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Essay on Soil Pollution in India | Hindi

Read this essay in Hindi to learn about the causes of soil pollution in India. 

प्रस्तावना:

जिस प्रकार हम वर्षावन का या एक भी पक्षी का निर्माण नहीं कर सकते, उसी प्रकार हम मिट्‌टी भी नहीं बना सकते, भले ही हम एक टंकी रसायन लेकर बैठे हों ! मृदा (मिट्‌टी) की प्रक्रियाओं में सहायक बनकर हम उसकी गुणवत्ता तो बढ़ा सकते हैं पर उसे नष्ट करके उसे दुबारा बना नहीं सकते । मृदा ऐसा संसाधन है जिसका कोई विकल्प नहीं । (पर्यावरण इतिहासकर डोनल्ड वोर्स्टर हमें याद दिलाते हैं कि खाद उपजाऊ मिट्‌टी की जगह नहीं ले सकती ।)

मृदा भूमि पर एक पतली पर्त होती है जिसमें खनिज, कार्बनिक पदार्थ, जीवित कायाएँ, वायु और जल होते हैं जो पदार्थ की वृद्धि में सहायक होते हैं । मूल सामग्री से मृदा के निर्माण में अनेक कारकों का योगदान होता है । इनमें तापमान के परिवर्तन और खुरचन, पवन, बहते जल, हिमानियों, रासायनिक क्षरण और लाइकेन (lichens) के कारण चट्‌टानों का प्राकृतिक रिसाव भी शामिल है ।

मृदा के निर्माण में जलवायु और समय का भी महत्त्व होता है । अत्यंत शुष्क और ठंडी जलवायु में मृदा का निर्माण बहुत धीमा होता है जबकि आर्द्र और शीतोष्ण जलवायु में मृदा का निर्माण अधिक तेजी से होता है । जलवायु की आदर्श दशाओं में नर्म मूल सामग्री से 15 वर्षों में एक सेमी मिट्‌टी का निर्माण हो सकता है । जलवायु की प्रतिकूल दशाओं में सख्त मूल सामग्री से मृदा के बनने में सैकड़ों वर्ष लग सकते     हैं ।

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परिपक्व मृदा अनेक सतहों में विभाजित होती है जिनको ‘मृदा क्षितिज’ (soil horizons) कहते हैं । हर क्षितिज की एक खास बुनावट (texture) और संरचना होती है जो मृदा के अलग-अलग प्रकारों में अलग-अलग होती है । मृदा में क्षितिजों का अनुप्रस्थ रूपरेखा को ‘मृदा की रूपरेखा’ कहते हैं । ऊपर की कूड़े-कबाड़े वाली सतह को ‘ओ-क्षितिज’ कहते हैं । इसमें अधिकतर नए-नए गिरे और अंशतः विघटित पत्ते, टहनियाँ, पशुओं के मलमूत्र, कवक और अन्य जैविक पदार्थ होते हैं । यह क्षितिज आम तौर पर भूरा या काला होता है ।

मृदा की सबसे ऊपरी सतह को ‘ए-क्षितिज’ कहते हैं । इसमें अंशतः विघटित जैव पदार्थ (ह्यूमस=humus) और कुछ अकार्बनिक खनिजों के कण होते हैं । यह नीचे की सतहों से आम तौर पर अधिक काली और ढीली होती है । अधिकांश पौधों की जड़ें इन्हीं दो ऊपरी सतहों में होती हैं ।

इन सतहों में जब तक वनस्पतियाँ उगती हैं, मृदा पानी को जमा रखती है और बाढ़ की तरह वेग से छोड़ने के बजाय सालभर थोड़ा-थोड़ा करके मुक्त करती है । इन दो सतहों में बड़ी संख्या में जीवाणु, कवक, केंचुए और दूसरे छोटे-छोटे कीट होते हैं जो मृदा में पेचीदा खाद्य जाल बनाते हैं, मृदा के पोषक तत्वों के पुनर्चालन में सहायक होते हैं और मृदा की उर्वरता को बढ़ाते हैं ।

