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Essay on Old Age in Hindi

Read this essay in Hindi language to learn about the phase of old age in an individual’s life.

वृद्धावस्था (Old Age):

हरलॉक के अनुसार, ”यह अवस्था जीवन विस्तार की अंतिम अवस्था है ।” उनके अनुसार, साठ वर्ष से अधिक की आयु के लोग वृद्ध कहे जाते हैं । उन्होंने आगे कहा कि साठ वर्ष की आयु प्रौढ़ व वृद्ध के बीच की मध्यम रेखा है ।

इस समय व्यक्ति अपने पूर्व जीवन की अत्याधुनिक वांछित आकांक्षाओं से धीरे-धीरे दूर होने लगता है तथा अपने जीवन के बीते दिनों की उपलब्धियों को याद करके जीवन यापन शुरू करता है और अपने जीवन के शेष दिनों को जीने के लिए स्वयं को तैयार करता है; जैसे-जैसे व्यक्ति की आयु बढ़ती है, उसके व्यवहार में परिवर्तन आना शुरू हो जाता है तथा वह छोटे बालकों के समान व्यवहार करना प्रारम्भ कर देता है ।

वृद्धावस्था का समय (Time of Old Age):

वृद्धावस्था का समय इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति कितने समय तक जीवित रहता है । इस अवस्था में आयु बढ़ने के साथ-साथ व्यक्ति की शक्ति, स्फूर्ति व काम करने की क्षमता भी धीमी पड़ने लगती है ।

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ऐसा भी देखा गया है कि कई बार व्यक्ति अपनी योग्यता व कौशल से इस आयु में हुए  ह्रास की क्षतिपूर्ति आसानी से कर लेता है; जैसे: स्कूटर या कार को वह धीमी गति से चलाकर दुर्घटना से बच सकता है ।

वृद्धावस्था में ह्रास: (Decline in Old Age):

व्यक्ति में जब ह्रास की गति तीव्र होती है, उस स्थिति में मनुष्य शारीरिक व मानसिक रूप से टूट जाता है या कमजोर हो जाता है तथा क्षतिपूर्ति करने में असमर्थ होता है, उस काल को जरावस्था कहते हैं ।

ऐसा भी देखा गया है कि व्यक्ति में जरावस्था कब आएगी, इसका समय निर्धारित करना अत्यंत कठिन है । कभी-कभी जराग्रस्त होने से पूर्व ही व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है । अत: यह अवस्था भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न समय पर शुरू होती है ।

जैसे विकास का नियम हर व्यक्ति पर एक-सा लागू नहीं होता वैसे ही  ह्रास का प्रतिमान भी सभी वृद्धों पर एक-सा लागू हो कोई जरूरी नहीं है । इसके साथ-साथ इस अवस्था के लक्षण भी सभी वृद्धों में पाये जायें यह आवश्यक नहीं है और यह भी आवश्यक नहीं कि वे प्रारम्भिक लक्षण कहे जा सकें ।

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आयु वृद्धि का प्रभाव प्रत्येक व्यक्ति में भिन्न-भिन्न प्रकार से होता है तथा स्त्री-पुरूषों में इसकी गति भी भिन्न-भिन्न होती है ।

यह निम्नलिखित बातों पर निर्भर करता है:

(i) आनुवांशिकता

(ii) वातावरण

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(iii) सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति

(iv) शैक्षणिक पृष्ठ भूमि ।

ह्रास या टूट-फूट की प्रक्रिया एक निश्चित क्रम में होती है, परन्तु फिर भी प्रत्येक व्यक्ति के शारीरिक व मानसिक लक्षणों के लिये यह क्रम भिन्न-भिन्न होता है तथा आयु के बढ़ने के साथ-साथ यह गति धीमी हो जाती है ।

यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि उसका मानसिक  ह्रास (जरण या शारीरिक) कौन-सा पहले होगा । जो व्यक्ति अपने आप को वृद्ध स्वीकार करने लगते हैं, उनमें मानसिक  ह्रास शीघ्र शुरू हो जाता है । क्रियाशील व सक्रिय व्यक्ति में जरण का प्रभाव कम देखा जाता है ।

