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Essay on Woman and Child Welfare | Sociology

Read this essay in Hindi to learn about the importance of woman and child welfare.

महिलाओं और बच्चों के कल्याण से अनेक पर्यावरणीय कारकों का गहरा संबंध है । अनुमान है कि दुनिया में हर साल लगभग 1.1 करोड़ महिलाएँ बीमारियों और अपर्याप्त भोजन से मरती हैं । इनमें से अधिकांश मौत विकासशील देशों  में होती हैं । कुछ देशों में तो हर पाँच बच्चों में एक बच्चा 5 वर्ष की आयु से पहले ही मर जाता है । विकासशील देशों में हर दस मौतों में से सात मौतें पाँच प्रमुख कारणों या उनके किसी संयोग से होती हैं । ये हैं: निमोनिया, दस्त, खसरा, मलेरिया और कुपोषण । दुनिया में हर चार में से तीन बच्चे इनमें से कम से कम एक रोग से ग्रस्त हैं ।

बचपन के आम रोगों का निदान:

 

 

साँस की दशाएँ:

साँस की अनेक बीमारियाँ वायु प्रदूषण से पैदा होती या बिगड़ती हैं । भीड़ भरे और कम हवादार, धुएँ और खुली आग वाले मकानों में रहने पर खासकर बच्चों को साँस के रोग हो सकते हैं ।

निमोनिया (Pneumonia):

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साँस का गंभीर संक्रमण (Acute respiratory infections-ARI) और सबसे बढ़कर निमोनिया पाँच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत का प्रमुख कारण है । इनसे हर साल 20 लाख से अधिक बच्चों की मौत होती है । स्वास्थ्य केंद्रों में आनेवाले बच्चों में लगभग 40 प्रतिशत साँस के रोगों से ग्रस्त होते हैं और जिन मौतों के दूसरे कारण बताए जाते हैं उनमें से अनेक वास्तव में साँस के ‘प्रच्छन्न’ (hidden) संक्रमण से होती हैं ।

इस संक्रमण से बच्चे बहुत जल्द मरते हैं और इसलिए उनका फौरन इलाज आवश्यक होता है । निमोनिया के अधिकांश रोगियों का इलाज पीने योग्य एंटीबायोटिक दवाओं से संभव है । सही प्रबंध से दुनियाभर में हर साल दस लाख से ऊपर जानें बचाई जा सकती हैं ।

जठरांत्री दशाएँ (Gastrointestinal conditions):

दूषित जल और भोजन ग्रहण करने से बड़े पैमाने पर, खासकर बच्चों में, रोग फैलते हैं ।

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दस्त (Diarrhea):

दस्त अनेक प्रकार के संक्रमण से होता है । बच्चे के जीवन की रक्षा के लिए दस्त का जल्द निदान और उपचार पहली शर्त है । दस्त के साथ अकसर जुड़े कुपोषण के हल से मृत्युदर और भी कम होती है । दस्त के साथ अकसर खसरा और मलेरिया जैसे दूसरे रोग भी लगते हैं । उनका पता लगाने के लिए चौकसी में वृद्धि एक और महत्त्वपूर्ण कदम है । पाया गया है कि स्तनपान में वृद्धि और खसरा के टीकों से दस्त की घटना कम होती है ।

खसरा (Measles):

खसरे का मतलब बच्चों में बुखार और बदनदर्द के साथ दानों का आना है और ऐसा एक विषाणु से होता है । इससे 4 करोड़ से अधिक बच्चे ग्रस्त होते हैं और 5 साल से कम के 8 लाख बच्चे मर जाते हैं । रोकथाम के लिए व्यापक टीकाकरण, गंभीर मामलों को फौरन अस्पताल भेजना, खसरे से जुड़ी दशाओं की फौरन पहचान तथा स्तनपान और विटामिन ए की खुराक समेत कुपोषण में सुधार रोकथाम के उपायों में शामिल हैं ।

खसरा एक टीके से रोका जा सकता है । खसरे से ग्रस्त छोटे बच्चों को अकसर दूसरे रोग भी लग जाते हैं, जैसे साँस का भयानक संक्रमण, दस्त और कुपोषण, जिनका संबंध पर्यावरण की गिरावट से है । खसरे के हमले के बाद बच निकलने वाले बच्चों को अनेक माह तक दूसरी घातक संक्रमण का डर रहता है । कारगर रोकथाम और इलाज से हर साल 8 लाख जानें बच सकती हैं ।

मलेरिया (Malaria):

उष्ण वातावरण में पानी के जमा होने और सड़ने से इस दशा का गहरा संबंध है । मलेरिया उष्ण देशों का एक व्यापक रोग है जो मच्छरों से मनुष्यों तक पहुँचनेवाले एक परजीवी से लगता है । इसका नियंत्रण कठिन साबित हो रहा है क्योंकि मच्छर दवारोधक हो गए हैं और कुछ क्षेत्रों में परजीवी भी उन सस्ती और कारगर दवाओं से अप्रभावित रहते हैं जिनसे अतीत में काफी सुरक्षा मिलती थी ।