‘बी-क्षितिज’ को प्रायः अवमृदा (subsoil) कहते हैं । इसमें जैव पदार्थ और प्राणी ए-क्षितिज से कम होते हैं । अवमृदा के नीचे की मिट्‌टी को ‘सी-क्षितिज’ कहते हैं । इसमें सड़ी-गली मूल सामग्री शामिल होती है । इस मूल सामग्री में जैव पदार्थ नहीं  होते । सी-क्षितिज की रासायनिक संरचना मृदा के pH के निर्माण में सहायता देती है तथा उनकी जलधारण और जल-अवशोषण की दर को भी प्रभावित करती है ।

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मृदाओं में मृत्तिका (clay) बहुत सूक्ष्म कणों, गाद (silt, रेत (मझोले आकार के कणों)) और बजरी (मोटे और बहुत मोटे कणों) के अंश अलग-अलग होते हैं । विभिन्न आकार-प्रकार के खनिज कणों की सापेक्ष मात्राएँ मिट्‌टी की बुनावट को निर्धारित करती हैं । मृत्तिका, रेत, गाद और बजरी की लगभग बराबर मात्राओं वाली मिट्‌टी को दोमट (loams) कहते हैं ।

मृदा का ह्रास (Causes of Soil Degradation):

अपरदन:

सतह के कूड़े-कबाड़े और ऊपरी मृदा के एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरण को मृदा का अपरदन (soil erosion) कहा जाता है । अपरदन जहाँ एक प्राकृतिक क्रिया है जो अकसर पवन और बहते जल के कारण होता रहता है, वहीं खेती, निर्माण, पशुओं की अतिचराई, घास के आवरण के दहन और वनविनाश जैसे मानवीय कार्यकलापों से इसमें काफी तेजी आ जाती है ।

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ऊपरी सतह की हानि से मृदा कम उपजाऊ हो जाती है और उसकी जलधारण क्षमता कम हो जाती है । इस सतह के बह जाने पर झीलों में गाद जमने से और पानी के गंदला होने से जल प्रदूषण होता है । अंततः इससे जलीय जीवन की हानि होती है । ऊपरी सतह की एक इंच मोटाई आम तौर पर 100-200 वर्षों में बनती है और यह समय जलवायु और मृदा के प्रकार पर निर्भर है । इसलिए ऊपरी मृदा को बनने की अपेक्षा अगर उसके अपरदन की गति अधिक हो तो मृदा एक अनवीकरणीय संसाधन हो जाती है ।

इसलिए आवश्यकता इसकी है कि ऊपरी सतह की हानि को रोकने के लिए मृदा संरक्षण के समुचित उपाय किए जाएँ । मृदा को अपरदन से बचाने की अनेक तकनीकें हैं । आज समन्वित शोधन की विधियों से जल और मृदा दोनों का संरक्षण किया जाता है ।

आम तौर पर प्रयुक्त दो विधियाँ इस प्रकार हैं:

i. क्षेत्र शोधन (area treatment) जिसमें भूमि का शोधन किया जाता है;  तथा

ii. जलनिकास शोधन (drainage-line treatment) जिसमें प्राकृतिक जलमार्गों (नालों) का शोधन किया जाता है ।

जलप्रवेश की दर बढ़ाने, जलप्रवाह की दर कम करने और मृदा का अपरदन रोकने के लिए सतत समरैखिक खंदकों (continuous contour trenches) का उपयोग किया जा सकता है । ये वास्तव में छिछली खंदकें होती हैं जो ढालों के आधार पर तथा समोच्च रेखाओं (contour lines) के सहारे-सहारे खोदी जाती हैं और मूलतः इनका उद्‌देश्य मृदा और जल का संरक्षण होता है ।

हल्की ढालों पर तथा कम या मध्यम वर्षा वाले क्षेत्रों में ये सबसे कारगर होती हैं । पौधों और घासों की तेजी से बढ़नेवाली प्रजातियाँ लगाकर इन बंधों को स्थायित्व प्रदान किया जाता है । भारी ढलान वाले क्षेत्रों में जहाँ बंध बनाना संभव नहीं है, इसी मकसद से पत्थरों की सतत समरैखिक बेंचें (continuous contour benches) बनाई जाती हैं ।