इसके साथ-साथ उन्नत चिकित्सा सुविधा, रहन-सहन के उत्तम विधियों के कारण जरावस्था का प्रारम्भ स्त्री व पुरूषों में साठ-पैंसठ वर्ष की आयु में होता है । कोई व्यक्ति मानसिक रूप से तभी निष्क्रिय होने लगता है जब उसमें शारीरिक  ह्रास के लक्षण प्रकट होना शुरू होते हैं ।

प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक संरचना व उसके विभिन्न अंगों का जीवन काल भिन्न-भिन्न होता है; जैसे-स्त्रियों में अण्डाशय एक निश्चित समय तक काम करता है उसके बाद वह निष्क्रिय हो जाता है । रोगी महिलाओं में मासिक धर्म जल्दी बंद हो सकता है तथा इसी प्रकार मानसिक  ह्रास भी हर व्यक्ति में भिन्न-भिन्न होता है; जैसे-शब्द भण्डार ज्ञान प्राप्ति व प्रत्यक्षीकरण में  ह्रास कम होता है परन्तु स्मृति या याददाश्त में ह्रास सबसे ज्यादा होता है ।

ह्रास के कारण (Causes of decline):

वृद्धावस्था में  ह्रास के दो कारण होते हैं:

(i) आंशिक रूप से शारीरिक कारक,

(ii) आंशिक रूप से मनोवैज्ञानिक कारक ।

इस अवस्था में शरीर के विभिन्न ऊतकों की संरचना में तीव्रता से परिवर्तन होता है । जिससे कोशिकाओं में उपस्थित तरल पदार्थ में कमी होती है जिससे पौष्टिक तत्व कोशिकाओं को प्राप्त नहीं हो पाते तथा अनुपयोगी या विषाक्त पदार्थ कोशिकाओं से निष्कासित न होकर उन्हीं में जमा रहते हैं । इस प्रकार कोशिका में उपस्थित तरल पदार्थ कोशिकाओं को बनाने के बजाय इन्हें क्षति पहुँचाते हैं ।

अत: जितनी ज्यादा मात्रा में कोशिकाओं का टूटना होगा शारीरिक  ह्रास उतना ही ज्यादा होगा । वृद्धावस्था में परिवर्तन का दूसरा कारण व्यक्ति में कोई विशेष रोग न होकर जरण की प्रक्रिया है ।

इस अवस्था में कोशिकाओं में दो प्रकार के परिवर्तन देखे जाते हैं:

(i) धीरे-धीरे कोशिकाओं में शुष्कीकरण

(ii) धीरे-धीरे कोशिकाओं में विभाजन की प्रक्रिया में कमी का उत्पन्न होना ।

कोशिकाओं की टूट-फूट होने पर इनके स्थान में नई कोशिकाओं के निर्माण की शक्ति कम हो जाती है । शरीर में आक्सीकरण की क्रिया की गति भी धीमी पड़ जाती है जिसका प्रभाव कोशिकाओं की रचना में परिवर्तन है;

जैसे:

(i) ऊतकों में लचीलेपन का अभाव,

(ii) संयोगी ऊतकों की मात्रा में कमी,

(iii) तंत्रिका तंत्र की गति धीमी होने पर उसके कार्य करने की क्षमता में कमी आना,

(iv) कोशिकाओं के आन्तरिक वातावरण को सामान्य बनाये रखने की क्रिया  में कमी आना आदि । ये सभी परिवर्तन  ह्रास की दिशा को इंगित करते हैं ।

इन परिवर्तनों के अतिरिक्त कोशिकाओं के द्रव्य में पौष्टिक तत्वों; जैसे: लौह, लवण व कैल्शियम जमा होने के कारण  ह्रास की प्रक्रिया तेज गति से होने लगती है । मस्तिष्क की कोशिकाओं व ऊतकों में भी तीव्र गति के साथ परिवर्तन होता है ।

