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“Maha Shivratri” in Hindi Language

महाशिवरात्रि । “Maha Shivratri” in Hindi Language!

1. प्रस्तावना ।

2. शिव का स्वरूप ।

3. महाशिवरात्रि का पौराणिक महत्त्व ।

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4. मनाने की रीति ।

5. उपसंहार ।


1.प्रस्तावना:

भारतभूमि धर्म प्राण-भूमि रही है । यहां के जन-जीवन एवं संस्कृति में 33 करोड़ देवी-देवताओं, सन्त-महात्माओं की पूजा-अर्चना करके अपने धार्मिक भाव को प्रकट करने की परम्परा रही है । हमारे धार्मिक ग्रन्धों में ब्रह्मा, विष्णु महेश इन तीनों देवताओं को सृष्टि के रचनाकर्त्ता, पालनकर्त्ता एवं संहारकर्त्ता के रूप में महत्त्व प्रदान किया गया है ।

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भगवान् शिव के प्रलयंकारी रूप के कारण ही उन्हें प्रलय का देवता कहा जाता है । भगवान् शिव को हमारे यहां भोलेनाथ, पशुपति नाथ, शंकर, आशुतोष पार्वतीनाथ, गौरीपति, भोले भण्डारी, महादेव आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है और उनकी पूजा-अर्चना की जाती है । उन्हें विशेष रूप से ‘नीलकण्ठ’ भी कहा जाता है ।

सृष्टि को विनाश से बचाने के लिए विष का पान करने वाले भगवान शिव ‘सत्य’ एवं ‘कल्याणकारी’ स्वरूप के साक्षात रूप हैं । उनकी सत्ता-महत्ता न केवल देवताओं के लिए है, वरन् पृथ्वीलोक के लिए भी है । महाशिवरात्रि के दिन विशेष रूप से भक्तगण उनकी पूजा एवं प्रार्थना बड़े ही भक्तिभाव से करते हैं ।

2. शिव का स्वरूप:

शिव का स्वरूप शुभ व कल्याणकारी है । वे तो लोक मंगल के देवता हैं । त्रिदेवों में वे अकेले ऐसे देवता हैं, जिनकी निराकार एवं साकार दोनों ही रूपों में आराधना की जाती है । शिवलिंग को उनके ज्योतिर्मय निराकार रूप का महास्वरूप माना गया है ।

शिवपुराण में लिंग का तात्पर्य ओंकार तथा (प्रण) से है, जो स्थूल और  मूल्य दोनों ही रूपों में सर्वत्र, सृष्टि में व्याप्त है । शिव शक्ति, कल्याण एवं ऊर्जा के साक्षात प्रतीक हैं । बारह ज्योतिलिंगों में शिव की उपासना से यह सिद्ध होता है कि वे उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम तक लोकमंगल के देवता हैं । बारह स्वरूपों में सम्पूर्ण संसार उनकी वन्दना करता है । उनकी वेशभूषा अघोरी सन्तों की तरह है ।

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लाल-लाल उनकी बड़ी आखें, सिर पर चन्द्रच्छू, उस पर फणीधर नाग का तना हुआ फण, चन्द्र और गंगा की धारा, गले में सांप लिपटा हुआ, साथ ही बांहों व कलाई पर लिपटे नाग, कमर पर लिपटी मृगछाल, मृगछाल का आसन, वाहन के लिए नन्दी बैल, त्रिशूल एवं रूद्राक्षधारी नीला शरीर, ताल-बैताल, भूत-प्रेतादि, गणों से घिरे हुए, कैलाश पर्वत शिखरवासी, साधना के समय श्मशानघाट वासी, ऐसे देवता हैं, जो स्थिर भी हैं और निरन्तर गतिशील भी हैं ।

जनमानस में स्थापित उनका लोक-रूप ऐसा कि वे आशुतोष हैं, अर्थात थोड़ी-सी पूजा एवं नामस्मरण में तुरन्त प्रसन्न होने वाले । वे सचमुच भोलेनाथ हैं । भस्मासुर जैसे राक्षसों को वरदान देते हैं । वे अपने पदचाप तथा डमरू से नृत्य एवं संगीत का सृजन करते हैं ।

जब वे ताण्डव नर्तन करते हैं, तो सम्पूर्ण लोक में फैली कलुषता शमन हो जाती है । वे संघर्ष का आवाहन देते हैं, जब उन्हें हर-हर महादेव कहकर पुकारा जाता है । शिव रस के अधिष्ठाता हैं, कभी रौद्र रस के, तो कभी शान्त रस के, तो कभी शृंगार के ।

