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Proverb on “Laziness” in Hindi Language

दैव-दैव आलसी पुकारा । Proverb on “Laziness” in Hindi Language!

1. प्रस्तावना ।

2. आलस्य मनुष्य का शत्रु ।

3. आलस्य से हानि ।

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4. आलस्य त्याग का महत्त्व ।

5. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

इस संसार में कुछ मनुष्य ऐसे होते हैं, जो कर्म को प्रमुख मानते हैं और कुछ तो भाग्य को सर्वप्रमुख मानते हैं । ऐसे व्यक्ति संसार के कष्टों, संघर्षों और कठिनाइयों का सामना नहीं करते हैं, वे असफलताओं से डरते हैं ।

कुछ ऐसे कर्मवीर, साहसी, उद्यमी मनुष्य होते हैं, जो किसी भी प्रकार के संघर्षो से न घबराकर अपने कर्म के बल पर जीवन जीते हैं । ऐसे व्यक्ति पुरुषार्थ को ही जीवन मानते हैं । जो व्यक्ति भाग्य पर विश्वास करते हैं, वे आलसी, अकर्मण्य, निरूद्यमी होते हैं, वे भगवान भरोसे बैठे रहते हैं । उनके जीवन का मूलमन्त्र यही होता है:

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”अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम ।

दास मलूका कह गये, सबके दाता राम ।।”

इस दोहे को अपने जीवन का आदर्श मानने के कारण भाग्य भरोसे बैठकर देश के लाखों लोग निठल्ले और निकम्मों की श्रेणी में गिने जाने लगे थे । एक समय था, जब चीन जैसा देश अपनी इसी अकर्मण्यता के कारण कर्मवीर देश जापान के सामने बौना नजर आता था । यह सत्य है कि जिस देश या समाज के लोग आलसी होकर भाग्य के भरोसे बैठे रहेंगे, वह राष्ट्र कदापि उन्नति नहीं कर सकता ।

2. आलस्य मनुष्य का शत्रु:

आलस्य को मानव-जाति का सबसे बड़ा शत्रु माना गया है । संस्कृत के एक  नीति श्लोक में यहां तक कहा गया है कि: ”आलस्य हि मनुष्याणां शरीरस्यो महारिपु ।” आलस्य से बढ़कर मनुष्य की अवनति का कोई भी कारण नहीं हो सकता । यह भी कहा गया है:  कायर मन कहै एक अधारा, दैव-दैव आलसी पुकारा ।

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अर्थात् आलसी मनुष्य ही दैव-दैव का, भाग्य का, प्रारब्ध का, काल और समय का अनावश्यक आश्रय लेते हैं । जब उन्हें जीवन में असफलता मिलती है, तो इसके लिए वे अपने भाग्य तथा ईश्वर को कोसते हैं । ऐसे व्यक्ति उस कायर कुत्ते की तरह अपमानजनक जीवन जीते हैं, जिनके जीवन का कोई अर्थ नहीं होता ।

आलसी व्यक्ति को संसार अपमान, घृणा, तिरस्कार की दृष्टि से देखता है । ऐसे लोग आजीवन दुःख झेलते हैं । उनके जीवन में सुख और शान्ति का सदैव अभाव रहता है । महात्मा गांधी ने भी कामचोर व कायरों के लिए कहा था: ‘जो अपने हिस्से का काम किये बिना भोजन पाते हैं, वे चोर हैं ।’ बाइबिल में भी यही कहा गया है: ‘कामचोर व्यक्ति को तो खाना खाने का भी अधिकार नहीं है ।’

3. आलस्य से हानि:

आलस्य से मानव की समस्त चेतनाएं और शक्तियां नष्ट हो जाती हैं । उसकी बौद्धिक तथा आध्यात्मिक शक्तियों का ह्रास होने लगता है । ऐसा व्यक्ति जीवन में निराशा से घिर जाता है । उदासीनता के कारण समाज के अपमान का पात्र बनता है ।

यदि विद्यार्थी पढ़ाई के समय आलस्य करता है, तो वह पढ़ाई में सफल नहीं होगा । यदि कोई परिवार का स्वामी आलसी रहेगा, तो परिवार के सभी सदस्य उसका अनुकरण करेंगे और परिवार के सारे कार्य भी नहीं हो पायेंगे । यहां तक कि उनके लिए जीवन निर्वाह करना कठिन हो जायेगा ।

4. आलस्य त्याग का महत्त्व:

आलस्य त्याग करने पर मनुष्य के लिए उन्नति के द्वार स्वयं ही खुल जायेंगे । सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर वर्तमान युग की आधुनिक, वैज्ञानिक सभ्यता तक मनुष्य ने जो उपलब्धियां प्राप्त की हैं, उसका सारा श्रेय कर्म को ही जाता है ।

प्रकृति के समस्त उपादान निरन्तर अपने कर्म में ही लगे रहते हैं । छोटे-से-छोटे जीवों में. चींटियों, मधुमक्खियों को देखा जाये, तो वे अनवरत श्रम करते रहते हैं । गतिशील रहना ही मनुष्य तथा प्रकृति का स्वभाव रहा है ।

लंका तक पहुंचने के मार्ग में जब लम्बा समुद्र आड़े आया, तो वानरों की सेना ने आगे बढ़ने हेतु पत्थरों पर ‘राम’ का नाम लिखकर उसका एक पुल बनाया और समुद्र को लांघ लिया । इसी तरह चाहे नेपोलियन हो या सिकन्दर अपने लक्ष्य की सफलता के लिए उन्होंने कर्म का ही आश्रय लिया । इस संसार के महान् लोगों ने सदैव कर्म को ही प्रमुखता दी है, तभी तो वे अपने ध्येय तक सफलता से पहुंचे ।

आलस्य त्याग करने पर मनुष्य के शरीर में ऊर्जा, स्फूर्ति और उत्साह का संचार होता है । सफलता पाकर उसका आत्मविश्वास दूना हो जाता है । अपने परिश्रम की कमाई से प्राप्त होने वाला धन-वैभव मनुष्य को एक अद्‌भुत आत्मसन्तुष्टि दे जाता है । आज विश्व के समस्त देश परिश्रम के कारण ही निरन्तर प्रगति के पथ पर अग्रसर हो रहे हैं । मानव का जीवन आज अधिकाधिक सुविधायुक्त होता जा रहा है ।

5. उपसंहार:

आलस्य मनुष्य का सचमुच ही महान् शत्रु है; क्योंकि वह उसे सभी तरफ से अवनति के गर्त में धकेलता जाता है । ऐसा मनुष्य तो मानव जीवन जीने की सार्थकता को खो देता है । वे काम को टालने की प्रवृत्ति का नया सिद्धान्त कुछ इस तरह गढ़ते हैं:

आज करै सौ काल कर, काल करै सौ परसो ।

जल्दी-जल्दी क्या करता है ? अब तो जीना है बरसो ।।

इसके विपरीत श्रम तथा कर्म को महत्त्व देने वाले व्यक्ति न केवल सफल और सार्थक जीवन जीते हैं, अपितु उनके जीवन का तो यही आदर्श होता है:

उद्यमेन हि सिद्धयन्ति कार्याणि न मनोरथै: ।

न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा: ।

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