अनेकों अध्ययनों से ज्ञात होता है कि इस अवस्था में मानसिक गिरावट अधिक होती है, जिससे व्यक्ति अधिकांशत: मानसिक रूप   में परेशान रहता है । जो व्यक्ति वृद्धावस्था के समय अपनी भूमिका के साथ स्वयं को समायोजित नहीं कर पाते वे अति शीघ्र जरावस्था में पहुँच जाते हैं ।

जरण की प्रक्रिया इस बात पर भी निर्भर करती है कि व्यक्ति अपने जीवन में कितने तनाव व तूफान को झेल चुका है । अन: इस समय व्यक्ति को प्राप्त होने वाली प्रेरणा मुख्य भूमिका निभाने का कार्य करती     है ।

यदि व्यक्ति सेवानिवृत्ति के पश्चात् अपने खाली समय का अच्छी तरह सदुपयोग करके अपनी रुचि व कौशल का प्रयोग करके जीवन से समायोजन करता है, उनमें जरण की स्थिति देर से आती है, जो लोग घर-परिवार की जिम्मेदारियों को बोझ या बोरियत का कार्य समझते हैं, उन व्यक्तियों में जरण के लक्षण जल्दी दिखाई देते हैं । इसके विपरीत जो लोग हँसी-खुशी से घर की जिम्मेदारियाँ उठाते हैं तथा रुचि व जिन्दादिली से सब कार्य करते हैं उनमें जरण के लक्षण देर से दिखाई देते हैं ।

वृद्धावस्था की आवश्यकताएँ (Needs of Old Age):

वृद्धावस्था में अनेक शारीरिक परिवर्तन होते हैं जिस कारण एक वृद्ध की आवश्यकताएँ भिन्न हो जाती हैं, जो कि निम्न भागों में बाँटी गई हैं:

 

(1)  शारीरिक आवश्यकताएँ (Physical Needs):

वृद्धावस्था में व्यक्ति के स्वास्थ्य में धीरे-धीरे गिरावट आने लगती है अत: उन आवश्यकताओं को (i) स्वास्थ्य सम्बन्धी आवश्यकताएँ कहते हैं । इस अवस्था में व्यक्ति के खानपान की आदतों में भी परिवर्तन होता है जिसे (ii) पोषण सम्बन्धी आवश्यकताएँ कहते हैं ।

(a) स्वास्थय सम्बन्धी आवश्यकताएँ (Health related needs):

जैसे-जैसे व्यक्ति में शारीरिक हास होता है उसके स्वास्थ्य में भी  ह्रास  होने लगता है तथा स्वास्थ्य में लगातार गिरावट आती जाती है । व्यक्ति नाना प्रकार की व्याधियों से पीड़ित हो जाता है; जैसे: उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग, गठिया तथा शक्तिहीनता आदि प्रमुख है ।

वृद्धों को समय-समय पर चिकित्सक की सलाह के अनुसार अपना शारीरिक परीक्षण करवाते रहना चाहिये । उचित समय पर दवाईयाँ लेते रहने से स्वास्थ्य में पर्याप्त सुधार होता है तथा वृद्ध व्यक्ति स्वस्थ रहता है । उत्तम स्वास्थ्य रहे इसके लिये निम्न बातों पर भी ध्यान रखना चाहिये:

(i) उचित आराम (Proper rest):

वैसे तो प्रत्येक आयु के लिये आराम आवश्यक है परन्तु वृद्धावस्था में व्यक्ति थकावट का ज्यादा अनुभव करता है जिस कारण उसे उचित आराम की आवश्यकता होती है तथा पर्याप्त व्यक्तियों को घर-परिवार के कार्यों से कुछ समय निकाल कर थोड़ी देर के लिये आराम अवश्य ही करना चाहिये । अधिकतर वृद्धावस्था में व्यक्ति को ज्यादा गहरी नींद नहीं आती है, ऐसी स्थिति में दिन में कई बार वे छोटी-छोटी झपकियाँ लेकर आराम प्राप्त कर सकते हैं ।

(ii) व्यायाम (Exercise):