बंजर को खेतिहर जमीन बनाने के लिए ग्रेडनी (gradonies) का प्रयोग भी किया जा सकता है । इसमें बहते जल को जमा करने के लिए तथा पेड़ों की कमी को सुरक्षित रखने के लिए जलग्रहण क्षेत्र के ऊपरी भागों में समोच्च रेखाओं के साथ-साथ नालों पर बंधों और छिछली खंदकों का निर्माण किया जाता है । दो बंधों के बीच के क्षेत्र में उपजाऊ मिट्‌टी का आवरण विकसित करके फसलें बोई जा सकती हैं ।

ऐसा करने के कुछ उपाय निम्नलिखित हैं:

i. अवरोधक बाँध जिनमें नालों के आर-पार घास, झाड़ और पेड़ लगाकर बंध बनाए गए हों ।

ii. धारे के आर-पार पत्थरों से बने बंध का उपयोग मृदा और जल के संरक्षण के लिए भी किया जा सकता है ।

iii. मिट्‌टी का बना अवरोधक बंध (check-bund), जो मिट्‌टी का अपरदन और जल का प्रवाह रोकने के लिए धारा के आर-पार स्थानीय मिट्‌टी से बनाया गया हो ।

iv. गौबियन (gabion) ढाँचा जो पत्थर से बना और मुलम्मेदार जंजीर में लिपटा बंध होता है । एक गैबियन ढाँचे में फेरोसीमेंट की एक इंच मोटी, अभेद्य दीवार उस ढाँचे के केंद्र में होती है जो जमीन से नीचे सख्त चट्‌टानों तक पहुँचती है । गैबियन भाग से सहारा पानेवाला, फेरोसीमेंट का यह विभाजक जल के प्रतिधारण में और बहते जल की शक्ति को झेलने में समर्थ होता है ।

v. बंधारा (bandhara) नाले के तली के नीचे और नाले के आरपार एक भूमिगत ढाँचा होता है जो भूजल की गति को रोकता है ।

रासायनिक खादों का अति-उपयोग (Excess Use of Fertilizers):

अनुमान है कि संसार में फसलों की लगभग 25 प्रतिशत उपज सीधे-सीधे रासायनिक खादों के उपयोग की देन है । पिछले कुछ दशकों में रासायनिक खादों का प्रयोग काफी बढ़ा है तथा अभी और भी बढ़ सकता      है । खाद बहुत महत्त्वपूर्ण होती है क्योंकि यह मिट्‌टी के उन पोषक तत्त्वों की भरपाई करती है जिनको पौधे ले लेते हैं । ऐसे तीन प्रमुख पोषक तत्त्व जो अकसर कम हो जाते हैं, पोटैशियम, फास्फोरस और नाइट्रोजन के यौगिक हैं । इनको आम तौर पर बड़े पोषकतत्त्व (macro nutrient) कहते हैं ।

बोरान, जस्ता और मैंगनीज जैसे तत्त्वों की अत्यंत कम मात्रा आवश्यक होती है और उनको सूक्ष्म पोषकतत्त्व (micro nutrient) कहते हैं । फसल के कटने पर उसी के साथ बड़े पोषकतत्त्वों की एक बड़ी मात्रा और सूक्ष्म पोषकतत्त्वों की थोड़ी-सी मात्रा भी निकल जाती है । अगर वही फसल फिर उगाई जाए तो पोषकतत्त्वों की मात्रा कम हो जाने के कारण उपज भी कम हो सकती है । खादों का प्रयोग करके मृदा में उन पोषकतत्त्वों की भरपाई की जा सकती है । अच्छी फसल के लिए खादों के अलावा रोगनाशकों (pesticides) की बड़ी मात्रा का प्रयोग भी किया जाता है ।

ये अवांछित कवकों, कीड़ों या वनस्पतियों को मारने या नियंत्रित करने के लिए प्रयुक्त रसायन होते हैं । कीटनाशकों को अनेक श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है । जिसका आधार यह होता है कि वे किन जीवों के नियंत्रण के लिए प्रयुक्त होते हैं ।

