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Essay on Water Pollution in India | Hindi

Read this essay in Hindi to learn about the cause and effect of water pollution in India.

”अंतरिक्ष की घोर अँधियारी में हमारा द्रव समान ग्रह एक कोमल नीलम की तरह चमक रहा है । इसके जैसा सौरमंडल में कुछ और है भी नहीं । यह सब जल के कारण है ।” -जॉन टाड (John Todd)

प्रस्तावना:

जल वह अनिवार्य पदार्थ है जिसके कारण पृथ्वी पर जीवन सभंव हुआ । जल के बिना जीवन भी नहीं होता । हम जल को प्रायः गंभीरता से नहीं लेते । यह नलों के घुमाने पर बहने लगता है; हममें से अधिकतर लोग जब चाहते हैं नहा लेते हैं, जब चाहे तैर लेते या बागों को पानी दे लेते हैं । अच्छे स्वास्थ्य की तरह, जल उपलब्ध होने पर हम उसकी उपेक्षा करते हैं ।

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हालाँकि पृथ्वी का 71 प्रतिशत भाग जल का है, पर हमारे उपयोग के लिए ताजे जल के रूप में इसका एक छोटा-सा भाग ही उपलब्ध है । पृथ्वी पर प्राप्त जल का 97 प्रतिशत समुद्रों में है और इतना खारा है कि सिंचाई के काम नहीं आ सकता । बाकी 3 प्रतिशत ताजा जल है । इसमें से 2.997 प्रतिशत ध्रुवों की बर्फ में या हिमानियों (glaciers) के रूप में है । इस तरह पृथ्वी के कुल जल का केवल 0.003 प्रतिशत ही हमें मिट्‌टी की नमी, भूजल, वाष्प तथा झीलों, नदी-नालों और नमभूमियों के रूप में उपलब्ध है ।

संक्षेप में अगर पृथ्वी पर कुल जल 1000 लीटर होता तो हमारे काम का ताजा जल केवल 0.003 लीटर (आधा चम्मच) होता । इस तरह जल एक बहुत कीमती संसाधन है । हमारी दुनिया की आगे की लड़ाइयाँ जल के लिए ही लड़ी जाएँगी । आज पृथ्वी पर उपलब्ध जल इस सदी के मध्य तक आज से दोगुनी जनसंख्या के बीच बँटेगा । भविष्य में ताजा जल जब और दुर्लभ होगा तो जल संसाधनों की उपलब्धि संसार के अनेक देशों की आर्थिक संवृद्धि का निर्धारण करने वाला महत्त्वपूर्ण कारक बन जाएगी ।

पृथ्वी पर जल की उपलब्धि (Water availability on the planet):

नदी-नालों, झीलों, दलदलों और कृत्रिम जलाशयों में मौजूद जल को भूजल अथवा भूतल जल (surface water) कहते हैं । जो जल रिसकर नीचे चला जाता है तथा मिट्‌टी और चट्‌टानों की सुराखों में भर जाता है वह भूमिगत जल (groundwater) कहलाता है । रेत, कंकड़ या आधारशिला की छिद्रमय जलमय सतहों को जिनसे होकर भूमिगत जल नीचे जाता है जलभर (aquifers) कहा जाता है ।

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अधिकांश जलभर वर्षाजल से अपने आप भर जाते हैं जो मिट्‌टी और चट्‌टान से होकर रिसता है । इस प्रक्रिया को प्राकृतिक भरपाई (recharge) कहते हैं । अगर कहीं पर निकासी की दर प्राकृतिक भरपाई की दर से अधिक हो तो वहाँ जल का स्तर कम हो जाएगा । जमीन पर छोड़ा जाने वाला कोई भी प्रदूषक जलभर में पहुँच जाता है और भूमिगत जल को प्रदूषित करता है । इससे आसपास के कुँओं का जल प्रदूषित हो जाता है ।

भारत में अधिकांश वर्षा मानसून में, जून से सितंबर तक होती है । इसका कारण है मौसमी पवनें तथा जल और थल के बीच तापमान में अंतर । ये पवनें अलग-अलग मौसमों में विपरीत दिशाओं में चलती हैं । वे गर्मी में अगल-बगल के समुद्रों से भारत में आती हैं और जाड़ों में उपमहाद्वीप से समुद्रों की ओर चलती हैं । भारत में मानसून प्रायः अच्छा-खासा स्थिर रहता है पर उसमें भौगोलिक अंतर होते हैं ।

