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“Romanticism” in Hindi Language

स्वच्छन्दतावाद । “Romanticism” in Hindi Language!

1. प्रस्तावना ।

2. मुख्य प्रवृत्तियां ।

3. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

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हिन्दी काव्यशास्त्र में स्वच्छन्दतावाद शब्द का प्रयोग अंग्रेजी के रोमांटि-सिज्य के आधार पर हुआ है । इस शब्द की व्युत्पत्ति फ्रांसीसी भाषा के रोमांस, रोमाच्य शब्द से हुई है । इसी का विशेषण रोमांटिक है । रोमांस प्रधान यूरोपीय साहित्य में जो प्रेम, शौर्य, छल-कपट एवं उद्दाम वासनाओं का प्राधान्न था, उसे स्वच्छन्दतावाद कहा गया ।

स्वच्छन्दतावाद, नवशास्त्रवाद की प्रतिक्रिया स्वरूप उत्पन्न हुआ है । इसकी विद्रोहात्मक प्रवृत्ति ने काव्य को कृत्रिमता के बन्धन से बांधा है । साहित्य में स्वच्छन्दतावाद की लहर जर्मन, इंग्लैण्ड, फ्रांस, इटली, पुर्तगाल, रूस, पोलैण्ड, भारत में हुई ।

अंग्रेजी में स्वछन्दतावाद का उन्नायक वर्ड्सवर्थ को माना जाता है । इसके बाद कॉलरिज, किडस आदि को माना जाता है । आचार्य शुक्ल ने श्रीधर पाठक को इस वाद का प्रवर्तक माना है । हिन्दी में यह आन्दोलन बंगला साहित्य के माध्यम से छायावादी काव्य में आया ।

2. स्वच्छन्दतावाद की प्रवृतियां:

स्वच्छन्दतावाद, सौन्दर्य भावना, प्रकृति प्रेम, मानवीय दृष्टिकोण, आत्माभिव्यंजना, नीति विद्रोह, रहस्यमय भावना, व्यक्तिगत प्रेमाभिव्यक्ति, अहं के उदात्तीकरण, निराशा, पलायन, नवीन कल्पना, गहन विश्वास की विशेषताओं से युक्त है । 1920-1935 तक की अवधि में स्वच्छन्दतावाद के नाम से अभिहित इस वाद की निम्नलिखित प्रवृतियां हैं:

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(क) विद्रोह की प्रवृत्ति:  स्वछन्दतावाद, भाषा शैली और विषयवस्तु की दृष्टि से सभी क्षेत्रों में विद्रोह का साहित्य है । फ्रांसीसी राज्यक्रान्ति से सम्बन्धित होने के कारण राजनीतिक प्रभाव से स्वछन्दतावाद विद्रोहात्मक है ।

स्वछन्दतावादी कवि न केवल भौतिक शक्तियों के अत्याचार व अनाचार के विरुद्ध है, अपितु वह नीति, धर्म, साहित्यिक परम्पराओं और शास्त्रीय नियमों का भी विरोध करता है । इस वाद के कवियों ने कुलीन पात्रों की अपेक्षा सामान्य पात्रों को अपने काव्य का विषय बनाया है ।

(ख) कृत्रिमता से मुक्ति:  स्वच्छन्दतावाद ने कवियों को आडम्बर तथा कृत्रिमता से मुक्ति दिलायी और सरलता, सहजता तथा प्रकृति की ओर आने का आग्रह किया । लिरिकल बेलेडस की रचना भी इसलिए हुई; क्योंकि इसमें सरल तथा सहज भावों को चित्रित किया गया है ।

(ग) कल्पना की प्रधानता:

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स्वच्छन्दतावादी काव्य कल्पना को प्रेरणादायक तत्त्व मानकर उसे प्राथमिकता देता है, इसलिए वह वास्तविक जगत की कठोरता और यथार्थता से दूर कल्पना के मनोरम जगत में विचरण करता है । इसी काल्पनिकता ने इस काव्य को सूक्ष्म, अमूर्त और मादक बना दिया है । कल्पना ने ही उसे रहस्यवादी बनाकर ईश्वरीय सत्ता का अनुभव प्रकृति के माध्यम से कराया है ।

(घ) पलायनवादी प्रवृत्ति:  स्वच्छन्दतावादी कवि संसार की कठोरता से ऊबकर स्वप्नलोक में विचरण करता है, जहां उसे कोई बाधा नहीं होती । स्वच्छन्दतावादी कवि वास्तविक जगत से पलायनवादी होकर आश्चर्य तथा अद्‌भुत के प्रति मोह रखता है ।

(ड.) व्यक्तिवाद की प्रधानता:  इस वाद का कवि अपनी रुचि, अपनी भावना, अपनी दृष्टि को ही प्रधानता देता है । कवि अपनी दृष्टि से ही काव्य की सर्जना करता है । आत्मानुभूति के कारण वह जीवन से अपना कोई सम्बन्ध नहीं मानता । उसके काव्य का नायक आत्मकेन्द्रित व्यक्ति होता है ।

(च) दु:खानुभूति की भावना:  स्वच्छन्दतावादी कवि स्वयं को संसार के संघर्षो से थका हुआ और परास्त मानता है । उसका मन वेदना, व्यथा, निराशा, कुण्ठा, उदासी, हताशा, अतिरिक्त आकांक्षा, अपूर्ण प्रेम, प्रिय की निष्ठुरता आदि के कारण दुखी रहता है । वह अपने प्रति सहानुभूतिपूर्वक सोचता है और जीवन को दु:खों से भरा हुआ पाता है, तो अपने को ही कष्ट पहुंचाने में उसे आनन्द का अनुभव होने लगता है ।

(छ) सौन्दर्य भावनाएं:  स्वच्छन्दतावादी काव्य में कल्पना के प्राचुर्य के कारण सौन्दर्यमयी भावना का सर्वथा चित्रण रहता है । कवि कीटस ने सौन्दर्य को ही शाश्वत सत्य माना है । उसका सौन्दर्य व्यक्ति सापेक्ष

है । इसके माध्यम से वह अपनी कुण्ठाओं की तृप्ति चाहता है ।

(ज) प्रकृति प्रेम:  स्वच्छन्दतावादी कवि प्रकृति को ही प्रेरणा मानकर मुक्त प्रांगण में विचरण करता  है । प्रकृति उसके सुख-दुःख की सहचरी है और वह उसे आल्हादकारी मानता है ।

(झ) संगीतात्मकता:  स्वच्छन्दतावादी कवि संगीतात्मकता और गीतात्मकता को विशेष प्रधानता देता है । अपने हृदय के उद्‌गारों की निष्पक्ष अभिव्यक्ति संगीत और गीत के माध्यम से करता है ।

3. उपसंहार:

समग्र रूप से यह स्पष्ट होता है कि स्वच्छन्दतावाद ने काव्य को प्राचीन तथा जर्जर काव्य रूढ़ियों से निकालकर स्वच्छन्द आकाश में उड़ने की प्रेरणा दी । यद्यपि दुःख और कल्पना की प्रधानता के कारण वह स्वयं में संकचित नजर आता है, तथापि व्यक्तिगत भावनाओं की स्वतन्त्र अभिव्यक्ति के कारण यह साहित्य अपना विशेष महत्त्व रखता है ।

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