व्यायाम प्रत्येक आयु में करने से व्यक्ति फिट व स्वस्थ रहता है । अत: बढ़ती आयु में भी फिट रहने के लिये विश्राम के साथ-साथ व्यायाम करना अति आवश्यक है । इस उम्र में हल्के-फुल्के व्यायाम, सुबह शाम घूमना या प्राणायाम से व्यक्ति फिट रहने के साथ-साथ तरोताजा महसूस करता है ।

(iii) उचित रहने का स्थान (Proper living space):

वृद्ध व्यक्ति जब शारीरिक रूप से कमजोर हो जाता है । तब उसे उचित निवास स्थान की आवश्यकता पड़ती है । वृद्धों की आँखों की रोशनी कमजोर हो जाती है अत: घर के कमरों में बड़ी खिड़कियाँ होनी चाहिये ताकि पर्याप्त मात्रा में रोशनी आ सके ।

सीढ़ियों की ऊँचाई कम होनी चाहिये, तथा सीढ़ियों पर अच्छी रोशनी होनी चाहिये ताकि वृद्ध व्यक्ति सीढ़ियों से गिर न सके । गर्मी के दिनों में कमरों में आवश्यकतानुसार पर्दों की व्यवस्था होनी चाहिये । इसके साथ-साथ गर्मी में कमरे को ठंडा करने के लिये कूलर या ए. सी. की व्यवस्था भी होनी चाहिये । ठंड के मौसम में कमरे को गर्म करने की उचित व्यवस्था होनी चाहिये ।

क्योंकि वृद्धावस्था में शरीर का उष्मा नियंत्रक तंत्र क्षीण हो जाने तथा संचार में कमी आ जाने के कारण वृद्ध व्यक्तियों की त्वचा ठंड के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती है । घर शोरगुल वाले स्थान से दूर होना चाहिये तथा घर या उसके आस-पास मनोरंजन के उचित साधन होने चाहिये ।

(b) पोषण सम्बन्धी आवश्यकताएँ (Food related needs):

आयु बढ़ने के साथ-साथ शरीर में कई परिवर्तन हो जाते हैं । वृद्धावस्था में शरीर के अंग शिथिल पड़ जाते हैं और उनकी कार्यक्षमता में कमी आ जाती है । बुढ़ापे में पाचन संस्थान कमजोर पड़ जाते हैं । दाँतों के गिर जाने से ये लोग कड़े भोज्य-पदार्थ नहीं खा पाते ।

अत: इस आयु में अधिकतर लोग अच्छी तरह पके हुए मुलायम भोजन का सेवन करते हैं फिर भी इनको कब्ज हो जाता है क्योंकि आमाशय तथा आँतों में पाचक रस कम उत्पन्न होने से भोजन का पाचन रस ठीक प्रकार नहीं हो पाता । आँतों की दीवार के कमजोर पड़ जाने से भोजन का शोषण भी  पूर्ण नहीं हो पाता ।

भोज्य पदार्थो का पूर्ण पाचन एवं शोषण न होने से शरीर में पौष्टिक तत्वों की न्यूनता हो जाने की सम्भावना बढ़ जाती है । रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्रा कम हो जाती है । आयु बढ़ने के साथ-साथ उत्सर्ज संस्थान की कार्यक्षमता धीरे-धीरे क्षीण होती जाती है, जिससे मूत्र में सोडियम क्लोराइड एवं यूरिया की मात्रा का कम हो जाना स्वाभाविक है । हार्मोन भी कम मात्रा में उत्पन्न होत हैं ।

बुढ़ापे में बन्धक तन्तुओं, रक्तवाहिनी स्नायु तन्तुओं, कोलेजन, त्वचा आदि में परिवर्तन आ जाता है । शरीर में निर्माण कार्य न होने के कारण बेसल मेटाबोलिक दर धीरे-धीरे कम हो जाती है । इसका प्रभाव कैलोरी की आवश्यकता पर पड़ता है ।

बुढ़ापे में स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाने से उनको दिये गये भोजन के चुनाव में सावधानी बरतनी चाहिए । भोजन को अच्छी तरह पकाकर सावधानीपूर्वक परोसने से उनको तृप्ति होती है ।

बुढ़ापे में पौष्टिक तत्वों की आवश्यकता: (Nutritional requirements during old age):