कुछ वर्ष बाद देश में या कुछ भागों में वर्षा का आरंभ काफी देर से हो सकता है । वर्षाकाल हो सकता है समय से पहले ही समाप्त हो जाए । एक भाग की अपेक्षा दूसरे भाग में वर्षा अधिक हो सकती है । इन सब बातों के कारण सूखे पड़ेंगे या बाढ़ें आएँगी । लेकिन भारत के जिन क्षेत्रों में मानसून काल में अच्छी वर्षा होती है वहाँ भी भंडारण की पर्याप्त सुविधाओं के अभाव में मानसून के बाद के काल में जल की कमी महसूस की जाती है ।

जब जल की गुणवत्ता या संरचना मानव के कार्यों के कारण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बदले और वह किसी काम का न रह जाए तो उसे प्रदूषित जल कहते हैं ।

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प्रदूषण के बिदुंस्रोत (Point sources of pollution):

प्रदूषण के किसी स्रोत की अगर आसानी से पहचान हो सके क्योंकि वह सुनिश्चित होता है और वह स्थान भी स्पष्ट होता है जहाँ वह जल में प्रवेश करता है तो उसे बिंदुस्रोत कहा जाता है, जैसे नगरपालिका और उद्योगों के निकास के पाइप ।

प्रदूषण के किसी स्रोत की आसानी से पहचान न हो सके जैसे कृषि से निकला जल, अम्लीय वर्षा आदि, तो उसे प्रदूषण का अ-बिंदुस्रोत (Non-point source) कहते हैं ।

जल प्रदूषण के कारण (Causes of water pollution):

आम जल प्रदूषकों की अनेक श्रेणियाँ होती हैं । रोगों के कारक (pathogens), जैसे जीवाणु, विषाणु, सूक्ष्मजीवी और परजीवी कृमि जो घरेलू नालियों से तथा मानव और पशुओं के अशोधित अपशिष्ट के साथ जल में पहुँचते हैं, जल को प्रदूषित कर देते हैं । मानव के मलमूत्र में एश्चेरिचिया कोली (Escherichia coli) और स्ट्रेप्टोकोक्स फीसलीज (Streptococcus faecalis) जैसे कोलीफार्म जीवाणुओं की भरभार है ।

ये जीवाणु आम तौर पर मानव-शरीर की बड़ी आँत में बढ़ते हैं जहाँ वे कुछ पाचन क्रियाओं और विटामिन ‘के’ के उत्पादन के लिए जिम्मेदार होते हैं । कम संख्या में हों तो ये जीवाणु हानिकारक नहीं होते । जल में मलमूत्र की भारी मात्रा इन जीवाणुओं की संख्या बढ़ाती है जिससे पेट और आँत के रोग होते हैं । मलमूत्र में पाए जाने वाले दूसरे हानिकारक जीवाणु भी पानी में थोड़ी संख्या में हो सकते हैं । इस तरह जल में अपशिष्ट (waste) जितने ही अधिक होंगे, उनसे रोग लगने की संभावना भी उतनी ही अधिक होगी ।

अपशिष्ट जल प्रदूषकों की एक और श्रेणी है । ये जैविक अपशिष्ट हैं जो वायवीय (ऑक्सीजन लेनेवाले) जीवाणुओं से विघटित हो जाते हैं । जीवाणुओं की बड़ी संख्या इन अपशिष्टों के विघटन के लिए जल में मौजूद ऑक्सीजन खा जाती है । इस प्रक्रिया में जल की गुणवत्ता गिरती है । जैविक पदार्थों की एक निश्चित मात्रा के विघटन के लिए आवश्यक ऑक्सीजन को जैविक ऑक्सीजन माँग (Biological Oxygen Demand) कहते हैं ।