वे अर्द्धनारीश्वर रूप में कोमलता और कठोरता के पर्याय हैं । उनका अर्द्धनारीश्वर रूप यह सन्देश देता है कि बिना शक्ति के शिवत्व कभी पूर्णता को प्राप्त नहीं होता । वे एक-दूसरे के पूरक है । नर हो या नारी । उनका नीलकण्ठ लोककल्याण का सच्चा प्रतीक है । समुद्र मन्धन के चौदह रत्नों में से निकला-अमृत और विष ।

अमृत तो सभी पीना चाहते हैं, किन्तु शिव लोक रक्षा के लिए गरल को अपने कणव से नीचे उतार लेते हैं । गरल के प्रभाव से शिवजी का शरीर नीला पड़ जाता है । वे स्वयं कष्ट सह लेते हैं, सृष्टि को विनाश से बचा लेते हैं । शिवजी का तीसरा नेत्र-दिव्य चक्षु है अन्तर्दृष्टि का, जिसमें अग्नि का तेज समाया हुआ है । यह नेत्र जब खुलता है, तो समरत प्रकार की विकृतियों को जला देता है ।

भाल पर विराजता अर्द्धचन्द्र, जटाओं से प्रवाहित गंगा, दोनों ही शीतलता के प्रतीक हैं । गंगा गतिशीलता की प्रतीक है । उनके शरीर पर सुशोभित भस्म विकृतियों को भस्मीभूत कर आध्यात्मिक कान्ति की चमक को रमा लेती है ।

श्मशानवासी और कैलाशवासी शिव स्थान निरपेक्ष हैं । त्रिशूलधारी शिव जगत् में ब्याज अज्ञान एवं विषयासक्ति भाव को उससे नष्ट करते हैं । उनका डमरू ज्ञान, कला एवं दिशाओं में व्याप्त स्वरों की व्यंजना करता है । उनका वाहन नन्दी धर्म का प्रतीक है, जो श्वेत रूप लिये हुए है । गणेश और कार्तिकेय उनके पुत्र हैं । पार्वती उनकी प्राणप्रिया ।


3. महाशिवरात्रि का पौराणिक महत्त्व:

शिवपुराण की कथा के अनुसार भगवान् शिव वर्ष में छह मास तक कैलाश पर्वत पर रहकर तपस्यालीन रहा करते हैं । उसके बाद छह मास तक कैलाश पर्वत से उतरकर धरती के श्मशान घाट पर वे रमते हैं ।

कैलाश पर्वत से धरती पर अवतरण होने के साथ सृष्टि के समस्त कीट-पतंगें भी उनके साथ धरती पर आ जाया करते हैं उनका अवतरण फागुन मास की कृष्णपक्ष की त्रयोदशी को हुआ करता है ।

यह महान् दिन ही शिव भक्तों के लिए महाशिवरात्रि के नाम से प्रसिद्ध है । उनका अवतरण सृष्टि के संरक्षक एवं संहारक का है, जो भौतिक एवं आध्यात्मिक चेतना का समन्वित रूप है । उनका कल्याणकारी रूप ही उन्हें जनमानस में सबसे लोकप्रिय बनाता है ।

वे महायोगेश्वर हैं, चैतन्य हैं । सर्वव्यापक एवं नित्य सृष्टि की चेतना में निहित हैं । उनका शिवत्व पूरे ब्रह्माण्ड में विकास एवं विनाश दोनों ही रूपों में व्याप्त है ।

4. मनाने की रीति:

महाशिवरात्रि के दिन भक्तगण निराहार रहकर उनकी आराधना करते हैं । दूध मिश्रित शुद्ध जल से शिवलिंग को रनान करा, बिल्वपत्र, बद्रीफल, पुष्प, धतूरा चढ़ाकर उन्हें प्रसन्न करते हैं । रात्रि जागरण कर भक्तगण उनकी आराधना में विकृतियों पर विजय एवं अभय की याचना करते हैं ।

5. उपसंहार:

सत्यम शिवम एवं कल्याणकारी रूप में सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त भगवान् शिव मानवों और दानवों के भी प्रिय देवता रहे हैं । वे विकृतियों पर सुकृतियों की विजय के देवता हैं । तुरन्त फल देने वाले, भक्तों के मनोरथ को शीघ्र पूर्ण करने वाले देवता हैं । तेज, शक्ति, शान्ति तथा मंगल के देवता शिव सर्वव्याप्त हैं । उनकी आराधना प्रकृति की आराधना है । वे प्रकृति में ब्याज विशुद्ध चेतन सता हैं ।

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