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“Pongal and Onam” in Hindi Language

पोंगल और ओणम का त्योहार । “Pongal and Onam” in Hindi Language!

1. प्रस्तावना ।

2. पोंगल और  ओणम का महत्त्व ।

3. मनाने की रीति ।

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4. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

त्योहारों के देश भारत में प्रत्येक त्योहार की अपनी अलग विशेषता है । हर त्योहार अनूठा है, विलक्षण है । चाहे वह होली हो, दीपावली हो या दशहरा या फिर महाराष्ट्र का गणेशोत्सव या फिर बंगाल का दुर्गोत्सव । इसी तरह पोंगल एवं ओणम-दक्षिण भारत के ये दोनों त्योहार प्राकृतिक पर्यावरण एवं महत्त्व से जुड़े होने के साथ-साथ धार्मिक एवं सामाजिक महत्त्व भी रखते हैं ।

2. पोंगल का महत्त्व:

दक्षिण भारत का यह त्योहार अपने सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्त्व के साथ-साथ मुख्यत: कृषि सम्बन्धों से जुड़ा हुआ है । तमिलनाडु में पोंगल के दिन गाय-बैलों की पूजा अत्यन्त भक्ति-भाव से की जाती है ।

आनन्द और उल्लास से मनाये जाने वाले इस त्योहार को कृषि एवं सम्पन्नता से विशेषत: जोड़ा जाता है । मिट्टी के बर्तन में, लिपे हुए आंगन में बने हुए चूल्हे पर दूध भरकर उसमें उबाला जाता है । फिर उसे उफनाया जाता है । उफनाने का प्रतीकात्मक महत्त्व यह है कि दूध के समान ही व्यक्ति की आत्मा, उनका हृदय एवं मन पवित्र एवं स्वच्छ होना चाहिए ।

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उसमें उफनती हुई उदारता एवं दयालुता होनी चाहिए । सूर्य देवता की प्रार्थना में भी यही भाव निहित होता है । जिस दिन उत्तर भारत में मकर संक्रान्ति मनाई जाती है, उसी दिन तमिलनाडु में पोंगल मनाया जाता है ।

पोंगल का मुख्य पर्व यद्यपि पौष मास की प्रतिपदा के दिन ही मनाया जाता है, परन्तु यह प्रतिपदा से चार-पांच दिन तक मनाया जाता है । खेतों में लहलहाती हुई धान की बालियों के बीच यह त्योहार एक आनन्दोत्सव का वातावरण ला देता है ।

घरों में लिपाई-पुताई रंग-रोगन के साथ लोग हानिकारक रीति-नीतियों को, कुविचारों, दुष्प्रवृत्तियों को त्यागने का निर्णय लेते हैं । इस अवसर पर दुकानों में सजावट की चीजों में विशेषत: नये-नये बर्तन होते हैं, जिनमें दूध औटाकर आंच पर चढ़ाया जाता है ।

दूध में उबाल आते ही सभी जन ”पोंगल-पोंगल” कहकर उत्साह से चिल्लाने लगते हैं । घरों, गलियों, खेतों, बाजारों, खलिहानों में जाकर लोग घरों में तैयार की गयी खीर, पकवान इत्यादि को सूर्य देवता के समक्ष खाते हैं ।

ओणम का महत्त्व:

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जिस तरह से तमिलनाडु में पोंगल मनाया जाता है, उसी तरह केरल में ओणम मनाया जाता है ।  यह त्योहार पौराणिक गाथाओं के साथ-साथ प्रकृति एवं ऋतु परिवर्तन से भी जुड़ा हुआ है । ओणम के समय खेतों में नयी फसलें पककर तैयार होंकर आती हैं, जिसे लोग ओणम के रूप में अपनी प्रसन्नता जाहिर कर मनाते हैं ।

एक पौराणिक कथा के अनुसार-अपनी माता की हत्या के प्रायश्चितस्वरूप परशुराम ने अपने पिता जमदग्नि से उन्हें पुनर्जीवित करने का वरदान  मांगा । बाद में इस घटना के पश्चाताप के रूप में समुद्र तट से जितनी दूरी पर फरसा फेंका और जितनी दूर तक समुद्र पीछे हटा, उतनी ही भूमि उन्होंने   ब्राह्मणों  को दान में दी ।

कालान्तर में इसमें केरल को बसाया गया । ओणम के इस पर्व के साथ जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार: ‘वामन अवतार’ धारण कर भगवान् ने राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी, तो वामन ने दो पग धरती को नापने के बाद तीसरा पग बलि के सिर पर रखा ।

बलि पाताललोक चले गये, किन्तु कहा जाता है कि महाराज बलि ओणम के दिन अपनी प्रजा को देखने के लिए आया करते थे । तभी से केरलवासी उनके आने की खुशी में यह त्योहार मनाते हैं । एक ओर राजा बलि का आगमन, तो दूसरी ओर नयी-नयी फसलों का आना । ये दोनों उत्साह ओणम के त्योहार से ही सम्बन्धित हैं ।

3. मनाने की रीति:

ओणम तथा पोंगल यह दोनों पर्व दक्षिण भारत में अत्यन्त ही उत्साह से मनाये जाते हैं । ओणम के दिन केरलवासी अपने घर-द्वार व आगन को बड़े ही सुरुचिपूर्ण ढंग से सजाते हैं । घर-आंगन की लिपाई-पुताई की जाती है ।

फूलों से रंगोली बनाकर अपने आगन को आकर्षक ढंग से सजाते हैं । घरों में महिलाएं वन्दनवार एवं तोरण सजाती हैं । गीत, संगीत, नाटक, अर्थात् ‘विलु कोटल’ यानी सामूहिक आयोजन किये जाते हैं । इस अवसर पर नौकाचालन प्रतियोगिता का समुद्र तट पर विशेष रूप से आयोजन किया जाता है ।

बाल-बच्चे, बूढ़े इस त्योहार को बड़े ही उत्साह से मनाते हैं । पोंगल के दिन घर की महिलाएं स्नान कर नये वस्त्रादि धारण करती हैं । पुरुष व बच्चे रंग-बिरंगे वस्त्रों से सुसज्जित होकर घर में बने पकवानों का आनन्द लेते हैं । तिल के बने पदार्थो को खाते व खिलाते है । इस अवसर पर चावल की खीर भी बनाई जाती है ।

4. उपसंहार:

इस तरह हम देखते हैं कि हमारे सभी भारतीय त्योहार धार्मिक एवं सामाजिक महत्त्व के साथ-साथ पर्यावरण एवं प्रकृति से भी घनिष्ठ सम्बन्ध रखते हैं । प्रकृति की सम्पन्नता एवं समृद्धि में त्योहारों का सौन्दर्य छिपा हुआ है ।

वास्तव में उल्लास एवं उमंग, सम्पन्नता एवं श्रीवृद्धि, यही तो त्योहारों के रंग हैं । उन्हीं रंगों में से एक है: ओणम । दूसरा है: पोंगल, जो भारतीय संस्कृति एवं लोक-जीवन को अपनी मंगलमयी सुगन्ध से सरोबार कर देते हैं ।

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