कम करता है । शोर के स्रोत से दूरी बढ़ने पर भी ध्वनि का स्तर काफी कम हो जाता है । स्रोत और ग्रहणकर्ता के बीच रास्ते के बीच लंबाई बढ़ाना नियंत्रण का एक निष्क्रिय उपाय है ।

हवाई अड्‌डे रिहायशी इलाकों से दूर बनाए जाएँ-नगरों के भूमि-उपयोग संबंधी नियम इस बात को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं । कानों में प्लग और रूई आदि का प्रयोग ऊँचे शेर से व्यक्ति की रक्षा करता है; विशेष रूप से तैयार किए गए इयरमफ (ear muffs) कान के पर्दे तक पहुँचनेवाली ध्वनि के स्तर में 40 डेसिबिल तक की कमी कर सकते हैं । लेकिन उनके उपयोग के बारे में कंपनी की हिदायतों के बावजूद मजदूर अकसर उन्हें नियमित रूप से नहीं पहनते ।

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