ऊष्मा (Energy):

आयु बढ़ने के साथ-साथ शरीर की क्रियाशीलता तथा बेसल मेटाबोलिक दर कम हो जाने से इस अवस्था में प्रौढ़ों की अपेक्षा 25 प्रतिशत कम कैलोरीज की आवश्यकता पड़ती है । शरीर का भार सन्तुलित रखने के लिए भी बुढ़ापे में कम कैलोरी की आवश्यकता होती है । इस अवस्था में प्रतिदिन 1700 से 2000 कैलोरीज की आवश्यकता होती है ।

प्रोटीन (Protein):

बुढ़ापे में भूख कम लगने से अधिकतर प्रोटीन की न्यूनता हो जाती है । अत: इस अवस्था में अधिक प्रोटीन देना उचित होगा । आहार में दूध, दूध से बने पदार्थों का समावेश अधिक हो । वृद्धावस्था में 60  से 70 ग्राम प्रोटीन प्रतिदिन ग्रहण करने से इसकी आवश्यकता पूर्ण हो जाती है ।

वसा (Fats):

इस अवस्था में वसा का ठीक पाचन न होने से आहार में अधिक वसायुक्त या तले हुए पदार्थो का सेवन कम मात्रा में करना चाहिए ।

खनिज लवण (Mineral):

खनिज लवणों का उचित शोषण न होने से कैल्शियम एवं लौह की शरीर में न्यूनता हो जाती है । प्रतिदिन 0.8 ग्राम कैल्शियम लेना चाहिए । कैल्शियम की कमी से वृद्धावस्था में अस्थियाँ कमजोर हो जाती हैं । इस अवस्था में प्रतिदिन 20 मि. ग्राम लौह लवण की आवश्यकता होती है तथा सोडियम की मात्रा कम लेनी चाहिए ।

विटामिन (Vitamin):

बूढ़े लोगों में विटामिन की न्यूनता अधिक देखी जाती है । अत: इनके आहार में विटामिन की पर्याप्त मात्रा रहनी चाहिए । हरी पत्ती वाली सब्जियों तथा फलों का अधिक सेवन होने से विटामिन की आवश्यकता पूर्ण हो जाती है । भोज्य पदार्थों के अतिरिक्त मल्टी-विटामिन टैबलेट का उपयोग भी आवश्यक है ।

पानी (Water):

प्रतिदिन 1.5 लीटर पानी पीने से उत्सर्जन संस्थान ठीक प्रकार से कार्य करेंगे । जल का उपयोग दूध, फलों के रस, सूप, मट्‌ठे के रूप में भी हो सकता है ।

रेशा (Fiber):

कब्ज की शिकायत को दूर करने के लिए आहार में रेशे-युक्त फल एवं सब्जियों का उपयोग भी हो सकता है ।

 

 

 

 

(2)  सामाजिक आवश्यकताएँ (Social Needs):

वृद्धावस्था में व्यक्ति की कुछ सामाजिक आवश्यकताएँ होती हैं उनको भी उचित स्थान प्राप्त होना चाहिये:

(i) आदर-सम्मान मिलना (Respect):

हमारे समाज में वृद्ध व्यक्तियों का अपना एक विशेष स्थान होता है । वृद्धजन की इच्छा होती है कि वे समाज में जहाँ भी जायें उन्हें उचित आदर-सम्मान प्राप्त हो । वे चाहते हैं कि समाज के किशोर एवं प्रौढ़ सदस्य उन्हें उचित आदर व सम्मान देते रहें परन्तु यदि उन्हें उचित मान-सम्मान प्राप्त नहीं होता तो वे दुःखी व व्यथित हो जाते हैं ।

(ii) महत्व प्राप्त करना (Importance):

वृद्ध व्यक्तियों को परिवार व समाज में उचित महत्व मिलना भी अति आवश्यक है । जब वे इस बात को महसूस करते हैं कि वे परिवार के लिए महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं तो वे अच्छी तरह परिवार में समायोजन कर पाते है । परन्तु इसके विपरीत यदि परिवार में उनकी सलाह लिये बिना कोई कार्य किया जाता है तो वह उनको सहन नहीं होता जिसके उपरान्त वे दुःखी रहते हैं ।