लेकिन जहाँ प्रतिरोधी परजीवी मिले हैं वहाँ उपयोग के लिए वैकल्पिक, नई दवाएँ विकसित की गई हैं । सही प्रबंध से हर साल पाँच लाख जानें बच सकती हैं । दुनिया में हर साल लगभग सात लाख बच्चे मलेरिया से मरते हैं, अधिकतर उप-सहारा अफ्रीका में । छोटे बच्चे खासकर इसके शिकार हो सकते हैं, क्योंकि बार-बार संक्रमण से बचने पर जो आंशिक प्रतिरोधी क्षमता पैदा होती है वह उनमें नहीं होती ।

निर्धनता-पर्यावरण-कुपोषण (Poverty-environment-malnutrition):

निर्धनता, ह्रासग्रस्त पर्यावरण और कुपोषण में गहरा संबंध होता है । बच्चे कुपोषण के शिकार कैसे होते हैं, इसका ज्ञान न होने पर समस्या और बढ़ जाती है ।

कुपोषण (Malnutrition):

कुपोषण को मौत का प्रत्यक्ष कारण शायद ही कभी समझा जाता हो । पर बच्चों में लगभग आधी मौतें इसी से होती हैं । भोजन का अभाव, पोषण के गलत ढंग और संक्रमण, या इन दोनों का संयोग मृत्यु का प्रमुख कारण है ।

पोषाहार की स्थिति संक्रमण से बिगड़ती है, विशेष रूप से बार-बार या लंबे चलनेवाले दस्त, निमोनिया, खसरे और मलेरिया से । पोषण के गलत ढंग-अपर्याप्त स्तनपान, गलत ढंग का भोजन या अपर्याप्त भोजन-कुपोषण को बढ़ाते हैं । कुपोषित बच्चों के बीमार पड़ने का डर अधिक होता है । स्तनपान अधिक कराना, भोजन में सुधार और जरूरतमंद बच्चों को नियमित रूप से सूक्ष्म पोषकतत्त्व देना ऐसे उपाय हैं जो मृत्युदर में कमी लाते हैं ।

स्तनपान में थोड़ी-सी वृद्धि से 5 साल से कम आयु में 10 प्रतिशत मौतें रोकी जा सकती हैं । माताएँ अगर कम से कम पहले चार और संभव हो तो छह माह तक बच्चों को स्तनपान कराएँ तो दस्त की संभावनाएँ और कुछ हद तक साँस के रोगों की घटनाएँ कम हो जाती हैं । जलयुक्त पेयपदार्थों की छोटी-छोटी मात्राएँ भी स्तनपान में कमी लाती हैं जिससे शरीर भार में कम वृद्धि होती है और दस्त का खतरा बढ़ता है । जब तक संभव हो, स्तनपान जारी रखने से पोषाहार की स्थिति में सुधार आता है ।

माताएँ अकसर छह माह से पहले ही अपने शिशुओं को दूसरे खाद्य और द्रव पदार्थ देने लगती हैं क्योंकि वे समझती हैं कि उनका स्तनपान कराना अपर्याप्त है । स्तनपान की तकनीकों और लाभों पर माताओं को प्रत्यक्ष परामर्श देने से कुपोषण की दशा में कमी आ सकती है ।

भारत में पर्यावरण की स्थिति तथा महिलाओं और बच्चों के कल्याण के बीच गहरा संबंध है । ग्राम और नगर दोनों में महिलाएँ पुरुषों से अधिक समय तक काम करती हैं, खासकर निम्न आयवर्गों में । उनके काम का ढर्रा अलग होता है और अकसर उनमें स्वास्थ्य संबंधी खतरे अधिक होते हैं ।

रोजाना पानी, लकड़ी और चारा लाना ग्रामीण स्त्रियों का मशक्कत वाला काम होता है । नगरीय क्षेत्रों में निम्न आयवर्ग की स्त्रियाँ गंदी बस्तियों के भीड़ और धुएँ से भरे झोपड़ों में रहती हैं और लंबे समय तक अंदर ही काम करती हैं जिससे साँस के रोग होते हैं ।

नगरीय क्षेत्रों में अनेक स्त्रियाँ कबाड़ जमा करके जीविका कमाती हैं । वे कचरे से प्लास्टिक, धातु और अन्य पुनर्चालन योग्य वस्तुएँ अलग करती हैं । इस प्रक्रिया में उन्हें अनेक प्रकार के संक्रमण लगते हैं । वे बहुत महत्त्वपूर्ण पर्यावरणीय सेवाएँ प्रदान करती हैं, पर इस काम के बदले वे बहुत कम रकम पाती हैं और विभिन्न रोगों से ग्रस्त हो जाती हैं ।

महिलाएँ और लड़कियाँ अकसर सबसे बाद में भोजन करती हैं क्योंकि परंपरागत समाज में उनका काम परिवार का भोजन पकाना और पहले पति और बेटों को खिलाना होता है । इस प्रकार, अपर्याप्त खुराक से कुपोषण और रक्तहीनता की स्थिति पैदा होती हैं ।

भारत में लड़कों की अपेक्षा लड़कियों पर कम ध्यान दिया जाता है; उन्हें शिक्षा की सुविधाएँ भी कम दी जाती हैं । इस तरह वे परवर्ती जीवन में पुरुषों से प्रतियोगिताएँ नहीं कर पातीं । यह सामाजिक और पर्यावरणीय भेद चिंता का विषय है और इसे देशभर में दूर किए जाने की आवश्यकता है ।

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