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“Experimentalist Era” in Hindi Language

प्रयोगवादी युग । “Experimentalist Era” in Hindi Language!

प्रयोगवाद की प्रवृत्तियां (विशेषताएं सन् 1943-1950 तक):

अज्ञेय के 1943 के तारसप्तक (प्रथम) के प्रकाशन के साथ-साथ हिन्दी काव्य साहित्य में सन् 1943 से 1950 तक का समय प्रयोगवाद के नाम से जाना जाता है । इस युग में भाव एवं शिल्प की दृष्टि से जो नये-नये प्रयोग किये गये, उसे प्रयोगवाद का नाम दिया गया है । संक्षेप में इस काल की निम्नलिखित प्रवृत्तियां एवं विशेषताएं हैं:

1. नवीन उपमानों का प्रयोग:

प्रयोगवादी कवियों ने काव्य के पुराने एवं प्रचलित उपमानों के स्थान पर नवीन उपमानों का प्रयोग किया है । प्रयोगवादी कवियों के अनुसार: ‘काव्य के पुराने उपमान मैले हो गये हैं, पुराने पड़ गये है ।’ प्रयोगवादी कवि नायिका के मुख सौन्दर्य के लिए नवीन उपमान का प्रयोग करता है ।

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1. चेहरा चिकना कसा हुआ,

काले बैंगन सा ।

प्रयोगवादी कवि सपनों के टूटने की स्थिति में:

2. मेरे सपने ऐसे  टूटे ।

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जैसे टूटा कोई भुंजा पाहड़ ।

2. यौन भावनाओं का खुला चित्रण:

प्रयोगवादी कवियों ने यौन भावनाओं का अत्यन्त खुला चित्रण किया है, जिसके कारण ऐसे वर्णनों में अश्लीलता का समावेश हो गया है । नवीन उपमानों के प्रयोग में कवि ने ऐसे ही नग्न चित्रणों को स्थान दिया है ।

3. बुद्धिवाद की प्रधानता: प्रयोगवादी कवियों ने अपनी कविताओं में बुद्धि तत्त्व को अधिक प्रधानता दी है, जिसके कारण वर्णनों में दुरूहता आ गयी है ।

4. निराशावाद की प्रधानता:  प्रयोगवादी कवियों ने मानव मन की निराशा, कुण्ठा, हताशा जैसी भावनाओं का अत्यन्त यथार्थता के साथ वर्णन किया है ।

5. लघुमानव वाद की प्रतिष्ठा:  प्रयोगवादी कवियों ने मानव जीवन की छोटी-से-छोटी वस्तु को अपनी कविता का विषय बनाया । उन्होंने चाय की प्याली, चूड़ी का टुकड़ा, गरम पकौड़ी, फटी ओढ़नी आदि लघु चीजों को भी अपनी कविता का विषय बनाया ।

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6. ईश्वर के प्रति अनास्था:  प्रयोगवादी कवि ईश्वर के प्रति अपनी अनास्था को व्यक्त करता है । वह मानव को ईश्वर की तुलना में अधिक महत्त्व देता है ।

7. अहं की प्रधानता:  प्रयोगवादी अपने अहं को अधिक महत्त्व देता है । फ्रायड के इस ‘मनोविश्लेषणवाद’ का अतियथार्थता के साथ प्रयोगवादी कवियों ने विश्लेषण किया है ।

8. प्राचीन रूढ़ियों के प्रति विद्रोह:  प्रयोगवादी कवियों ने प्राचीन परम्परागत रूढ़ियों के प्रति विद्रोह की भावना व्यक्त की है । वह शोषण एवं अन्धविश्वासों से मुक्त नवीन समाज की स्थापना करना चाहता है ।

9. अस्पष्ट एवं दुरूह प्रतीकों का प्रयोग:  प्रयोगवादी कवियों ने अपनी कविताओं में अस्पष्ट एवं कठिन प्रतीकों का प्रयोग किया है ।

10. मुक्त छन्दों का प्रयोग:  प्रयोगवादी कवियों ने अपनी कविताओं में मुक्त छन्दों का प्रयोग किया है । अतुकांत रचनाओं के प्रयोग से कविता के भावों को एक साथ (समवेत स्वर) ग्रहण करने में कठिनाई का अनुभव स्थान-स्थान पर होता है ।

11. व्यंग्य की प्रधानता:  प्रयोगवादी रचनाओं में व्यक्ति एवं समाज दोनों ही स्थितियों पर करारे व्यंग्य प्रहार किये हैं । जैसे:

सांप तुम सभ्य नहीं हुए ।

यह तो बताओ तुमने

डसना कहां से सीखा

इतना विष कहां से पाया ।

12. निष्कर्ष:  निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि प्रयोगवादी काव्य अपने नवीन प्रयोग, नवीन विषयवस्तु एवं प्रतीकोंके कारण अपनी विशिष्ट पहचान रखता है ।

प्रयोगवादी कवि:

1. अज्ञेय – हरी घास पर क्षण भर, इत्यलम, आगन के पार द्वार, इन्द्रधनुष ये रौंदे हुए, बावरा अंधेरी ।

2. मुक्तिबोध – चांद का मुंह टेढ़ा है, भूरी-भूरी खाक धूल ।

3. धर्मवीर भारती – अंधा युग, कनुप्रिया ।

4. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना – बांस का पुल, एक सुनी नाव, काठ की घण्टियां ।

5. नरेश मेहता – संशय की एक रात ।

6. गिरिजा कुमार माथुर – धूप के धान, शिला पंख चमकीले ।

7. दुष्यन्त कुमार – एक कण्ठ विषपायी ।

8. भारत भूषण अग्रवाल – ओ प्रस्तुत मन ।

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