कीटनाशकों (insecticides) का प्रयोग कीड़े-मकोड़ों और कवकनाशकों (fungicides) का प्रयोग कवकों के नियंत्रण के लिए होता है । चूहों आदि को कृतंकनाशकों (rodenticides) से मारा जाता है जबकि शाकनाशकों (herbicides) से अवांछित वनस्पतियों को मारा जाता है ।

रोगनाशकों के उपयोग से पैदा समस्याएँ (Problems with Pesticide Use):

रोगनाशक अथवा कीटनाशक न केवल रोगों को मारते हैं बल्कि मनुष्यों समेत अनेक प्रकार के प्राणियों को भी मारते हैं । वे दीर्घस्थायी या अल्पस्थायी हो सकते हैं । दीर्घस्थायी रोगनाशक उपयोग के बाद भी लंबे समय तक प्रभावी रहते हैं । पर वे आसानी से विघटित न होने के कारण मृदा में तथा खाद्य शृंखला में शामिल प्राणियों के शरीर में जमा होते रहते हैं ।

मिसाल के लिए डी डी टी, जो शुरू-शुरू में इस्तेमाल होने वाले में संश्लेषित कार्बनिक कीटनाशकों में से एक है, को पूर्ण कीटनाशक माना जाता था । अनुमान है कि उपयोग के पहले दस वर्षों (1942-52) में इसने लगभग 50 लाख जानें बचाईं क्योंकि यह रोगजनक मच्छरों को मारने में समर्थ था । लेकिन एक अरसे बाद अनेक मच्छर और कीट डी डी टी के अभ्यस्त हो गए और इसका प्रभाव जाता रहा ।

शीतोष्ण क्षेत्रों (temperate regions) में डी डी टी का अर्धजीवन (half life) 10-15 वर्ष है (यह अर्धजीवन यह वह काल है जिसमें रसायन का आधा भाग विघटित होता है) । मतलब यह कि अगर किसी क्षेत्र में 100 किग्रा डी डी टी छिड़की जाए तो 10-15 वर्ष बाद उसकी 50 किग्रा मात्रा फिर भी बचेगी । डी डी टी का अर्धजीवन मिट्‌टी के प्रकार, तापमान, मिट्‌टी में मौजूद प्राणियों के प्रकार और दूसरी बातों के आधार पर अलग-अलग होता है । दुनिया के उष्ण क्षेत्रों में यह बहुत कम, मात्र 6 माह भी हो सकता है ।

कुछ देशों में डी डी टी का प्रयोग प्रतिबंधित है । लेकिन भारत में मच्छरों पर नियंत्रण के लिए इसके उपयोग की अनुमति है । दीर्घस्थायी रोगनाशक मिट्‌टी के छोटे कणों से चिपक जाते हैं जो आसानी से पवन और जल के साथ कहीं और चले जाते हैं और इस तरह वहाँ की मिट्‌टी को प्रभावित करते हैं । दीर्घस्थायी रोगनाशक पशुओं के शरीर में भी जमा होते रहते हैं और अगर वे इनको अपने शरीर से न निकाल सकें तो कालक्रम में उसकी मात्रा बढ़ती जाती है ।

इस संवृत्ति को जैव-संचय (bioaccumulation) कहते हैं । एक प्रभावित पशु को जब कोई मांसभक्षी प्राणी खाता है तो उस मांसभक्षी प्राणी के शरीर में ये रोगनाशक और भी संकेंद्रित होते हैं । पोषण के उच्चतर स्तरों वाले प्राणियों के शरीरों में किसी पदार्थ की मात्रा की यह वृद्धि ‘जैव-आवर्धन’ (biomagnification) कहलाती है । यह प्रक्रिया घातक साबित हुई है, खासकर डी डी टी जैसे कीटनाशकों के सिलसिले में । डी डी टी पारितंत्रों में जैव-आवर्धन का एक सुज्ञात उदाहरण है ।

