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Essay on the Soil: Composition and Colour | Hindi | Soil Science

Here is an essay on the ‘Soil’ for class 6, 7, 8, 9, 10, 11 and 12. Find paragraphs, long and short essays on the ‘Soil’ especially written for school and college students in Hindi language.

मिट्टी द्‌वारा वनस्पतियों को आधार प्राप्त होता है, उनका पोषण होता है और उनकी वृद्धि होती है । मिट्टी ही खेती का आधार है । मिट्टी को ‘मृदा’ भी कहते हैं । सभी प्राणियों का जीवन, पालनपोषण तथा अस्तित्व इसी मिट्टी पर ही निर्भर है ।

मिट्टी कैसे बनती है ?

पत्थरों के छोटे टुकड़ों, बालू, महीन मिट्टी के कणों और कार्बनिक पदार्थों को मिलाकर मिट्टी बनी हुई है । वायुमंडल की ऊष्मा, ठंडक, पवन आदि में होनेवाले परिवर्तनों का प्रभाव चट्टानों पर पड़ता है । इससे चट्टानों पृष्ठभागों पर विवर बन जाते है । प्रचंड ऊष्मा तथा ठंड से भी चट्टानों में विवर बनते हैं ।

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इन विवरों में संचित पानी ठंड के समय हिमीभूत होता है । पानी के हिमीभवन से उसका आयतन (आकार) बढ़ता है । इससे चट्टानों पर दाब पड़ता है और चट्टानें टूटती हैं । नदी तथा वर्षा के पानी, बहते हुए पवन, जलवायु में निरंतर होनेवाले परिवर्तन द्‌वारा भी चट्टानें तथा उनके टुकड़े टूटते रहते हैं ।

उनका क्रमश: क्षरण होते रहने के कारण कुछ समय बाद उनका महीन कणों में रूपांतरण हो जाता है और उनसे मिट्टी बनती है । मिट्टी की यह परत पृथ्वी के पृष्ठभाग पर फैल जाती है । संक्षेप में प्रकृति के विभिन्न घटकों द्‌वारा होनेवाले प्रभावों तथा चट्टानों के क्षरण द्‌वारा मिट्टी बनती है । चट्टानों के मिट्टी में होनेवाले इस रूपांतरण की क्रिया को चट्टानों का ‘अपरदन’ कहते हैं । खेत की जमीन को ही ‘मृदा’ कहते हैं ।

मिट्टी में सूक्ष्मजीव तथा कीड़े-मकोड़े रहते हैं, बढ़ते हैं तथा अंत में मरते हैं । इसी मिट्टी में ही वनस्पतियाँ भी उगती है, बढ़ती है और अंत में नष्ट हो जाती है । चूहे, मूस जैसे कुतरनेवाले प्राणी अपने निवास के लिए जमीन में बिल बनाते है । इससे कंकरीली जमीन पोली होने से मिट्टी तैयार होती है । इसी प्रकार इस मिट्टी में अनेक प्रकार की जैविक प्रक्रियाएँ सतत होती रहती हैं । इन क्रियाओं की भी अपरदन में सहायता मिलती है ।

जमीन के अंदर बढ़नेवाली वनस्पतियों की जड़ें चट्टानों की दरारों में प्रविष्ट होकर उनका अपरदन करवाने में सहायता करती हैं । वनस्पतियों की जड़ों द्वारा होनेवाले अपरदन से मुख्यत: चिकनी मिट्टी तैयार होती है । अच्छी खेतीवाली जमीन की २.५ सेमी मोटी मिट्टी की परत प्राकृतिक रूप से तैयार होने में ८०० से १००० वर्ष का समय लगता है ।

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मिट्टी-एक प्राकृतिक संसाधन:

मिट्टी द्‌वारा ही वनस्पति जगत विकसित हुआ है । यदि मिट्टी न होती तो जमीन पर वनस्पतियाँ भी न होतीं । भोजन के अभाव में प्राणी जगत का भी विकास न हुआ होता । वनस्पतियाँ ही सभी प्राणियों तथा मानव को भोजन देती हैं और निवास के लिए मानव को लकड़ियों की पूर्ति करती हैं ।

ठंड तथा तूफान से शरीर के संरक्षण के लिए आवश्यक वस्त्र भी वनस्पतियों से मिलते हैं । तात्पर्य यह है कि मनुष्य के लिए आवश्यक तीन मूलभूत आवश्यक्ताओं भोजन, वस्त्र तथा निवास की पूर्ति वनस्पतियों द्‌वारा ही होती है ।

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मिट्टी से ही विभिन्न प्रकार के खनिज तथा धातुएँ उपलब्ध होती हैं । चट्टानों में वर्षा का पानी संचित होने के कारण हमें पानी भी मिलता है । इन वनस्पतियों का जीवन मिट्टी पर निर्भर है । अत: मानव जीवन को मिट्टी का बहुत बड़ा योगदान एवं महत्व है । इसलिए मिट्टी एक प्राकृतिक संसाधन है ।

मिट्टी के उपयोग:

