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Essay on Thermal Pollution | Hindi

Read this essay in Hindi to learn about the cause and effect of thermal pollution.

स्रोत (Source of Thermal Pollution):

नदी में गर्म पानी के निकास को प्रायः ताप प्रदूषण कहते हैं । ऐसा तब होता है जब कोई उद्योग एक स्रोत (मसलन नदी) से पानी लेता है, शीतलन के लिए इसका उपयोग करता है और फिर गर्म पानी उसी स्रोत में लौटा देता है । बिजलीघर पानी को गर्म करके भाप बनाते हैं और उनसे बिजली बनानेवाली टरबाइनें चलाते हैं ।

भाप की टरबाइनों के कारगर कामकाज के लिए टरबाइनों से भाप के निकलने के बाद उसे ठंडा करके जल में बदला जाता है । यह संघनन किसी जल स्रोत से जल लेकर किया जाता है और जल गर्मी सोखता है । यह गर्म जल जो सामान्य से कम से कम 15 सेल्सियस अधिक गर्म होता है, बाद में उसी जल स्रोत में छोड़ दिया जाता है ।

प्रभाव (Effects of Thermal Pollution):

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जल के ताप में वृद्धि होने से पानी में ऑक्सीजन की विलेयता कम हो जाती है और मछलियों का चयापचय (metabolism) तेज हो जाता है । इससे नदी का पर्यावरण संतुलन बदल जाता हैं । ताप में वृद्धि एक सीमा तक हो तो कुछ मछलियों की वृद्धि दर बढ़ती है और बिजलीघर के पास मछलियों की पैदावार बढ़ जाती है । लेकिन समय-समय पर संयंत्रों के बंद होने के कारण, जो नियंत्रित और अनियोजित दोनों प्रकार का हो सकता है, पानी के तापमान में आकस्मिक परिवर्तन आते हैं जिससे गुनगुने जल में रहने की आदी मछलियाँ मर जाती हैं ।

उष्ण सागरों के प्राणी सामान्यतः 2 या 3 सेल्सियस से अधिक की तापमान वृद्धि सह नहीं पाते और 37 सेल्सियस से अधिक तापमान पर अधिकांश स्पंज, मोलस्क और झींगे मर जाते हैं । इससे प्राणियों की विविधता में कमी आती है क्योंकि केवल गुनगुने पानी की अभ्यस्त प्रजातियाँ ही बच और फल-फूल सकती हैं ।

नियंत्रण के उपाय (Control Measures for Thermal Pollution):

गर्म पानी संघनक से बाहर आए, तो उसे पहले शीतलन तालाब (cooling pond) या शीतलन स्तंभ (cooling tower) से गुजारकर ताप प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सकता है । यह गर्मी हवा में बिखर जाती है और फिर पानी को नदी में छोड़ा जा सकता है या संयंत्र में ही शीतलन के लिए दोबारा प्रयोग किया जा सकता है । ताप प्रदूषण घटाने के दूसरे अनेक उपाय भी हैं । एक उपाय एक बड़े और छिछले तालाब का निर्माण करना है । गर्म पानी पंप के द्वारा तालाब में एक ओर से छोड़ा जाता है और ठंडा पानी दूसरी ओर से निकाल लिया जाता है ।

गर्मी तालाब से निकलकर वायुमंडल में बिखर जाती है । शीतलन स्तंभ का उपयोग एक और उपाय है । ऐसे ढाँचे तालाब से कम जगह घेरते हैं । यहाँ अधिकांश गर्मी वाष्पन के द्वारा स्थानांतरित होती है । संघनक से आनेवाला गर्म पानी नीचे ऊर्ध्व चादरों या अवरोधकों पर छिड़का जाता है और तब यह पानी पतली फिल्मों के रूप में नीचे आता है ।

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स्तंभ के आधार पर बनी पाइप से ठंडी हवा स्तंभ में प्रवेश करती है और ऊपर उठती हुई वाष्पन के जरिए शीतल होती जाती है । बाहर की ठंडी हवा और अंदर की गर्म हवा के घनत्व में अंतर के कारण प्राकृतिक प्रवाह बना रहता है ।

अतिरिक्त गर्मी स्तंभ के आधार से कोई 100 मीटर ऊँचाई पर वायुमंडल में बिखर जाती है । ठंडा हो चुका जल स्तंभ के फर्श पर जमा होता है तथा बिजलीघर के संघनकों में वापस भेज दिया जाता है । पर इन दोनों विधियों में दोष यह है कि वाष्पीकरण के द्वारा भारी मात्रा में पानी गायब हो जाता है ।

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