(iii) वार्तालाप करना (Conversation):

वृद्धावस्था में यदि पति-पत्नी में से किसी की मृत्यु हो जाती है तो दूसरा साथी अकेला हो जाता है तब उनकी स्थिति अत्यन्त कष्टदायक होती है । इस स्थिति में अकेला पुरूष या अकेली स्त्री अपने मन की बात किससे कहे और किसकी सुने, इस दुविधा में रहते हैं ।

प्राय: घर के सभी सदस्य अपने कार्यों में अत्यंत व्यस्त रहते हैं तथा वृद्ध व्यक्ति से बातचीत का समय नहीं निकाल पाते हैं जिस कारण वे अपने आप को अकेला महसूस करते हैं । वे अपने दिल की बात दूसरों से करना चाहते हैं परन्तु किसी को भी उनके दिल की बात सुनने का समय नहीं होता । जिन वृद्ध जनों को घर परिवार  में उचित सम्मान मिलता है तथा घर के सदस्य उनसे बात करते या उनकी बात सुनते हैं तो किसी भी प्रकार की समस्या नहीं होती है ।

समायोजन करना (Adjustment):

वृद्धावस्था में व्यक्ति के शरीर में परिवर्तन आता है जिससे सामाजिक गतिविधियों में कमी हो जाती है तथा जिस कारण समाज में उनकी स्थिति बदल जाती है ।

ऐसी स्थिति में उन्हें निम्न समायोजन करना पड़ता है:

(i) शारीरिक ह्रास तथा स्वास्थ्य में होने वाली गिरावट के साथ समायोजन,

(ii) सेवानिवृत्ति व आर्थिक कमी के साथ समायोजन,

(iii) जीवन साथी की मृत्यु व अकेलेपन से समायोजन,

(iv) रहन-सहन की बदली हुई स्थिति से समायोजन,

(v) समाज में अपनी बदली हुई भूमिका से समायोजन,

(vi) प्रत्येक आयु समूह के सदस्यों के साथ समायोजन ।

(3) भावनात्मक आवश्यकताएँ: (Emotional needs):

वृद्धावस्था में सबसे ज्यादा भावनात्मक आवश्यकता की जरूरत पड़ती है जो कि निम्न प्रकार हैं:

स्नेह अथवा प्रेम की आवश्यकता (Needs for love):

वैसे तो स्नेह व प्रेम की हर व्यक्ति को पूरे जीवन तक आवश्यकता होती है परन्तु वृद्धावस्था में व्यक्ति को स्नेह व प्यार की अधिक आवश्यकता होती है । वृद्ध व्यक्तियों की यह सोच होती है कि अब उनमें शक्ति नहीं रही तथा कई बार वे आर्थिक रूप से स्वतंत्र व आत्म निर्भर नहीं होते है उनको महसूस होता है कि परिवार के सदस्य अब उनसे स्नेह व प्रेम नहीं करते हैं ।

सहानुभूतिपूर्वक देखभाल की आवश्यकता (Needs for sympathy):

वृद्धावस्था में वृद्ध व्यक्ति शारीरिक कमजोरी, कार्य करने की क्षमता में कमी तथा कई प्रकार के रोग से ग्रसित हो जाने के कारण कई बार परिवार के युवा व बच्चे या अन्य सदस्यों का व्यवहार उपेक्षा पूर्ण हो जाता है । परिवार के सदस्यों को उनके कष्टों को समझकर उनकी सेवा करनी चाहिए । वृद्धजनों को उनके पुत्र-पुत्रियों से स्नेहयुक्त सेवा प्राप्त करने की तथा उनकी सहानुभूतिपूर्वक उचित देखभाल करने की आवश्यकता होती है ।

(iii) प्रसन्नचित्त रहने की आवश्यकता (Need to live happy):