जल में ऑक्सीजन की यह माँग प्रदूषण के स्तर की सूचक होती है । अगर जल में काफी अधिक जैविक पदार्थ मिल जाएँ तो तमाम मौजूद ऑक्सीजन समाप्त हो जाती है । इसके कारण मछलियों तथा ऑक्सीजन पर निर्भर अन्य जलीय प्राणी मर जाते हैं । तब अवायवीय (ऑक्सीजन न लेनेवाले) जीवाणु अपशिष्टों का विघटन करने लगते हैं । उनका अवायवीय श्वसन दुर्गंध और खराब स्वाद वाले रसायन पैदा करता है जो मानव के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं ।

प्रदूषकों की तीसरी श्रेणी अजैव पादप प्रदूषकों की है । ये जल में घुलनशील नाइट्रेट और फास्फेट होते हैं जो शैवालों और अन्य पौधों की अत्यधिक वृद्धि कराते हैं । पोषक तत्वों की अधिकता के कारण होनेवाली इस अत्यधिक वृद्धि को सुपोषण (eutrophication) कहते हैं । इससे पानी के नल जाम हो जाते हैं, पानी की गंध और स्वाद में बदलाव आता है और जैव पदार्थों का संचय होता है । इन जैव पदार्थों के विघटन के कारण ऑक्सीजन का स्तर कम हो जाता है तथा मछलियों और अन्य जलीय प्राणियों की मृत्यु हो जाती है ।

किसी खेत में प्रयुक्त रासायनिक खादों की मात्रा अकसर पौधों की आवश्यकता से कई गुना अधिक होती है । खादों और कीटनाशकों के रसायन, मिट्‌टी और जल को प्रदूषित करते हैं । जहाँ अत्यधिक खाद सुपोषण का कारण है, वहीं यह कीटनाशक ‘जैवसंचय’ (bioaccumulation) और ‘जैव-आवर्धन’ (biomagnification) का कारण भी बनती हैं । जलाशयों में पहुँचने के बाद ये कीटनाशक जलीय खाद्य-शृंखला में पहुँच जाते हैं ।

ये फिर पातप्लवकों (phytoplanktons) और जलीय पौधों द्वारा ग्रहण किए जाते हैं । इन पौधों को शाकभक्षी मछलियाँ खाती हैं, उनको मांसभक्षी मछलियाँ खाती हैं और उनको भी जलचर पक्षी खाते हैं । खाद्य-शृंखला की किसी भी कड़ी में ये रसायन, जो शरीर से नहीं निकलते, जमा होते जाते हैं, उनका संकेंद्रण लगातार बढ़ता है और इस तरह हानिकारक पदार्थों का जैव-आवर्धन (biomagnification) होता जाता है ।

भारी मात्रा में कीटनाशकों के जमा होने का एक प्रभाव यह होता है कि पक्षी सामान्य से काफी पतली खोल वाले अंडे देते हैं । इससे ये अंडे समय से पहले फूटते हैं और अंदर मौजूद अपरिपक्व बच्चे मर जाते हैं । बाज, चील जैसे शिकारी पक्षी और मछली खाने वाले पक्षी ऐसे प्रदूषण से प्रभावित होते हैं ।

हालाँकि भारत में खेतिहर कामों में डी डी टी के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया है और इसका उपयोग केवल मलेरिया-उन्मूलन के लिए किया जा सकता है, पर खेती में इसका प्रयोग फिर भी हो रहा है क्योंकि यह सस्ती है ।

जल प्रदूषकों की चौथी श्रेणी जल में विलेय अकार्बनिक रसायनों की है जो अम्ल, लवण तथा पारा और सीसे जैसे विषैली धातुओं के यौगिक होते हैं । इन रसायनों के भारी स्तर से जल पीने योग्य नहीं रह जाता, मछलियों और अन्य जलीय जीवन को हानि पहुँचती है, फसलों की उपज कम हो जाती है और जल के संपर्क में रहनेवाले उपकरणों के संक्षरण में तेजी आती है ।

जल प्रदूषण का एक और कारण अनेक प्रकार के कार्बनिक यौगिक हैं, जैसे तेल, गैसोलीन, प्लास्टिक, कीटनाशक, सफाई के रसायन, डिटरजेंट और दूसरे बहुत-से रसायन । ये जलीय जीवन और मानव के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं । ये औद्योगिक प्रक्रियाओं से सीधे जल में पहुँचते हैं, या तो उद्योगों में रसायनों के गलत ढंग से उपयोग के कारण या आम तौर पर रासायनिक अपशिष्टों के अनुचित और गैरकानूनी निकास के कारण ।