मिट्टी को हम जैसा चाहें वैसा रूप दे सकते हैं । इसे मिट्टी की ‘आकार्यता’ का गुणधर्म कहते हैं । मिट्टी से निर्मित वस्तुओं को तपाने पर उसमें समाविष्ट खनिज पदार्थ पिघल जाते हैं और ठंडा होते समय ये खनिज मिट्टी के अन्य कणों को बाँधकर रखते हैं । इससे वस्तुएँ कठोर बनती हैं ।

वनस्पतियों के संवर्धन के अतिरिक्त मिट्टी के कुछ और भी उपयोग हैं । मिट्टी का एक महत्वपूर्ण उपयोग यह है कि मिट्टी पानी को पकड़कर रखती है । इसलिए कुओं तथा तालाबों से हमें वर्षभर पानी मिलता रहता है । इमारतों आदि के निर्माण में लगनेवाली ईटों तथा दैनिक जीवन में उपयोगी कुछ बरतन भी मिट्टी से बनाए जाते हैं । कुछ घरों की दीवारें भी मिट्टी से ही बनाई जाती हैं ।

मिट्टी का रंग:

मिट्टी के अलग-अलग कई रंग होते हैं । काला, पीला, लाल तथा ललछौंह आदि मिट्टी के विभिन्न रंग हैं । मिट्टी का एक महत्वपूर्ण गुणधर्म उसका रंग है । अनेक प्रक्रियाओं का समावेश होने पर मिट्टी को रंग प्राप्त होता है ।

इसी रंग के आधार पर ही मिट्टी के कस और पानी के निकास जैसी बातों की जानकारी मिलती है । मिट्टी का रंग उसकी बनावट पर, जैव घटकों पर और लोहे तथा चूने जैसे रासायनिक घटकों पर निर्भर होता है ।

कार्बनिक पदार्थों के साथ-साथ मिट्टी में क्वार्ट्ज, फेल्सपार, अभ्रक, कार्बोनेटी खनिज, आयरन आक्साइड और आयरन सल्फाइड जैसे खनिजों के सूक्ष्म कण भी होते हैं ।  विभिन्न वस्तुओं का निर्माण मुख्य रूप से चीनी मिट्टी, चिकनी मिट्टी तथा खड़िया मिट्टी नामक तीन प्रकार की मिट्टी से किया जाता है ।

चीन देश की ‘काउलिंग’ नामक पहाड़ी के समीप मिलनेवाली मिट्टी को चीनी मिट्टी अथवा ‘केओलिन’ कहते हैं । यह श्वेत रंगवाली होती है । इस मिट्टी से प्लेटें, प्यालियाँ, स्नानघर की टाइलें, टंकियाँ तथा प्रयोगशाला के उपकरण आदि बनाए जाते हैं ।

चीनी मिट्टी से बनी वस्तुओं को आकर्षक तथा सजावटी बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के आक्साइडों का उपयोग करते हैं । लाल रंग के लिए आयरन आक्साइड तथा हरे सौ के लिए कापर आक्साइड का उपयोग किया जाता है । चिकनी मिट्टी तथा खड़िया मिट्टी केओलिन के ही प्रकार हैं ।

खड़िया मिट्टी का रंग श्वेत होता है । इसलिए पुतले तथा मूर्तियाँ आदि के निर्माण में इस मिट्टी का उपयोग किया जाता है । मिट्टी के कणों का आकार विभिन्न प्रकार का होता है । विभिन्न आकारवाले इन्हीं कणों के अनुपात के आधार पर ही मिट्टी की किस्म निर्धारित हैं ।

किस्म के आधार पर मिट्टी के निम्नलिखित प्रकार है:

(i) बलुई मिट्टी,

(ii) चिकनी मिट्टी,

(iii) दोमट मिट्टी ।

(i) बलुई मिट्टी:

यदि मिट्टी में बालू तथा मोटे कणों का अनुपात अधिक हो, तो उसे बलुई मिट्टी के रूप में जाना जाता है ।

(ii) चिकनी मिट्टी:

इस मिट्टी में मिट्टी के सूक्ष्म आकारवाले कण अधिक होते हैं ।

(iii) दोमट मिट्टी:

इस मिट्टी के कणों का आकार मध्यम अर्थात न तो सूक्ष्म और न बड़ा होता है । दोमट मिट्टी में पानी को धारण करने की क्षमता औसत दर्जे की होती है । इसके विपरीत बलुई मिट्टी में पानी को धारण करने की क्षमता कम होती है । चिकनी मिट्टी में पानी को धारण करने की क्षमता अधिक होती है । परंतु पानी की मात्रा अधिक होने पर उसमें समाविष्ट हवा का अनुपात कम हो जाता है । इसके कारण जमीन के अंदर होनेवाली जड़ों की वृद्धि रुक जाती है ।

करो और देखो:

दो डिब्बे लो । उनकी पेंदी में एक-एक छोटे छेद करो । अब एक डिब्बे में बालू पत्थर तथा मिट्टी का मिश्रण लेकर उसमें एक छोटा पौधा रोप दो । नियमित पानी देते रहो । दूसरे डिब्बे में चिकनी मिट्टी लेकर उसमें भी एक पौधा रोपो । नियमित पानी देते रहो । ८- १५ दिनों में पौधों का निरीक्षण करो और लिखो ।