कीटनाशकों के साथ दूसरी समस्या यह है कि कीड़े-मकोड़े उनके अभ्यस्त हो जाते हैं । इस तरह ये कीटनाशक कुछ पीढ़ियों बाद बेअसर हो जाते हैं । अनेक कीटनाशक कीड़ों की लाभदायक प्रजातियों को भी मारते हैं । वे शिकारी और परजीवी कीटों को भी मारते हैं जो रोगों को नियंत्रित करते हैं ।

इस तरह एक रोगनाशक के उपयोग के बाद रोगजनक प्रजातियाँ तेजी से बढ़ती हैं क्योंकि उनकी जनसंख्या की वृद्धि पर कोई प्राकृतिक रोक नहीं रह जाती । रोगनाशकों का प्रयोग करने वालों तथा इनके प्रयोग से पैदा फसलों के उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक और अल्पकालिक प्रभाव भी भारी चिंता के विषय हैं । अनेक वर्षों तक थोड़ी-थोड़ी मात्रा में रोगनाशकों का संपर्क विकार, कैंसर आदि पैदा कर सकता है ।

इसलिए जो सवाल पैदा होता है वह यह है: अगर रोगनाशकों में इतने दोष हैं तो उनका इतना व्यापक उपयोग क्यों होता है और उनका विकल्प क्या है ? रोगनाशकों के उपयोग के तीन प्रमुख कारण हैं । पहला, रोगनाशकों के उपयोग से अल्पकालिक दृष्टि से खाद्यान्न उत्पादन बढ़ा है क्योंकि रोगों से होनेवाली हानियाँ कम हुई हैं और दुनिया के अनेक भागों में अब ये अनाज उगाए जा सकते हैं ।

इनके व्यापक उपयोग का दूसरा कारण आर्थिक सोच पर आधारित है । बढ़ी उपज किसान को रोगनाशकों की लागत से अधिक दाम दिलाती है । तीसरे, खासकर विकासशील देशों में स्वास्थ्य के लिए मच्छरों से पैदा समस्याओं को कीटनाशकों के बिना नियंत्रित कर सकना असंभव है ।

पर अब अधिकाधिक किसान रासायनिक खादों का उपयोग बंद कर रहे हैं और उपज को प्रभावित किए बिना रोगनाशकों को नियंत्रित करने की विभिन्न विधियों का उपयोग कर रहे हैं । इस तरह रासायनिक खादों और कीटनाशकों के उपयोग के अनेक विकल्प विकसित किए गए हैं जिनके लक्ष्य थोड़े-थोड़े भिन्न और कुछ-कुछ समान हैं । वैकल्पिक कृषि वह व्यापकतम शब्द है जिसमें कृषि की तमाम परंपरागत विधियाँ आ जाती हैं, जैसे निर्वहनीय कृषि, जैविक कृषि, परंपरागत फसलों के वैकल्पिक उपयोग, फसलें उगाने की वैकल्पिक विधियाँ ।

निर्वहनीय कृषि पारितंत्र की अवस्था को बनाए रखकर आर्थिक रूप से व्यावहारिक ढंग से पर्याप्त सुरक्षित खाद्य उत्पादन की विधियों का व्यवहार है । जैविक कृषि का अर्थ रासायनिक खादों और कीटनाशकों के उपयोग से बचना है । कृषि पर इनका नकारात्मक प्रभाव कम करने के लिए अनेक प्रकार की तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है । फसलों के डंठल आदि को खेत में ही छोड़ दें तो वे मिट्‌टी में मिल कर कटाव को कम करते हैं और जैविक पदार्थों को बढ़ाते हैं । मिट्‌टी में जैव पदार्थों के मिलने पर संहनन (compaction) की संभावना कम हो जाती है ।

फसल-चक्र (crop rotation) मिट्‌टी की उर्वरता बढ़ाने, कटाव कम करने और रोगों को नियंत्रित करने का एक असरदार ढंग है । जैविक कृषि के पक्ष-विपक्ष में अपने-अपने तर्क हैं । आलोचकों का कहना है कि जैविक कृषि आज की जनसंख्या को पर्याप्त भोजन नहीं दे सकती और इसकी आर्थिक व्यावहारिकता कुछ ही दशाओं में संभव है ।