जैसा देखा गया है कि वृद्धावस्था ह्रास का समय है तथा इस अवस्था में शारीरिक व मानसिक रोग व परेशानियाँ लगी रहती हैं । प्राय: देखा जाता है कि वृद्ध दुखी व असंतुष्ट होते हैं तथा अपनी बदली परिस्थितियों से समझौता नहीं कर पाते । इस स्थिति में उन्हें इन परिवर्तनों को सच मानना चाहिये तथा स्थिति को स्वीकार करना चाहिये ।

उन्हें हमेशा इस बात का प्रयास करना चाहिये कि वे स्वयं भी खुश रहें तथा परिवार के अन्य सदस्य भी  प्रसन्नचित्त रहें तथा पारिवारिक वातावरण से अच्छी तरह समायोजन कर सकें । प्रसन्न रहकर वे इस स्थिति का पूरा-पूरा आनन्द ले  सकते हैं क्योंकि ऐसा नहीं होता कि ऐसी अवस्था सदा ही कष्टकारक हो ।

वृद्ध व्यक्ति बाहर कार्य करने के दायित्व से मुक्त हो जाते  हैं । अत: वे अपने नाती-पोतों के साथ खेलकर तथा अन्य गतिविधियों से अपना मन बहला सकते हैं ।

(4) आर्थिक आवश्यकताएँ (Financial Needs):

वृद्धावस्था में व्यक्ति सेवा निवृत्त हो जाते हैं । जो व्यक्ति सरकारी नौकरी में होते हैं उनको सेवा निवृत्त के पश्चात् पी.एफ., ग्रेच्युटी, बीमा तथा पेनान आदि से धन प्राप्त होता है अन्त: उन्हें आर्थिक समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता है । परन्तु जो सरकारी नौकरी में न होकर किसी अन्य व्यवसाय में होते हैं उन्हें भी शारीरिक, मानसिक समस्याओं के चलते कार्य से निवृत्त होना पडता है ।

जो व्यक्ति अपने युवावस्था व प्रौढ़ावस्था में अच्छी धन राशि की बचत कर लेते हैं तथा उनका कुशलतापूर्वक निवेश भी करते है उन्हें वृद्धावस्था में किसी प्रकार की आर्थिक तंगी का सामना नहीं करना पड़ता तथा उनका जीवन खुशहाल रहता है ।

कई ऐसे भी व्यक्ति होते हैं जिनको वृद्धावस्था में आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है जिस कारण उनके समक्ष आर्थिक कठिनाइयाँ उत्पन्न हो जाती हैं । इसके परिणामस्वरूप उन्हें आर्थिक तंगी में जीवन व्यतीत करना पड़ता है जो उनके मानसिक तनाव का कारण होता है । अत: वे स्वयं को असुरक्षित महसूस करते हैं जिसका प्रभाव उनके समायोजन पर पड़ता है ।

(5) मनोरंजनात्मक आवश्यकताएँ (Recreational Needs):

वृद्धावस्था में व्यक्ति सेवानिवृत्त हो जाता है ।

इस समय उनके मनोरंजन के निम्न साधन हो सकते हैं:

(i) समाचार पत्रों व मैगजीन का पठन-पाठन करना ।

(ii) जिन्हें पूजा पाठ में रुचि है वे पूजा पाठ कर सकते हैं ।

(iii) आजकल मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन टी. वी. है । जिसका उपयोग वृद्ध व्यक्ति कर सकते हैं ।

(iv) इस अवस्था में कुछ न कुछ करने; जैसे: बागवानी या सामाजिक कार्य या नाती-पोते की देखभाल में रुचि लेकर भी मनोरंजन किया जा सकता है ।

(v) वृद्धों के आजकल अनेकों क्लब बन गये हैं जहाँ मनोरंजन के सभी साधन उपलब्ध रहते हैं जिनका उपयोग वृद्ध व्यक्ति कर सकते हैं ।

कुछ लोग समझते हैं कि वृद्धों को मनोरंजन की आवश्यकता क्यों होनी चाहिये ? ऐसा नहीं है कि वृद्धों की सभी इच्छाएँ उनकी अवस्था के साथ भर गई हैं । उन्हें शारीरिक व मानसिक रूप से फिट रहाने के लिये मनोरंजन को आवश्यकता होती है ।

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