निलंबित कणों की पर्तें जल प्रदूषकों की एक और श्रेणी है । ये मिट्‌टी और अन्य ठोस पदार्थों के अविलेय कण है जो जल में निलंबित रहते हैं । ऐसा मिट्‌टी के कटाव के कारण होता है । मिट्‌टी के कणों की भारी मात्रा का जल में निलंबन सूर्य के प्रकाश के प्रवेश में बाधा डालता है ।

इससे जलीय पौधों और शैवाल के प्रकाश संश्लेषण कार्य में कमी आती है और जलाशयों का पर्यावरण संतुलन भंग होता है । नदी-नालों में जल प्रवाह की गति जब कम होती है तो निलंबित कण पर्त बनकर नीचे बैठ जाते हैं । नीचे बैठनेवाले अत्यधिक अवसाद मछलियों के प्रजनन स्थल को नष्ट करते हैं तथा झीलों कृत्रिम जलाशयों आदि को भर देते हैं ।

जल में विलेय रेडियोधर्मी समस्थानिक एक और श्रेणी के जल प्रदूषक हैं । खाद्य शृंखलाओं और खाद्य जालों से गुजरकर ये विभिन्न उत्तकों और अंगों में जमा हो जाते हैं । ऐसे समस्थानिकों से निकलनेवाला आयनकारी विकिरण जन्मगत दोषों, कैंसर और प्रजनन संबंधी हानि का कारण है ।

संयंत्र को ठंडा करने के लिए बड़ी मात्रा में पानी का प्रयोग करनेवाले बिजलीघरों और उद्योगों से निकला गर्म पानी स्थानीय जलाशयों में तापमान को बढ़ाता है । इससे ताप प्रदूषण होता है । बिजलीघर पानी को गर्म करके भाप बनाते हैं जो टरबाइन चलाकर बिजली पैदा करती है । भाप की टरबाइन का कारगर कार्यकलाप सुनिश्चित करने के लिए भाप को टरबाइन से निकलने के बाद जल में बदल दिया जाता है ।

इस संघनन के लिए किसी जलाशय से जल लिया जाता है जो ऊष्मा को सोख सके । यह गर्म पानी, जो सामान्य से कम से कम 15 अधिक होता है, वापस उसी जलाशय में छोड़ दिया जाता है । यह गर्म जल न केवल आक्सीजन की विलेयता कम करता है बल्कि विभिन्न जलीय प्राणियों के प्रजनन चक्र को भी परिवर्तित करता है ।

सड़कों और पार्कों से बहकर निकलते पानी में जब तेल मिलता है तो वह भूजल को भी प्रदूषित करता है । भूमिगत टैंकों से रिसाव प्रदूषण का एक और स्रोत है । समुद्र में परिवहन के विशाल टैंकरों से दुर्घटनावश बहनेवाला तेल पर्यावरण को काफी हानि पहुँचाता रहा है ।

हालाँकि एक्सान वाल्डेज (Exxon Valdez) जैसी दुर्घटनाओं पर विश्वभर का ध्यान जाता है, पर दूसरे और कम गोचर स्रोतों से छोटी मात्रा में नियमित रिसाव कहीं बहुत अधिक तेल प्रदूषण फैलाता है । समुद्रों में तेल प्रदूषण का लगभग दो-तिहाई भाग तीन स्रोतों की देन है: सड़कों से बहा तेल, मशीनों या वाहनों के फ्रैंक केसों से चिकनाई के तेल का गलत रिसाव तथा टैंकरों के भरे जाने और खाली किए जाने के समय तेल का रिसाव । तेल के टैंकर अपना तेल खाली कर देने के बाद अकसर स्थिरता पाने के लिए समुद्रजल का प्रयोग करते हैं । फिर टैंकर में दुबारा तेल भरे जाने के लिए तेल-प्रदूषित जल वापस समुद्र में छोड़ दिया    जाता है ।

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