मिट्टी के घटक:

मिट्टी में वनस्पतिजन्य तथा प्राणिजन्य घटक होते हैं । इन घटकों को कार्बनिक पदार्थ कहते हैं । मिट्टी में जीवाणु, कवक, शैवाल, नीलहरित शैवाल तथा वनस्पतियों का सड़ा-गला खरपतवार भी होता है । ये वनस्पतिजन्य घटक हैं । इसी के साथ-साथ आदिजीवी, कीटक, कीड़े, सीप, घोंघे, केंचुए के साथ-साथ अन्य मृत प्राणियों के सड़े-गले अवशेष जैसे प्राणिजन्य घटक भी होते हैं ।

करो और देखो:

प्लास्टिक का एक डिब्बा लो । इसकी पेंदी में एक छोटा छेद बनाओ । अब प्लास्टिक के इस डिब्बे में मुरझाए फूल, पत्तियाँ, घासफूस, नारियल की जटा आदि एकत्र करके डालो । इस पर पानी छिड़को । यह एक परत तैयार हो गई ।

दो-तीन दिनों के बाद पहलेवाली परत पर पुन: वैसी ही एक अन्य परत तैयार क्यो । ऐसी ही तीन-चार परतें बनाव उसमें एक पौधा रोपो । इसे बढ़ने दो और निरीक्षण करते रहो ।

मिट्टी का क्षरण:

वर्षा के पानी के आघात, पानी के तेज प्रवाह और तूफानों के झोंकों से जमीन पर स्थित मिट्टी का क्षरण होता है । इसके कारण जमीन के पृष्ठभाग की उपजाऊ मिट्टी की परत बह जाती है । मिट्टी की मात्रा कम होती है और वह कसहीन हो जाती है । इस प्रकार के क्षरण को रोकने के लिए जमीन के पृष्ठभाग को ढक्कर रखना आवस्थक है ।

जमीन पर घास उगाने, फसलें पैदा करने और वृक्षों का रोपण करने से जमीन को आच्छादन प्राप्त होता है । जमीन के ढाल और उसके प्रकार पर भी उसकी मिट्टी का क्षरण निर्भर होता है । ढाल की आडी दिशा में कृषिकर्म करके क्षरण को कम किया जा सकता है ।

खेत में मेंड़ें बनाकर भी बहते हुए पानी का वेग कम करके मिट्टी के बहाव को रोक सकते हैं । इससे भी क्षरण में कमी होती है । मिट्टी का क्षरण कम करने से उसकी सुरक्षा होती है । इसे ही ‘भूसंधारण’ कहते

हैं । राज्य के प्रत्येक जिले में सरकारी भूंसधारण विभाग का कार्यालय होता है । वहीं पर खेतों की मिट्टी के क्षरण को कम करने की विधियों की जानकारी दी जाती है ।

मिट्टी का प्रदूषण:

जमीन में समाविष्ट विभिन्न घटकों का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ने को मिट्टी का प्रदूषण कहते हैं । आवश्यकता से अधिक रासायनिक उर्वरकों का उपयोग करने, फलों-फसलों पर रासायनिक दवाएँ छिड़ने से जमीन के रासायनिक पदार्थों का अनुपात बढ़ जाता है ।

इसके अतिरिक्त कारखानों से बाहर छोड़े गए संदूषित पानी के मिट्टी में मिश्रित होने, अम्लीय वर्षा जैसे अन्य विभिन कारणों से भी मिट्टी का प्रदूषण होता है । पानी तथा रसायनों के अत्यधिक उपयोग से भी जमीन भास्मिक (खारापन) हो जाती है । जमीन में खारापन होना भी प्रहण का एक प्रकार ही है । ऐसी जमीन में फसलों का अच्छा उत्पादन नहीं होता ।

मिट्टी का प्रदूषण रोकने के लिए रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर प्राकृतिक खादों अर्थात कार्बनिक खादों का उपयोग करना चाहिए । रासायनिक उर्वरकों तथा औषधियों का अत्यधिक उपयोग नहीं करना चाहिए । कारखानों से बाहर निकलनेवाले पानी का प्रसंस्करण करने के बाद ही उसे बाहर छोड़ना चाहिए ।

मृदा परिक्षण:

मिट्टी का परीक्षण करने से जमीन के गुण तथा दोष समझ में आते हैं । किसान अपनी जमीन में विभिन्न फसलें लेता है । फसलें उगाने पर प्राय: उत्पादन में कमी आ जाती है । किसानों को कुछ अड़चनें भी आ सकी हैं ।

ऐसी स्थिति में मिट्टी के रंग, किस्म तथा उसमें समाविष्ट कार्बनिक पदार्थों आदि घटकों पर विचार करना पड़ता है । इन घटकों की जाँच करने के लिए मृदा परीक्षण किया जाता है । मृदा परीक्षण करने से फसलों से संबंधित अड़चनें दूर हो जाती हैं । अच्छी फसलें आने की दृष्टि से भी किसानों को मार्गदर्शन मिलता है ।

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