लेकिन जैविक कृषि के समर्थकों का कहना है कि मृदा के कटाव और प्रदूषण की छिपी हुई लागतों पर भी विचार किया जाए तो यह एक व्यावहारिक विधि है । इसके अलावा जैविक कृषि करनेवालों को खादों और रोगनाशकों पर पैसा खर्च नहीं करना पड़ता और उन्हें अपनी उपज के दाम भी अधिक मिलते हैं । इस तरह यह विधि उनके लिए व्यावहारिक बन जाती है ।

इन प्रभावों में कमी का एक और ढंग समन्वित रोग प्रबंध (Integrated Pest Management-IPM) का व्यवहार है । यह ऐसी तकनीक है जो एक फसल के सभी पारितंत्री पक्षों और उसे लगने वाले विशेष रोगों की पूरी समझ पर आधारित है और रोग-नियंत्रण की ऐसी रणनीतियों का व्यवहार करती है जिसमें रोगनाशकों का प्रयोग नहीं या कम होता है ।

यह जैव-रोगनाशकों (biopesticides) के उपयोग को बढ़ावा देता है । ये जैव-रोगनाशक तीन स्रोतों से मिलते हैं, सूक्ष्मजीवों से, वनस्पतियों से और जैव-रसायनों से । सूक्ष्म जैवकीटनाशक जीवाणुओं, कवकों, विषाणुओं या प्रोटोजोआ जैसे सूक्ष्म प्राणी हैं जो अनेक ढंग से रोगों का सामना करते हैं । वे रोगों के लिए विशिष्ट द्रव पैदा करके उन्हें मार डालते हैं ।

जैव रासायनिक कीटनाशकों में अनेक रसायन होते हैं जो कीटों की प्रजनन और पाचन व्यवस्थाओं को प्रभावित करते हैं । सबसे व्यापक प्रयोग वाले जैव-कीटनाशक बैसिलस थ्यूरिंजिंसिस (bacillus thuringiensis-Bt), नीम (Azadirachta indica) और ट्राइकोग्रैमा (trichogramma) हैं । ये हालाँकि बाजार में उपलब्ध हैं पर अभी तक लोकप्रिय नहीं हो सके हैं ।

लवण और जल की अधिकता (Excess Salts and Water):

केवल वर्षा पर निर्भर खेतों की अपेक्षा सिंचित खेतों में फसलों की उपज अधिक होती है । पर इसके अपने दुष्प्रभाव भी हैं । सिंचाई के जल में लवण घुले हुए होते हैं और शुष्क जलवायु में लवण के घोल से काफी पानी वाष्प बनकर उड़ जाता है जिससे नमक जैसे लवण ऊपरी मृदा में बचे रह जाते हैं ।

इन लवणों के संग्रह को लवणीकरण (salinization) कहते हैं जिससे पौधों की वृद्धि घट जाती है, उपज कम होती है, फसल आखिर मारी जाती है और जमीन खेती के लायक नहीं रह जाती । अधिक जल का प्रयोग करके ये लवण मिट्‌टी से निकाले जा सकते हैं । पर इस ढंग से पैदावार की लागत बढ़ती है और पानी की अत्यधिक बरबादी भी होती है । लवणों के इस प्रकार निकाले जाने से आगे चलकर सिंचाई के जल में लवण की मात्रा बढ़ जाती है ।

सिंचाई से पैदा एक और समस्या है जलभराव । यह तब होता है जब मिट्‌टी में लवण को और गहरे पैठाने के लिए भारी मात्रा में जल का प्रयोग होता है । लेकिन निकास अगर ठीक न हो तो यह जल भूमि के नीचे जमा हो जाता है और जल का स्तर क्रमशः बढ़ता जाता है । तब पौधों की जड़ें इसी खारे जल में बँध जाती हैं और आखिरकार भर जाती हैं । इस तरह दीर्घकाल में मिट्‌टी का ह्रास रोकने के लिए बेहतर यही है कि हम निर्वहनीय कृषि प्रणालियों का सहारा लें ।

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